आगामी लोकसभा चुनाव को लेकर बेशक अंदरूनी तौर पर सियासी गतिविधियां जोर-शोर से जारी हैं और हर खेमे में काफी हलचल का माहौल का दिख रहा है लेकिन औपचारिक तौर पर किसी भी खेमे से कोई बड़ी खबर सामने नहीं आने की बड़ी वजह खरमास को बताया जा रहा है। दरअसल हिन्दू समाज में खरमास के दौरान कोई भी शुभ कार्य करना, नया व्यवसाय या साझेदारी करना या कोई भी नई चीज लेना वर्जित माना जाता है। कई इलाकों में तो इस दौरान नए कपड़े खरीदना या पहनना भी मना होता है। खरमास से जुड़े मिथकों व किस्से-कहानियों का राजनीतिक दलों पर कितना अधिक प्रभाव पड़ रहा है इसका सहज अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इन दिनों किसी भी खेमे से गठबंधन या साझेदारी के बारे में किसी समझौते को निर्णायक रूप नहीं दिया जा रहा है। बात चाहे उत्तर प्रदेश में कांग्रेस से किनारा करके सपा, बसपा व रालोद द्वारा आपस में चुनाव पूर्ण गठबंधन किये जाने के संकेतों की करें अथवा बिहार में भाजपानीत राजग के खिलाफ राजग को धुरी बनाकर समान विचारधारा वाले दलों के एक मंच पर आकर महागठबंधन बनाए जाने की या फिर बिहार में सीट समझौते को लेकर भाजपा, जदयू व लोजपा के बीच जारी तनातनी की। किसी भी मामले में औपचारिक तौर पर अभी कोई अंतिम फैसला नहीं किया जा रहा है और सभी राजनीतिक दल केवल संकेतों की भाषा में ही सियासी समस्याओं को सुलझाने की दिशा में आगे बढ़ते दिखाई पड़ रहे हैं। दरअसल माना जाता है कि सूर्य के धनु राशि में प्रवेश करने के साथ ही खरमास का आरंभ हो जाता है। धनु वास्तव में गुरू की राशि है। जब इसमें सूर्य आते हैं तो गुरू का प्रभाव कुंद पड़ जाता है। जबकि किसी भी शुभ कार्य या बड़ी पहल के लिये ज्योतिषीय नजरिये से गुरू का सहयोग बेहद आवश्यक है। लेकिन जब तक सूर्य धनु राशि में रहेंगे तब तक गुरू काफी हद तक निष्क्रिय रहेंगे। इसी वजह से इसे खरमास का नाम दिया जाता है और इस दौरान कोई बड़ा काम नहीं करने की सलाह दी जाती है। इस बार यह खरमास बीते 16 दिसंबर की सुबह नौ बजकर आठ मिनट से आरंभ हुआ है जो आगामी 14 जनवरी को सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने के बाद ही समाप्त होगा। चुंकि खरमास के दौरान कोई नयी साझेदारी या व्यावसायिक समझौते को अमल में लाना वर्जित बताया गया है लिहाजा कोई भी दल इस दौरान किसी राजनीतिक समझौते को निर्णायक मुकाम तक पहुंचाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है। बेशक अंदरूनी तौर पर इस बात का खुला संकेत दिया जा रहा हो कि यूपी में सपा, बसपा और रालोद का जबकि बिहार में राजद, कांग्रेस, रालोसपा, माकपा, भाकपा, हम और शरद यादव का ही नहीं बल्कि भाजपा, जदयू और लोजपा का भी गठबंधन हो गया है और इन तीनों खेमों ने सीटों के बंटवारे के मसले को भी आपस में सुलझा लिया है लेकिन औपचारिक तौर पर कोई भी खेमा सीटों के तालमेल के आंकड़ों को सार्वजनिक करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है। बताया जाता है कि खरमास के कारण ही सपा यह स्वीकार करने से हिचक रही है कि उसने गठबंधन में परिवर्तन करते हुए कांग्रेस से किनारा कर लिया है और महागठबंधन की ओर से भी यह बताने से परहेज बरता जा रहा है कि उसके कौन-कौन से घटक कितनी सीटों पर चुनाव लड़ेंगे। यहां तक कि भाजपा को आंखें दिखा रही लोजपा को कितनी सीटें देने का