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शुक्रवार, 29 अप्रैल 2016

बदलाव के उजाले में सियासी अंधेरा

बदलाव के उजाले में सियासी अंधेरा


दमघोंटू प्रदूषण की बढ़ती रफ्तार पर लगाम कसने और वाहनों की बेतहाशा रेलमपेल के कारण हांफती, कराहती व कदम-कदम पर अटकती-चटखती सड़कों को सुगम व सुरक्षित बनाने के मकसद से दिल्ली में शुरू की गयी सम-विषम योजना की गुणवत्ता व लोकप्रियता तो निश्चित ही सवालों से परे है। इस योजना को सही तरीके से लागू करके इसका अधिकतम लाभ हासिल करने में भले ही लाख दुश्वारियां सामने आ रही हों लेकिन इसकी उपयोगिता के बारे में किसी को रत्ती भर भी संदेह नहीं है। तभी तो इस साल के पहले पखवाड़े में पहली दफा लागू की गयी इस योजना को दोबारा शुरू करने से पहले जब लोगों से रायशुमारी की गयी तो 80 फीसदी से भी अधिक लोगों ने इसके प्रति सकारात्मक विचार ही दिये। यहां तक कि दिल्ली सरकार के तमाम राजनीतिक विरोधियों ने भी उसकी इस पहल को सराहनीय व अनुकरणीय बताने से परहेज नहीं बरता। लेकिन इस मामले को लेकर अब जिस तरह की राजनीति शुरू हुई है और इस योजना की आड़ लेकर दिल्ली सरकार ने जिस तरह का राजनीति कारोबार शुरू कर दिया है उसे देखकर स्वाभाविक तौर पर लोगों को दुख भी हो रहा है और इसके भविष्य को लेकर चिंता भी हो रही है। माना कि दिल्ली सरकार ने आम लोगों को राहत देने के लिये ही इस योजना को शुरू किया है और विरोधियों ने भी इसकी जनप्रियता का सम्मान करते हुए इसके औचित्य पर उंगली उठाने की पहल नहीं की है लेकिन इसका कतई यह मतलब नहीं है कि इस मसले को राजनीति का ऐसा मुद्दा बना दिया जाये जो विवादों की नयी गाथा का आधार बन जाये। वास्तव में देखा जाये तो इस योजना को विवादों के दायरे में लाने के लिये दिल्ली सरकार के विरोधी जितने दोषी हैं उससे जरा भी कम आम आदमी पार्टी की नीतियां नहीं हैं। अगर वास्तव में सरकार ने पूरी इमानदारी व सहज भाव से दिल्ली व दिल्लीवालों की समस्या सुलझाने की नीयत से इस योजना को संचालित किया होता तो इस मामले को लेकर कोई विवाद पैदा होने का सवाल ही नहीं था। लेकिन औपचारिक तौर पर भले ही दिल्ली में सत्तारूढ़ आप सरकार के शीर्ष रणनीतिकार इस हकीकत को स्वीकार ना करें लेकिन सच यही है इस योजना को ऐसी दुधारू गाय बनाने की कोशिश की गयी है जो राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी को जनसमर्थन व व्यापक स्वीकार्यता का