इस बात में कोई दो राय नहीं हो सकती कि केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार ने अपने कार्यकाल में ना सिर्फ कई मामलों में विकास का कीर्तिमान स्थापित किया है बल्कि प्रभावशाली व कड़े फैसले भी लिये हैं जिससे ना सिर्फ घरेलू अर्थव्यवस्था की बल्कि विश्व स्तर पर देश की छवि में भी काफी निखार आया है। हालांकि मोदी सरकार के कड़े फैसलों का आम लोगों को कितना लाभ मिला है और इसके एवज में कितना बोझ सहन करते हुए नुकसान उठाना पड़ा है इस पर अलग से बहस हो सकती है। लेकिन इस बात में कोई दो राय नहीं है कि मोदी सरकार ने अपने पूर्ववर्तियों की तुलना में काफी हद तक संतुलित, बहुआयामी, विस्तृत और तेज गति व पारदर्शिता के साथ काम किया है। लेकिन इस बात को भी नकारा नहीं जा सकता है कि सरकार ने जितना काम किया है उससे कहीं अधिक काम को गिनाने में अपनी ऊर्जा खर्च की है। जितने काम की गिनती गिनाई जा रही है उतना जमीन पर बदलाव नहीं दिख रहा है। माना कि सरकार ने योजनाएं आरंभ की और उसे जमीनी स्तर पर पहुंचाने का प्रयास भी हुआ लेकिन इसे ऐसे गिनाना आम लोगों में चिढ़ का सबब बन रहा है मानो सरकार ने देश पर कोई बहुत बड़ा उपकार कर दिया हो और देशवासियों को उसका कृतज्ञ होना चाहिये। वास्तव में सरकार को चुना ही गया था देश हित में काम करने और देश का विकास करने के लिये। लिहाजा सरकार के संचालकों को तो आम लोगों का कृतज्ञ होना चाहिये कि उन्हें जनता ने काम करने का मौका दिया। साथ ही सरकार के संचालकों को इस बात के लिये अपने गिरेबान में भी झांकना चाहिये कि जिन अच्छे दिनों की उम्मीद बंधाई गई थी उसे वे कितना पूरा कर पाए और कितना नहीं कर पाए। सरकार बनाने से पहले सपने तो चांद-तारों के दिखाए गए थे लेकिन हकीकत में उन सपनों को पूरा कर पाना अब तक संभव नहीं हो पाया है। बात चाहे सबको अपना घर दिलाने की हो या सबको स्वास्थ्य बीमा का लाभ दिलाने की। गंगा को पूरी तरह अविरल व निर्मल करने की हो अथवा भ्रष्टाचारियों को सलाखों के पीछे पहुंचाने की। हर देशवासी को चैबीसों घंटे बिजली पाने का अधिकार दिलाने की बात हो, हर हाथ को काम या भूख से पूर्ण मुक्ति की। ये वो वायदे हैं जो मोदी सरकार के मौजूदा संचालकों ने स्पष्ट शब्दों में पिछले चुनाव के दौरान किये थे। लेकिन उपरोक्त में से एक भी वायदा अब तक पूरा नहीं किया जा सका है। आज भी ये बुनियादी जरूरतें आम लोगों के लिये सपना ही बनी हुई हैं। जमीनी धरातल पर सपनों को उतारने की मियाद 2022 की बताई जा रही है जबकि पूरा देश आजादी की 75वीं वर्षगांठ मनाएगा। लेकिन यह मियाद बताते समय सरकार के संचालक यह भूल जाते हैं कि जब उन्होंने इन सपनों को पूरा करने का वायदा करते हुए आम लोगों से वोट मांगे थे तब सरकार केवल 2019 तक के लिये ही चुनी जानी थी, 2022 तक के लिये नहीं। लिहाजा काम तो उन्हें कायदे से 2019 में ही पूरा करना चाहिये था। लेकिन मसला है कि सरकार और विपक्ष के बीच जारी बेमानी मसलों की खींचतान से फुर्सत मिले तो इन बातों पर किसी का ध्यान जाए। सरकार कतई नहीं चाहेगी कि लोगों को वे पुराने वायदे याद आएं और अगर किसी की जहन में उन सपनों के पूरा होने की उम्मीद बची भी हो तो वह 2022 के भरोसे शांत रहे। दूसरी ओर विपक्ष भी इन मसलों को तूल नहीं पकड़ने देना चाहेगा क्योंकि कल को अगर सत्ता की बागडोर उसके हाथों में आयी तो उसे इन सपनों को 2022 तक पूरा करना ही होगा। लेकिन इस सबके बीच आम लोगों के सपने और उम्मीदें हवा हो रहे हैं। इसी का नतीजा है कि बीते दिनों पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में भाजपा को जनता ने खारिज कर दिया। हालांकि बाकी मसलों पर तो कम से कम 2022 तक की उम्मीद बंधाई जा रही है लेकिन भ्रष्टाचार के जिन मामलों को आगे करके कांग्रेस को बदनाम व अलोकप्रिय किया गया उसके गुनहगारों को सत्ता में रहते हुए भी सजा नहीं दिला पाना निश्चित तौर पर यही बताता है कि इन मामलों को केवल राजनीतिक लाभ लेने के लिये ही तूल दिया गया था और अब एक बार फिर चुनाव करीब आता देख कर ऐसे मामलों को दोबारा उठाया गया था। वर्ना जिस काॅमनवेल्थ घोटाले को लेकर भाजपा ने आसमान सिर पर उठाया हुआ था उसके गुनहगारों की पहचान करना भी अब तक गवारा नहीं किया गया है। जिस राॅबर्ट वाड्रा को सरकार बनते ही सलाखों के पीछे डाले जाने की बात कही जा रही थी वह आज भी छुट्टा घूम रहा है। उसके खिलाफ ठोस कार्रवाई तो अब तक नहीं हुई अलबत्ता उस पर कीचड़ उछालने का सिलसिला बदस्तूर जारी है। यहां तक कि अगस्ता वेस्ट लैंड हेलीकाॅप्टर घोटाले में सीधे तौर पर कांग्रेस के शीर्ष संचालक परिवार को रिश्वतखोर बताया गया उसका सबसे बड़ा मास्टरमाइंड क्रिश्चन मिशेल को भारत लाने के बाद भी सिर्फ उसका नाम लेकर प्रधानमंत्री मोदी कांग्रेस को डराने और बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं। अगर वाकई मिशेल ने कोई सुराग दिया है तो अब तक पूछताछ भी क्यों नहीं हुई है गांधी परिवार के सदस्यों से? ये वो तमाम सवाल हैं जो आम लोगों के मन में उठ रहे हैं और उठने भी चाहिये। आखिर जिन उम्मीदों के पूरा होने की कल्पना करके लोगों ने भाजपा को सरकार बनाने का मौका दिया उस मसले पर तो मोदी सरकार के संचालकों से सीधा सवाल पूछा ही जा सकता है। क्योंकि ये सपने इन्हीं लोगों ने दिखाये थे। हालांकि सवाल तो उन सपनों पर भी पूछा जाना चाहिये जिसको पूरा करने का वायदा करते हुए भाजपा का गठन किया गया था लेकिन मौजूदा संचालकों को असहज करने वाले गौ-हत्या बंदी, राम मंदिर निर्माण, धारा-370 और समान नागरिक संहिता सरीखे मसलों को अगर छोड़ भी दें तो जो वायदे इन्हीं लोगों ने किये थे उन्हें भी तो अब तक पूरा नहीं किया गया है। इसके बावजूद अगर काम करने से अधिक गिनाने की रणनीति अपनाई जा रही है तो निश्चत ही यह वैसा ही आत्मघाती रहेगा जैसा वर्ष 2004 में भारत उदय और इंडिया शायनिंग जैसे लोगों को चिढ़ाने वाले नारों ने बैक-फायर किया था।
बुधवार, 26 दिसंबर 2018
मंगलवार, 25 दिसंबर 2018
इमरान का बचकानापन
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान बेशक स्थानीय घरेलू राजनीति में अपनी कामयाबी का झंडा गाड़ चुके हों लेकिन वास्तविकता यह है कि वे आज भी सिर्फ एक क्रिकेटर की मानसिकता के बोझ तले ही दबे हुए हैं। क्रिकेट को दरअसल माइंडगेम कहा जाता है। यह जितना जमीन पर खेला जाता है उससे कहीं अधिक दिमाग में होता है। विरोधी पक्ष के दिमाग को पढ़ना और उसके दिमाग को अपने मनमुताबिक नियंत्रित करना क्रिकेट का एक अहम पहलू है। इसकी के तहत विरोधी पक्ष के बारे में ऊटपटांग बातें की जाती हैं और उसे उकसाने का प्रयास किया जाता है। उसकाने की कोशिश के पीछे रणनीति रहती है विरोधी पक्ष की एकाग्रता को भंग करना और उसे गुस्से व आक्रोश से भर देना ताकि उसका असर विरोधी के खेल पर पड़े और वह अपना स्वाभाविक खेल ना दिखा पाए। इसी रणनीति को इमरान ने भारत और पाकिस्तान के रिश्तों के मामले में इस्तेमाल करके यह बेहतर तरीके से जता दिया है कि बेशक वे प्रधानमंत्री के ओहदे पर पहुंच चुके हों लेकिन उनकी मानसिकता क्रिकेटर वाली ही है। वर्ना वे कतई भारतीय मुसलमानों की स्थिति के बारे में टिप्पणी नहीं करते। या फिर ऐसी टिप्पणी करने से पहले वे पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की स्थिति पर विचार कर लेते। सच तो यह है कि इस बचकाने बयान के पीछे इमरान की वही रणनीति काम कर रही है जिसका खुलासा करते हुए उनके विदेशमंत्री ने करतारपुर गलियारे के शिलान्यास के मौके पर कहा था कि पाकिस्तान की ओर से फेंकी गई गुगली में भारत फंस गया है। लेकिन जब पाकिस्तान को लगा कि उसकी गुगली बेकार चली गई तो अब उसने उकसावे की रणनीति पर अमल आरंभ कर दिया है। पहली उकसावे की बात उसने बीते दिनों करतारपुर के मामले को लेकर ही की जिसके तहत करतारपुर का इलाका भारत को देने के एवज में कोई अन्य जमीन का टुकड़ा लेने के कथित भारतीय प्रस्ताव को उसने ढ़ोल पीटकर नकारने की पहल की। जबकि सच तो यह है कि पाकिस्तान से जमीन की अदला बदली का तो कोई सवाल ही नहीं है बल्कि अभी तो भारत को उसके कब्जे से अपनी जमीन का काफी बड़ा हिस्सा छुड़ाना है। उसके कब्जे में मौजूद अपनी जमीन छुड़ाने का प्रयास करने के बजाय भारत की ओर से पाकिस्तान के किसी जमीन की अदला बदली का प्रस्ताव सामने लाया जाएगा इसकी तो कल्पना करना भी मूर्खतापूर्ण ही है। लेकिन पाकिस्तान की ओर से ऐसे प्रचारित किया गया मानो भारत ने उसके पास इस तरह का कोई प्रस्ताव प्रस्तुत किया हो। लेकिन भारत की ओर से इस मामले में सधी प्रतिक्रिया दिया जाना भी जरूरी नहीं समझा गया तो अब भारत में हलचल मचाने की एक नयी तरकीब के तहत भारतीय मुसलमानों की स्थिति को लेकर अनावश्यक व बचकाना बयान इमरान खान की ओर से दिया गया है। हालांकि बेहद खुशी और गर्व की बात है कि इमरान के इस बयान का मुंहतोड़ जवाब देने के लिये सबसे पहले असदुद्दीन ओवैसी और नसीरूद्दीन शाह जैसे ही लोग सामने आए और उन्होंने पाकिस्तान के अल्पसंख्यकों के मसले को उठाकर इमरान को आइना दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इसके अलावा स्वाभाविक तौर पर हमारे गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने भी इमरान को उनकी औकात बताई है और पाकिस्तान की वास्तवकि जमीनी हकीकत को बेपर्दा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। लेकिन इस सबके बीच असली बात पर्दे के पीछे ही रह गयी कि आखिर इमरान ने क्या सोच कर ऐसा बयान दिया। अव्वल तो भारत की अंदरूनी बातों के बारे में बोलने का ना तो उन्हें कोई अख्तियार है और ना ही उनकी हैसियत, स्थिति या औकात है कि वे किसी भी मामले में भारत के सामने खड़े हो सकें। और दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि अगर उनके देश में अल्पसंख्यकों को मानवीय अधिकार भी मिले होते तो संभव था कि उनकी बातों को विश्व बिरादरी द्वारा गंभीरतापूर्वक सुना भी जा सकता था। लेकिन पाकिस्तान की अंदरूनी हालत तो यह है कि आजादी के बाद पाकिस्तान की कुल आबादी में अल्पसंख्यकों की हिस्सेदारी जहां 32 फीसदी थी वह घटकर अब सात फीसदी पर आ गई है उसमें भी हिन्दुओं की तादाद महज तीन फीसदी से कुछ ही ज्यादा बची है। जो बचे भी हैं उन्हें जानवरों से भी बदतर स्थित में गुजर बसर करने के मजबूर होना पड़ रहा है और उन्हें वहां की दोयम दर्जे की नागरिक सुविधाएं ही मुहैया कराई जाती हैं। इसी बदतर माहौल का नतीजा है कि जो एक बार पाकिस्तान से बाहर निकलने में कामयाब हो जाता है वह दोबारा कतई वहां वापस लौटने के लिये तैयार नहीं होता है और ऐसे शरणार्थियों को बाहर निकालने की अमानवीयता दिखा पाना किसी भी देश के लिये संभव नहीं हो पाता है। जबकि भारतीय मुसलमानों को यहां अलग करके नहीं देखा जाता बल्कि भारत पर जितना अधिकार किसी अन्य को हासिल है उससे रत्ती भर भी कम मुसलमानों को नहीं है। यही वजह है कि किसी भी देश में भारत का कोई शरीफ मुसलमान शरणार्थी के तौर पर नहीं रह रहा है। खैर, इमरान ने जो बयान दिया है उसके पीछे उनकी कतई यह सोच नहीं है कि वे मुसलमानों को लेकर चिंतित है अथवा उनकी भारतीय मुसलमानों से कोई हमदर्दी है। वर्ना बंटवारे के बाद भारत छोड़ कर जानेवाले मुसलमानों को पाकिस्तान में आज भी मुहाजिर कह कर नहीं पुकारा जाता और उनके साथ बेगाना सलूक नहीं किया जाता। सच तो यह है कि इमरान का यह बयान उस खुराफाती रणनीति का हिस्सा है जिसके तहत वे भारत को उकसा कर उससे पाकिस्तान के बारे में तीखी बातें सुनना चाहते हैं। दरअसल उनकी ख्वाहिश है कि मीठी बातें ना हो सकें तो कम से कम तीखी बातें ही हों ताकि वे अपने देश की जनता को यह तो बता सकें कि वे भारत के मोर्चे पर कुछ कर रहे हैं। दरअसल वे भारत के मोर्चे पर कुछ करते हुए दिखना चाह रहे हैं जबकि भारत की ओर से बारंबार यह स्पष्ट किया जा चुका है कि अगर कुछ कर दिखाना है तो पहले मुंबई हमले के मास्टरमाइंड के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए और उसे उसके करतूतों की कठोरतम सजा दिलाई जाए। इसके अलावा सीमा पार से आतंकवाद को धकेलने का सिलसिला बंद किया जाए और पाकिस्तान की धरती से भारत के खिलाफ हो रहे साजिश के सिलसिले को बंद किया जाए। जब तक ये दोनों बातें अमल में नहीं आएंगी तब तक पाकिस्तान के किसी भी बयान या हरकत का कोई मतलब नहीं निकलने वाला और ऐसा करने के बजाय इमरान जो बचकानी बातें कर रहे हैं उससे उनकी ही गंभीरता औश्र विश्वसनीयता को विश्व मंच पर आघात पहुंच रहा है।
