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शनिवार, 19 नवंबर 2016

गुड़-गोबर करती बैंकिंग व्यवस्था

गुड़-गोबर करती बैंकिंग व्यवस्था


अक्सर यही देखा जाता है कि जिसके हाथ में भी डंडा आ जाये तो वह खुद को हवलदार से कम नहीं समझता। कायदे से तो हाथों में डंडा आने पर सबसे पहले उससे जुड़ी जिम्मेवारियों का एहसास होना चाहिये। लेकिन ऐसा होता हुआ कम ही दिखता है। यही हालत इन दिनों बैंकिंग व्यवस्था की भी है। सरकार ने उसे नोट बदलने का काम क्या सौंपा उसने खुद को आम लोगों का भाग्यविधाता ही समझ लिया। कहीं से भी ऐसा सुनने में नहीं आया है कि किसी बैंक ने लोगों के लिये पेयजल का प्रबंध किया हो या फिर बैठने की व्यवस्था की हो। हर बैंक के बाहर लंबी-लंबी कतार में क्या बूढ़े और क्या महिलाएं, सभी कष्ट से त्राहि-त्राहि करते ही नजर आये। लेकिन बैंक अपने धुन में मगन। घड़ी देखकर उठना और घड़ी देखकर बैठना। उसी सुस्त गति से काम करना और लोगों की परेशानियों का लुत्फ उठाना। वास्तव में देखा जाये तो देश की बैंकिग व्यवस्था की सुस्त व ढ़ीली रफ्तार के कारण ही आम लोगों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। नोटों को बदलने व नये नोटों का वितरण करने की अपेक्षित गति हासिल करने में देश की बैंकिंग व्यवस्था पूरी तरह नाकाम साबित हुई है। इसीका नतीजा है कि नोटबंदी की घोषणा हुए दस दिन का वक्त गुजर जाने के बाद भी हालातों में बहुत अधिक सुधार नहीं देखा जा रहा है। वह भी तब जबकि सरकार बार-बार यह दोहरा रही है कि देश में नये नोटों की कोई कमी नहीं है। बैंकिंग सेवा प्राप्त करने में पेश आ रही दुश्वारी का ही नतीजा है कि अधिकांश मदर डेयरी के बूथों व दवा दुकानदारों ने पुराने नोट स्वीकार करने का अधिकार दिये जाने के बावजूद इसे स्वीकार करने से इनकार करना आरंभ कर दिया है। उनकी दलील है कि उनसे नकदी स्वीकार करने के लिये बैंकों ने कोई विशेष व्यवस्था नहीं की है। बैंकों की सुस्त गति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अधिकांश बैंकों में ना तो कोई विशेष काउंटर बनाया गया और ना ही लोगों को कुछ बताने-समझाने के लिये कोई पहल की गयी। सच पूछा जाये तो देश के नीति निर्धारकों ने कालाधन, भ्रष्टाचार और नकली नोटों के कारोबार से एक झटके में ही निजात हासिल करने के लिये पांच सौ और एक हजार के नोटों को चलन से बाहर करने का जो हौसला दिखाया उसके पीछे कहीं ना कहीं देश की बैंकिंग व्यवस्था के प्रति उनका भरोसा ही छिपा था।  