भरोसा देकर राजग में बरकरार रहने के लिये मनाया गया है इसका खुलासा करने से भी पूरी तरह परहेज बरता जा रहा है। ऐसे में संभव है कि पूरी तस्वीर साफ होने के लिये मकर संक्रांति यानि 14 जनवरी तक का इंतजार करना पड़े जब सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करते ही खरमास का दोष दूर हो जाएगा और शुभ कार्यों पर लगा प्रतिबंध समाप्त हो जाएगा। हालांकि यह कोई पहला मौका नहीं है जब ग्रह-नक्षत्रों के मद्देनजर सियासत ने अपनी चाल बदली हो बल्कि कई बार ऐसा देखा गया है कि ज्योतिषीय सलाहों को मान कर कई ऐसे मामलों में भी ऊटपटांग फैसले ले लिये जाते हैं जो सतही तौर पर मजाक का कारण बनते हैं। मसलन हिन्दू धर्म में 13 के अंक को बेहद अशुभ माना गया है। इसी वजह से लोग अक्सर इस अंक से परहेज बरतते हैं कि कहीं कोई अनहोनी या अपशकुन ना हो जाए। अनहोनी का यही डर था कि जब अत्याधुनिक व विश्वस्तरीय शहर नोएडा को बसाया गया तो उसमें सेक्टर तेरह नाम की जगह ही नहीं रखी गई। नोएडा में सेक्टर बारह भी है और चैहद भी लेकिन तेरह गायब है। इसी प्रकार अंकों का खेल कैसे राजनीति को प्रभावित करता है इसका उदाहरण संसद के भीतर भी देखा गया जहां 420 नंबर की सीट जिसे भी मिलती है वह तुरंत अपनी कुर्सी बदलने के लिये अर्जी दाखिल कर देता है। मजाल है कि कोई भी पार्टी पितृपक्ष यानि श्राद्ध पक्ष के दौरान कोई बड़ी बैठक या बड़ा फैसला कर ले। तमाम नेताओं के अपने ज्योतिषी हैं और अलग-अलग ज्योतिषीय सलाहकार भी हैं। उनसे पूछे बगैर कई बड़े नेता तो घर से कदम बाहर निकालना भी गवारा नहीं करते हैं। भाजपा के एक प्रवक्ता जो इन दिनों केन्द्र सरकार में काफी बड़ा मंत्रालय संभाल रहे हैं उनके बारे में प्रसिद्ध है कि प्रवक्ता रहने के दौरान वे हर दिन के हिसाब से अलग रंग के कपड़ों का चयन करते हैं और निश्चित अंतराल पर अलग-अलग इत्र का इस्तेमाल करते हैं। वास्तव में देखा जाए तो यह सब मन के वहम के अलावा और कुछ भी नहीं है। जो होनी है वह अपने कर्मों पर निर्भर है। कर्म अच्छे होंगे तो भाग्य अच्छा ही रहेगा और कर्म बुरे होंगे तो कितना ही टोना-टोटका क्यों ना कर लिया जाए, किस्मत खराब होकर ही रहेगी और दुर्भाग्य कभी पीछा नहीं छोड़ेगा। लिहाजा बेहतर होगा कि ग्रह-नक्षत्रों से डरने के बजाय राजनीतिक दल अपनी नीति और नीयत में सुधार लाएं ताकि आम लोग उन्हें अपने समर्थन से आगे बढ़ाने के लिये आगे आएं।
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शनिवार, 22 दिसंबर 2018
शनिवार, 9 अप्रैल 2016
स्थापितों से आगे भी है आसमान
स्थापितों से आगे भी है आसमान
सांगठनिक तौर पर अहम जिम्मेवारियां सौंपे जाने के मामले में भाजपा द्वारा जिस तरह से एक के बाद चैंकानेवाले चेहरे सामने लाए जा रहे हैं वह वाकई बेहद दिलचस्प है। ना परंपराओं की परवाह की जा रही है और ना ही वर्जनाओं की। ना सिफारिश के आधार पर फैसले हो रहे हैं और ना ही विरोध की परवाह की जा रही है। देखी जा रही है तो सिर्फ योग्यता, क्षमता और काबिलियत। साथ ही जोर इस बात पर कि समाज के सबसे निचले पायदान से आनेवालों को आगे बढ़ने का मौका प्राथमिकता के आधार पर मुहैया कराया जाए। दरअसल जबसे पार्टी के संस्थापकों और उनके द्वारा आगे लाये दूसरी पीढ़ी के नेताओं का संगठन पर वर्चस्व कमजोर पड़ा है और पार्टी का नेतृत्व नरेन्द्र मोदी व अमित