शनिवार, 22 दिसंबर 2018
ग्रह-नक्षत्रों में अटकी सियासत
आगामी लोकसभा चुनाव को लेकर बेशक अंदरूनी तौर पर सियासी गतिविधियां जोर-शोर से जारी हैं और हर खेमे में काफी हलचल का माहौल का दिख रहा है लेकिन औपचारिक तौर पर किसी भी खेमे से कोई बड़ी खबर सामने नहीं आने की बड़ी वजह खरमास को बताया जा रहा है। दरअसल हिन्दू समाज में खरमास के दौरान कोई भी शुभ कार्य करना, नया व्यवसाय या साझेदारी करना या कोई भी नई चीज लेना वर्जित माना जाता है। कई इलाकों में तो इस दौरान नए कपड़े खरीदना या पहनना भी मना होता है। खरमास से जुड़े मिथकों व किस्से-कहानियों का राजनीतिक दलों पर कितना अधिक प्रभाव पड़ रहा है इसका सहज अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इन दिनों किसी भी खेमे से गठबंधन या साझेदारी के बारे में किसी समझौते को निर्णायक रूप नहीं दिया जा रहा है। बात चाहे उत्तर प्रदेश में कांग्रेस से किनारा करके सपा, बसपा व रालोद द्वारा आपस में चुनाव पूर्ण गठबंधन किये जाने के संकेतों की करें अथवा बिहार में भाजपानीत राजग के खिलाफ राजग को धुरी बनाकर समान विचारधारा वाले दलों के एक मंच पर आकर महागठबंधन बनाए जाने की या फिर बिहार में सीट समझौते को लेकर भाजपा, जदयू व लोजपा के बीच जारी तनातनी की। किसी भी मामले में औपचारिक तौर पर अभी कोई अंतिम फैसला नहीं किया जा रहा है और सभी राजनीतिक दल केवल संकेतों की भाषा में ही सियासी समस्याओं को सुलझाने की दिशा में आगे बढ़ते दिखाई पड़ रहे हैं। दरअसल माना जाता है कि सूर्य के धनु राशि में प्रवेश करने के साथ ही खरमास का आरंभ हो जाता है। धनु वास्तव में गुरू की राशि है। जब इसमें सूर्य आते हैं तो गुरू का प्रभाव कुंद पड़ जाता है। जबकि किसी भी शुभ कार्य या बड़ी पहल के लिये ज्योतिषीय नजरिये से गुरू का सहयोग बेहद आवश्यक है। लेकिन जब तक सूर्य धनु राशि में रहेंगे तब तक गुरू काफी हद तक निष्क्रिय रहेंगे। इसी वजह से इसे खरमास का नाम दिया जाता है और इस दौरान कोई बड़ा काम नहीं करने की सलाह दी जाती है। इस बार यह खरमास बीते 16 दिसंबर की सुबह नौ बजकर आठ मिनट से आरंभ हुआ है जो आगामी 14 जनवरी को सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने के बाद ही समाप्त होगा। चुंकि खरमास के दौरान कोई नयी साझेदारी या व्यावसायिक समझौते को अमल में लाना वर्जित बताया गया है लिहाजा कोई भी दल इस दौरान किसी राजनीतिक समझौते को निर्णायक मुकाम तक पहुंचाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है। बेशक अंदरूनी तौर पर इस बात का खुला संकेत दिया जा रहा हो कि यूपी में सपा, बसपा और रालोद का जबकि बिहार में राजद, कांग्रेस, रालोसपा, माकपा, भाकपा, हम और शरद यादव का ही नहीं बल्कि भाजपा, जदयू और लोजपा का भी गठबंधन हो गया है और इन तीनों खेमों ने सीटों के बंटवारे के मसले को भी आपस में सुलझा लिया है लेकिन औपचारिक तौर पर कोई भी खेमा सीटों के तालमेल के आंकड़ों को सार्वजनिक करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है। बताया जाता है कि खरमास के कारण ही सपा यह स्वीकार करने से हिचक रही है कि उसने गठबंधन में परिवर्तन करते हुए कांग्रेस से किनारा कर लिया है और महागठबंधन की ओर से भी यह बताने से परहेज बरता जा रहा है कि उसके कौन-कौन से घटक कितनी सीटों पर चुनाव लड़ेंगे। यहां तक कि भाजपा को आंखें दिखा रही लोजपा को कितनी सीटें देने का भरोसा देकर राजग में बरकरार रहने के लिये मनाया गया है इसका खुलासा करने से भी पूरी तरह परहेज बरता जा रहा है। ऐसे में संभव है कि पूरी तस्वीर साफ होने के लिये मकर संक्रांति यानि 14 जनवरी तक का इंतजार करना पड़े जब सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करते ही खरमास का दोष दूर हो जाएगा और शुभ कार्यों पर लगा प्रतिबंध समाप्त हो जाएगा। हालांकि यह कोई पहला मौका नहीं है जब ग्रह-नक्षत्रों के मद्देनजर सियासत ने अपनी चाल बदली हो बल्कि कई बार ऐसा देखा गया है कि ज्योतिषीय सलाहों को मान कर कई ऐसे मामलों में भी ऊटपटांग फैसले ले लिये जाते हैं जो सतही तौर पर मजाक का कारण बनते हैं। मसलन हिन्दू धर्म में 13 के अंक को बेहद अशुभ माना गया है। इसी वजह से लोग अक्सर इस अंक से परहेज बरतते हैं कि कहीं कोई अनहोनी या अपशकुन ना हो जाए। अनहोनी का यही डर था कि जब अत्याधुनिक व विश्वस्तरीय शहर नोएडा को बसाया गया तो उसमें सेक्टर तेरह नाम की जगह ही नहीं रखी गई। नोएडा में सेक्टर बारह भी है और चैहद भी लेकिन तेरह गायब है। इसी प्रकार अंकों का खेल कैसे राजनीति को प्रभावित करता है इसका उदाहरण संसद के भीतर भी देखा गया जहां 420 नंबर की सीट जिसे भी मिलती है वह तुरंत अपनी कुर्सी बदलने के लिये अर्जी दाखिल कर देता है। मजाल है कि कोई भी पार्टी पितृपक्ष यानि श्राद्ध पक्ष के दौरान कोई बड़ी बैठक या बड़ा फैसला कर ले। तमाम नेताओं के अपने ज्योतिषी हैं और अलग-अलग ज्योतिषीय सलाहकार भी हैं। उनसे पूछे बगैर कई बड़े नेता तो घर से कदम बाहर निकालना भी गवारा नहीं करते हैं। भाजपा के एक प्रवक्ता जो इन दिनों केन्द्र सरकार में काफी बड़ा मंत्रालय संभाल रहे हैं उनके बारे में प्रसिद्ध है कि प्रवक्ता रहने के दौरान वे हर दिन के हिसाब से अलग रंग के कपड़ों का चयन करते हैं और निश्चित अंतराल पर अलग-अलग इत्र का इस्तेमाल करते हैं। वास्तव में देखा जाए तो यह सब मन के वहम के अलावा और कुछ भी नहीं है। जो होनी है वह अपने कर्मों पर निर्भर है। कर्म अच्छे होंगे तो भाग्य अच्छा ही रहेगा और कर्म बुरे होंगे तो कितना ही टोना-टोटका क्यों ना कर लिया जाए, किस्मत खराब होकर ही रहेगी और दुर्भाग्य कभी पीछा नहीं छोड़ेगा। लिहाजा बेहतर होगा कि ग्रह-नक्षत्रों से डरने के बजाय राजनीतिक दल अपनी नीति और नीयत में सुधार लाएं ताकि आम लोग उन्हें अपने समर्थन से आगे बढ़ाने के लिये आगे आएं।
गुरुवार, 20 दिसंबर 2018
महबूबा की अटपटी बातें
जम्मू कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री पीडीपी अध्यक्षा महबूबा मुफ्ती ने पाकिस्तान के साथ बातचीत की शुरूआत के लिये लोकसभा चुनावों का नतीजा आने तक इंतजार करने की जो बात कही है वह ना सिर्फ अटपटी और गैर-जरूरी है बल्कि कहीं ना कहीं यह दर्शाता है कि अभी तक वे पाकिस्तान को लेकर भारत सरकार और हर खासो-आम भारतीय की सोच को समझ ही नहीं पाई हैं। हालांकि यह भी संभव है कि वे इस बात को समझना ही नहीं चाह रही हों कि पाकिस्तान के साथ भारत के रिश्तों का हमारे अंदरूनी चुनाव से कोई लेना-देना ही नहीं है। अगर पाकिस्तान कल की तारीख में भी मुंबई हमले के गुनहगारों को उनके किये की माकूल सजा दे तो परसों से ही रिश्तों में जारी संवादहीनता और तल्खी की बर्फ पिघलने लगेगी। लेकिन मसला है कि एक तरफ पाकिस्तान अपनी खुराफातें और बदमाशियां बदस्तूर जारी रखने पर आमादा है और दूसरी ओर यह भी चाह रहा है कि भारत उसके साथ बातचीत की प्रक्रिया भी शुरू कर दे और उसे आगे बढ़कर गले लगा ले। आखिर ऐसा कैसे संभव हो सकता है? देश में चुनाव कब होंगे और उसमें किसकी जीत या हार होगी और किसकी सरकार बनेगी यह तमाम बातें हमारी अंदरूनी राजनीति से जुड़ी है जिनका दोनों मुल्कों के रिश्तों से कोई तालमेल ही नहीं है। हालांकि इस बात से कोई इन्कार नहीं कर सकता कि भारत और पाकिस्तान के बीच शान्तिपूर्ण सम्बन्ध दोनों मुल्कों के लोगों के लिए फायदेमन्द हैं। इस मायने में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान का विचार वाकई काबिले तारीफ है। लेकिन जमीनी हकीकतें इससे बिलकुल विपरीत हैं। यहां तक कि इमरान की कथनी और करनी में कहीं कोई तालमेल दिखाई ही नहीं पड़ रहा है। मिसाल के तौर पर सत्ता संभालने के बाद इमरान सरकार ने मुंबई पर हमले के आतंकी हमले के मास्टरमाइंड हाफिज की अगुवाई वाली तमाम संस्थाओं को आतंकी संगठनों की सूची से बाहर कर दिया। इसमें फलह ए इन्सानियत और जमात उद दावा भी शामिल हैं जिन्हें लश्करे तैयबा के मुखौटे की तरह इस्तेमाल किया जाता है। मुंबई आतंकी हमलों के मास्टरमाइंड हाफिज सईद को संयुक्त राष्ट्र द्वारा वैश्विक आतंकी घोषित किया जा चुका है। उस पर 10 मिलियन डॉलर का इनाम है। लेकिन वह पाकिस्तान में खुला घूम रहा है। यही नहीं, हाफिज की पार्टी ‘मिल्ली मुस्लिम लीग’ को चुनाव लड़ने की अनुमति देकर उसे राजनीति की मुख्यधारा में लाने की कोशिश की जा रही है। इसकी मार्फत हाफिज पाकिस्तान में राजनीतिक ताकत बनने की कोशिश कर रहा है। एक तरफ तो इमरान कहते हैं कि आतंकवाद और कट्टरपन को बढ़ावा देने से पाकिस्तान का ही नुकसान हो रहा है लेकिन दूसरी तरफ सरकार बनने के 100 दिनों के भीतर इमरान ने अनेक संदिग्ध मदरसों को निगरानी सूची से बाहर कर दिया। उनके मुताबिक मदरसों को आतंकवाद से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। हालांकि, वे जानते हैं कि ऐसे अनेक मदरसों को संदिग्ध स्रोतों से पैसा मिलता है और वे अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की नजरों में सन्देहास्पद रहे हैं। पूरी दुनिया को यह पता है कि मदरसे की आड़ में चल रहे इन संस्थाओं में मासूम बच्चों और नौजवानों का माइंडवॉश करके उन्हें आतंकी इरादों की पूर्ति का औजार बनाया जाता है। हालांकि, करतारपुर साहिब गलियारे का उद्घाटन विशुद्ध धार्मिक मौका था, लेकिन इमरान ने उस मंच से भी कश्मीर मुद्दे का जिक्र करके इसे राजनीतिक रंग देने की कोशिश की। उनके विदेश मन्त्री शाह महमूद कुरैशी ने इससे भी एक कदम आगे बढ़ते हुए सरकार के इस फैसले को इमरान की गुगली के तौर पर पेश किया। जिस पर भारत ने कड़ी प्रतिक्रिया दी। इस बीच पाकिस्तान प्रशिक्षित आतंकी भारत में खून-खराबे की घटनाओं को अंजाम देने में लगे हुए हैं। पिछले ही दिनों उन्होंने अमृतसर में निरंकारियों के एक धार्मिक जलसे पर हमला किया, जिसमें 03 लोग मारे गए और 20 घायल हुए। इसे पंजाब में साम्प्रदायिक तनाव फैलाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है, ताकि आतंकवाद को भड़काया जा सके। घटनास्थल से बरामद ग्रेनेड पाकिस्तान में बने थे इसलिए इस घटना के स्रोत पर किसी को दुविधा नहीं हो सकती। सबसे चैंकाने वाली बात तो यह है कि करतारपुर साहिब गलियारे के उद्घाटन पर खालिस्तान समर्थक नेता गोपाल सिंह चावला भी मौजूद था और इमरान खान व पाकिस्तानी सेना प्रमुख उससे औपचारिक शिष्टाचार निभा रहे थे। इन सबसे साफ तौर पर यह पता लगता है कि इमरान की बातों और कामों में कोई सम्बन्ध नहीं है। ऐसे माहौल में अगर उन्हें लगता है कि भारत बातचीत के रास्ते पर कदम बढ़ाएगा, तो इसे उनकी खुशफहमी ही कही जा सकती है। भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने साफ कर दिया है कि जब तक पाकिस्तान भारत के खिलाफ आतंकी गतिविधियों पर विराम नहीं लगाता तब तक उससे बातचीत की कोई संभावना नहीं है। उनके मुताबिक आतंकवाद और बातचीत साथ-साथ नहीं चल सकते। पाकिस्तान को समझना होगा कि भारत के लिए आतंकवाद का खात्मा एक अहम मुद्दा है और जब तक पाकिस्तान इसके खिलाफ स्पष्ट, कठोर, और पारदर्शी कदम नहीं उठाता है तब तक उसके किसी अनुरोध या घड़ियाली आंसू का भारत की सोच और नीति पर कोई असर नहीं होगा। पाकिस्तान को भारत ही नहीं तमाम दुनिया को भरोसा दिलाना चाहिए कि वह वास्तव में आतंकवाद के खात्मे के लिए तैयार है और इसके लिए जरूरी कदम उठा रहा है। जिस दिन ऐसा होगा उसी दिन भारत खुद आगे बढ़कर बातचीत की प्रक्रिया को बहाल करने के लिए कदम बढ़ाएगा। लेकिन यह सीधी सी और बिना लाग-लपेट की बात अगर पाकिस्तान में इमरान सरकार के संचालकों को और भारत में महबूबा सरीखी नेताओं समझ में नहीं आ रही है तो इसका सीधा सा मतलब यही है वे इसे समझना ही नहीं चाह रहे हैं। महबूबा को ही नहीं बल्कि पाकिस्तान की सरकार को भी यह समझ लेना चाहिये कि इस मसले को भारत के आम चुनावों से जोड़कर दिखाने के बहाने भारत की मौजूदा सरकार की रीति-नीति के बारे में दुनिया में गलतफहमी फैलाने का जो प्रयास किया जा रहा है उसे कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता है और इस बात में भी किसी को कोई शंका नहीं होनी चाहिये कि बेशक चुनाव के बाद भारत में किसी भी दल की सरकार बने अथवा कोई भी प्रधानमंत्री बने लेकिन पाकिस्तान को लेकर गोली बंद होने के बाद ही बोली शुरू होने की जो नीति अपनाई गई है उसमें रत्ती भर भी रद्दोबदल की जरा भी संभावना नहीं है।
