बवालियों की गिरफ्त में कोतवाली
संसद की मौजूदा तस्वीर के तहत तो बवालियों का ही कोतवाली में बोलबाला दिख रहा है। कहां तो इन बवालियों की आंखों में कोतवाली का खौफ स्पष्ट नजर आना चाहिये था और कहां कोतवाल को ही इन बवालियों ने सवालों के कठघरे में खड़ा करने की कोशिशें शुरू कर दी हैं। खास तौर से अगस्ता वेस्टलैंड हेलीकाॅटर खरीद में हुए घोटाले के मामले को लेकर जिस तरह से अपनी कमियों व खामियों को स्वीकार करने के बजाय पूर्ववर्ती सरकार के रणनीतिकारों ने मौजूदा सरकार की नीति व नीयत पर ही दोषारोपण आरंभ कर दिया है उससे तो यही लग रहा है कि खुद के दामन पर लगे बदनामी का दाग धोने के लिये इन्होंने सरकार का दामन दागदार करने की राह पकड़ ली है। तभी तो अगस्ता के विवाद पर झूठे तथ्यों के सहारे भाजपा को भी गुनाह में बराबर का भागीदार बताने व अपनी गलतियों पर पर्दा डालने की कोशिशें शुरू की गयीं। पहले तर्क गढ़ा गया कि अगस्ता को काली सूची में डालने का काम पूर्ववर्ती संप्रग सरकार ने ही किया था। लेकिन तथ्यों का खुलासा होने के बाद जब इस दलील का दम निकल गया तो कहा गया कि कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व का चरित्र हनन करने के लिये भारतीय प्रधानमंत्री ने इटली के प्रधानमंत्री के साथ एक गुप्त समझौता किया है। जिसके तहत भारतीय मछुआरों की हत्या का मुकदमा झेल रहे इतालवी नौसैनिकों को बचाने के एवज में इटली की अदालत में वहां की जांच एजेसियों ने ऐसी बेबुनियाद कहानी पेश की है जिसके चलते हेलीकाॅप्टर खरीद में दलाली का मामला सामने आया है। लेकिन यह दलील भी सरकार ने औपचारिक तौर पर संसद में खारिज कर दी जिसे कांग्रेस ने स्वीकार भी कर लिया। अगर सरकार की सफाई कांग्रेस ने स्वीकार नहीं की होती तो उसके पास विशेषाधिकार हनन की नोटिस देने का अख्तियार भी था। लेकिन सरकार द्वारा गोपनीय समझौते की बात को ही नहीं बल्कि दोनों देशों के प्रधानमंत्री की मुलाकात होने को भी नकार दिये जाने को कांग्रेस द्वारा चुपचाप स्वीकार कर लिये जाने से साफ है कि उसे अपनी दलील के थोथेपन का पहले से पता था। खैर, जब इस दलील से भी दाल नहीं गल सकी तो एक नया सुर्रा छोड़ा गया कि जब पूर्ववर्ती सरकार को हेलीकाॅप्टर सौदे में गड़बड़ी का पता चला तो ना सिर्फ कंपनी द्वारा जमा करायी गयी धरोहर राशि जब्त कर ली गयी बल्कि उसके द्वारा की गयी तीन हेलीकाॅप्टरों की आपूर्ति का भुगतान भी रोक दिया गया जिससे सरकारी खजाने को तकरीबन तीन हजार करोड़ का फायदा ही हुआ, कोई नुकसान नहीं हुआ। अब ऐसी दलीलों को सामने रखकर अगर यह बताने की कोशिश की जा रही है कि चुंकि इस सौदे में देश को फायदा ही हुआ लिहाजा इसमें दलाली खाए जाने के सवाल को समाप्त कर दिया जाना चाहिये तो जाहिर तौर पर इस दलील को शायद ही कोई स्वीकार करे। क्योंकि इस सौदे में हुए नफा-नुकसान का मामला तो अलग ही है और अगर इसमें देश को घाटा नहीं होने दिया गया तो इसका एहसान नहीं जताया जा सकता। अलबत्ता सरकार का तो कर्तव्य ही है कि वह हर मामले में देश का हित सुनिश्चित करे। लेकिन देश का हित सुनिश्चित करने के एवज में किसी को दलाली खाने की छूट तो नहीं दी जा सकती। यहां सवाल तो उस दलाली की रकम का है जिसे बांटनेवाले ने अपना जुर्म कबूल भी कर लिया है और और अपने इस गुनाह की सजा भी भुगत रहा है। लेकिन दलाली लेनेवाले का कहीं कोई अता-पता ही नहीं है। इस सवाल को तथ्यों के साथ सदन में प्रस्तुत करने के क्रम में जब सुब्रमण्यम स्वामी ने असली दलाल की स्वीकारोक्ती का फर्रा पेश कर दिया तो उसका ठोस जवाब देने के बजाय पूछा जा रहा है कि उनके पास ये कागजात कहां से आये। यानि कागज में दर्ज तथ्यों पर चर्चा करने के बजाय बवाल काटने की कोशिश हो रही है दस्तावेज के स्रोत को लेकर। अब ऐसे सवालों और इन बवालों के सहारे अगर विवाद के दाग को छिपाने की कोशिश होगी तो दाग धुलेंगे या गहरे होंगे इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। लेकिन मसला है कोतवाली में बवालियों के कोहराम का। इसका उपाय तो तभी निकल सकता है जब देश में त्वरित न्याय की व्यवस्था मजबूत हो। वर्ना जिस देश में 1992 में बम फोड़नेवाले आतंकी याकूब मेनन को फांसी के तख्ते तक पहुंचाने में 23 साल का वक्त लग जाता हो वहां की कोतवाली में बवालियों का बोलबाला दिखना स्वाभाविक ही है।
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