दूध भी दे और अन्य राजनीतिक दलों को तबियत से लथाड़ मारकर लहुलुहान व परेशान भी करे। वर्ना कोई वजह ही नहीं थी कि कल तक इस मसले पर दिल्ली सरकार को जमकर साधुवाद देनेवाली तमाम राजनीतिक पार्टियां इस मसले पर ही दिल्ली सरकार को जमकर कोसने की पहल करतीं। ऐसा हुआ ही इसलिये है कि क्योंकि समूचे देश में अपनी वाहवाही लूटने व राष्ट्रीय स्तर पर मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का चेहरा चमकाने के लिये दिल्ली के आम लोगों की गाढ़ी कमाई का सैकड़ों करोड़ रूपया विज्ञापन के तौर पर पानी में बहा दिया गया है जिससे दिल्ली या दिल्लीवासियों को कुछ भी लाभ नहीं मिलनेवाला है। अलबत्ता बकौल मधेपुरा सांसद पप्पू यादव, अगर इस रकम का आधा हिस्सा भी दिल्ली में प्रदूषण के नियंत्रण की योजनाओं पर खर्च किया जाता तो लोगों को इसका काफी अधिक लाभ मिल सकता था। यही पैसा अगर सायकिल के प्रयोग को प्रोत्साहित करने, सौर व वैकल्पिक ऊर्जा के क्षेत्र को सुदृढ़ करने, कचरा प्रबंधन की क्षमता में वृद्धि करने या गाद-गंदगी से अटे-पटे नदी, नाले, सीवर व सड़क को साफ-सुथरा करने सरीखे कार्यों में खर्च किया जाता तो निश्चित ही किसी को सम-विषम योजना की खामियां गिनाने का मौका नहीं मिल पाता। लेकिन पैसा खर्च हो रहा है राष्ट्रीय स्तर पर विज्ञापन के माध्यम से चेहरा चमकाने में। इसमें भी अगर दिल्ली सरकार की इस दलील को सही मानें कि लोगों को योजना की जानकारी देने के लिये ऐसा करना आवश्यक है तो कायदे से दिल्ली से प्रकाशित होनेवाले अखबारों व एफएम रेडियो सरीखे जन-जन से जुड़े सूचना व संचार के माध्यमों को ही विज्ञापन दिया जाना चाहिये था। अन्य प्रदेशों में विज्ञापन के माध्यम से इसकी आड़ में अपना चेहरा चमकाने का क्या मतलब है। एक पखवाड़े की इस प्रायोगिक योजना के बहाने समूची दिल्ली को होर्डिंग से पाट देने, समूची दिल्ली को केजरीवालमय कर देने, विज्ञापन के माध्यम से दिल्ली को जागरूक करने के मामले में दिल्ली से प्रकाशित होनेवाले जमीनी अखबारों को इस योजना का सबसे मजबूत हिस्सा बनाने में ज्यादा रूचि नहीं लेने, कम खर्च में बेहतर जनसंपर्क के विभिन्न माध्यमों का इस्तेमाल करने से परहेज बरतने व राष्ट्रीय स्तर पर जमकर शोशेबाजी करने सरीखी पहलकदमियां तो यही इशारा कर रही हैं कि बदलाव व बेहतरी का उजाला लेकर आयी इस नीति को लागू करने में नीयत को साफ-शफ्फाक रखने में कुछ कसर तो रह ही रही है।   

