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शनिवार, 22 दिसंबर 2018

ग्रह-नक्षत्रों में अटकी सियासत

आगामी लोकसभा चुनाव को लेकर बेशक अंदरूनी तौर पर सियासी गतिविधियां जोर-शोर से जारी हैं और हर खेमे में काफी हलचल का माहौल का दिख रहा है लेकिन औपचारिक तौर पर किसी भी खेमे से कोई बड़ी खबर सामने नहीं आने की बड़ी वजह खरमास को बताया जा रहा है। दरअसल हिन्दू समाज में खरमास के दौरान कोई भी शुभ कार्य करना, नया व्यवसाय या साझेदारी करना या कोई भी नई चीज लेना वर्जित माना जाता है। कई इलाकों में तो इस दौरान नए कपड़े खरीदना या पहनना भी मना होता है। खरमास से जुड़े मिथकों व किस्से-कहानियों का राजनीतिक दलों पर कितना अधिक प्रभाव पड़ रहा है इसका सहज अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इन दिनों किसी भी खेमे से गठबंधन या साझेदारी के बारे में किसी समझौते को निर्णायक रूप नहीं दिया जा रहा है। बात चाहे उत्तर प्रदेश में कांग्रेस से किनारा करके सपा, बसपा व रालोद द्वारा आपस में चुनाव पूर्ण गठबंधन किये जाने के संकेतों की करें अथवा बिहार में भाजपानीत राजग के खिलाफ राजग को धुरी बनाकर समान विचारधारा वाले दलों के एक मंच पर आकर महागठबंधन बनाए जाने की या फिर बिहार में सीट समझौते को लेकर भाजपा, जदयू व लोजपा के बीच जारी तनातनी की। किसी भी मामले में औपचारिक तौर पर अभी कोई अंतिम फैसला नहीं किया जा रहा है और सभी राजनीतिक दल केवल संकेतों की भाषा में ही सियासी समस्याओं को सुलझाने की दिशा में आगे बढ़ते दिखाई पड़ रहे हैं। दरअसल माना जाता है कि सूर्य के धनु राशि में प्रवेश करने के साथ ही खरमास का आरंभ हो जाता है। धनु वास्तव में गुरू की राशि है। जब इसमें सूर्य आते हैं तो गुरू का प्रभाव कुंद पड़ जाता है। जबकि किसी भी शुभ कार्य या बड़ी पहल के लिये ज्योतिषीय नजरिये से गुरू का सहयोग बेहद आवश्यक है। लेकिन जब तक सूर्य धनु राशि में रहेंगे तब तक गुरू काफी हद तक निष्क्रिय रहेंगे। इसी वजह से इसे खरमास का नाम दिया जाता है और इस दौरान कोई बड़ा काम नहीं करने की सलाह दी जाती है। इस बार यह खरमास बीते 16 दिसंबर की सुबह नौ बजकर आठ मिनट से आरंभ हुआ है जो आगामी 14 जनवरी को सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने के बाद ही समाप्त होगा। चुंकि खरमास के दौरान कोई नयी साझेदारी या व्यावसायिक समझौते को अमल में लाना वर्जित बताया गया है लिहाजा कोई भी दल इस दौरान किसी राजनीतिक समझौते को निर्णायक मुकाम तक पहुंचाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है। बेशक अंदरूनी तौर पर इस बात का खुला संकेत दिया जा रहा हो कि यूपी में सपा, बसपा और रालोद का जबकि बिहार में राजद, कांग्रेस, रालोसपा, माकपा, भाकपा, हम और शरद यादव का ही नहीं बल्कि भाजपा, जदयू और लोजपा का भी गठबंधन हो गया है और इन तीनों खेमों ने सीटों के बंटवारे के मसले को भी आपस में सुलझा लिया है लेकिन