शनिवार, 19 नवंबर 2016
गुड़-गोबर करती बैंकिंग व्यवस्था
गुड़-गोबर करती बैंकिंग व्यवस्था
अक्सर यही देखा जाता है कि जिसके हाथ में भी डंडा आ जाये तो वह खुद को हवलदार से कम नहीं समझता। कायदे से तो हाथों में डंडा आने पर सबसे पहले उससे जुड़ी जिम्मेवारियों का एहसास होना चाहिये। लेकिन ऐसा होता हुआ कम ही दिखता है। यही हालत इन दिनों बैंकिंग व्यवस्था की भी है। सरकार ने उसे नोट बदलने का काम क्या सौंपा उसने खुद को आम लोगों का भाग्यविधाता ही समझ लिया। कहीं से भी ऐसा सुनने में नहीं आया है कि किसी बैंक ने लोगों के लिये पेयजल का प्रबंध किया हो या फिर बैठने की व्यवस्था की हो। हर बैंक के बाहर लंबी-लंबी कतार में क्या बूढ़े और क्या महिलाएं, सभी कष्ट से त्राहि-त्राहि करते ही नजर आये। लेकिन बैंक अपने धुन में मगन। घड़ी देखकर उठना और घड़ी देखकर बैठना। उसी सुस्त गति से काम करना और लोगों की परेशानियों का लुत्फ उठाना। वास्तव में देखा जाये तो देश की बैंकिग व्यवस्था की सुस्त व ढ़ीली रफ्तार के कारण ही आम लोगों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। नोटों को बदलने व नये नोटों का वितरण करने की अपेक्षित गति हासिल करने में देश की बैंकिंग व्यवस्था पूरी तरह नाकाम साबित हुई है। इसीका नतीजा है कि नोटबंदी की घोषणा हुए दस दिन का वक्त गुजर जाने के बाद भी हालातों में बहुत अधिक सुधार नहीं देखा जा रहा है। वह भी तब जबकि सरकार बार-बार यह दोहरा रही है कि देश में नये नोटों की कोई कमी नहीं है। बैंकिंग सेवा प्राप्त करने में पेश आ रही दुश्वारी का ही नतीजा है कि अधिकांश मदर डेयरी के बूथों व दवा दुकानदारों ने पुराने नोट स्वीकार करने का अधिकार दिये जाने के बावजूद इसे स्वीकार करने से इनकार करना आरंभ कर दिया है। उनकी दलील है कि उनसे नकदी स्वीकार करने के लिये बैंकों ने कोई विशेष व्यवस्था नहीं की है। बैंकों की सुस्त गति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अधिकांश बैंकों में ना तो कोई विशेष काउंटर बनाया गया और ना ही लोगों को कुछ बताने-समझाने के लिये कोई पहल की गयी। सच पूछा जाये तो देश के नीति निर्धारकों ने कालाधन, भ्रष्टाचार और नकली नोटों के कारोबार से एक झटके में ही निजात हासिल करने के लिये पांच सौ और एक हजार के नोटों को चलन से बाहर करने का जो हौसला दिखाया उसके पीछे कहीं ना कहीं देश की बैंकिंग व्यवस्था के प्रति उनका भरोसा ही छिपा था। लेकिन बड़े अफसोस की बात है कि बैंकिंग व्यवस्था ने उस भरोसे की लाज रखने के लिये अलग से कुछ भी प्रयास नहीं किया है। जो था, जैसा था, उससे ही इतने बड़े और ऐतिहासिक काम को आगे बढ़ाया। वह तो गनीमत है कि सत्ता पक्ष की इमानदारी पर कोई दाग नहीं आया है वर्ना जिस तरीके से नोटबंदी को लागू करने के लिये बैंकों ने आम लोगों की ऐसी-तैसी करके रख दी है उसके नतीजे में सत्ता-व्यवस्था के प्रति भारी आक्रोश के माहौल में कुछ भी हो सकता था। यह स्थिति तब दिख रही है जब सरकार ने बैंकों को ऐसी नीतियां बनाकर दी हैं जिससे उन पर काम का बोझ काफी कम पड़ रहा है। ना तो उन्हें परंपरागत काम को यथापूर्वक निपटाना पड़ रहा है और ना ही पुराने उपभोक्ताओं को यथावत सेवाएं देनी पड़ रही हैं। नकदी की आपूर्ति भी निर्विघ्न तरीके से की जा रही है और रिजर्व बैंक की ओर से मुंहमांगी सहूलियतें भी मुहैया करायी जा रही हैं। इसके बावजूद कहीं दो बजे तो कहीं चार बजे ही शटर बंद कर दिये जाने की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं। रिजर्व बैंक और सरकार के दखल के बाद भी कुछ ही जगह महिलाओं और बुजुर्गों के लिये अलग लाईन लगाने की व्यवस्था की गयी वर्ना कस्टमर को कष्ट में मरने के लिये ही छोड़ रखा है बैंकों ने। अपेक्षित तो यह था कि मौजूदा विशेष परिस्थिति में पूरी मेहनत, लगन और इमानदारी का प्रदर्शन किया जाता। सभी ग्राहकों को एक समान सेवा मुहैया करायी जाती। लेकिन कहीं पीछे की खिड़की से नोट सप्लाई का वीडियो सामने आ रहा है तो कहीं नेताजी और उनके चमचों के लिये देर रात शटर उठाया-गिराया जा रहा है। यह बैंकिग सेवा की अव्यवस्था का ही नतीजा है कि इन दिनों सरकार को कोसने के बजाय लोग सिर्फ बैंकों से ही नाराज दिख रहे हैं। हालांकि ग्रामीण बैंकों ने अपनी पूर्वघोषित हड़ताल को स्थगित करने की सकारात्मक पहल अवश्य की लेकिन इतने भर से ही बैंकिग व्यवस्था की तमाम कमियों, खामियों व गलतियों को कतई नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। सच पूछा जाये तो नोटबंदी के अभियान ने पूरे बैंकिंग तंत्र की सुस्ती, संवेदनहीनता और गैर जिम्मेदाराना रवैये को ही उजागर किया है जिस पर भरोसा करके सरकार ने देश को कैशलेस व्यवस्था की राह पर काफी आगे ले जाने का ख्वाब बुना है। @ Navkant Thakur
मंगलवार, 6 सितंबर 2016
अब झुलसेंगे अलगाववादियों के अरमान
अब झुलसेंगे अलगाववादियों के अरमान
देश विरोधी ताकतों के हाथों में खेल रहे पाकिस्तान के पिट्ठुओं को औकात में लाने की योजना तैयार हो गयी है। अब इन्हें ना सिर्फ सरकारी सहूलियतों से महरूम होना पड़ेगा बल्कि व्यवस्था से कटकर पूरी तरह अलग-थलग रहने के लिये मजबूर होना पड़ेगा। दरअसल कश्मीर में सामान्य स्थिति बहाल करने की कोशिशों के तहत सूबे के दौरे पर गये सर्वदलीय प्रतिमंडल के साथ बदसलूकी करना वहां के स्थानीय अलगाववादी नेताओं को अब काफी महंगा पड़ने जा रहा है और सरकार ने हर कीमत पर उनकी ढ़िठाई, हठधर्मिता व देशविरोधी मानसिकता का माकूल इलाज करने का पक्का इरादा कर लिया है। इस सिलसिले में बनायी गयी योजना के तहत अलगाववादी नेताओं को मुहैया करायी जा रही तमाम सरकारी सहूलियतों से उन्हें महरूम कर दिया जाएगा और सूबे से जुड़े किसी भी मामले को लेकर होनेवाली बातचीत की प्रक्रिया में उन्हें हर्गिज शामिल नहीं किया जाएगा। सूत्रों की मानें तो सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल की वापसी के बाद प्रधानमंत्री के साथ हुई गृहमंत्री राजनाथ सिंह की बैठक के बाद यह तय हुआ है कि अलगाववादियों के प्रति अब कतई नरमी या सहानुभूति का व्यवहार नहीं किया जाएगा बल्कि अगर जल्दी ही वे तहे-दिल से भारत की एकता, अखंडता व संप्रभुता को स्वीकार करने के अलावा समूचे जम्मू-कश्मीर को (गुलाम कश्मीर सहित) भारत के अविभाज्य व अभिन्न हिस्से के तौर पर कबूल नहीं कर लेते तो निकट भविष्य में उन्हें इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है। प्राप्त जानकारी के मुताबिक इसी मसले को लेकर आज शाम भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के साथ भी गृहमंत्री की बैठक हुई जिसमें शाह ने भी सरकार के इस फैसले से पूरी सहमति जताई है। अब माना जा रहा है कि राजनाथ के अलावा वित्तमंत्री अरूण जेटली की मौजूदगी में पार्लियामेंट एनेक्सी में होनेवाली कश्मीर से लौटे सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों की बैठक में सरकार के इस फैसले पर राजनीतिक आम सहमति भी कायम कर ली जाएगी। अलगाववादियों के प्रति सख्त रवैया अपनाये जाने को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक आम सहमति का माहौल बनाने के बाद औपचारिक तौर पर जम्मू कश्मीर सरकार से अनुरोध किया जाएगा कि देशहित को प्राथमिकता देते हुए तमाम अलगाववादी नेताओं का हर स्तर पर पूर्ण बहिष्कार किया जाये और उन्हें किसी भी तरह की सरकारी सहायता या सहूलियत उपलब्ध कराने से पूरी तरह परहेज बरता जाये। हालांकि किसी भी वार्ता प्रक्रिया में अलगाववादियों को शामिल नहीं करने का फैसला पहले ही लिया जा चुका है और इसी वजह से ना तो राजनाथ के पिछले जम्मू-कश्मीर दौरे के दौरान अलगाववादी नेताओं को बातचीत का मौका दिया गया और ना ही सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल के दौरे के एजेंडे में उनसे मुलाकात की कोई बात शामिल थी। लेकिन निजी हैसियत से अलगाववादियों से मिलने गये प्रतिनिधिमंडल के कुछ सदस्यों की इस पहलकदमी के साथ सरकार की सहानुभूति अवश्य जुड़ी हुई थी क्योंकि अगर यह बातचीत आगे बढ़ती तो सूबे में अमन बहाली के अलावा अलगाववादियों के देश की मुख्यधारा के साथ जुड़ने की उम्मीद बंध सकती थी। लेकिन मुलाकात के लिये आये नेताओं से अलोकतांत्रिक व काफी हद तक असभ्य व अमर्यादित व्यवहार करके इन अलगाववादियों ने अपने लिये खुद ही ऐसे भविष्य का ब्लू प्रिंट तैयार कर लिया है जिसके तहत देश के किसी भी सियासी या गैर सियासी संगठन की उनके साथ अब रत्ती भर भी सहानुभूति नहीं जुड़ सकती है। वैसे भी इन अलगाववादियों ने लंबे समय से देश की नाक में दम किया हुआ है और भारत के शासन-प्रशासन को चिढ़ाने व खिझाने का कोई भी मौका ये अपने हाथ से जाने नहीं देते। ना तो इन्हें भारत के हितों की कोई परवाह है और ना ही भारतीय संवैधानिक व लोकतांत्रिक व्यवस्था में इनकी आस्था है। ऐसे में इन्हें सिर पर चढ़ाए रखने का कोई मतलब ही नहीं है। बल्कि इन्हें औकात में लाने की कोशिश तो काफी पहले ही आरंभ हो जानी चाहिये थी। लेकिन देर आयद दुरूस्त आयद। इतना तो तय है कि भारत के टुकड़े करने का ख्वाब देखनेवाले अलगाववादियों की सुरक्षा, यात्रा व रहन-सहन पर सरकारी खजाने से होनेवाले औसतन सालाना एक सौ करोड़ रूपये के खर्च में अब भारी कटौती की जाएगी और उन्हें भारतीय संविधान के दायरे में रहकर बातचीत करके पूरे मसले का हल निकालने के लिये विवश होना ही पड़ेगा। लेकिन आवश्यक है कि इन्हें विदेशों से मिलनेवाली खैरात पर रोक लगायी जाये और दीन-दुनियां से इनका संपर्क पूरी तरह काट दिया जाये। साथ ही देश के आम लोगों की गाढ़ी कमाई का पैसा इनकी सुरक्षा, यात्रा व रहन-सहन पर खर्च किये जाने का भी कोई औचित्य नहीं है बल्कि इनसे सुरक्षा का खर्च भी वसूला जाना चाहिये। इसके बाद भी अगर ये सूबे में अमन बहाली की राह के आड़े आएं तो इनके खिलाफ देशद्रोह व देश के खिलाफ जंग छेड़ने की सख्त धाराओं के तहत कठोरतम कानूनी कार्रवाई करने से भी परहेज नहीं बरता जाना चाहिये। उसके बाद ही इन्हें आटे-दाल का भाव पता लगेगा।
मंगलवार, 16 अगस्त 2016
जवाबदेही पर जोर.........