गुरुवार, 14 अप्रैल 2016

दिल्ली में दोबारा.... सम-विषम पखवाड़ा

सम-विषम के बढ़ते कदम

दिल्ली सरकार ने प्रदूषण की मार और यातायात व्यवस्था में सुधार के लिये सम-विषम के जिस फार्मूले को आजमाया है वह वाकई हर मामले में सम ही है। हालांकि इस योजना के प्रथम चरण में विषमता के कुछ मामले अवश्य सामने आये। मसलन प्रदूषण के स्तर में अपेक्षित गिरावट नहीं आ पायी, सीएनजी स्टीकर के वितरण में धांधली देखी गयी और पर्यावरण सेवा के तहत निजी व स्कूल की गाडि़यों को सरकारी खर्चे पर सड़क पर उतारना आमदनी के लिहाज से काफी महंगा सौदा साबित हुआ। लेकिन गहराई से गौर करें तो ये तमाम कमियां व खामियां इस योजना को लागू करने में रह गयी कमी का ही नतीजा थीं। वर्ना सफलता के पैमाने पर परखा जाये तो समूची दिल्ली ने इसे तहेदिल से सराहा और जब इसका दूसरा चरण शुरू करने से पहले चार लाख लोगों से वेबसाइट, ई-मेल, फोन और मोहल्ला सभा की बैठकों के माध्यम से रायशुमारी करायी गयी तो 80 फीसदी दिल्लीवासियों ने इसके समर्थन में ही अपनी राय जाहिर की। यानि सियासत के लिये आवश्यक जनसमर्थन की ताकत के नजरिये से तो इसे अभूतपूर्व सफलता मिली ही। साथ ही वाहनों के बोझ से कराह रही सड़कों को भी सांस लेने का मौका मिला और लोगों को जाम के जानलेवा झाम से राहत मिली। इसके अलावा प्रदूषण फैलाने में वाहनों का योगदान भी कम तो हुआ ही। यानि एक योजना का फायदा तिगुना। तभी तो अब दोबारा इसे अगले पंद्रह दिनों के लिये लागू करने का फैसला किया गया है और जनसरोकार के प्रति दिल्ली सरकार की कटिबद्धता को देखते हुए उम्मीद की जा रही है कि जल्दी की इस योजना को स्थायी तौर पर भी लागू कर दिया जाएगा। हालांकि इस बार भी प्रायोगिक तौर पर ही सम-विषम योजना को लागू किया जा रहा है और इसे सफल बनाने के हरसंभव प्रयास किये जा रहे हैं। मसलन दिल्ली-एनसीआर को जोड़नेवाली 17 रूटों पर स्पेशल बसें चलाई जाएंगी। सुचारू यातायात सुनिश्चित करने के लिये 400 पूर्व सैनिकों की तैनाती की जाएगी। साथ ही पिछली बार की तुलना में एक हजार ज्यादा यानी 5 हजार वॉलंटियर लगाए जाएंगे। पर्यावरण बस सेवा इस बार भी जारी रहेगी जिनमें मार्शल तैनात होंगे और आधी सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित रहेंगी। मेट्रो फीडर बस सेवा के रूट में भी जरूरत के मुताबिक बदलाव किया जाएगा और मेट्रो के फेरे भी बढ़ाए जाएंगे। इसके अलावा वायु गुणवत्ता पर बारीक नजर रखने के लिये 119 जगहों पर प्रदूषण के स्तर का लगातार मुआयना किया जाएगा। यानि योजना के पहले चरण से सबक लेते हुए इस दफा भी इसे सफल बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही है। लिहाजा पिछले अनुभव को देखते हुए इस लोकप्रिय योजना की सफलता पर शायद ही किसी को संदेह हो। तभी तो प्रादेशिक स्तर पर विरोधी पार्टियां इसकी कितनी ही खामियां क्यों ना गिना रही हों लेकिन इसकी लोकप्रियता व सफलता ने केन्द्र को भी अचंभित व चमत्कृत कर दिया है। यही वजह है कि अब केन्द्र सरकार देश भर में इस योजना का विस्तार करने पर गंभीरता से विचार कर रही है। जाम व प्रदूषण की दोहरी मार से कराह रहे मुम्बई, पुणे व कोलकाता सरीखे महानगरों को ही नहीं बल्कि उन तमाम शहरों को इस योजना से जोड़ने की योजना बनायी जा रही है जहां वाहनोें की तादाद 20 लाख से अधिक हो और रोजाना औसतन कम से कम 300 गाडि़यां पंजीकृत होती हों। यानि अब देश के तकरीबन सभी सूबों को इसके दायरे में लाया जाएगा और तमाम उन शहरों में इसका विस्तार किया जाएगा जहां जाम की समस्या बेहद आम है। इस योजना को देश भर में लागू करके राष्ट्रीय स्तर पर इसका सियासी श्रेय लूटने के लिये केन्द्र सरकार इस कदर लालायित है कि राज्यसभा में अपने कमजोर संख्याबल की समस्या को देखते हुए वह इससे संबंधित विधेयक को मनीबिल के तौर पर लोकसभा में पेश करने का मन बना रही है ताकि राज्यसभा की मंजूरी हासिल करने का झमेला ही ना रहे। हालांकि अब यह देखना दिलचस्प होगा कि 25 अप्रैल से आरंभ हो रहे संसद सत्र में ही इसे पारित कराने के प्रति कटिबद्ध दिख रही केन्द्र सरकार किस त्वरित गति से इसे देशभर में लागू करने में कामयाब होती है। बहरहाल इतना तो तय है कि देश भर में इसका विस्तार करके सियासी श्रेय लूटने में केन्द्र सरकार भले ही कामयाब हो जाये लेकिन इतिहास के पन्नों में इसका व्यावहारिक श्रेय तो दिल्ली की केजरीवाल सरकार के हिस्से में ही दर्ज होगा।