औपचारिक तौर पर कोई भी खेमा सीटों के तालमेल के आंकड़ों को सार्वजनिक करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है। बताया जाता है कि खरमास के कारण ही सपा यह स्वीकार करने से हिचक रही है कि उसने गठबंधन में परिवर्तन करते हुए कांग्रेस से किनारा कर लिया है और महागठबंधन की ओर से भी यह बताने से परहेज बरता जा रहा है कि उसके कौन-कौन से घटक कितनी सीटों पर चुनाव लड़ेंगे। यहां तक कि भाजपा को आंखें दिखा रही लोजपा को कितनी सीटें देने का भरोसा देकर राजग में बरकरार रहने के लिये मनाया गया है इसका खुलासा करने से भी पूरी तरह परहेज बरता जा रहा है। ऐसे में संभव है कि पूरी तस्वीर साफ होने के लिये मकर संक्रांति यानि 14 जनवरी तक का इंतजार करना पड़े जब सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करते ही खरमास का दोष दूर हो जाएगा और शुभ कार्यों पर लगा प्रतिबंध समाप्त हो जाएगा। हालांकि यह कोई पहला मौका नहीं है जब ग्रह-नक्षत्रों के मद्देनजर सियासत ने अपनी चाल बदली हो बल्कि कई बार ऐसा देखा गया है कि ज्योतिषीय सलाहों को मान कर कई ऐसे मामलों में भी ऊटपटांग फैसले ले लिये जाते हैं जो सतही तौर पर मजाक का कारण बनते हैं। मसलन हिन्दू धर्म में 13 के अंक को बेहद अशुभ माना गया है। इसी वजह से लोग अक्सर इस अंक से परहेज बरतते हैं कि कहीं कोई अनहोनी या अपशकुन ना हो जाए। अनहोनी का यही डर था कि जब अत्याधुनिक व विश्वस्तरीय शहर नोएडा को बसाया गया तो उसमें सेक्टर तेरह नाम की जगह ही नहीं रखी गई। नोएडा में सेक्टर बारह भी है और चैहद भी लेकिन तेरह गायब है। इसी प्रकार अंकों का खेल कैसे राजनीति को प्रभावित करता है इसका उदाहरण संसद के भीतर भी देखा गया जहां 420 नंबर की सीट जिसे भी मिलती है वह तुरंत अपनी कुर्सी बदलने के लिये अर्जी दाखिल कर देता है। मजाल है कि कोई भी पार्टी पितृपक्ष यानि श्राद्ध पक्ष के दौरान कोई बड़ी बैठक या बड़ा फैसला कर ले। तमाम नेताओं के अपने ज्योतिषी हैं और अलग-अलग ज्योतिषीय सलाहकार भी हैं। उनसे पूछे बगैर कई बड़े नेता तो घर से कदम बाहर निकालना भी गवारा नहीं करते हैं। भाजपा के एक प्रवक्ता जो इन दिनों केन्द्र सरकार में काफी बड़ा मंत्रालय संभाल रहे हैं उनके बारे में प्रसिद्ध है कि प्रवक्ता रहने के दौरान वे हर दिन के हिसाब से अलग रंग के कपड़ों का चयन करते हैं और निश्चित अंतराल पर अलग-अलग इत्र का इस्तेमाल करते हैं। वास्तव में देखा जाए तो यह सब मन के वहम के अलावा और कुछ भी नहीं है। जो होनी है वह अपने कर्मों पर निर्भर है। कर्म अच्छे होंगे तो भाग्य अच्छा ही रहेगा और कर्म बुरे होंगे तो कितना ही टोना-टोटका क्यों ना कर लिया जाए, किस्मत खराब होकर ही रहेगी और दुर्भाग्य कभी पीछा नहीं छोड़ेगा। लिहाजा बेहतर होगा कि ग्रह-नक्षत्रों से डरने के बजाय राजनीतिक दल अपनी नीति और नीयत में सुधार लाएं ताकि आम लोग उन्हें अपने समर्थन से आगे बढ़ाने के लिये आगे आएं। 