शाह के रूप में ऐसी जोड़ी के हाथ में आया है जो ना तो किसी से उपकृत है और ना किसी पूर्वाग्रह या गुटबाजी से प्रेरित, तब से संगठन में बदलाव की जो बयार चल निकली है वह वाकई बेहद दिलचस्प है। तमाम ऐसे स्थापित चेहरे जो जोड़तोड़, गुटबाजी व गणेश परिक्रमा के बूते विभिन्न स्तरों पर पार्टी में लंबे समय से जमे हुए थे उनकी जगह ऐसे चेहरों को तरजीह देने का सिलसिला चल निकला है जो ‘नेकी कर और दरिया में डाल’ की नीति पर अमल करते हुए संगठन की सेवा में दत्तचित्तता से तल्लीन थे। उन्हें ख्वाहिश भले रही हो पार्टी से कुछ पाने की लेकिन उम्मीद तो कतई नहीं थी कि कुछ मिल पाएगा। ऐसे लोगों को जब अचानक मुख्यधारा में शीर्ष पर बिठाने की नीति पर अमल किया जाने लगा है तो स्वाभाविक तौर पर यह आरोप तो लगना ही है कि मोदी-शाह की जोड़ी पार्टी पर अपनी पकड़ मजबूत करने के लिये संगठन में मनमाने परिवर्तन कर रही है। पुराने स्थापितों की अनदेखी की जा रही है और संगठन पर अपना एकाधिकार स्थापित करने की कोशिश हो रही है ताकि किसी भी मामले में किसी भी स्तर से कभी कोई विरोध या असहमति का स्वर सामने आने की गुंजाइश ही ना रहे। जाहिर तौर पर इस तरह के आरोपों को सिरे से तो कतई खारिज नहीं किया जा सकता है लेकिन इन आरोपों से अलग हटकर देखा जाये तो पार्टी के वंचित, पीडि़त व शोषित तबके को नये निजाम के दौर में आगे आने का मौका मिलना तटस्थ नजरिये से तो स्वागतयोग्य ही है। वर्ना जिस रघुवर दास ने टाटा स्टील रोलिंग मिल में दिहाड़ी मजदूरी करते हुए हरिजन विद्यालय से शुरूआती पढ़ाई की हो, बेहद अभाव व फांके में रहकर भी विधि स्नातक की डिग्री ली हो, वर्ष 1977 में ही जनता पार्टी से जुड़ गया हो और भाजपा की स्थापना के बाद से ही पार्टी का सक्रिय कार्यकर्ता रहा हो उसे 1995 तक विधानसभा का टिकट भी नहीं मिला हो और तत्कालीन संगठन महामंत्री गोविंदाचार्य की नजर में आने के कारण टिकट मिलने के बाद से अब तक एक बार भी हार का मुंह नहीं देखा हो, उनकी कहानी ही यह बताने के लिये काफी है कि अगर मोदी-शाह की जोड़ी ने उन्हें मुख्यमंत्री नहीं बनाया होता तो आज भी ये सियासी तौर पर हाशिये पर ही होते। यह इस जोड़ी का ही कारनामा है कि इसने तमाम वर्जनाओं को तोड़कर दास को ठीक उसी प्रकार आदिवासी बहुल झारखंड का गैरआदिवासी मुख्यमंत्री बनवाया जैसे मनोहरलाल खट्टर को जाटबहुल हरियाणा का गैरजाट मुख्यमंत्री। खट्टर की कहानी भी ऐसी ही है जैसी दास की और अब पंजाब में विजय सांपला, उत्तर प्रदेश में केशव प्रसाद मौर्य और तेलंगाना में डाॅ के लक्षमण को पार्टी का अध्यक्ष घोषित करके उसी परंपरा को आगे बढ़ाया गया है। ये सभी पिछड़े समाज व बेहद गरीब परिवार से आए हैं और इन्होंने संघ परिवार व संगठन के लिये अपना सबकुछ अर्पित करने से लेकर पार्टी के लिये खुद को भी समर्पित कर दिया था लेकिन बदले में कुछ पाने के लिये ना तो कभी गुटबाजी की और ना किसी की गणेश परिक्रमा करना गवारा किया। लिहाजा भले ही पिछड़ों-दलितों को साधने के लिये इन्हें आगे आने का मौका दिया गया हो या फिर इन्हें गुटनिरपेक्ष रहने का प्रतिफल मिल रहा हो। सच तो यही है कि मतदाताओं को अंत्योदय के प्रति अपनी प्रतिबद्धता समझाने में पार्टी को इस सांगठनिक अंत्योदय से निश्चित ही काफी लाभ मिलेगा।
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