शुक्रवार, 15 अप्रैल 2016

हादसे से बेपर्दा हुई हकीकत

हादसे से बेपर्दा हुई हकीकत


केरल के पुत्तिंगल देवी मंदिर में हुए हादसे के बाद जिस तरह से आतिशबाजी के लिये जमा किये गये बारूदी जखीरे की हकीकत परत दर परत बेपर्दा हो रही है उससे सरकार भी भौंचक है। हालांकि हालत तो सहा भी ना जाये और कहा भी ना जाये की ही है लेकिन मजबूरी है कि कहना तो पड़ेगा ही। यह बताना ही पड़ेगा कि आतिशबाजी में इस्तेमाल किये जानेवाले जिन जानलेवा रसायनों के इस्तेमाल पर समूचे देश में पाबंदी है वे आखिर केरल के मंदिरों में कैसे पहुंच गये। कहां से इतनी बहुतायत मात्रा में ऐसी आतिशबाजी का सामान आया जो ना तो हमारे देश में बनता है और ना ही जिसके इस्तेमाल की इजाजत है। वह भी इतनी अधिक मात्रा में कि भीषण हादसे की वजह बने डेढ़ क्ंिवटल विस्फोटकों के पलक झपकते ही स्वाहा हो जाने के बाद भी जिसका जखीरा समाप्त नहीं हुआ है बल्कि थोक में जमा किये गये ऐसे बारूदी विस्फोटकों की अलग-अलग जगहों से भारी तादाद में बरामदगी का सिलसिला लगातार जारी है। कभी वह कारों से बरामद हो रहा है तो कहीं गोदाम में ठुंसा हुआ पाया जा रहा है। जाहिर है कि प्रशासन की सख्ती को देखते हुए बारूदी जखीरे के सप्लायरों व जमाकर्ताओं ने इसे भारी मात्रा में छिपा लिया होगा। यानि सामान्य शब्दों में कहें तो देश में ऐसे बारूद का ढ़ेर जहां-तहां होने से इनकार नहीं किया जा सकता है जिसे हमारे देश में खपाने के लिये बकायदा एक बहुत बड़ा नेटवर्क काम कर रहा है और इसके तार निश्चित ही विदेशों से जुड़े हुए हैं अथवा यह पूरा नेटवर्क ही विदेशों से संचालित हो रहा है। वर्ना कोई वजह ही नहीं है कि जो विस्फोटक हमारे देश में ना बनता है और ना ही खुले बाजार में बिक सकता है उसकी इतनी बड़ी खेप देश के भीतर मंदिर हादसे की वजह बन जाये और जहां-तहां से थोक के भाव में इसकी बरामदगी हो। जाहिर है कि स्थानीय प्रशासन तो सिर्फ कानून-व्यवस्था की दृष्टि से ही मामले को देखेगा लेकिन असली जिम्मेवारी तो केन्द्र की है क्योंकि केरल के मंदिर हादसे ने जिस हकीकत को बेपर्दा किया है उससे राष्ट्रीय सुरक्षा में सेंध का काफी बड़ा मामला सामने आ गया है। तभी तो केन्द्र सरकार भी औपचारिक तौर पर इस हादसे की जांच का जिम्मा किसी बड़ी एजेंसी को सौंपकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेने के बजाय अंदरूनी तौर पर मामले की पूरी हकीकत को गहराई से समझ लेना चाह रही है। यही वजह है कि इस पूरे मामले की आपराधिक नजरिये से जांच कराने के बजाय विशेषज्ञ संस्थाओं को जांच के काम में लगाया जा रहा है। खास तौर से पेट्रोलियम एक्सप्लोसिव सेफ्टी आॅर्गेनाइजेशन सरीखी ऐसी संस्थाओं को जांच की जिम्मेवारी दी गयी है जिसे यह पता लगाने में महारथ हासिल है कि हादसे की वजह बने पटाखों में कौन सा रसायन इस्तेमाल हुआ और उन रसायनों का उत्पादन व निर्यात किन देशों से होता है। अभी अंदरूनी तौर पर तीन जांच टीमों ने जिम्मा संभाल लिया है और रसायनों व विस्फोटकों की पड़ताल के अलावा यह भी जानकारी जुटायी जा रही है कि ये अवैध व प्रतिबंधित सामान कितनी मात्रा में कैसे व कहां से हमारी सरहद के भीतर दाखिल हो रहे हैं। इस मामले में अब तक जो जानकारी मिली है उसके मुताबिक पूरे मामले में चीन की चालबाजी खुलकर सामने आ रही है। चीन से समुद्री मार्ग द्वारा प्रतिबंधित सामानों की तस्करी होने की सूचना सरकार को मिल गयी है। हालांकि इसमें कमियां व खामियां हमारी ओर से ही रही हैं क्योंकि चीन से आनेवाले माल से लदे कंटेनरों में जिस तरह से छिपाकर प्रतिबंधित सामान भारत में लाया जा रहा है उसे पहचानने और पकड़ने में हमारे तमाम स्कैनर नाकाम साबित हुए हैं। इसमें गलती मशीनों की नहीं बल्कि उसे संचालित करनेवाले उन जांच अधिकारियों की निकल कर सामने आ रही है जो कंटेनरों की गहराई से पड़ताल करने की जहमत नहीं उठाते। अब लाख टके का सवाल है कि जब कंटेनर में छिपाकर प्रतिबंधित पटाखे भारत में दाखिल कराये जाने की हकीकत सामने आ गयी है तो इस संभावना को कैसे नकारा जा सकता है कि उसी कंटेनर में हथियार भी आता होगा और मादक पदार्थ ही नहीं बल्कि नकली नोट भी। साथ ही भारत के खिलाफ पाकिस्तान से हाथ मिलाकर खुल्लमखुल्ला पठानकोट हमले के मास्टर माइंड मसूद अजहर की अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पैरोकारी करनेवाला चीन अपने कंटेनर के द्वारा आईएसआई की साजिशों को भी तो सफल करने में सहयोगी बन सकता है। इस तरह के तमाम पहलू हैं जो कोल्लम हादसे से सतह पर आ गये हैं और जिनकी गहराई से जांच करके सुरक्षा-व्यवस्था को चाक-चैबंद करने की जरूरत है।  

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