पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान बेशक स्थानीय घरेलू राजनीति में अपनी कामयाबी का झंडा गाड़ चुके हों लेकिन वास्तविकता यह है कि वे आज भी सिर्फ एक क्रिकेटर की मानसिकता के बोझ तले ही दबे हुए हैं। क्रिकेट को दरअसल माइंडगेम कहा जाता है। यह जितना जमीन पर खेला जाता है उससे कहीं अधिक दिमाग में होता है। विरोधी पक्ष के दिमाग को पढ़ना और उसके दिमाग को अपने मनमुताबिक नियंत्रित करना क्रिकेट का एक अहम पहलू है। इसकी के तहत विरोधी पक्ष के बारे में ऊटपटांग बातें की जाती हैं और उसे उकसाने का प्रयास किया जाता है। उसकाने की कोशिश के पीछे रणनीति रहती है विरोधी पक्ष की एकाग्रता को भंग करना और उसे गुस्से व आक्रोश से भर देना ताकि उसका असर विरोधी के खेल पर पड़े और वह अपना स्वाभाविक खेल ना दिखा पाए। इसी रणनीति को इमरान ने भारत और पाकिस्तान के रिश्तों के मामले में इस्तेमाल करके यह बेहतर तरीके से जता दिया है कि बेशक वे प्रधानमंत्री के ओहदे पर पहुंच चुके हों लेकिन उनकी मानसिकता क्रिकेटर वाली ही है। वर्ना वे कतई भारतीय मुसलमानों की स्थिति के बारे में टिप्पणी नहीं करते। या फिर ऐसी टिप्पणी करने से पहले वे पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की स्थिति पर विचार कर लेते। सच तो यह है कि इस बचकाने बयान के पीछे इमरान की वही रणनीति काम कर रही है जिसका खुलासा करते हुए उनके विदेशमंत्री ने करतारपुर गलियारे के शिलान्यास के मौके पर कहा था कि पाकिस्तान की ओर से फेंकी गई गुगली में भारत फंस गया है। लेकिन जब पाकिस्तान को लगा कि उसकी गुगली बेकार चली गई तो अब उसने उकसावे की रणनीति पर अमल आरंभ कर दिया है। पहली उकसावे की बात उसने बीते दिनों करतारपुर के मामले को लेकर ही की जिसके तहत करतारपुर का इलाका भारत को देने के एवज में कोई अन्य जमीन का टुकड़ा लेने के कथित भारतीय प्रस्ताव को उसने ढ़ोल पीटकर नकारने की पहल की। जबकि सच तो यह है कि पाकिस्तान से जमीन की अदला बदली का तो कोई सवाल ही नहीं है बल्कि अभी तो भारत को उसके कब्जे से अपनी जमीन का काफी बड़ा हिस्सा छुड़ाना है। उसके कब्जे में मौजूद अपनी जमीन छुड़ाने का प्रयास करने के बजाय भारत की ओर से पाकिस्तान के किसी जमीन की अदला बदली का प्रस्ताव सामने लाया जाएगा इसकी तो कल्पना करना भी मूर्खतापूर्ण ही है। लेकिन पाकिस्तान की ओर से ऐसे प्रचारित किया गया मानो भारत ने उसके पास इस तरह का कोई प्रस्ताव प्रस्तुत किया हो। लेकिन भारत की ओर से इस मामले में सधी प्रतिक्रिया दिया जाना भी जरूरी नहीं समझा गया तो अब भारत में हलचल मचाने की एक नयी तरकीब के तहत भारतीय मुसलमानों की स्थिति को लेकर अनावश्यक व बचकाना बयान इमरान खान की ओर से दिया गया है। हालांकि बेहद खुशी और गर्व की बात है कि इमरान के इस बयान का मुंहतोड़ जवाब देने के लिये सबसे पहले असदुद्दीन ओवैसी और नसीरूद्दीन शाह जैसे ही लोग सामने आए और उन्होंने पाकिस्तान के अल्पसंख्यकों के मसले को उठाकर इमरान को आइना दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इसके अलावा स्वाभाविक तौर पर हमारे गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने भी इमरान को उनकी औकात बताई है और पाकिस्तान की वास्तवकि जमीनी हकीकत को बेपर्दा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। लेकिन इस सबके बीच असली बात पर्दे के पीछे ही रह गयी कि आखिर इमरान ने क्या सोच कर ऐसा बयान दिया। अव्वल तो भारत की अंदरूनी बातों के बारे में बोलने का ना तो उन्हें कोई अख्तियार है