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मंगलवार, 25 दिसंबर 2018

इमरान का बचकानापन

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान बेशक स्थानीय घरेलू राजनीति में अपनी कामयाबी का झंडा गाड़ चुके हों लेकिन वास्तविकता यह है कि वे आज भी सिर्फ एक क्रिकेटर की मानसिकता के बोझ तले ही दबे हुए हैं। क्रिकेट को दरअसल माइंडगेम कहा जाता है। यह जितना जमीन पर खेला जाता है उससे कहीं अधिक दिमाग में होता है। विरोधी पक्ष के दिमाग को पढ़ना और उसके दिमाग को अपने मनमुताबिक नियंत्रित करना क्रिकेट का एक अहम पहलू है। इसकी के तहत विरोधी पक्ष के बारे में ऊटपटांग बातें की जाती हैं और उसे उकसाने का प्रयास किया जाता है। उसकाने की कोशिश के पीछे रणनीति रहती है विरोधी पक्ष की एकाग्रता को भंग करना और उसे गुस्से व आक्रोश से भर देना ताकि उसका असर विरोधी के खेल पर पड़े और वह अपना स्वाभाविक खेल ना दिखा पाए। इसी रणनीति को इमरान ने भारत और पाकिस्तान के रिश्तों के मामले में इस्तेमाल करके यह बेहतर तरीके से जता दिया है कि बेशक वे प्रधानमंत्री के ओहदे पर पहुंच चुके हों लेकिन उनकी मानसिकता क्रिकेटर वाली ही है। वर्ना वे कतई भारतीय मुसलमानों की स्थिति के बारे में टिप्पणी नहीं करते। या फिर ऐसी टिप्पणी करने से पहले वे पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की स्थिति पर विचार कर लेते। सच तो यह है कि इस बचकाने बयान के पीछे इमरान की वही रणनीति काम कर रही है जिसका खुलासा करते हुए उनके विदेशमंत्री ने करतारपुर गलियारे के शिलान्यास के मौके पर कहा था कि पाकिस्तान की ओर से फेंकी गई गुगली में भारत फंस गया है। लेकिन जब पाकिस्तान को लगा कि उसकी गुगली बेकार चली गई तो अब उसने उकसावे की रणनीति पर अमल आरंभ कर दिया है। पहली उकसावे की बात उसने बीते दिनों करतारपुर के मामले को लेकर ही की जिसके तहत करतारपुर का इलाका भारत को देने के एवज में कोई अन्य जमीन का टुकड़ा लेने के कथित भारतीय प्रस्ताव को उसने ढ़ोल पीटकर नकारने की पहल की। जबकि सच तो यह है कि पाकिस्तान से जमीन की अदला बदली का तो कोई सवाल ही नहीं है बल्कि अभी तो भारत को उसके कब्जे से अपनी जमीन का काफी बड़ा हिस्सा छुड़ाना है। उसके कब्जे में मौजूद अपनी जमीन छुड़ाने का प्रयास करने के बजाय भारत की ओर से पाकिस्तान के किसी जमीन की अदला बदली का प्रस्ताव सामने लाया जाएगा इसकी तो कल्पना करना भी मूर्खतापूर्ण ही है। लेकिन पाकिस्तान की ओर से ऐसे प्रचारित किया गया मानो भारत ने उसके पास इस तरह का कोई प्रस्ताव प्रस्तुत किया हो। लेकिन भारत की ओर से इस मामले में सधी प्रतिक्रिया दिया जाना भी जरूरी नहीं समझा गया तो अब भारत में हलचल मचाने की एक नयी तरकीब के तहत भारतीय मुसलमानों की स्थिति को लेकर अनावश्यक व बचकाना बयान इमरान खान की ओर से दिया गया है। हालांकि बेहद खुशी और गर्व की बात है कि इमरान के इस बयान का मुंहतोड़ जवाब देने के लिये सबसे पहले असदुद्दीन ओवैसी और नसीरूद्दीन शाह जैसे ही लोग सामने आए और उन्होंने पाकिस्तान के अल्पसंख्यकों के मसले को उठाकर इमरान को आइना दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इसके अलावा स्वाभाविक तौर पर हमारे गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने भी इमरान को उनकी औकात बताई है और पाकिस्तान की वास्तवकि जमीनी हकीकत को बेपर्दा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। लेकिन इस सबके बीच असली बात पर्दे के पीछे ही रह गयी कि आखिर इमरान ने क्या सोच कर ऐसा बयान दिया। अव्वल तो भारत की अंदरूनी बातों के बारे में बोलने का ना तो उन्हें कोई अख्तियार है और ना ही उनकी हैसियत, स्थिति या औकात है कि वे किसी भी मामले में भारत के सामने खड़े हो सकें। और दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि अगर उनके देश में अल्पसंख्यकों को मानवीय अधिकार भी मिले होते तो संभव था कि उनकी बातों को विश्व बिरादरी द्वारा गंभीरतापूर्वक सुना भी जा सकता था। लेकिन पाकिस्तान की अंदरूनी हालत तो यह है कि आजादी के बाद पाकिस्तान की कुल आबादी में अल्पसंख्यकों की हिस्सेदारी जहां 32 फीसदी थी वह घटकर अब सात फीसदी पर आ गई है उसमें भी हिन्दुओं की तादाद महज तीन फीसदी से कुछ ही ज्यादा बची है। जो बचे भी हैं उन्हें जानवरों से भी बदतर स्थित में गुजर बसर करने के मजबूर होना पड़ रहा है और उन्हें वहां की दोयम दर्जे की नागरिक सुविधाएं ही मुहैया कराई जाती हैं। इसी बदतर माहौल का नतीजा है कि जो एक बार पाकिस्तान से बाहर निकलने में कामयाब हो जाता है वह दोबारा कतई वहां वापस लौटने के लिये तैयार नहीं होता है और ऐसे शरणार्थियों को बाहर निकालने की अमानवीयता दिखा पाना किसी भी देश के लिये संभव नहीं हो पाता है। जबकि भारतीय मुसलमानों को यहां अलग करके नहीं देखा जाता बल्कि भारत पर जितना अधिकार किसी अन्य को हासिल है उससे रत्ती भर भी कम मुसलमानों को नहीं है। यही वजह है कि किसी भी देश में भारत का कोई शरीफ मुसलमान शरणार्थी के तौर पर नहीं रह रहा है। खैर, इमरान ने जो बयान दिया है उसके पीछे उनकी कतई यह सोच नहीं है कि वे मुसलमानों को लेकर चिंतित है अथवा उनकी भारतीय मुसलमानों से कोई हमदर्दी है। वर्ना बंटवारे के बाद भारत छोड़ कर जानेवाले मुसलमानों को पाकिस्तान में आज भी मुहाजिर कह कर नहीं पुकारा जाता और उनके साथ बेगाना सलूक नहीं किया जाता। सच तो यह है कि इमरान का यह बयान उस खुराफाती रणनीति का हिस्सा है जिसके तहत वे भारत को उकसा कर उससे पाकिस्तान के बारे में तीखी बातें सुनना चाहते हैं। दरअसल उनकी ख्वाहिश है कि मीठी बातें ना हो सकें तो कम से कम तीखी बातें ही हों ताकि वे अपने देश की जनता को यह तो बता सकें कि वे भारत के मोर्चे पर कुछ कर रहे हैं। दरअसल वे भारत के मोर्चे पर कुछ करते हुए दिखना चाह रहे हैं जबकि भारत की ओर से बारंबार यह स्पष्ट किया जा चुका है कि अगर कुछ कर दिखाना है तो पहले मुंबई हमले के मास्टरमाइंड के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए और उसे उसके करतूतों की कठोरतम सजा दिलाई जाए। इसके अलावा सीमा पार से आतंकवाद को धकेलने का सिलसिला बंद किया जाए और पाकिस्तान की धरती से भारत के खिलाफ हो रहे साजिश के सिलसिले को बंद किया जाए। जब तक ये दोनों बातें अमल में नहीं आएंगी तब तक पाकिस्तान के किसी भी बयान या हरकत का कोई मतलब नहीं निकलने वाला और ऐसा करने के बजाय इमरान जो बचकानी बातें कर रहे हैं उससे उनकी ही गंभीरता औश्र विश्वसनीयता को विश्व मंच पर आघात पहुंच रहा है।  