जवाबदेही पर जोर
लोकतांत्रिक व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही अपेक्षित तो रहती है लेकिन इन अपेक्षाओं के पूरा होने की अभी तक कोई राह नहीं निकली थी। खास तौर से जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही तो चुनावी राजनीति तक ही सीमित रहती आई है। हालांकि इस व्यवस्था को सुधारने के काफी प्रयास हुए और सूचना का अधिकार के तौर पर लोगों के हाथ में एक हथियार भी आया लेकिन इसका भी पूरा लाभ नहीं मिल सका और माननीयों की जवाबदेही पूरी तरह तय नहीं हो सकी। देश को आजाद हुए 70 साल होने को आए लेकिन अब तक का जो अनुभव है उसके मुताबिक सांसद बन जाने के बाद आम तौर पर कोई भी नेता अपने मतदाताओं के सामने अपने कामकाज का हिसाब प्रस्तुत करना गवारा नहीं करता है। जबकि जनप्रतिनिधि के तौर पर उसकी जवाबदेही है कि वह ना सिर्फ जिम्मेवारी के साथ अपने निर्वाचकों के हितों को सुनिश्चित करे और अपने निर्वाचन क्षेत्र के विकास को आगे बढ़ाए बल्कि अपने कामकाज के बारे में मतदाताओं को जानकारी भी दे और इसमें उनका सुझाव भी ले। लेकिन हकीकत तो यह है कि इन सांसदों से अपेक्षाएं भले कुछ भी हों लेकिन वे आम तौर पर सत्ता मिल जाने के बाद जनता से कट ही जाते हैं। कई दफा ऐसे भी मामले सामने आएं हैं जब लोगों को अपने जनप्रतिधियों के गुमशुदा होने का पोस्टर भी गलियों की दीवारों पर चस्पां करने के लिये मजबूर होना पड़ा है। हालांकि यह तो नहीं कहा जा सकता कि सांसद अपनी जिम्मेवारी नहीं निभाते है लेकिन इस बात से कतई इनकार नहीं किया जा सकता कि जो सांसद अपनी जिम्मेवारी निभाते भी हैं वह ज्यादातर मनमाने तरीके से ही निभाते हैं और उसमें भी दिखावा ही अधिक रहता है। मानो जिम्मेवारी निभाकर जनता पर कोई बहुत बड़ा एहसान कर रहे हों। वैसे भी जिस सामाजिक व्यवस्था व पंरपरा में किसी दूसरे व कथित ऐरे-गैरे को अपने कामकाज का हिसाब देना तौहीन माना जाता हो उस तौहीन को कोई क्यों स्वीकार करें? लेकिन अब वक्त बदला है, परिस्थितियां बदली हैं और निजाम बदला है। यह नया निजाम अपनी जवाबदेही को भी समझता है और दूसरों के लिए भी जवाबदेही तय करने से परहेज नहीं बरतता है। यही वजह है कि सत्ता संभालने की सालगिरह के मौके पर प्रधानमंत्री खुद अपनी सरकार के कामकाज का रिपोर्ट कार्ड जनता के सामने हर वर्ष प्रस्तुत कर रहे हैं। साथ ही परंपरा यह भी डाली गई है कि हर साल सरकार का हर विभाग अपने कामकाज का रिपोर्ट कार्ड सार्वजनिक तौर पर पेश करे और अगले साल के लिये निर्धारित अपने लक्ष्य से भी देश को अवगत कराए। यानि प्रधानमंत्री ने खुद को भी जनता के प्रति जवाबदेह बनाया है और अपने माननीय मंत्रियों को भी। ऐसे में अब अगर सांसदों से भी यही अपेक्षा की गई है तो इसे कैसे गलत कहा जा सकता है। बल्कि यह तो होना ही चाहिए था। खैर, देर आयद दुरुस्त आयद। प्रधानमंत्री ने पार्टी के सभी सांसदों को साफ शब्दों में यह बता दिया है कि उन्हें अपने कामकाज का हिसाब देना ही होगा। पिछले दो साल में सांसद के तौर पर उन्होंने क्या काम किया है और बाकी बचे कार्यकाल के लिये उन्होंने अपने लिये क्या लक्ष्य निर्धारित किया है इसका पूरा बही-खाता उन्हें प्रस्तुत करना होगा। चुंकि सांसदों से उनके कामकाज का हिसाब प्रधानमंत्री खुद लेने वाले हैं लिहाजा इसमें गड़बड़ियों व गलतबयानी की गुंजाइश काफी कम होने की संभावना है। वैसे भी प्रधानमंत्री का लगातार यह आग्रह रहा है कि सांसदों को अपने क्षेत्र में अधिक से अधिक वक्त बिताना चाहिए, स्थानीय लोगों के साथ संपर्क में रहना चाहिए और सोशल मीडिया के माध्यम से भी लोगों के लिए उपलब्ध रहना चाहिए। हालांकि उनके इस आग्रह को कितने सांसदों ने स्वीकार किया है यह तो सर्वविदित ही है। वैसे भी स्वेच्छा से जब अपेक्षाएं पूरी नहीं होती हैं तो इसके लिये कड़ाई करनी ही पड़ती है और उसी कड़ाई का मुजाहिरा हुआ है आज प्रधानमंत्री की बातों से। प्रधानमंत्री ने यह भी कहा है की सामाजिक एकता, अखंडता, सौहार्द व समरसता की भावना को जगाते हुए राष्ट्रवाद का प्रवाह जमीनी स्तर तक पहुंचाने के लिए आगामी 15 अगस्त से आरंभ हो रही तिरंगा यात्रा के प्रतिदिन की प्रगति की रिपोर्ट अगर सांसद स्वयं उन्हें सौपेंगे तो बेहतर रहेगा। यानि सांसदों के जमीनी जुड़ाव की मॉनीटरिंग अब प्रधानमंत्री खुद ही करने वाले हैं। जाहिर तौर पर जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही तय करने की दिशा में प्रधानमंत्री की ओर से की गयी यह शुरुआत बेहद ही सराहनीय है। इससे ना सिर्फ सांसदों में जागरुकता आएगी बल्कि आम लोगों का अपने जनप्रतिनिधियों के प्रति नजरिया भी बदलेगा जिससे निजाम व आवाम के दरमियान परस्पर तारतम्यता कायम होगी जिसका अंतिम परिणाम विकास, सुशासन व पारदर्शिता के तौर पर सामने आएगा।
बुधवार, 22 जून 2016
कैराना की कराह का कचोट
कैराना की कराह का कचोट
पश्चिमी उत्तर प्रदेश स्थित कैराना की धरती को महाभारत काल में दानवीर कर्ण की जन्मभूमि होने का गौरव हासिल है। यही वही धरती है जहां महान गायक अब्दुल करीम खां ने शाष्त्रीय संगीत के किराना घराना की स्थापना की थी। बताते हैं कि एक बार महान संगीतकार मन्ना डे जब किसी काम से कैराना आये तब उन्होंने गाड़ी से उतर कर यहां की धरती पर पैर रखने से पहले इसकी मिट्टी के प्रति अपना सम्मान प्रदर्शित करते हुए अपने जूते उतारकर हाथ में ले लिये थे। यहां तक कि भारतरत्न पंडित भीमसेन जोशी का संबंध भी कैराना की धरती से रहा है। ऐसे में अंदाजा लगाया जा सकता है कि कैराना की धरती कितनी पूज्य व पवित्र है। बिल्कुल किसी तीर्थ की तरह। लेकिन वही धरती आज कराह रही है, कलप रही है। जहां संगीत के सरगम की तान फिजाओं को गुंजायमान करती थी वहां दहशत का सन्नाटा पसरा है। सामाजिक सद्भाव व समरसता की बात तो दूर रही अब तो वहां का सामाजिक संतुलन ही बिगड़ चुका है और स्थिति की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कुछ दिन पहले तक जहां एक खास समुदाय की आबादी तकरीबन 40 फीसदी थी वह सिमटकर महज 8 फीसदी से भी कम पर आ गयी है। अगर जीवन-यापन की स्थानीय समस्याओं के कारण वहां से परिवारों का पलायन हो रहा होता तो कायदे से सभी समुदायों का पलायन होना चाहिये था। किसी एक संप्रदाय के लोगों का ही पलायन क्यों हुआ दूसरे का क्यों नहीं? इस कसौटी पर परखें तो स्पष्ट है कि पलायन की वजह जीवन-यापन की समस्या नहीं है बल्कि इसके पीछे सांप्रदायिक असहिष्णुता ही है जिसने प्रबल समुदाय के सामने विवश होकर निर्बल समुदाय को पलायन के लिये मजबूर कर दिया है। यानि स्थानीय बहुसंख्यकों को ही सीधे तौर पर इस पलायन के लिये जिम्मेवार कहा जाये तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है। स्थानीय नागरिकांे का कहना है कि यहां पर धर्मविशेष से जुड़े बड़े अपराधियों व गुंडों का जबर्दस्त आतंक है। यह गुंडे आये दिन स्कूल जाती हुयी बच्च्यिों को छेड़ते हंै तथा उनके साथ अश्लील हरकतें करते हैं जिसके कारण इन बच्चियों ने स्कूल जाना बंद कर दिया है। यदि जाती भी हैं तो उनके साथ कोई न कोई उनको छोडने ओर लेने के लिए जाता है। दुराचार की कई घटनाएं घट चुकी हैंै लेकिन पुलिस प्रशासन हाथ पर हाथ धरे बैठा रहा है। आम तौर पर थाने में रिपोर्ट तक दर्ज नहीं की जाती है। यहां तक कि सामाजिक समरसता के लिये कई दफा महापंचायत का भी आयोजन हुआ लेकिन इसका कोई परिणाम नहीे निकला। इसमें महत्वपूर्ण तथ्य है कि समूचा पीड़ित पक्ष एक ही धर्म का है जबकि आरोपियों का मजहब अलग है। यानि पूरा मामला सीधे तौर पर सांप्रदायिक टकराव व वर्चस्व का ही है। लेकिन मसला है कि यह सच कहे कौन? सत्ताधारी सपा भी चुप और मुख्य विपक्षी बसपा भी मौन। स्थानीय तौर पर बहुसंख्यक हो चुके राष्ट्रीय स्तर के अल्पसंख्यकों का वोट तो सबको चाहिये। लिहाजा इस झमेले को कोई क्यों तूल देता। वह भी तब जबकि पिछले प्रधानमंत्री बेलाग लहजे में बता चुके थे कि उनके नजरिये से देश के तमाम संसाधनों पर पहला हक अल्पसंख्यकों का ही है। जाहिर तौर पर यह अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की ही नीति थी जिसके कारण कैराना की समस्या को कभी सतह पर नहीं आने दिया गया और अंदरखाने वहां के बिगड़ते सामाजिक संतुलन की लगातार अनदेखी की गयी। लेकिन केन्द्र में निजाम बदला तो जमीन पर भी असर दिखा और जिनकी अब तक जुबान बंद थी उनके समर्थन में कुछ बातें शुरू हुईं जो बढ़ते-बढ़ते अब यहां तक आ गयी है कि कैराना का नाम अब किसी के लिये अंजाना नहीं रहा है। केन्द्र के नये निजाम के झंडाबरदारों ने जब आवाज उठायी तो सूबे की सरकार भी सक्रिय हुई। फिलहाल दोनों ओर से जांच जारी है। आरोपों के फर्रे तैयार हो रहे हैं। खुद के बचाव का इंतजाम भी किया जा रहा है। लेकिन पीड़ितों की घरवापसी पर किसी का ध्यान नहीं है। सभी इस आग में अपनी सियासी रोटी सेंकने की जुगत में दिख रहे हैं। आखिर चुनावी मौसम जो ठहरा। जाहिर है कि चुनाव के बाद यह मामला भी फाइलों में ही दब कर दम तोड़ देगा और यहां से उजड़े हुए परिवारों का भी वहीं हश्र होगा जो कश्मीरी पंडितों या तमिल ब्राह्मणों का हो चुका है। ऐसे में कैराना की कराह से कचोट होना तो स्वाभाविक ही है। काश कोई वास्तव में पीड़ितों की तत्काल घरवापसी कराने की कोशिश करता लेकिन अफसोस है कि जिनसे उम्मीद की जा सकती है वे भी राजनीतिक कारणों से इसे सांप्रदायिक मामला मानने से इनकार करके सच को झुठलाते हुए ही दिख रहे हैं।
शुक्रवार, 10 जून 2016
तयशुदा मंजिल की गुमशुदा राहें
तयशुदा मंजिल की गुमशुदा राहें
लोकसभा चुनाव में महज 32 फीसदी वोट पाकर भी भाजपा ने बहुमत के जादूई आंकड़े से ग्यारह सीटें अधिक हासिल कर लीं और चुनावी दौड़ में तमाम सियासी दलों को इस कदर पीछे छोड़ दिया कि किसी दल को इतनी सीटें भी नहीं मिल सकीं कि वह न्यूनतम दस फीसदी सीटों के दम पर लोकसभा में विपक्ष के नेता के पद पर अपनी दावेदारी दर्ज करा सके। इस बात की कसक ने पिछले दो सालों से तमाम राजनीतिक दलों की रातों की नींद और दिन का चैन उड़ाया हुआ है। लिहाजा अगली दफा के लिये सभी ने अभी से यह लक्ष्य तय कर लिया है कि भाजपा की राह रोकने के लिये वे एकजुट होकर ही लड़ेंगे। वोटों का बिखराव नहीं होने देंगे। आपस में एक-दूसरे को चुनौती देने के बजाय एकजुट होकर भाजपा के लिये चुनौती पेश करेंगे। इस लक्ष्य का आधार तो वही है जिसका बेहद सफल प्रयोग बिहार के विधानसभा चुनाव में किया जा चुका है जहां महागठजोड़ बनाकर भाजपा विरोधी वोटों का इस कदर ध्रुवीकरण किया गया कि मोदी की सेना को टिककर लड़ने की मजबूत जमीन भी मयस्सर नहीं हो सकी। लेकिन मसला है कि इस तयशुदा लक्ष्य को हासिल करने के लिये कोई ठोस राह भी तो मिले। इस नजरिये से देखें तो राहें गुमशुदा ही नजर आ रही हैं। जिधर से कोई राह खोलने की कोशिश होती है उधर अगले कदम पर ही किसी ना किसी के मत्वाकांक्षाओं की दीवार आड़े आ जाती है। मसलन कोशिश हुई टूटे-बिखरे व बिछड़े समाजवादी कुनबे को एकजुट करने की तो इसमें बिहार की राजनीति में अपना वर्चस्व कायम रखने की राजद व जदयू की और यूपी में अपना एकाधिकार कायम रखने की सपा की महत्वाकांक्षा आड़े आ गयी। फिर नये सिरे से नितीश ने कोशिश शुरू की जदयू का विस्तार करने के लिये अजित सिंह व बाबूलाल मरांडी को दल-बल सहित संगठन में शामिल कराने की। लेकिन इसमें भी फच्चर यह फंसा कि जब इन दोनों को हाथों-हाथ कोई फायदा मिलना ही नहीं है तो अपनी दुकान समेट कर वे किसी अन्य के साथ विलय ही क्यों करें। लिहाजा यह विचार भी आगे नहीं बढ़ सका। यहां तक कि बिहार विधानसभा चुनाव के बाद राजद व जदयू का विलय हो जाने की जो बात दोनों ही दलों के शीर्ष नेतृत्व ने कही थी उस दिशा में भी कुछ होता हुआ नहीं दिख रहा है। हो भी कैसे? ना तो नितीश कभी लालू के मातहत काम कर सकते हैं और ना ही लालू अपने पूरे जीवन की कमाई नितीश के हवाले कर सकते हैं। लिहाजा वह विचार भी परवान चढ़ पाना नामुमकिन ही दिख रहा है। इन तमाम प्रयोगों का प्रस्ताव विफल हो जाने के बाद अब एक ओर डी राजा ने पांच टुकड़ों में बंटे वाम दलों को एक मंच पर आने का प्रस्ताव दिया है जबकि ममता बनर्जी के नेतृत्व में तीसरा मोर्चा गठित करने की कवायद समाजवादियों ने शुरू की है। लेकिन मसला वही है कि जहां ममता होगी वहां वामदल नहीं हो सकते, जहां सपा होगी वहां बसपा नहीं रह सकती, द्रमुक और अन्ना द्रमुक एक साथ नहीं आ सकते और सबसे बड़ी बात यह कि राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस किसी अन्य का नेतृत्व स्वीकार ही नहीं कर सकती। उस पर तुर्रा यह कि बीजद और टीआरएस सरीखे दल अपना पत्ता खोलने के लिये कतई तैयार नहीं हैं। यानि कुल मिलाकर देखें तो लोकसभा चुनाव में पड़े 68 फीसदी भाजपा विरोधी वोटों को एकजुट करके दिल्ली की कुर्सी पर कब्जा जमाने का लक्ष्य तो कागजी तौर पर सबके समक्ष पूरी तरह स्पष्ट है लेकिन इस लक्ष्य को हासिल करने के लिये आवश्यक विपक्षी एकजुटता की राह पूरी तरह गुमशुदा है। लिहाजा अब तीसरे मोर्चे का विचार भी माखौल का पर्याय बनता जा रहा है। तभी तो भाजपा भी निश्चिंत है और कांग्रेस भी। दोनों को पता है कि उनके मोर्चे से अलग कोई नया मोर्चा गठित हो पाना नामुमकिन की हद तक मुश्किल है। यानि मोर्चे दो ही हो सकते हैं। या तो भाजपा के नेतृत्व में राजग या फिर कांग्रेस के नेतृत्व में संप्रग। इसके अलावा किसी तीसरे के नेतृत्व पर बाकियों के बीच सहमति बन ही नहीं सकती। और अगर बनी भी तो उसका कोई फायदा नहीं मिलना क्योंकि अलग-अलग प्रदेशों की अलग-अलग पार्टियां एकजुट भी हो जाएं तो इसका कोई लाभ-हानि का चुनावी समीकरण नहीं बन सकता। फायदा तो तब हो जब बिहार की तरह हर सूबे की भाजपा विरोधी पार्टियां अपने मतभेद भुलाकर एकजुट हों और राष्ट्रीय स्तर पर उनका एक व्यापक गठजोड़ बने। वर्ना अगर यूपी की तरह चौतरफा लड़ाई हुई और कोई किसी के साथ आने के लिये तैयार नहीं हुआ तो निर्धारित लक्ष्य की राहें यथावत गुमशुदा ही रहेंगी।