लेकिन बड़े अफसोस की बात है कि बैंकिंग व्यवस्था ने उस भरोसे की लाज रखने के लिये अलग से कुछ भी प्रयास नहीं किया है। जो था, जैसा था, उससे ही इतने बड़े और ऐतिहासिक काम को आगे बढ़ाया। वह तो गनीमत है कि सत्ता पक्ष की इमानदारी पर कोई दाग नहीं आया है वर्ना जिस तरीके से नोटबंदी को लागू करने के लिये बैंकों ने आम लोगों की ऐसी-तैसी करके रख दी है उसके नतीजे में सत्ता-व्यवस्था के प्रति भारी आक्रोश के माहौल में कुछ भी हो सकता था। यह स्थिति तब दिख रही है जब सरकार ने बैंकों को ऐसी नीतियां बनाकर दी हैं जिससे उन पर काम का बोझ काफी कम पड़ रहा है। ना तो उन्हें परंपरागत काम को यथापूर्वक निपटाना पड़ रहा है और ना ही पुराने उपभोक्ताओं को यथावत सेवाएं देनी पड़ रही हैं। नकदी की आपूर्ति भी निर्विघ्न तरीके से की जा रही है और रिजर्व बैंक की ओर से मुंहमांगी सहूलियतें भी मुहैया करायी जा रही हैं। इसके बावजूद कहीं दो बजे तो कहीं चार बजे ही शटर बंद कर दिये जाने की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं। रिजर्व बैंक और सरकार के दखल के बाद भी कुछ ही जगह महिलाओं और बुजुर्गों के लिये अलग लाईन लगाने की व्यवस्था की गयी वर्ना कस्टमर को कष्ट में मरने के लिये ही छोड़ रखा है बैंकों ने। अपेक्षित तो यह था कि मौजूदा विशेष परिस्थिति में पूरी मेहनत, लगन और इमानदारी का प्रदर्शन किया जाता। सभी ग्राहकों को एक समान सेवा मुहैया करायी जाती। लेकिन कहीं पीछे की खिड़की से नोट सप्लाई का वीडियो सामने आ रहा है तो कहीं नेताजी और उनके चमचों के लिये देर रात शटर उठाया-गिराया जा रहा है। यह बैंकिग सेवा की अव्यवस्था का ही नतीजा है कि इन दिनों सरकार को कोसने के बजाय लोग सिर्फ बैंकों से ही नाराज दिख रहे हैं। हालांकि ग्रामीण बैंकों ने अपनी पूर्वघोषित हड़ताल को स्थगित करने की सकारात्मक पहल अवश्य की लेकिन इतने भर से ही बैंकिग व्यवस्था की तमाम कमियों, खामियों व गलतियों को कतई नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। सच पूछा जाये तो नोटबंदी के अभियान ने पूरे बैंकिंग तंत्र की सुस्ती, संवेदनहीनता और गैर जिम्मेदाराना रवैये को ही उजागर किया है जिस पर भरोसा करके सरकार ने देश को कैशलेस व्यवस्था की राह पर काफी आगे ले जाने का ख्वाब बुना है।  @ Navkant Thakur