शनिवार, 22 दिसंबर 2018

ग्रह-नक्षत्रों में अटकी सियासत

आगामी लोकसभा चुनाव को लेकर बेशक अंदरूनी तौर पर सियासी गतिविधियां जोर-शोर से जारी हैं और हर खेमे में काफी हलचल का माहौल का दिख रहा है लेकिन औपचारिक तौर पर किसी भी खेमे से कोई बड़ी खबर सामने नहीं आने की बड़ी वजह खरमास को बताया जा रहा है। दरअसल हिन्दू समाज में खरमास के दौरान कोई भी शुभ कार्य करना, नया व्यवसाय या साझेदारी करना या कोई भी नई चीज लेना वर्जित माना जाता है। कई इलाकों में तो इस दौरान नए कपड़े खरीदना या पहनना भी मना होता है। खरमास से जुड़े मिथकों व किस्से-कहानियों का राजनीतिक दलों पर कितना अधिक प्रभाव पड़ रहा है इसका सहज अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इन दिनों किसी भी खेमे से गठबंधन या साझेदारी के बारे में किसी समझौते को निर्णायक रूप नहीं दिया जा रहा है। बात चाहे उत्तर प्रदेश में कांग्रेस से किनारा करके सपा, बसपा व रालोद द्वारा आपस में चुनाव पूर्ण गठबंधन किये जाने के संकेतों की करें अथवा बिहार में भाजपानीत राजग के खिलाफ राजग को धुरी बनाकर समान विचारधारा वाले दलों के एक मंच पर आकर महागठबंधन बनाए जाने की या फिर बिहार में सीट समझौते को लेकर भाजपा, जदयू व लोजपा के बीच जारी तनातनी की। किसी भी मामले में औपचारिक तौर पर अभी कोई अंतिम फैसला नहीं किया जा रहा है और सभी राजनीतिक दल केवल संकेतों की भाषा में ही सियासी समस्याओं को सुलझाने की दिशा में आगे बढ़ते दिखाई पड़ रहे हैं। दरअसल माना जाता है कि सूर्य के धनु राशि में प्रवेश करने के साथ ही खरमास का आरंभ हो जाता है। धनु वास्तव में गुरू की राशि है। जब इसमें सूर्य आते हैं तो गुरू का प्रभाव कुंद पड़ जाता है। जबकि किसी भी शुभ कार्य या बड़ी पहल के लिये ज्योतिषीय नजरिये से गुरू का सहयोग बेहद आवश्यक है। लेकिन जब तक सूर्य धनु राशि में रहेंगे तब तक गुरू काफी हद तक निष्क्रिय रहेंगे। इसी वजह से इसे खरमास का नाम दिया जाता है और इस दौरान कोई बड़ा काम नहीं करने की सलाह दी जाती है। इस बार यह खरमास बीते 16 दिसंबर की सुबह नौ बजकर आठ मिनट से आरंभ हुआ है जो आगामी 14 जनवरी को सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने के बाद ही समाप्त होगा। चुंकि खरमास के दौरान कोई नयी साझेदारी या व्यावसायिक समझौते को अमल में लाना वर्जित बताया गया है लिहाजा कोई भी दल इस दौरान किसी राजनीतिक समझौते को निर्णायक मुकाम तक पहुंचाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है। बेशक अंदरूनी तौर पर इस बात का खुला संकेत दिया जा रहा हो कि यूपी में सपा, बसपा और रालोद का जबकि बिहार में राजद, कांग्रेस, रालोसपा, माकपा, भाकपा, हम और शरद यादव का ही नहीं बल्कि भाजपा, जदयू और लोजपा का भी गठबंधन हो गया है और इन तीनों खेमों ने सीटों के बंटवारे के मसले को भी आपस में सुलझा लिया है लेकिन औपचारिक तौर पर कोई भी