शुक्रवार, 27 मई 2016
बाजार में बिचौलियों का वर्चस्व
लोग बेहाल बिचौलिये मालामाल
बाजार में बिचौलियों का वर्चस्व तो हमेशा से रहा है। बल्कि यह कहना भी गलत नहीं होगा कि बाजार बनता ही बिचौलियों से है। उत्पादक और उपभोक्ता के बीच की कड़ी कहे जानेवाले बिचौलियों ने अगर बाजार का निर्माण किया है तो जाहिर तौर पर अपने मुनाफे के लिये ही किया है। तभी तो उत्पादन कम हो या ज्यादा, दौर सस्ती का हो या महंगाई का। इनका मुनाफा पक्का रहता है। ये अपने मुनाफे के लिये बाजार को इस तरह संचालित करते हैं कि किसी भी सूरत में ना तो उत्पादक का अधिक भला हो पाता है और ना ही उपभोक्ता को ज्यादा सहूलियत मिल पाती है। मिसाल के तौर पर इन दिनों खुदरा बाजार की बात करें तो हर घर में रोजाना इस्तेमाल होनेवाली प्याज पिछले कई महीनों से लगातार औसतन बीस रूपये प्रति किलोग्राम की दर पर डटी हुई है। यह वो कीमत है जो पिछले मानसून के बाद प्याज की कमी के कारण पनपी आवक में कमी के नतीजे में निर्धारित हुई थी। लेकिन अब जबकि प्याज की बंपर पैदावार हुई है और किसानों के लिये इसे संभाल कर रखना मुश्किल हो रहा है तब भी अगर इसकी खुदरा कीमतों में कोई उतार नहीं दिख रहा है तो इसकी साफ व सीधी वजह बाजार में मुनाफाखोर बिचौलियों का वर्चस्व ही है जिन्होंने मांग व आपूर्ति के बीच मनमाना संतुलन कायम करके कीमत को लगातार स्थिर किया हुआ है। आलम यह है कि किसान को मंडी में महज डेढ़ से दो रूपये प्रति किलो की दर से खरीदनेवाले भी बड़ी मुश्किल से मिल रहे हैं जबकि उपभोक्ताओं को इसकी कीमत औसतन बीस रूपये की दर से चुकानी पड़ रही है। ऐसे में सवाल है कि आखिर बीच का 18 रूपया जा कहां रहा है। जाहिर तौर पर यह उन बिचौलियों की तिजोरी में जमा हो रहा है जो प्याज को खेत से किचेन तक का सफर तय कराते हैं। ऐसे में किसान का यथावत बदहाल रहना स्वाभाविक ही है। वह तब भी बदहाल था जब बाढ़-सुखाड़ के कारण उसकी फसल बर्बाद हो गयी और वह आज भी बदहाल है जब उसने अपना खून-पसीना एक करके बंपर फसल पैदा की है। इसी प्रकार जब उत्पादन कम हुआ तब भी उपभोक्ता को ही अपनी जेब ढ़ीली करनी पड़ी और आज भी बाजार में उपभोक्ता ही लुट रहा है। यानि दोनों तरफ से फायदा इन बिचौलियों का ही है।ऐसा नहीं है कि यह नौबत महाराष्ट्र के प्याज उत्पादकों को ही झेलनी पड़ रही है बल्कि यही हाल समूचे देश के किसानों का है जो मंडी में बिचौलियों के हाथों औने-पौने दामों पर अपनी फसल बेचने के लिये मजबूर हैं। किसान आलू पैदा करे या टमाटर, गन्ना उगाए या फल-फूल उपजाये। सबकी व्यथा एक जैसी ही है। इसमें किसी वस्तु का दाम अधिक तेजी से बढ़ जाने पर सरकार अगर हरकत में भी आती है तो जमाखोरों पर छापेमारी के अलावा आयात में इजाफा करने के परंपरागत तौर-तरीकों पर अमल शुरू कर देती है। लेकिन कभी यह कोशिश नहीं होती कि किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य मिले और उपभोक्ताओं को सही कीमत पर बाजार में सामान उपलब्ध हो सके। लिहाजा बिचौलियों की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता। ऐसे में आवश्यकता है कि बाजार में कीमतों के निर्धारण व नियंत्रण पर भी सरकार व प्रशासन की नजर हो। सिर्फ मांग व आपूर्ति के बीच संतुलन के भरोसे बाजार को छोड़े रखने से ना तो उत्पादकों को न्याय मिल सकता है और ना ही उपभोक्ताओं को। इस दिशा में दिल्ली विधानसभा चुनाव के वक्त आम आदमी पार्टी व भाजपा ने भी काफी वायदे किये थे। एक ओर किसानों को मंडी में ही अपनी उपज बेचने की अनिवार्यता समाप्त करने की बात कही गयी थी वहीं दूसरी ओर बाजारों में स्वयंसेवकों की तैनाती का भरोसा दिलाया गया था ताकि मनमानी कीमत वसूलनेवालों पर लगाम कसी जा सके। लेकिन ये सभी बातें सिर्फ बातें ही साबित हुई हैं। वैसे भी अगर किसान खुद ही उपभोक्ताओं को अपना उत्पाद बेचने चला जाये तो वह खेती पर क्या ध्यान देगा और दूसरी ओर खुदरा बाजार के लिये जब तक सभी जींसों का ठोस तरीके से मूल्य निर्धारण नहीं किया जाता तब तक मनमानी कीमत का कैसे पता चल पाएगा। यानि बाजार की असली बीमारी का इलाज किये बिना इस अव्यस्था से निजात पाने की कल्पना भी बेकार ही है। लिहाजा आवश्यकता है कि उत्पादक और उपभोक्ता के बीच कीमतों का अनुपात निर्धारित किया जाये और बिचौलियों व बाजार की अन्य ताकतों को लागत के मुकाबले एक निश्चित अनुपात में ही मुनाफा कमाने की छूट रहे। वर्ना मांग व आपूर्ति के चक्कर में पूरी बाजार व्यवस्था यथावत घनचक्कर बनी रहेगी।
गुरुवार, 26 मई 2016
जीत के जोश में होश की दरकार
जीत के जोश में होश की दरकार
पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के नतीजों की जो समग्र तस्वीर सामने आयी है उसमें दो बातें बिल्कुल साफ हैं। पहली यह की इसने भाजपा को संभावनाओं के असीमित संसार का दरवाजा दिखा दिया है जबकि दूसरी ओर कांग्रेस को उन सूबों में भी मतदाताओं ने सिरे से नकार दिया है जहां कांग्रेस मुक्त भारत के सपने को साकार करने का सपना देखना भी भाजपा के लिये संभव नहीं माना जा सकता है। यानि इस दफा बड़ी जीत भाजपा के हिस्से में आयी है जबकि करारी व अकल्पनीय शिकस्त का सामना कांग्रेस को करना पड़ा है। लिहाजा हार के बाद अब आत्मचिंतन करने की बारी तो कांग्रेस की ही है जिसे इस समय कुछ भी कहना ऐसा ही होगा मानो जले पर नमक छिड़का जा रहा हो। ऐसे में फिलहाल कांग्रेस के नजरिये इन चुनावी नतीजों का विश्लेषण करने से परहेज बरतना ही बेहतर होगा और उचित यही होगा कि उसे इस हार के कारणों पर विचार करने व उसमें सुधार करने का उपाय तलाशने के लिये छोड़ दिया जाये। लेकिन भाजपा के नजरिये से तो इन चुनावी नतीजों का विश्लेषण तत्काल ही किया जा सकता है जिसे इस जीत के बाद ऐसा लग रहा है मानो उसने दुनियां जीत ली हो। तभी तो पार्टी अध्यक्ष से लेकर प्रधानमंत्री तक भी सार्वजनिक तौर पर अपना उद्गार प्रकट करने में कोई कोताही नहीं बरत रहे हैं। बताया जा रहा है कि यह मोदी सरकार की दो साल की उपलब्धियों के प्रति जनता की स्वीकार्यता का नतीजा है। पार्टी इस जीत के नशे में इस कदर मदहोश है कि उसे बाकी सूबों में अपेक्षित सफलता नहीं मिल पाने का कोई मलाल ही नहीं है। असम की जीत से ही पार्टी पूरी तरह आत्ममुग्ध है। उस पर तुर्रा यह कि पार्टी को पहली दफा केरल में भी खाता खोलने का मौका मिल गया। लिहाजा लाजिमी तौर पर उसकी खुशियों का कोई पारावार ही नहीं है। लेकिन पार्टी की ओर जिस जीत को अब तक की तमाम सफलताओं से अधिक बड़ा बताने की कोशिश हो रही है उसकी गहराई से पड़ताल करें तो पूरा मामला उतना खुशनुमां व उत्साहजनक नहीं दिखता है जितना दिखाने की कोशिश हो रही है। अलबत्ता समग्रता में देखें तो लोकसभा चुनाव के पूर्व तक की स्थिति के नजरिये से तो भाजपा ने वास्तव में अपने प्रदर्शन में अकल्पनीय सुधार किया है लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में नरेन्द्र मोदी का पदार्पण होने के बाद जो भाजपा की तस्वीर बनी है उस लिहाज से इस बार का प्रदर्शन कहीं से भी ऐसा नहीं है जिसके दम पर वह उत्साह में आकर अश्वमेध का घोड़ा खोलने की स्थिति में दिखे। माना कि उसे पहली दफा असम में पूर्ण बहुमत के साथ ही देश के पूर्वोत्तरी हिस्से में प्रवेश का अवसर मिल गया है लेकिन बाकी किसी भी सूबे में वह उस लक्ष्य को कतई हासिल नहीं कर पायी है जिसकी उसे अपेक्षा थी। यहां तक कि असम के जिस चुनावी नतीजे को प्रधानमंत्री भी चौंकानेवाला करार दे रहे हैं वहां भी मत फीसदी के मामले में कांग्रेस ही भाजपा पर भारी रही है और भाजपा के मुकाबले कांग्रेस को डेढ़ फीसदी अधिक वोट मिले हैं। केरल की ही बात करें तो सूबे की तीस फीसदी आबादीवाले इझवा समुदाय के सर्वमान्य सामाजिक संगठन एसएनडीपी को राजनीति में प्रवेश दिलाते हुए बड़ी मेहनत व मशक्कत के बाद बीडीजेएस के नाम से एक नयी पार्टी का गठन कराया गया। लक्ष्य था कि अपने परंपरागत ग्यारह फीसदी अय्यर वोटबैंक के साथ तीस फीसदी इझवा वोटों को जोड़कर सूबे के चुनाव को त्रिकोणीय स्वरूप दिया जाये। लेकिन यह पूरी योजना कागजों पर ही सिमट कर रह गयी और जहां एक ओर भाजपा को सिर्फ एक सीट के साथ सूबे में किसी तरह खाता खोलने का मौका मिल सका वहीं बीडीजेएस तो सियासी तौर पर अपना अस्तित्व भी पैदा नहीं कर सका। कहां तो पार्टी को उम्मीद थी कि उसे तीस फीसदी से भी अधिक वोट मिलेंगे और हकीकत में उसे मिला है सिर्फ साढ़े दस फीसदी वोट। दूसरी ओर पश्चिम बंगाल में तो कांग्रेस और वाममोर्चे के गठजोड़ की घोषणा होने के साथ ही सत्ताविरोधी वोटों में अपनी हिस्सेदारी तलाशने की भी भाजपा में हिम्मत नहीं बची और उसने गिने-चुने एक दर्जन सीटों पर ही अपना ध्यान केन्द्रित कर लिया जिसमें उसके हिस्से में सिर्फ तीन सीटें ही आयीं। इसी प्रकार पुदुचेरी और तमिलनाडु में भी भाजपा के हिस्से में सिफर ही आया है। खैर, ये तमाम तथ्य ऐसे हैं जिनकी उपेक्षा या अनदेखी करने का दिखावा किया जाना तो स्वाभाविक ही है लेकिन पार्टी को अंदरूनी तौर पर गहराई से इस बात की पड़ताल करनी ही होगी कि कमी कहां रह गयी।
मंगलवार, 17 मई 2016
राष्ट्रपति की विचारणीय चिंता
राष्ट्रपति की विचारणीय चिंता
देश में ज्ञान, विज्ञान व अनुसंधान के स्तर को लेकर राष्ट्रपति ने अपनी जो चिंता प्रकट की है और जिस तरह के भविष्य का दर्पण दिखाया है वह वाकई विचारणीय भी है और चिंतनीय भी। चिंतनीय इसलिये क्योंकि आखिर कभी तो हमें यह चिंता करनी ही होगी कि हमारी शिक्षा प्रणाली हमें कहां लेकर जा रही है। राष्ट्रपति के ही शब्दों में कहें तो आजादी के बाद से आज तक भारतीय शिक्षण संस्थानों ने एक भी ऐसा देसी छात्र हमें नहीं दिया है जो ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में अपने प्रामाणिक अनुसंधान के दम पर देश को नोबेल पुरस्कार से नवाज सके। एक ओर हमारे शिक्षण संस्थान विश्व की शीर्ष रैंकिंग में दो सौवें स्थान पर आने के लिये भी लगातार जद्दोजहद करते दिखते हैं वहीं सरकार भी इस दिशा में कितनी निश्चिंत है इसका सहज अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि देश की जीडीपी का महज आधा फीसदी ही शिक्षण, प्रशिक्षण व शोध के क्षेत्र में खर्च के लिये आवंटित किये जाने की परंपरा लगातार चली आ रही है। यानि सरकार किसी भी दल की क्यों ना रही हो, शिक्षा को कभी प्राथमिकता नहीं मिल सकी। वह भी तब जबकि हम खम ठोंकते हैं उस चीन को हर मोर्चे पर पीछे छोड़ने का जो अपनी जीडीपी का लगभग सवा दो फीसदी हिस्सा सिर्फ ज्ञान, विज्ञान व अनुसंधान पर ही खर्च करता है। यानि शिक्षा के क्षेत्र में बतकही व बतरस से आगे बढ़कर कुछ ठोस करने की ना तो कभी नीति रही और ना नीयत। इसमें तकरीबन ग्यारह वर्षों तक वित्तमंत्री रहते हुए देश के आय-व्यय में संतुलन बिठा चुके प्रणब दा की यह स्वीकारोक्ति अवश्य ही सराहनीय है कि किसी भी वित्तमंत्री के लिये बाकी खर्चों से बचाकर शिक्षा के मद में आवंटन बढ़ाना बेहद मुश्किल व सिरदर्दी का काम हो सकता है। लेकिन यह करना तो पड़ेगा। वर्ना राष्ट्रपति ने भविष्य की जो तस्वीर दिखायी है उसके मुताबिक 2030 में जब विश्व का हर दूसरा व्यक्ति भारत का नागरिक होगा और उसमें से भी आधे की उम्र 25 वर्ष के भीतर की होगी तब उस विशाल युवा समुद्र को समुचित तौर पर विश्व व्यवस्था में अपना स्थान बनाने में कितनी मुश्किलें पेश आएंगी इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। लिहाजा आज सिर्फ कौशल भारत, कुशल भारत का जो नारा बेहद जादूई प्रतीत हो रहा है वह उन दिनों किसी काम का नहीं बचेगा अगर कुशलता की बुनियाद हमारे अपने अनुसंधान पर आधारित नहीं होगी। यानि आवश्यकता इस बात की है कि हम शोध व अनुसंधान के क्षेत्र में विश्व की मांग व मानवता की जरूरतों के मुताबिक अपना ध्यान केन्द्रित करें और रटंत विद्या की परंपरा से अलग हटकर कुछ नया करने की पहल करें। यह बात तो हमारे प्रधानमंत्री भी कई दफा स्वीकार कर चुके हैं कि मौजूदा युग ज्ञान का युग है। लिहाजा ज्ञान में सिर्फ पारंगत होना ही काफी नहीं हो सकता, इसमें दुनियां से आगे निकलने की आवश्यकता है। जिसके लिये ना सिर्फ हमारे शिक्षण संस्थानों को अपने पाठ्यक्रमों की गुणवत्ता में व्यापक सुधार लाना होगा बल्कि छात्रों को भी भविष्य की चुनौतियों के प्रति जागरूक होना पड़ेगा और सरकार को भी इस दिशा में अभी से समुचित निवेश की व्यवस्था करनी होगी। अगर सभी मोर्चों पर एक साथ पहलकदमी नहीं हुई तो 14 साल बाद 25 साल के आयुवर्ग की विश्व की एक-चौथाई भारतीय आबादी का भविष्य सुधारना नामुमकिन होगा और भारत को विश्वगुरू के पद पर दोबारा प्रतिष्ठित करने का सपना कभी पूरा नहीं हो पाएगा। आज 119 विश्वविद्यालय व 37,000 कॉलेजों का देश होने के बावजूद भारत शिक्षा के क्षेत्र में विश्व मानचित्र पर कहीं नहीं दिख रहा है। हम विश्व में तृतीय व चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों के प्रमुख आपूर्तिकर्ता के तौर पर पहचाने जा रहे हैं। ना हमें कोई नोबेल के लिये नामांकित करवा पा रहा है और ना ही अपने अनुसंधानों के दम पर हम विश्व को चमत्कृत कर पा रहे हैं। हम तो इसी से संतोष कर लेते हैं कि आमर्त्य सेन सरीखे किसी भारतीय मूल वाले को नोबेल मिल गया अथवा गॉड पार्टिकल का नामकरण हमारे सीबी रमण के नाम पर हो गया। लेकिन इससे बात बनती नहीं, बिगड़ती ही जा रही है। जिसे सुधारने के अलावा दूसरा कोई विकल्प ही नहीं है। चाहे इस क्षेत्र को तत्काल प्राथमिकता मिले या भविष्य में, मिलनी तो है ही। बस चिंता इस बात की है कि इसमें जितनी देरी होगी उसकी भरपायी भी उतनी ही मुश्किल होती चली जाएगी।
शुक्रवार, 13 मई 2016
बेमानी गीत का सियासी संगीत
बेमानी गीत का सियासी संगीत