शुक्रवार, 27 मई 2016

बाजार में बिचौलियों का वर्चस्व

लोग बेहाल बिचौलिये मालामाल


बाजार में बिचौलियों का वर्चस्व तो हमेशा से रहा है। बल्कि यह कहना भी गलत नहीं होगा कि बाजार बनता ही बिचौलियों से है। उत्पादक और उपभोक्ता के बीच की कड़ी कहे जानेवाले बिचौलियों ने अगर बाजार का निर्माण किया है तो जाहिर तौर पर अपने मुनाफे के लिये ही किया है। तभी तो उत्पादन कम हो या ज्यादा, दौर सस्ती का हो या महंगाई का। इनका मुनाफा पक्का रहता है। ये अपने मुनाफे के लिये बाजार को इस तरह संचालित करते हैं कि किसी भी सूरत में ना तो उत्पादक का अधिक भला हो पाता है और ना ही उपभोक्ता को ज्यादा सहूलियत मिल पाती है। मिसाल के तौर पर इन दिनों खुदरा बाजार की बात करें तो हर घर में रोजाना इस्तेमाल होनेवाली प्याज पिछले कई महीनों से लगातार औसतन बीस रूपये प्रति किलोग्राम की दर पर डटी हुई है। यह वो कीमत है जो पिछले मानसून के बाद प्याज की कमी के कारण पनपी आवक में कमी के नतीजे में निर्धारित हुई थी। लेकिन अब जबकि प्याज की बंपर पैदावार हुई है और किसानों के लिये इसे संभाल कर रखना मुश्किल हो रहा है तब भी अगर इसकी खुदरा कीमतों में कोई उतार नहीं दिख रहा है तो इसकी साफ व सीधी वजह बाजार में मुनाफाखोर बिचौलियों का वर्चस्व ही है जिन्होंने मांग व आपूर्ति के बीच मनमाना संतुलन कायम करके कीमत को लगातार स्थिर किया हुआ है। आलम यह है कि किसान को मंडी में महज डेढ़ से दो रूपये प्रति किलो की दर से खरीदनेवाले भी बड़ी मुश्किल से मिल रहे हैं जबकि उपभोक्ताओं को इसकी कीमत औसतन बीस रूपये की दर से चुकानी पड़ रही है। ऐसे में सवाल है कि आखिर बीच का 18 रूपया जा कहां रहा है। जाहिर तौर पर यह उन बिचौलियों की तिजोरी में जमा हो रहा है जो प्याज को खेत से किचेन तक का सफर तय कराते हैं। ऐसे में किसान का यथावत बदहाल रहना स्वाभाविक ही है। वह तब भी बदहाल था जब बाढ़-सुखाड़ के कारण उसकी फसल बर्बाद हो गयी और वह आज भी बदहाल है जब उसने अपना खून-पसीना एक करके बंपर फसल पैदा की है। इसी प्रकार जब उत्पादन कम हुआ तब भी उपभोक्ता को ही अपनी जेब ढ़ीली करनी पड़ी और आज भी बाजार में उपभोक्ता ही लुट रहा है। यानि दोनों तरफ से फायदा इन बिचौलियों का ही है।ऐसा नहीं है कि यह नौबत महाराष्ट्र के प्याज उत्पादकों को ही झेलनी पड़ रही है बल्कि यही हाल समूचे देश के किसानों का है जो मंडी में बिचौलियों के हाथों औने-पौने दामों पर अपनी फसल बेचने के लिये मजबूर हैं। किसान आलू पैदा करे या टमाटर, गन्ना उगाए या फल-फूल उपजाये। सबकी व्यथा एक जैसी ही है। इसमें किसी वस्तु का दाम अधिक तेजी से बढ़ जाने पर सरकार अगर हरकत में भी आती है तो जमाखोरों पर छापेमारी के अलावा आयात में इजाफा करने के परंपरागत तौर-तरीकों पर अमल शुरू कर देती है। लेकिन कभी यह कोशिश नहीं होती कि किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य मिले और उपभोक्ताओं को सही कीमत पर बाजार में सामान उपलब्ध हो सके। लिहाजा बिचौलियों की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता। ऐसे में आवश्यकता है कि बाजार में कीमतों के निर्धारण व नियंत्रण पर भी सरकार व प्रशासन की नजर हो। सिर्फ मांग व आपूर्ति के बीच संतुलन के भरोसे बाजार को छोड़े रखने से ना तो उत्पादकों को न्याय मिल सकता है और ना ही उपभोक्ताओं को। इस दिशा में दिल्ली विधानसभा चुनाव के वक्त आम आदमी पार्टी व भाजपा ने भी काफी वायदे किये थे। एक ओर किसानों को मंडी में ही अपनी उपज बेचने की अनिवार्यता समाप्त करने की बात कही गयी थी वहीं दूसरी ओर बाजारों में स्वयंसेवकों की तैनाती का भरोसा दिलाया गया था ताकि मनमानी कीमत वसूलनेवालों पर लगाम कसी जा सके। लेकिन ये सभी बातें सिर्फ बातें ही साबित हुई हैं। वैसे भी अगर किसान खुद ही उपभोक्ताओं को अपना उत्पाद बेचने चला जाये तो वह खेती पर क्या ध्यान देगा और दूसरी ओर खुदरा बाजार के लिये जब तक सभी जींसों का ठोस तरीके से मूल्य निर्धारण नहीं किया जाता तब तक मनमानी कीमत का कैसे पता चल पाएगा। यानि बाजार की असली बीमारी का इलाज किये बिना इस अव्यस्था से निजात पाने की कल्पना भी बेकार ही है। लिहाजा आवश्यकता है कि उत्पादक और उपभोक्ता के बीच कीमतों का अनुपात निर्धारित किया जाये और बिचौलियों व बाजार की अन्य ताकतों को लागत के मुकाबले एक निश्चित अनुपात में ही मुनाफा कमाने की छूट रहे। वर्ना मांग व आपूर्ति के चक्कर में पूरी बाजार व्यवस्था यथावत घनचक्कर बनी रहेगी।