शुक्रवार, 10 जून 2016

तयशुदा मंजिल की गुमशुदा राहें

तयशुदा मंजिल की गुमशुदा राहें


लोकसभा चुनाव में महज 32 फीसदी वोट पाकर भी भाजपा ने बहुमत के जादूई आंकड़े से ग्यारह सीटें अधिक हासिल कर लीं और चुनावी दौड़ में तमाम सियासी दलों को इस कदर पीछे छोड़ दिया कि किसी दल को इतनी सीटें भी नहीं मिल सकीं कि वह न्यूनतम दस फीसदी सीटों के दम पर लोकसभा में विपक्ष के नेता के पद पर अपनी दावेदारी दर्ज करा सके। इस बात की कसक ने पिछले दो सालों से तमाम राजनीतिक दलों की रातों की नींद और दिन का चैन उड़ाया हुआ है। लिहाजा अगली दफा के लिये सभी ने अभी से यह लक्ष्य तय कर लिया है कि भाजपा की राह रोकने के लिये वे एकजुट होकर ही लड़ेंगे। वोटों का बिखराव नहीं होने देंगे। आपस में एक-दूसरे को चुनौती देने के बजाय एकजुट होकर भाजपा के लिये चुनौती पेश करेंगे। इस लक्ष्य का आधार तो वही है जिसका बेहद सफल प्रयोग बिहार के विधानसभा चुनाव में किया जा चुका है जहां महागठजोड़ बनाकर भाजपा विरोधी वोटों का इस कदर ध्रुवीकरण किया गया कि मोदी की सेना को टिककर लड़ने की मजबूत जमीन भी मयस्सर नहीं हो सकी। लेकिन मसला है कि इस तयशुदा लक्ष्य को हासिल करने के लिये कोई ठोस राह भी तो मिले। इस नजरिये से देखें तो राहें गुमशुदा ही नजर आ रही हैं। जिधर से कोई राह खोलने की कोशिश होती है उधर अगले कदम पर ही किसी ना किसी के मत्वाकांक्षाओं की दीवार आड़े आ जाती है। मसलन कोशिश हुई टूटे-बिखरे व बिछड़े समाजवादी कुनबे को एकजुट करने की तो इसमें बिहार की राजनीति में अपना वर्चस्व कायम रखने की राजद व जदयू की और यूपी में अपना एकाधिकार कायम रखने की सपा की महत्वाकांक्षा आड़े आ गयी। फिर नये सिरे से नितीश ने कोशिश शुरू की जदयू का विस्तार करने के लिये अजित सिंह व बाबूलाल मरांडी को दल-बल सहित संगठन में शामिल कराने की। लेकिन इसमें भी फच्चर यह फंसा कि जब इन दोनों को हाथों-हाथ कोई फायदा मिलना ही नहीं है तो अपनी दुकान समेट कर वे किसी अन्य के साथ विलय ही क्यों करें। लिहाजा यह विचार भी आगे नहीं बढ़ सका। यहां तक कि बिहार विधानसभा चुनाव के बाद राजद व जदयू का विलय हो जाने की जो बात दोनों ही दलों के शीर्ष नेतृत्व ने कही थी उस दिशा में भी कुछ होता हुआ नहीं दिख रहा है। हो भी कैसे? ना तो नितीश कभी लालू के मातहत काम कर सकते हैं और ना ही लालू अपने पूरे जीवन की कमाई नितीश के हवाले कर सकते हैं। लिहाजा वह विचार भी परवान चढ़ पाना नामुमकिन ही दिख रहा है। इन तमाम प्रयोगों का प्रस्ताव विफल हो जाने के बाद अब एक ओर डी राजा ने पांच टुकड़ों में बंटे वाम दलों को एक मंच पर आने का प्रस्ताव दिया है जबकि ममता बनर्जी के नेतृत्व में तीसरा मोर्चा गठित करने की कवायद समाजवादियों ने शुरू की है। लेकिन मसला वही है कि जहां ममता होगी वहां वामदल नहीं हो सकते, जहां सपा होगी वहां बसपा नहीं रह सकती, द्रमुक और अन्ना द्रमुक एक साथ नहीं आ सकते और सबसे बड़ी बात यह कि राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस किसी अन्य का नेतृत्व स्वीकार ही नहीं कर सकती। उस पर तुर्रा यह कि बीजद और टीआरएस सरीखे दल अपना पत्ता खोलने के लिये कतई तैयार नहीं हैं। यानि कुल मिलाकर देखें तो लोकसभा चुनाव में पड़े 68 फीसदी भाजपा विरोधी वोटों को एकजुट करके दिल्ली की कुर्सी पर कब्जा जमाने का लक्ष्य तो कागजी तौर पर सबके समक्ष पूरी तरह स्पष्ट है लेकिन इस लक्ष्य को हासिल करने के लिये आवश्यक विपक्षी एकजुटता की राह पूरी तरह गुमशुदा है। लिहाजा अब तीसरे मोर्चे का विचार भी माखौल का पर्याय बनता जा रहा है। तभी तो भाजपा भी निश्चिंत है और कांग्रेस भी। दोनों को पता है कि उनके मोर्चे से अलग कोई नया मोर्चा गठित हो पाना नामुमकिन की हद तक मुश्किल है। यानि मोर्चे दो ही हो सकते हैं। या तो भाजपा के नेतृत्व में राजग या फिर कांग्रेस के नेतृत्व में संप्रग। इसके अलावा किसी तीसरे के नेतृत्व पर बाकियों के बीच सहमति बन ही नहीं सकती। और अगर बनी भी तो उसका कोई फायदा नहीं मिलना क्योंकि अलग-अलग प्रदेशों की अलग-अलग पार्टियां एकजुट भी हो जाएं तो इसका कोई लाभ-हानि का चुनावी समीकरण नहीं बन सकता। फायदा तो तब हो जब बिहार की तरह हर सूबे की भाजपा विरोधी पार्टियां अपने मतभेद भुलाकर एकजुट हों और राष्ट्रीय स्तर पर उनका एक व्यापक गठजोड़ बने। वर्ना अगर यूपी की तरह चौतरफा लड़ाई हुई और कोई किसी के साथ आने के लिये तैयार नहीं हुआ तो निर्धारित लक्ष्य की राहें यथावत गुमशुदा ही रहेंगी।