कहते हैं कि जब रोम जल रहा था तब नीरो बांसुरी बजा रहा था। ऐसी ही तस्वीर इन दिनों देश के सियासत की भी दिख रही है। कहां तो देश जल रहा है रक्षा खरीद में भ्रष्टाचार से, सूखे पर हो रहे सियासी कारोबार से, महंगाई के बाजार से और प्रकृति के अत्याचार से। लेकिन जिनके कांधों पर इन मसलों को सुलझाने की जिम्मेवारी है वे अलग ही राग आलाप रहे हैं। उनकी धुन भी अलग है और सरगम भी, जो आम लोगों की अपेक्षाओं व आवश्यकताओं से कहीं मेल ही नहीं खाती। यहां बहस हो रही है प्रधानमंत्री की शैक्षणिक योग्यता पर जिससे आम लोगों का कोई वास्ता ही नहीं है। लेकिन मुद्दा चाहिये ताकि प्रधानमंत्री को लपेटे में लिया जा सके, उनकी खिंचाई की जा सके और उन्हें नीचा दिखाया जा सके। इसके लिये कुछ नहीं तो यही सही। हालांकि यह बात इस विवाद को तूल देनेवाले भी मान रहे हैं कि प्रधानमंत्री बनने के लिये किसी खास शैक्षणिक योग्यता या अहर्ता की कोई बाध्यता नहीं है। ना तो संवैधानिक तौर पर और ना ही सामाजिक, राजनीतिक या पारंपरिक तौर पर। इसके बावजूद कभी कहा जाता है कि जिस नरेन्द्र मोदी ने कला संकाय में दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक की डिग्री ली वह गुजरात के नरेन्द्र दामोदरदास मोदी नहीं बल्कि राजस्थान का नरेन्द्र महावीर मोदी है। फिर जब प्रमाणपत्र के साथ प्रधानमंत्री की अंकतालिका भी भाजपा द्वारा सार्वजनिक कर दी जाती है तो उसे स्वीकार करने के बजाय एक नयी बहस छेड़ी जाती है कि भाजपा ने जो भले ही गुजरात विश्वविद्यालय स्पष्ट शब्दों में यह प्रमाणित कर रहा है कि भाजपा ने प्रधानमंत्री की जो राजनीतिशाष्त्र में मास्टरी का प्रमाणपत्र जारी किया है वह पूरी तरह वैध है। लेकिन गुजरात विश्वविद्यालय की बात पर ध्यान देना किसी को गवारा नहीं है। सब पिले हुए हैं दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रमाणपत्र को गलत बताने में, उसे झूठा व फर्जी साबित करने में। अब इसका इलाज तो यही हो सकता है कि दिल्ली विश्वविद्यालय ही अपने पुराने रिकार्ड खंगालकर यह प्रमाणित करे कि भाजपा ने प्रधानमंत्री का जो प्रमाणपत्र प्रस्तुत किया है वह असली है या नकली। इसके अलावा और कोई यह प्रमाणित भी नहीं कर सकता। किसी के अख्तियार में ही नहीं है। वर्ना अगर यकीन करें तो उस दौरान अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के दिल्ली प्रांत के अध्यक्ष रहे मौजूदा वित्तमंत्री अरूण जेटली भी यह बताने से नहीं हिचक रहे हैं कि नरेंद्र मोदी अहमदाबाद से दिल्ली आकर बीए की परीक्षा दिया करते थे। साथ ही उनके बयान की पुष्टि वह नरेश गौड़ भी कर रहे हैं जो विद्यार्थी परिषद के पूर्णकालिक सदस्य थे और परिषद के कार्यालय में रहा करते थे। उनकी दलील है कि मोदी जब भी परीक्षा देने दिल्ली आते थे तो उनके साथ विद्यार्थी परिषद के कार्यालय में ही ठहरते थे। यानि गवाह तो सामने हैं जो चीख-चीखकर यह दुहाई दे रहे हैं कि मोदी ने दिल्ली विश्वविद्यालय से ही बीए का इम्तिहान दिया था। लेकिन इन गवाहों पर भला विरोधी व विपक्षी पार्टियां क्यों यकीन करे। उन्हें तो ये सभी गवाह भाजपा के जरखरीद ही नजर आयेंगे क्योंकि जेटली तो आज भी पार्टी के शीर्ष रणनीतिकार बने हुए हैं और नरेश भी भाजपा के टिकट से चार दफा दिल्ली विधानसभा के सदस्य चुने जा चुके हैं। ऐसे में अब पूरी बहस का अंतिम व निर्णायक अंत तो तभी हो सकता है जब दिल्ली विश्वविद्यालय की ओर से इसके बारे में कोई ठोस स्पष्टीकरण आये और वह प्रामाणिक तौर पर मामले की हकीकत का खुलासा करे। लेकिन सवाल है कि 38 साल पुराना रिकार्ड खंगालना भी किसी मुसीबत से कम नहीं है। वह भी तब जबकि इस बीच रिकार्ड रूम में कई दफा अग्निकांड हो चुका हो और दीमकों, तिलचट्टों, चूहों व छिपकलियों की सैकड़ों-हजारों पीढि़यां वहां अपनी रिहाइश बना चुकी हों। ऐसे में उम्मीद तो कम ही है कि उस वक्त का पूरा डाटा यथावत संजोया हुआ मिल जायेगा, वह भी उतनी ही साफ-सुथरी व स्वच्छ हालत में, जैसे उन्हें रखा गया था। खैर, यह जिम्मेवारी तो दिल्ली विश्वविद्यालय की ही है और जिस गति से यह विवाद दिनोंदिन परवान चढ़ रहा है और भाजपा ने भी प्रमाणपत्र की स्वप्रमाणित प्रति सार्वजनिक कर दी है उसके बाद इसे सही या गलत बताने का दबाव तो दिल्ली विश्वविद्यालय पर बढ़ना लाजिमी ही है। लेकिन इस बेमानी व विशुद्ध सियासी मसले को तूल देकर जिस तरह से आम लोगों के दुख-सुख से जुड़े मसलों की अनदेखी की जा रही है उसे कैसे जायज ठहराया जा सकता है।
शनिवार, 7 मई 2016
बवालियों की गिरफ्त में कोतवाली
बवालियों की गिरफ्त में कोतवाली
संसद की मौजूदा तस्वीर के तहत तो बवालियों का ही कोतवाली में बोलबाला दिख रहा है। कहां तो इन बवालियों की आंखों में कोतवाली का खौफ स्पष्ट नजर आना चाहिये था और कहां कोतवाल को ही इन बवालियों ने सवालों के कठघरे में खड़ा करने की कोशिशें शुरू कर दी हैं। खास तौर से अगस्ता वेस्टलैंड हेलीकाॅटर खरीद में हुए घोटाले के मामले को लेकर जिस तरह से अपनी कमियों व खामियों को स्वीकार करने के बजाय पूर्ववर्ती सरकार के रणनीतिकारों ने मौजूदा सरकार की नीति व नीयत पर ही दोषारोपण आरंभ कर दिया है उससे तो यही लग रहा है कि खुद के दामन पर लगे बदनामी का दाग धोने के लिये इन्होंने सरकार का दामन दागदार करने की राह पकड़ ली है। तभी तो अगस्ता के विवाद पर झूठे तथ्यों के सहारे भाजपा को भी गुनाह में बराबर का भागीदार बताने व अपनी गलतियों पर पर्दा डालने की कोशिशें शुरू की गयीं। पहले तर्क गढ़ा गया कि अगस्ता को काली सूची में डालने का काम पूर्ववर्ती संप्रग सरकार ने ही किया था। लेकिन तथ्यों का खुलासा होने के बाद जब इस दलील का दम निकल गया तो कहा गया कि कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व का चरित्र हनन करने के लिये भारतीय प्रधानमंत्री ने इटली के प्रधानमंत्री के साथ एक गुप्त समझौता किया है। जिसके तहत भारतीय मछुआरों की हत्या का मुकदमा झेल रहे इतालवी नौसैनिकों को बचाने के एवज में इटली की अदालत में वहां की जांच एजेसियों ने ऐसी बेबुनियाद कहानी पेश की है जिसके चलते हेलीकाॅप्टर खरीद में दलाली का मामला सामने आया है। लेकिन यह दलील भी सरकार ने औपचारिक तौर पर संसद में खारिज कर दी जिसे कांग्रेस ने स्वीकार भी कर लिया। अगर सरकार की सफाई कांग्रेस ने स्वीकार नहीं की होती तो उसके पास विशेषाधिकार हनन की नोटिस देने का अख्तियार भी था। लेकिन सरकार द्वारा गोपनीय समझौते की बात को ही नहीं बल्कि दोनों देशों के प्रधानमंत्री की मुलाकात होने को भी नकार दिये जाने को कांग्रेस द्वारा चुपचाप स्वीकार कर लिये जाने से साफ है कि उसे अपनी दलील के थोथेपन का पहले से पता था। खैर, जब इस दलील से भी दाल नहीं गल सकी तो एक नया सुर्रा छोड़ा गया कि जब पूर्ववर्ती सरकार को हेलीकाॅप्टर सौदे में गड़बड़ी का पता चला तो ना सिर्फ कंपनी द्वारा जमा करायी गयी धरोहर राशि जब्त कर ली गयी बल्कि उसके द्वारा की गयी तीन हेलीकाॅप्टरों की आपूर्ति का भुगतान भी रोक दिया गया जिससे सरकारी खजाने को तकरीबन तीन हजार करोड़ का फायदा ही हुआ, कोई नुकसान नहीं हुआ। अब ऐसी दलीलों को सामने रखकर अगर यह बताने की कोशिश की जा रही है कि चुंकि इस सौदे में देश को फायदा ही हुआ लिहाजा इसमें दलाली खाए जाने के सवाल को समाप्त कर दिया जाना चाहिये तो जाहिर तौर पर इस दलील को शायद ही कोई स्वीकार करे। क्योंकि इस सौदे में हुए नफा-नुकसान का मामला तो अलग ही है और अगर इसमें देश को घाटा नहीं होने दिया गया तो इसका एहसान नहीं जताया जा सकता। अलबत्ता सरकार का तो कर्तव्य ही है कि वह हर मामले में देश का हित सुनिश्चित करे। लेकिन देश का हित सुनिश्चित करने के एवज में किसी को दलाली खाने की छूट तो नहीं दी जा सकती। यहां सवाल तो उस दलाली की रकम का है जिसे बांटनेवाले ने अपना जुर्म कबूल भी कर लिया है और और अपने इस गुनाह की सजा भी भुगत रहा है। लेकिन दलाली लेनेवाले का कहीं कोई अता-पता ही नहीं है। इस सवाल को तथ्यों के साथ सदन में प्रस्तुत करने के क्रम में जब सुब्रमण्यम स्वामी ने असली दलाल की स्वीकारोक्ती का फर्रा पेश कर दिया तो उसका ठोस जवाब देने के बजाय पूछा जा रहा है कि उनके पास ये कागजात कहां से आये। यानि कागज में दर्ज तथ्यों पर चर्चा करने के बजाय बवाल काटने की कोशिश हो रही है दस्तावेज के स्रोत को लेकर। अब ऐसे सवालों और इन बवालों के सहारे अगर विवाद के दाग को छिपाने की कोशिश होगी तो दाग धुलेंगे या गहरे होंगे इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। लेकिन मसला है कोतवाली में बवालियों के कोहराम का। इसका उपाय तो तभी निकल सकता है जब देश में त्वरित न्याय की व्यवस्था मजबूत हो। वर्ना जिस देश में 1992 में बम फोड़नेवाले आतंकी याकूब मेनन को फांसी के तख्ते तक पहुंचाने में 23 साल का वक्त लग जाता हो वहां की कोतवाली में बवालियों का बोलबाला दिखना स्वाभाविक ही है।
गुरुवार, 5 मई 2016
अराजकता की आजादी
अराजकता की आजादी
लोकतांत्रिक व्यवस्था में हर किसी को आजादी है अपनी बात रखने की। यह आजादी होनी भी चाहिये वर्ना इसके बिना तो लोकतंत्र की कल्पना भी नहीं की जा सकती। लेकिन इसका यह मतलब भी नहीं है कि अपनी बात रखने के लिये ऐसे तौर-तरीकों को अमल में लाया जाये जो व्यवस्था के लिये सिरदर्दी का सबब बन जाये। अलबत्ता स्थापित व्यवस्था पर हमला करने के क्रम में भी अपेक्षित यही है कि इसमें लोकतांत्रिक भावनाओं, मूल्यों व परंपराओं को पूरी अहमियत दी जाये। ऐसा कुछ भी नहीं किया जाये जिससे लोकतांत्रिक मूल्यों को आघात पहुंचे या व्यवस्था के लिये उसे संभावना मुश्किल हो जाये। अगर ऐसी कोई नौबत आती है तो उसे अभिव्यक्ति की आजादी के बजाय अराजकता का नाम ही दिया जाएगा और लोकतंत्र में अराजकता के लिये तो कोई स्थान हो ही नहीं सकता। लिहाजा अभिव्यक्ति की आजादी और अराजकता के बीच की लक्ष्मण रेखा को तो हम सबों को पहचानना ही होगा। गौर से देखें तो इन दिनों यह लक्ष्मण रेखा लगातार कमजोर ही नहीं पड़ रही है बल्कि कई मामलों में तो विलुप्त भी हो जा रही है। उसका इस कदर अतिक्रमण हो जाता है जिसमें यह विभेद करना भी मुश्किल हो जाता है कि इसे अराजकता कहें या अभिव्यक्ति की आजादी। यह स्थिति बहुचर्चित जेएनयू विवाद के मामले में भी दिखी और गुजरात के पाटीदार आंदोलन में भी। यहां तक कि हरियाणा में जाटों के लिये आरक्षण की मांग को लेकर हुए हिंसक आंदोलन के मामले को भी अराजकता की स्थिति उत्पन्न करने के प्रयास का नाम देना ही उचित होगा। कमोबेश यही स्थिति अब दिल्ली में डीजल से चलनेवाली टैक्सियों पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा लगायी गयी रोक के मामले में भी दिख रही है। माना कि अदालत के इस फैसले से सूबे के तकरीबन एक तिहाई टैक्सी चालकों यानि 22 हजार उन परिवारों के सामने रोजी-रोटी का संकट उत्पन्न हो गया है जो डीजल से चलनेवाली टैक्सी पर आधारित व आश्रित हैं। लेकिन इसका यह कतई मतलब नहीं है कि अगर अदालत से उन्हें राहत नहीं मिल पायी है तो वे सड़क पर उतर कर लोगों का जीना दूभर करें। हरियाणा व उत्तर प्रदेश को दिल्ली से जोड़नेवाले राजमार्गों पर चक्का जाम करें। वाहनों की आवाजाही ठप कर दें। यह अख्तियार तो उन्हें कतई हासिल नहीं है और इस तरह की हरकतों को तो अराजकता की स्थिति उत्पन्न करने की कोशिश का ही नाम दिया जाएगा। इसे अभिव्यक्ति की आजादी तो कतई नहीं कह सकते। कहें भी कैसे? हालत यह है कि दिल्ली इन दिनों विश्व की सबसे प्रदूषित राजधानी घोषित होने की स्थिति में आती जा रही है। यहां की जहरीली होती आबोहवा को सुधारने के लिये सरकार भी प्रयत्नशील है, एनजीटी प्राधिकरण भी अदालत भी। इसके लिये तमाम उपाय किये जा रहे हैं। चाहे आॅड इवन का फार्मूला लागू करना हो या डीजल से चलनेवाली गाडि़यों का पंजीकरण प्रतिबंधित करना हो। हर मुमकिन कदम उठाये जा रहे हैं ताकि लोगों को खुलकर सांस लेने लायक वातावरण उपलब्ध कराया जा सके। इस दिशा में समाज भी प्रयत्नशील है और स्कूली बच्चे भी जन जागरूकता फैलाने के अभियान में जुटे हुए हैं। लेकिन अफसोस इस बात का है कि वातावरण व माहौल में सुधार के पक्षधर तो सभी हैं लेकिन इसके प्रति अपनी जिम्मेवारी समझना बहुतों को गवारा नहीं है। माननीय सांसदों की मांग है कि उन्हें आॅड इवन से अलग रखा जाये तो वकीलों को भी इस योजना का अनुपालन करना रास नहीं आ रहा। कोई बड़ी बात नहीं कि भविष्य में चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े लोग भी इससे छूट की मांग करेंगे और शिक्षण क्षेत्र से जुड़े लोग भी। फिर विद्यार्थी और पुलिस विभाग के लोग ही क्यों इसका अनुपालन करे। सबकी अपनी दलीलें हैं कि अगर वे नियत समय पर नियत जगह नहीं पहुंचे तो अनर्थ हो सकता है। लेकिन मसला छूट के लिये दी जानेवाली दलीलों का नहीं है। सवाल है समाज की सोच का। वह सोच जो व्यवस्था को सुधारने के लिये कुछ होते हुए तो देखना चाहती है लेकिन खुद कुछ करना नहीं चाहती। खुद पर जरा सा बोझ पड़े, थोड़ी सी परेशानी पेश आए तो ऐसी सोच के लोग बिलबिला उठते हैं। लेकिन कहते हैं कि जो खुद की मदद नहीं करता उसकी मदद भगवान भी नहीं कर सकते, फिर सरकार, प्रशासन या अदालत की तो बिसात ही क्या है। यह तो चलती ही व्यवस्था से है जिस पर अपनी बात मनवाने के लिये प्रहार करते हुए लोग यह भी भूल जा रहे हैं कि कहां उन्होंने अभिव्यक्ति की आजादी का अतिक्रमण करते हुए अराजकता की ओर कदम बढ़ा दिया है। जाहिर है कि इस सोच को तो बदलना ही होगा। व्यवस्था को सुधारने के लिये पहले खुद सुधरना होगा।
शुक्रवार, 29 अप्रैल 2016
बदलाव के उजाले में सियासी अंधेरा
बदलाव के उजाले में सियासी अंधेरा
दमघोंटू प्रदूषण की बढ़ती रफ्तार पर लगाम कसने और वाहनों की बेतहाशा रेलमपेल के कारण हांफती, कराहती व कदम-कदम पर अटकती-चटखती सड़कों को सुगम व सुरक्षित बनाने के मकसद से दिल्ली में शुरू की गयी सम-विषम योजना की गुणवत्ता व लोकप्रियता तो निश्चित ही सवालों से परे है। इस योजना को सही तरीके से लागू करके इसका अधिकतम लाभ हासिल करने में भले ही लाख दुश्वारियां सामने आ रही हों लेकिन इसकी उपयोगिता के बारे में किसी को रत्ती भर भी संदेह नहीं है। तभी तो इस साल के पहले पखवाड़े में पहली दफा लागू की गयी इस योजना को दोबारा शुरू करने से पहले जब लोगों से रायशुमारी की गयी तो 80 फीसदी से भी अधिक लोगों ने इसके प्रति सकारात्मक विचार ही दिये। यहां तक कि दिल्ली सरकार के तमाम राजनीतिक विरोधियों ने भी उसकी इस पहल को सराहनीय व अनुकरणीय बताने से परहेज नहीं बरता। लेकिन इस मामले को लेकर अब जिस तरह की राजनीति शुरू हुई है और इस योजना की आड़ लेकर दिल्ली सरकार ने जिस तरह का राजनीति कारोबार शुरू कर दिया है उसे देखकर स्वाभाविक तौर पर लोगों को दुख भी हो रहा है और इसके भविष्य को लेकर चिंता भी हो रही है। माना कि दिल्ली सरकार ने आम लोगों को राहत देने के लिये ही इस योजना को शुरू किया है और विरोधियों ने भी इसकी जनप्रियता का सम्मान करते हुए इसके औचित्य पर उंगली उठाने की पहल नहीं की है लेकिन इसका कतई यह मतलब नहीं है कि इस मसले को राजनीति का ऐसा मुद्दा बना दिया जाये जो विवादों की नयी गाथा का आधार बन जाये। वास्तव में देखा जाये तो इस योजना को विवादों के दायरे में लाने के लिये दिल्ली सरकार के विरोधी जितने दोषी हैं उससे जरा भी कम आम आदमी पार्टी की नीतियां नहीं हैं। अगर वास्तव में सरकार ने पूरी इमानदारी व सहज भाव से दिल्ली व दिल्लीवालों की समस्या सुलझाने की नीयत से इस योजना को संचालित किया होता तो इस मामले को लेकर कोई विवाद पैदा होने का सवाल ही नहीं था। लेकिन औपचारिक तौर पर भले ही दिल्ली में सत्तारूढ़ आप सरकार के शीर्ष रणनीतिकार इस हकीकत को स्वीकार ना करें लेकिन सच यही है इस योजना को ऐसी दुधारू गाय बनाने की कोशिश की गयी है जो राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी को जनसमर्थन व व्यापक स्वीकार्यता का दूध भी दे और अन्य राजनीतिक दलों को तबियत से लथाड़ मारकर लहुलुहान व परेशान भी करे। वर्ना कोई वजह ही नहीं थी कि कल तक इस मसले पर दिल्ली सरकार को जमकर साधुवाद देनेवाली तमाम राजनीतिक पार्टियां इस मसले पर ही दिल्ली सरकार को जमकर कोसने की पहल करतीं। ऐसा हुआ ही इसलिये है कि क्योंकि समूचे देश में अपनी वाहवाही लूटने व राष्ट्रीय स्तर पर मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का चेहरा चमकाने के लिये दिल्ली के आम लोगों की गाढ़ी कमाई का सैकड़ों करोड़ रूपया विज्ञापन के तौर पर पानी में बहा दिया गया है जिससे दिल्ली या दिल्लीवासियों को कुछ भी लाभ नहीं मिलनेवाला है। अलबत्ता बकौल मधेपुरा सांसद पप्पू यादव, अगर इस रकम का आधा हिस्सा भी दिल्ली में प्रदूषण के नियंत्रण की योजनाओं पर खर्च किया जाता तो लोगों को इसका काफी अधिक लाभ मिल सकता था। यही पैसा अगर सायकिल के प्रयोग को प्रोत्साहित करने, सौर व वैकल्पिक ऊर्जा के क्षेत्र को सुदृढ़ करने, कचरा प्रबंधन की क्षमता में वृद्धि करने या गाद-गंदगी से अटे-पटे नदी, नाले, सीवर व सड़क को साफ-सुथरा करने सरीखे कार्यों में खर्च किया जाता तो निश्चित ही किसी को सम-विषम योजना की खामियां गिनाने का मौका नहीं मिल पाता। लेकिन पैसा खर्च हो रहा है राष्ट्रीय स्तर पर विज्ञापन के माध्यम से चेहरा चमकाने में। इसमें भी अगर दिल्ली सरकार की इस दलील को सही मानें कि लोगों को योजना की जानकारी देने के लिये ऐसा करना आवश्यक है तो कायदे से दिल्ली से प्रकाशित होनेवाले अखबारों व एफएम रेडियो सरीखे जन-जन से जुड़े सूचना व संचार के माध्यमों को ही विज्ञापन दिया जाना चाहिये था। अन्य प्रदेशों में विज्ञापन के माध्यम से इसकी आड़ में अपना चेहरा चमकाने का क्या मतलब है। एक पखवाड़े की इस प्रायोगिक योजना के बहाने समूची दिल्ली को होर्डिंग से पाट देने, समूची दिल्ली को केजरीवालमय कर देने, विज्ञापन के माध्यम से दिल्ली को जागरूक करने के मामले में दिल्ली से प्रकाशित होनेवाले जमीनी अखबारों को इस योजना का सबसे मजबूत हिस्सा बनाने में ज्यादा रूचि नहीं लेने, कम खर्च में बेहतर जनसंपर्क के विभिन्न माध्यमों का इस्तेमाल करने से परहेज बरतने व राष्ट्रीय स्तर पर जमकर शोशेबाजी करने सरीखी पहलकदमियां तो यही इशारा कर रही हैं कि बदलाव व बेहतरी का उजाला लेकर आयी इस नीति को लागू करने में नीयत को साफ-शफ्फाक रखने में कुछ कसर तो रह ही रही है।
गुरुवार, 21 अप्रैल 2016
'वाह.... क्या बात कही है साहब'
भ्रष्टाचार की बढ़ती स्वीकार्यता
उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लागू किये जाने का विरोध करते हुए निवर्तमान मुख्यमंत्री हरीश रावत द्वारा दाखिल की गयी याचिका पर सुनवाई करने के क्रम में नैनीताल उच्च न्यायालय का यह कहना वाकई चैंकानेवाला है कि अगर सिर्फ भ्रष्टाचार के आधार पर चुनी हुई सरकार को बर्खास्त करने की परंपरा शुरू हो गयी तो देश में एक भी सरकार नहीं बचेगी। हालांकि उच्च न्यायालय ने किस सर्वे या जांच रिपोर्ट के आधार पर भ्रष्टाचार के हम्माम में देश के तमाम सूबों की सभी सरकारों के एक बराबर नंगेपन की ओर इशारा किया है यह तो शायद ही किसी को मालूम हो, लेकिन महत्वपूर्ण बात है कि भ्रष्टाचार के मामले में संलिप्तता का सबूत सामने होने के बावजूद अगर अदालत उस पर सख्ती से कार्रवाई किये जाने को बेहतर मानने के बदले उसके नतीजों पर गंभीरता से गौर करने की बात कह रही है तो इसका सीधा मतलब तो यही है कि अब अदालतों के लिये भी इकलौता भ्रष्टाचार कोई बड़ा मुद्दा नहीं रह गया है। अब लाजिमी है कि अदालत की इस बात को भ्रष्टाचार की स्वीकार्यता के बढ़ते दायरे के तौर पर ही देखा जाएगा और भविष्य के लिये यह बात नजीर बन जाएगी। जब भी किसी अदालत में मुख्यमंत्री द्वारा बहुमत जुटाने के लिये विधायकों की खरीद फरोख्त करने से संबंधित कोई मुकदमा पेश होगा तो एक बार के लिये बचाव पक्ष का वकील यह बात अदालत की संज्ञान में अवश्य लाएगा कि नैनीताल हाईकोर्ट ने सिर्फ भ्रष्टाचार के आधार पर किसी सरकार को बर्खास्त किये जाने का क्या नतीजा बताया है। खैर, भ्रष्टाचार के बढ़ते दायरे को एक नये मुकाम पहुंचाने का काम रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ने भी यह कहकर किया है कि बैंकों का पैसा हजम कर जानेवाली कंपनियों से जुड़े मामलों को नैतिकता की कसौटी पर नहीं परखा जाना चाहिये। अब स्वाभाविक है कि रघुराम की इस सलाह को तो मौजूदा माहौल में विजय माल्या सरीखे उन बड़े मगरमच्छों से संबंधित मामलों से ही जोड़कर देखा जाएगा जिन्होंने कागजी तौर पर खुद को भारी घाटे में बताकर बैंकों का काफी मोटा पैसा हजम किया हुआ है। ना सिर्फ माल्या बल्कि उस जैसों की लगातार लंबी होती कतार को मिल रहे बचाव के मौके को लेकर भले ही समाज, सरकार और सर्वोच्च न्यायालय की ओर से भी बदस्तूर गंभीर चिंता जाहिर की जा रही हो लेकिन रघुराम ने इसे नैतिकता का मसला नहीं माने जाने की सलाह देकर तो शायद यही बताने की कोशिश की है कि कर्ज लेकर वापस नहीं लौटाने और मय मुनाफे के पूरी जमा-पूंजी समेटकर चंपत हो जाने के मसले को कालेधन या भ्रष्टाचार से नहीं जोड़ा जाये। अब ऐसे में सवाल तो यही है कि अगर रघुराम की बात मानकर पैसा बनाने की प्रक्रिया को नैतिकता से नहीं जोड़ा जाये और नैनीताल उच्च न्यायालय की दलील को नजीर मानते हुए सिर्फ भ्रष्टाचार के आधार पर किसी सत्ताधारी को उसके पद से नहीं हटाया जाये तो फिर भ्रष्टाचार के मामलों का करें क्या? फिर तो यही मान लिया जाना श्रेयस्कर होगा कि भ्रष्टाचार तो सिर्फ एक भाव है, नजरिया है। ठीक वैसे ही जैसे सुख और दुख। यानि जिसके नजरिये में नैतिकता होगी उसे ही भ्रष्टाचार भी समझ में आएगा और पैसे की कालिख भी दिखेगी। वर्ना पैसा कहां काला या सफेद होता है। इसी प्रकार भले ही पैसा बनाने के गलत तौर तरीकों को कोई भ्रष्टाचार कहे। माल कूटनेवालों की जमात तो इसे सिर्फ मुनाफा कमाने का तरीका ही बताएगी। यानि समाज के संभ्रांत व दिशानिर्देशक वर्ग का काफी बड़ा तबका अब यही बताने की कोशिश में है कि भ्रष्टाचार को सिर्फ एक वैचारिक भाव के तौर पर देखा जाये और व्यावहारिक तौर पर उसे किसी भी कार्रवाई का आधार ना बनाया जाये। जाहिर तौर पर इससे हास्यास्पद और दुखद स्थिति की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती है। माना कि नैनीताल हाईकोर्ट में दाखिल रावत की याचिका पर इंसाफ करने के लिये विधायकों की खरीद-फरोख्त के प्रयासों का संज्ञान लेने की अदालत को आवश्यकता नहीं है लेकिन इसका यह मतलब भी तो नहीं होना चाहिये भ्रष्टाचार के आधार पर किसी चुनी हुई सरकार को बर्खास्त किये जाने की परंपरा की सिर्फ इसलिये शुरू नहीं होने दी जाये क्योंकि ऐसा करने से किसी सूबे में सरकार नहीं बच पाएगी। यानि आवश्यक है सरकार बचाना और इसके लिये भ्रष्टाचार की अनदेखी भी करनी पड़े तो ऐसा करने में कोई हर्ज नहीं है। जाहिर है कि ऐसे में तो अब भ्रष्टाचार के मसले को भूल जाना ही बेहतर होगा, या फिर इसके चाबुक को निचले स्तर तक ही सीमित रखना होगा। वर्ना शीर्ष पर इसका जिक्र होने से खतरा लोकतंत्र की सलामती के लिये भी उत्पन्न हो सकता है और इससे अर्थव्यवस्था की मजबूती भी प्रभावित हो सकती है। वाह.... क्या बात कही है साहब।
बुधवार, 20 अप्रैल 2016
पाकिस्तान का खुराफाती कूटनीतिक प्रपंच
चोरी और सीनाजोरी
पाकिस्तान ने भारत के साथ खुराफाती कूटनीतिक प्रपंच का जो खेल शुरू किया है उसकी जाल में अब वह खुद ही उलझता दिख रहा है। हकीकत यही है कि भारत की ओर से तो कभी कहा ही नहीं गया कि बातचीत का दरवाजा बंद करने की कोई जरूरत है। फिर पाकिस्तानी कूटनीतिज्ञों के दिमाग में समग्र वार्ता स्थगित होने की बात कहां से घुसी यह या तो वे जानें या उनका खुदा जाने। हालांकि इसे चोर की दाढ़ी में तिनके के तौर पर अवश्य देखा जा सकता है। दरअसल पठानकोट के मामले में अपनी स्पष्ट भूमिका को नकारते हुए इसे भारत की ही खुराफात बताने की पहल करने, पठानकोट मामले की जांच के लिये एनआईए को अपनी सरहद में दाखिल होने की इजाजत देने से आनाकानी करने, सीमा पर संघर्षविराम का उल्लंघन करते हुए नये सिरे से बेवजह गोलीबारी का सिलसिला शुरू करने और बलूचिस्तान व गुलाम कश्मीर के इलाकों में दावानल की शक्ल अख्तियार करती दिख रही अलगाववाद की आग में भारत को घसीटने के लिये एक कथित सामान्य नौसैनिक को राॅ का एजेंट बताकर दुनियां के समक्ष प्रस्तुत करने के बाद शायद पाकिस्तानी हुक्मरानों को यह लगा होगा कि उनकी इतनी बदमाशियों के बाद तो भारत की ओर से समग्र वार्ता पर अवश्य ही विराम लगा दिया जाएगा। वैसे भी भारत की यह स्पष्ट नीति रही है कि गोली और बोली एक साथ तो जारी नहीं रखी जा सकती। गोली की भाषा में बात करनी हो तो गोली से ही बात कर लो वर्ना बोली में बातचीत तभी संभव है जब गोलियों के शोर पर विराम लगाया जाए। जबकि पाकिस्तान की नीति रही है कि बोली का जवाब गोली से दो और जब गोली का जवाब गोला से मिलने लगे तो वार्ता की दुहाई देना शुरू कर दो। तभी तो इस बार भी जब उसे सरहद पर गोली के जवाब में गोले का सामना करना पड़ा तो उसकी पूरी कूटनीतिक फौज समग्र वार्ता के लिये हाय-तौबा मचाने में जुट गयी। नयी दिल्ली में उसने अपने उच्चायुक्त अब्दुल बासित को आगे कर दिया और उसकी संयुक्त राष्ट्र की स्थायी प्रतिनिधि मलीहा लोधी ने विश्व बिरादरी को बरगलाने के लिये अमेरिका में मोर्चा खोल दिया। दोनों का लोधी ने यह बेसुरा राग आलापा कि भारत के साथ पाकिस्तान के रिश्ते इसलिये नहीं सुधर रहे हैं क्योंकि नई दिल्ली से समग्र बातचीत के लिये पहलकदमी नहीं की जा रही है। दूसरी ओर बासित ने तो बातचीत का सिलसिला स्थगित हो जाने का एलान भी कर दिया। जाहिर है कि पाकिस्तानी रणनीतिकारों को यही लगा होगा कि इन हरकतों से भारतीय खेमा बौखला उठेगा और गुस्से में आकर कुछ अनाप-शनाप बातें या हरकतें अवश्य करेगा। लेकिन उनके अरमान धरे रह गये और इधर से सिर्फ बासित के बयान को ही आपसी संबंधों के लिये झटका बताकर चुप्पी साध ली गयी जबकि लोधी की जहरीली वाणी का प्रतिवाद करने के लिये एक शब्द खर्च करने की भी जहमत नहीं उठायी गयी। यानि नयी दिल्ली का इरादा बिल्कुल स्पष्ट है कि बेवजह की धमाचैकड़ी बहुत हो गयी, अब जो भी होगा वह ठोस होगा। इधर-उधर की बातों में वक्त जाया नहीं करने के नई दिल्ली के ठोस इरादे देखकर अब पाकिस्तान को पसीना आना लाजिमी ही है। तभी तो बड़बोले बासित के बयान को दरकिनार करते हुए उसे औपचारिक तौर पर बताना पड़ा है कि भारत के साथ बातचीत की प्रक्रिया कतई स्थगित नहीं हुई है बल्कि इसके लिये उचित वक्त व स्थान तय करने पर लगातार मंथन चल रहा है। यानि पठानकोट हमले के बाद सामने आये नाजुक हालातों में बातचीत की प्रक्रिया को लगे झटके को प्रचारित करके पाकिस्तान यह साबित करने में जुट गया है कि भारत की ओर बातचीत के लिये पहल ही नहीं हो रही है। जबकि भारत तो पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि बातचीत का तो कोई विकल्प ही नहीं है, यह तो होनी ही है। लेकिन पहले इसके लिये माहौल तो बने। खास तौर से पठानकोट के मामले में जब पाकिस्तान ने स्वीकार कर लिया है कि भारत पर हुए इस हमले में उसकी जमीन का इस्तेमाल हुआ है और उधर के लोगों ने ही इसे अंजाम दिया है तो फिर अब इसके अपराधियों पर ठोस कार्रवाई तो होनी ही चाहिये। वर्ना एक तरफ वह चीन के सहयोग से मसूद अजहर का संयुक्त राष्ट्र में बचाव करे, सरहद पर अशांति का माहौल बनाये और पठानकोट मामले की जांच के लिये एनआईएक को अपने यहां घुसने भी ना दे जबकि दूसरी तरफ बातचीत की प्रक्रिया स्थगित होने का ढि़ढ़ोरा पीटकर भारत को ही इसका जिम्मेवार ठहराये। यह तो वही बात हुई मानो उल्टा चोर कोतवाल को डांटे।
शनिवार, 16 अप्रैल 2016
आम आदमी पार्टी का मास्टर स्ट्रोक....