खेमा सीटों के तालमेल के आंकड़ों को सार्वजनिक करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है। बताया जाता है कि खरमास के कारण ही सपा यह स्वीकार करने से हिचक रही है कि उसने गठबंधन में परिवर्तन करते हुए कांग्रेस से किनारा कर लिया है और महागठबंधन की ओर से भी यह बताने से परहेज बरता जा रहा है कि उसके कौन-कौन से घटक कितनी सीटों पर चुनाव लड़ेंगे। यहां तक कि भाजपा को आंखें दिखा रही लोजपा को कितनी सीटें देने का भरोसा देकर राजग में बरकरार रहने के लिये मनाया गया है इसका खुलासा करने से भी पूरी तरह परहेज बरता जा रहा है। ऐसे में संभव है कि पूरी तस्वीर साफ होने के लिये मकर संक्रांति यानि 14 जनवरी तक का इंतजार करना पड़े जब सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करते ही खरमास का दोष दूर हो जाएगा और शुभ कार्यों पर लगा प्रतिबंध समाप्त हो जाएगा। हालांकि यह कोई पहला मौका नहीं है जब ग्रह-नक्षत्रों के मद्देनजर सियासत ने अपनी चाल बदली हो बल्कि कई बार ऐसा देखा गया है कि ज्योतिषीय सलाहों को मान कर कई ऐसे मामलों में भी ऊटपटांग फैसले ले लिये जाते हैं जो सतही तौर पर मजाक का कारण बनते हैं। मसलन हिन्दू धर्म में 13 के अंक को बेहद अशुभ माना गया है। इसी वजह से लोग अक्सर इस अंक से परहेज बरतते हैं कि कहीं कोई अनहोनी या अपशकुन ना हो जाए। अनहोनी का यही डर था कि जब अत्याधुनिक व विश्वस्तरीय शहर नोएडा को बसाया गया तो उसमें सेक्टर तेरह नाम की जगह ही नहीं रखी गई। नोएडा में सेक्टर बारह भी है और चैहद भी लेकिन तेरह गायब है। इसी प्रकार अंकों का खेल कैसे राजनीति को प्रभावित करता है इसका उदाहरण संसद के भीतर भी देखा गया जहां 420 नंबर की सीट जिसे भी मिलती है वह तुरंत अपनी कुर्सी बदलने के लिये अर्जी दाखिल कर देता है। मजाल है कि कोई भी पार्टी पितृपक्ष यानि श्राद्ध पक्ष के दौरान कोई बड़ी बैठक या बड़ा फैसला कर ले। तमाम नेताओं के अपने ज्योतिषी हैं और अलग-अलग ज्योतिषीय सलाहकार भी हैं। उनसे पूछे बगैर कई बड़े नेता तो घर से कदम बाहर निकालना भी गवारा नहीं करते हैं। भाजपा के एक प्रवक्ता जो इन दिनों केन्द्र सरकार में काफी बड़ा मंत्रालय संभाल रहे हैं उनके बारे में प्रसिद्ध है कि प्रवक्ता रहने के दौरान वे हर दिन के हिसाब से अलग रंग के कपड़ों का चयन करते हैं और निश्चित अंतराल पर अलग-अलग इत्र का इस्तेमाल करते हैं। वास्तव में देखा जाए तो यह सब मन के वहम के अलावा और कुछ भी नहीं है। जो होनी है वह अपने कर्मों पर निर्भर है। कर्म अच्छे होंगे तो भाग्य अच्छा ही रहेगा और कर्म बुरे होंगे तो कितना ही टोना-टोटका क्यों ना कर लिया जाए, किस्मत खराब होकर ही रहेगी और दुर्भाग्य कभी पीछा नहीं छोड़ेगा। लिहाजा बेहतर होगा कि ग्रह-नक्षत्रों से डरने के बजाय राजनीतिक दल अपनी नीति और नीयत में सुधार लाएं ताकि आम लोग उन्हें अपने समर्थन से आगे बढ़ाने के लिये आगे आएं। 