शनिवार, 7 मई 2016

बवालियों की गिरफ्त में कोतवाली

बवालियों की गिरफ्त में कोतवाली  

संसद की मौजूदा तस्वीर के तहत तो बवालियों का ही कोतवाली में बोलबाला दिख रहा है। कहां तो इन बवालियों की आंखों में कोतवाली का खौफ स्पष्ट नजर आना चाहिये था और कहां कोतवाल को ही इन बवालियों ने सवालों के कठघरे में खड़ा करने की कोशिशें शुरू कर दी हैं। खास तौर से अगस्ता वेस्टलैंड हेलीकाॅटर खरीद में हुए घोटाले के मामले को लेकर जिस तरह से अपनी कमियों व खामियों को स्वीकार करने के बजाय पूर्ववर्ती सरकार के रणनीतिकारों ने मौजूदा सरकार की नीति व नीयत पर ही दोषारोपण आरंभ कर दिया है उससे तो यही लग रहा है कि खुद के दामन पर लगे बदनामी का दाग धोने के लिये इन्होंने सरकार का दामन दागदार करने की राह पकड़ ली है। तभी तो अगस्ता के विवाद पर झूठे तथ्यों के सहारे भाजपा को भी गुनाह में बराबर का भागीदार बताने व अपनी गलतियों पर पर्दा डालने की कोशिशें शुरू की गयीं। पहले तर्क गढ़ा गया कि अगस्ता को काली सूची में डालने का काम पूर्ववर्ती संप्रग सरकार ने ही किया था। लेकिन तथ्यों का खुलासा होने के बाद जब इस दलील का दम निकल गया तो कहा गया कि कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व का चरित्र हनन करने के लिये भारतीय प्रधानमंत्री ने इटली के प्रधानमंत्री के साथ एक गुप्त समझौता किया है। जिसके तहत भारतीय मछुआरों की हत्या का मुकदमा झेल रहे इतालवी नौसैनिकों को बचाने के एवज में इटली की अदालत में वहां की जांच एजेसियों ने ऐसी बेबुनियाद कहानी पेश की है जिसके चलते हेलीकाॅप्टर खरीद में दलाली का मामला सामने आया है। लेकिन यह दलील भी सरकार ने औपचारिक तौर पर संसद में खारिज कर दी जिसे कांग्रेस ने स्वीकार भी कर लिया। अगर सरकार की सफाई कांग्रेस ने स्वीकार नहीं की होती तो उसके पास विशेषाधिकार हनन की नोटिस देने का अख्तियार भी था। लेकिन सरकार द्वारा गोपनीय समझौते की बात को ही नहीं बल्कि दोनों देशों के प्रधानमंत्री की मुलाकात होने को भी नकार दिये जाने को कांग्रेस द्वारा चुपचाप स्वीकार कर लिये जाने से साफ है कि उसे अपनी दलील के थोथेपन का पहले से पता था। खैर, जब इस दलील से भी दाल नहीं गल सकी तो एक नया सुर्रा छोड़ा गया कि जब पूर्ववर्ती सरकार को हेलीकाॅप्टर सौदे में गड़बड़ी का पता चला तो ना सिर्फ कंपनी द्वारा जमा करायी गयी धरोहर राशि जब्त कर ली गयी बल्कि उसके द्वारा की गयी तीन हेलीकाॅप्टरों की आपूर्ति का भुगतान भी रोक दिया गया जिससे सरकारी खजाने को तकरीबन तीन हजार करोड़ का फायदा ही हुआ, कोई नुकसान नहीं हुआ। अब ऐसी दलीलों को सामने रखकर अगर यह बताने की कोशिश की जा रही है कि चुंकि इस सौदे में देश को फायदा ही हुआ लिहाजा इसमें दलाली खाए जाने के सवाल को समाप्त कर दिया जाना चाहिये तो जाहिर तौर पर इस दलील को शायद ही कोई स्वीकार करे। क्योंकि इस सौदे में हुए नफा-नुकसान का मामला तो अलग ही है और अगर इसमें देश को घाटा नहीं होने दिया गया तो इसका एहसान नहीं जताया जा सकता। अलबत्ता सरकार का तो कर्तव्य ही है कि वह हर मामले में देश का हित सुनिश्चित करे। लेकिन देश का हित सुनिश्चित करने के एवज में किसी को दलाली खाने की छूट तो नहीं दी जा सकती। यहां सवाल तो उस दलाली की रकम का है जिसे बांटनेवाले ने अपना जुर्म कबूल भी कर लिया है और और अपने इस गुनाह की सजा भी भुगत रहा है। लेकिन दलाली लेनेवाले का कहीं कोई अता-पता ही नहीं है। इस सवाल को तथ्यों के साथ सदन में प्रस्तुत करने के क्रम में जब सुब्रमण्यम स्वामी ने असली दलाल की स्वीकारोक्ती का फर्रा पेश कर दिया तो उसका ठोस जवाब देने के बजाय पूछा जा रहा है कि उनके पास ये कागजात कहां से आये। यानि कागज में दर्ज तथ्यों पर चर्चा करने के बजाय बवाल काटने की कोशिश हो रही है दस्तावेज के स्रोत को लेकर। अब ऐसे सवालों और इन बवालों के सहारे अगर विवाद के दाग को छिपाने की कोशिश होगी तो दाग धुलेंगे या गहरे होंगे इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। लेकिन मसला है कोतवाली में बवालियों के कोहराम का। इसका उपाय तो तभी निकल सकता है जब देश में त्वरित न्याय की व्यवस्था मजबूत हो। वर्ना जिस देश में 1992 में बम फोड़नेवाले आतंकी याकूब मेनन को फांसी के तख्ते तक पहुंचाने में 23 साल का वक्त लग जाता हो वहां की कोतवाली में बवालियों का बोलबाला दिखना स्वाभाविक ही है।