बदहाल व्यवस्था में सुधार की उम्मीद
आजादी के बाद से अब तक दिल्ली में सरकारी अस्पतालों का जो ढ़ांचा खड़ा हुआ है उसमें सिर्फ दस हजार बेड का ही इंतजाम हो पाया है। ऐसे में दिल्ली व आसपास की तकरीबन दो करोड़ की आबादी पर अस्पतालों में मात्र दस हजार बेड की उपलब्धता के आंकड़े से ही समझा जा सकता है कि स्थिति किस कदर भयावह ही नहीं बल्कि बेकाबू हो चुकी है। हालांकि सरकारी अस्पतालों में सभी के लिये मुफ्त दवाईयों का इंतजाम करके दिल्ली की सरकार ने एक भरोसा तो जगाया है कि जनसरोकार के प्रति उसकी प्रतिबद्धता पर उंगली नहीं उठायी जा सकती। लेकिन मसला है कि स्थिति में सुधार कैसे आये। लोगों को स्वास्थ्य सुविधाओं का अधिकतम लाभ देने के लिये अगले साल के आखिर तक अस्पतालों की क्षमता को दो गुना करते हुए दस हजार बेड और बढ़ाने का लक्ष्य तो निर्धारित कर लिया गया है। लेकिन क्या इतना ही काफी है। कतई नहीं। खास तौर से जिस सूबे की आबादी दो करोड़ के आंकड़े को पार करने जा रही हो वहां के लिये कुछ ऐसे वैकल्पिक इंतजाम तो करने ही होंगे ताकि बड़े अस्पतालों का बोझ कम हो और लोगों को घर के नजदीक ही स्वास्थ्य सुविधा का लाभ उपलब्ध हो सके। इस दिशा में इस साल के अंत तक दिल्ली में एक हजार मोहल्ला क्लीनिक और 150 पाॅलीक्लीनिक खोलने का जो लक्ष्य तय किया है वह वाकई बेहद क्रांतिकारी फैसला है। इस तरह से इस साल के अंत तक दिल्ली के सभी विधानसभा क्षेत्रों में कम से कम 15 ऐसे स्वास्थ्य केन्द्र खुल जाएंगे जहां ना सिर्फ रोजाना डाॅक्टर अपनी सेवाएं देंगे बल्कि वहां मुफ्त दवाओं का भी इंतजाम होगा। इसके अलावा हर विधानसभा क्षेत्र में 2-3 पाॅलीक्लीनिक खोलने की जो योजना बनायी गयी है उसके तहत हर पाॅलीक्लीनिक में 7-8 स्पेस्लिस्ट डाॅक्टर रोज अपनी सेवाएं देंगे और यहां भर्ती करने के लिये बेड को छोड़कर बड़े अस्पतालों सरीखे बाकी तमाम इंतजाम उपलब्ध होंगे। जाहिर है कि इस योजना के साकार हो जाने के बाद दिल्ली की स्वास्थ्य व्यवस्था में वाकई काफी सुधार देखने को मिलेगा। जहां एक ओर लोगों को अपने घर के आसपास ही प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाएं मिल जाएंगी वहीं बड़े अस्पतालों का बोझ भी कम होगा और छोटी-मोटी बीमारियों का इलाज कराने के लिये लोगों को अस्पतालों के चक्कर भी नहीं लगाने पड़ेंगे। पिछले साल से अब तक तकरीबन जिन सौ मोहल्ला क्लिनिकों का परिचालन आरंभ हो चुका है वहां अब तक का अनुभव यही बताता है कि लोगों की 90 फीसदी स्वास्थ्य समस्याएं यहीं ठीक हो जा रही हैं। इन मोहल्ला क्लीनिकों की सफलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है इसका डंका अब अमेरिका में भी बज रहा है और वहां भी लोगों को आसान स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराने के लिए केजरीवाल सरकार की मोहल्ला क्लीनिक योजना से सबक लेने के सुझाव दिए जा रहे हैं। पिछले सप्ताह भी एक बड़े अमेरिकी मीडिया हाउस द वाशिंगटन पोस्ट में इस बाबत एक लेख प्रकाशित हुआ है जिसमें दिल्ली में शुरू की गई मोहल्ला क्लीनिक योजना की जमकर तारीफ की गई है। साथ ही इस लेख में अमेरिकी प्रशासन को सलाह दी गई है कि वह भी अपनी स्वास्थ्य व्यवस्था को सुधारने के लिए मोहल्ला क्लीनिक योजना को लागू करने का इंतजाम करे। जाहिर है कि अगर अमेरिका सरीखे विकसित व साधन संपन्न देश की मीडिया भी वहां के लिये इस योजना को अमल में लाये जाने की वकालत कर रहा है तो निश्चित तौर पर यह एहसास ना सिर्फ दिल्ली सरकार बल्कि आम दिल्लीवासियों के लिये भी बेहद सुखद है। लेकिन इस सब के बीच इस बात को नहीं भुलाया जा सकता है कि मोहल्ला क्लिनिक की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए इनमें जरूरत के अनुरूप स्टाफ और बुनियादी चिकित्सीय सुविधाएं देने में कतई कोताही नहीं बरती जानी चाहिये। खास तौर से बंद पड़े गोदामों में बिना समुचित व्यवस्था व परिचारक के ही आनन फानन में मोहल्ला क्लीनिक शुरू कर देने की जो परिपाटी शुरू की जा रही है वह कतई उचित नहीं है। जब लोगों ने इतने दिनों तक समस्याएं झेली हैं तो वे कुछ दिन और भी सब्र कर सकते हैं। लेकिन इंतजाम ऐसे हों कि जब किसी मोहल्ला क्लीनिक का लोकार्पण किया जाये तो वहां आवश्यक सुविधाएं अवश्य मौजूद हों और वहां काम करनेवालों और इलाज कराने के लिये आनेवालों को किसी समस्या का सामना ना करना पड़े। ऐसा हो जाए तो यह दिल्ली की बीमार जनता के लिए आम आदमी पार्टी का मास्टर स्ट्रोक साबित होगा।
शुक्रवार, 15 अप्रैल 2016
हादसे से बेपर्दा हुई हकीकत
हादसे से बेपर्दा हुई हकीकत
केरल के पुत्तिंगल देवी मंदिर में हुए हादसे के बाद जिस तरह से आतिशबाजी के लिये जमा किये गये बारूदी जखीरे की हकीकत परत दर परत बेपर्दा हो रही है उससे सरकार भी भौंचक है। हालांकि हालत तो सहा भी ना जाये और कहा भी ना जाये की ही है लेकिन मजबूरी है कि कहना तो पड़ेगा ही। यह बताना ही पड़ेगा कि आतिशबाजी में इस्तेमाल किये जानेवाले जिन जानलेवा रसायनों के इस्तेमाल पर समूचे देश में पाबंदी है वे आखिर केरल के मंदिरों में कैसे पहुंच गये। कहां से इतनी बहुतायत मात्रा में ऐसी आतिशबाजी का सामान आया जो ना तो हमारे देश में बनता है और ना ही जिसके इस्तेमाल की इजाजत है। वह भी इतनी अधिक मात्रा में कि भीषण हादसे की वजह बने डेढ़ क्ंिवटल विस्फोटकों के पलक झपकते ही स्वाहा हो जाने के बाद भी जिसका जखीरा समाप्त नहीं हुआ है बल्कि थोक में जमा किये गये ऐसे बारूदी विस्फोटकों की अलग-अलग जगहों से भारी तादाद में बरामदगी का सिलसिला लगातार जारी है। कभी वह कारों से बरामद हो रहा है तो कहीं गोदाम में ठुंसा हुआ पाया जा रहा है। जाहिर है कि प्रशासन की सख्ती को देखते हुए बारूदी जखीरे के सप्लायरों व जमाकर्ताओं ने इसे भारी मात्रा में छिपा लिया होगा। यानि सामान्य शब्दों में कहें तो देश में ऐसे बारूद का ढ़ेर जहां-तहां होने से इनकार नहीं किया जा सकता है जिसे हमारे देश में खपाने के लिये बकायदा एक बहुत बड़ा नेटवर्क काम कर रहा है और इसके तार निश्चित ही विदेशों से जुड़े हुए हैं अथवा यह पूरा नेटवर्क ही विदेशों से संचालित हो रहा है। वर्ना कोई वजह ही नहीं है कि जो विस्फोटक हमारे देश में ना बनता है और ना ही खुले बाजार में बिक सकता है उसकी इतनी बड़ी खेप देश के भीतर मंदिर हादसे की वजह बन जाये और जहां-तहां से थोक के भाव में इसकी बरामदगी हो। जाहिर है कि स्थानीय प्रशासन तो सिर्फ कानून-व्यवस्था की दृष्टि से ही मामले को देखेगा लेकिन असली जिम्मेवारी तो केन्द्र की है क्योंकि केरल के मंदिर हादसे ने जिस हकीकत को बेपर्दा किया है उससे राष्ट्रीय सुरक्षा में सेंध का काफी बड़ा मामला सामने आ गया है। तभी तो केन्द्र सरकार भी औपचारिक तौर पर इस हादसे की जांच का जिम्मा किसी बड़ी एजेंसी को सौंपकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेने के बजाय अंदरूनी तौर पर मामले की पूरी हकीकत को गहराई से समझ लेना चाह रही है। यही वजह है कि इस पूरे मामले की आपराधिक नजरिये से जांच कराने के बजाय विशेषज्ञ संस्थाओं को जांच के काम में लगाया जा रहा है। खास तौर से पेट्रोलियम एक्सप्लोसिव सेफ्टी आॅर्गेनाइजेशन सरीखी ऐसी संस्थाओं को जांच की जिम्मेवारी दी गयी है जिसे यह पता लगाने में महारथ हासिल है कि हादसे की वजह बने पटाखों में कौन सा रसायन इस्तेमाल हुआ और उन रसायनों का उत्पादन व निर्यात किन देशों से होता है। अभी अंदरूनी तौर पर तीन जांच टीमों ने जिम्मा संभाल लिया है और रसायनों व विस्फोटकों की पड़ताल के अलावा यह भी जानकारी जुटायी जा रही है कि ये अवैध व प्रतिबंधित सामान कितनी मात्रा में कैसे व कहां से हमारी सरहद के भीतर दाखिल हो रहे हैं। इस मामले में अब तक जो जानकारी मिली है उसके मुताबिक पूरे मामले में चीन की चालबाजी खुलकर सामने आ रही है। चीन से समुद्री मार्ग द्वारा प्रतिबंधित सामानों की तस्करी होने की सूचना सरकार को मिल गयी है। हालांकि इसमें कमियां व खामियां हमारी ओर से ही रही हैं क्योंकि चीन से आनेवाले माल से लदे कंटेनरों में जिस तरह से छिपाकर प्रतिबंधित सामान भारत में लाया जा रहा है उसे पहचानने और पकड़ने में हमारे तमाम स्कैनर नाकाम साबित हुए हैं। इसमें गलती मशीनों की नहीं बल्कि उसे संचालित करनेवाले उन जांच अधिकारियों की निकल कर सामने आ रही है जो कंटेनरों की गहराई से पड़ताल करने की जहमत नहीं उठाते। अब लाख टके का सवाल है कि जब कंटेनर में छिपाकर प्रतिबंधित पटाखे भारत में दाखिल कराये जाने की हकीकत सामने आ गयी है तो इस संभावना को कैसे नकारा जा सकता है कि उसी कंटेनर में हथियार भी आता होगा और मादक पदार्थ ही नहीं बल्कि नकली नोट भी। साथ ही भारत के खिलाफ पाकिस्तान से हाथ मिलाकर खुल्लमखुल्ला पठानकोट हमले के मास्टर माइंड मसूद अजहर की अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पैरोकारी करनेवाला चीन अपने कंटेनर के द्वारा आईएसआई की साजिशों को भी तो सफल करने में सहयोगी बन सकता है। इस तरह के तमाम पहलू हैं जो कोल्लम हादसे से सतह पर आ गये हैं और जिनकी गहराई से जांच करके सुरक्षा-व्यवस्था को चाक-चैबंद करने की जरूरत है।
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