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2016

स्कूली बस्ते में ठुंसा भ्रष्टाचार

स्कूली बस्ते में ठुंसा भ्रष्टाचार


दिल्ली की मौजूदा सरकार ने जिस मसले पर सबसे ज्यादा तवज्जो दी हुई है वह है स्कूलों की समस्याएं। अपने सालाना बजट का सबसे बड़ा हिस्सा शिक्षा के क्षेत्र में खर्च करने का ऐलान करके सरकार ने अपनी उस घोषणा के प्रति इमानदारी व प्रतिबद्धता का ही मुजाहिरा किया है जिसके तहत सरकारी स्कूलों को हर मामले में निजी स्कूलों के स्तर पर लाने की बात कही गयी थी। साथ ही निजी स्कूलों की मनमानी पर भी उसकी पैनी निगाहें टिकी हुई हैं। तभी तो नर्सरी में दाखिले के नाम पर हर साल मचनेवाली लूट पर अब काफी लगाम लगी है और स्कूलों को पारदर्शी तरीके से प्रशासनिक व्यवस्था संचालित करने के लिये मजबूर होना पड़ रहा है। लेकिन इस सबके बीच निजी स्कूलों में बच्चों के बस्ते के नाम पर हो रही अभिभावकों की सालाना लूट-खसोट की चैतरफा अनदेखी वाकई हैरान करनेवाली है। कायदे से देखा जाये तो दिल्ली की निजी शिक्षण संस्थाओं में हर साल बच्चों के बस्ते में अरबों का भ्रष्टाचार ठूंसा जा रहा है जिसका बोझ वहन करने के अलावा अभिभावकों के पास दूसरा कोई विकल्प ही नहीं है। दरअसल जिनके बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ रहे हैं उनकी मजबूरी बन चुकी है कि हर साल स्कूल में बच्चे का क्लास बदलते ही वे नयी किताबें और काॅपियां खरीद लें। साथ ही स्कूल के नाम की मुहर लगी हुई काॅपियां व किताबें कहां व किस कीमत पर मिलेंगी यह भी स्कूल का प्रशासन ही मनमाने तरीके से तय करता है। अब सवाल यह है कि क्या स्कूल ऐसे बंदोबस्त नहीं कर सकते कि हर साल अनिवार्य रूप से किताबें ना बदली जाएं और एक क्लास की किताबें अगले साल उसी क्लास में आनेवाले बच्चे को दिलवा दी जाएं, ताकि किताबों का दोबारा इस्तेमाल हो सके। बच्चों के माता-पिता पर अतिरिक्त बोझ पड़ने से बच जाए और बच्चों को उसी प्रकाशन और सिलेबस की किताबें आसानी से मिल जाए। लेकिन मसला है कि अगर स्कूल ऐसा करने लगे तो उसकी कमाई का जरिया ही बंद हो जाएगा। उस प्रकाशक का धंधा चैपट हो जाएगा जो मोटे कमीशन के बदले स्कूल से अपनी पसंद की पुस्तकों को स्कूलों में चलवाने का पूरा रैकेट चलवा रहा है। इसमें हैरानी की बात ये है कि स्कूलों की इस मनमानी पर लगाम लगाने का कोई बंदोबस्त नहीं है। बस्ता माफिया खुलकर अभिभावकों की जेब काट रहा है जिस पर न तो सरकार का कोई ध्यान है और न ही अदालत इसका संज्ञान ले रही है। यह बस्ता माफिया लोगों को किस कदर खुलेआम लूट रहा है इसे समझने के लिये अगर हम आंकड़ों का सहारा लें तो दिल्ली व इससे सटे इलाकों में तकरीबन दो हजार से भी ज्यादा छोटे-बड़े निजी स्कूल हैं जिनमें औसतन हर स्कूल में तीन हजार बच्चे पढ़ते हैं। यानी छात्रों की कुल तादाद हुई तकरीबन साठ लाख। अगर इन साठ लाख बच्चों से बस्ते के नाम पर हर साल औसतन पांच हजार रूपया भी वसूला जाता है तो यह आंकड़ा हो जाता है तीस अरब रुपये का। इसमें अगर ‘चोरी में इमानदारी का हिस्सा’ कहा जानेवाला ‘दस फीसदी’ भी स्कूल की तिजोरी में आता हो तो वह रकम होती है तीन अरब की और बाकी 27 अरब में से अगर आधी रकम भी किताब-काॅपी की छपाई, ढ़ुलाई और बंटाई में खर्च हो जाती हो तब भी बस्ता माफिया की जेब में हर साल आम लोगों की खून-पसीने की कमाई का साढ़े तेरह अरब रूपया आना तय ही है। हालांकि अनुमानित कमाई का यह आंकड़ा वास्तव में इससे कहीं ज्यादा बड़ा होगा लेकिन अगर इस अनुमानित आंकड़े को भी हकीकत मान लिया जाये तो जो बस्ता माफिया हर साल 135 करोड़ का मुनाफा बटोर रहा है वह अपने धंधे को बचाने व बढ़ाने के लिये कुछ करोड़ की रकम तो खर्च करता ही होगा। शायद यही वजह है कि हर साल आम लोगों को लग रही इस भारी चपत का किसी भी स्तर पर कोई संज्ञान नहीं लिया जा रहा है और बच्चों को अच्छी तालीम दिलाने की चाहत रखनेवाला आम आदमी बस्ते में ठूंसे गये भ्रष्टाचार का बोझ ढ़ोने के लिये मजबूर हो रहा है।