और ना ही उनकी हैसियत, स्थिति या औकात है कि वे किसी भी मामले में भारत के सामने खड़े हो सकें। और दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि अगर उनके देश में अल्पसंख्यकों को मानवीय अधिकार भी मिले होते तो संभव था कि उनकी बातों को विश्व बिरादरी द्वारा गंभीरतापूर्वक सुना भी जा सकता था। लेकिन पाकिस्तान की अंदरूनी हालत तो यह है कि आजादी के बाद पाकिस्तान की कुल आबादी में अल्पसंख्यकों की हिस्सेदारी जहां 32 फीसदी थी वह घटकर अब सात फीसदी पर आ गई है उसमें भी हिन्दुओं की तादाद महज तीन फीसदी से कुछ ही ज्यादा बची है। जो बचे भी हैं उन्हें जानवरों से भी बदतर स्थित में गुजर बसर करने के मजबूर होना पड़ रहा है और उन्हें वहां की दोयम दर्जे की नागरिक सुविधाएं ही मुहैया कराई जाती हैं। इसी बदतर माहौल का नतीजा है कि जो एक बार पाकिस्तान से बाहर निकलने में कामयाब हो जाता है वह दोबारा कतई वहां वापस लौटने के लिये तैयार नहीं होता है और ऐसे शरणार्थियों को बाहर निकालने की अमानवीयता दिखा पाना किसी भी देश के लिये संभव नहीं हो पाता है। जबकि भारतीय मुसलमानों को यहां अलग करके नहीं देखा जाता बल्कि भारत पर जितना अधिकार किसी अन्य को हासिल है उससे रत्ती भर भी कम मुसलमानों को नहीं है। यही वजह है कि किसी भी देश में भारत का कोई शरीफ मुसलमान शरणार्थी के तौर पर नहीं रह रहा है। खैर, इमरान ने जो बयान दिया है उसके पीछे उनकी कतई यह सोच नहीं है कि वे मुसलमानों को लेकर चिंतित है अथवा उनकी भारतीय मुसलमानों से कोई हमदर्दी है। वर्ना बंटवारे के बाद भारत छोड़ कर जानेवाले मुसलमानों को पाकिस्तान में आज भी मुहाजिर कह कर नहीं पुकारा जाता और उनके साथ बेगाना सलूक नहीं किया जाता। सच तो यह है कि इमरान का यह बयान उस खुराफाती रणनीति का हिस्सा है जिसके तहत वे भारत को उकसा कर उससे पाकिस्तान के बारे में तीखी बातें सुनना चाहते हैं। दरअसल उनकी ख्वाहिश है कि मीठी बातें ना हो सकें तो कम से कम तीखी बातें ही हों ताकि वे अपने देश की जनता को यह तो बता सकें कि वे भारत के मोर्चे पर कुछ कर रहे हैं। दरअसल वे भारत के मोर्चे पर कुछ करते हुए दिखना चाह रहे हैं जबकि भारत की ओर से बारंबार यह स्पष्ट किया जा चुका है कि अगर कुछ कर दिखाना है तो पहले मुंबई हमले के मास्टरमाइंड के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए और उसे उसके करतूतों की कठोरतम सजा दिलाई जाए। इसके अलावा सीमा पार से आतंकवाद को धकेलने का सिलसिला बंद किया जाए और पाकिस्तान की धरती से भारत के खिलाफ हो रहे साजिश के सिलसिले को बंद किया जाए। जब तक ये दोनों बातें अमल में नहीं आएंगी तब तक पाकिस्तान के किसी भी बयान या हरकत का कोई मतलब नहीं निकलने वाला और ऐसा करने के बजाय इमरान जो बचकानी बातें कर रहे हैं उससे उनकी ही गंभीरता औश्र विश्वसनीयता को विश्व मंच पर आघात पहुंच रहा है।
पाकिस्तान लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
पाकिस्तान लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
मंगलवार, 25 दिसंबर 2018
गुरुवार, 20 दिसंबर 2018
महबूबा की अटपटी बातें
जम्मू कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री पीडीपी अध्यक्षा महबूबा मुफ्ती ने पाकिस्तान के साथ बातचीत की शुरूआत के लिये लोकसभा चुनावों का नतीजा आने तक इंतजार करने की जो बात कही है वह ना सिर्फ अटपटी और गैर-जरूरी है बल्कि कहीं ना कहीं यह दर्शाता है कि अभी तक वे पाकिस्तान को लेकर भारत सरकार और हर खासो-आम भारतीय की सोच को समझ ही नहीं पाई हैं। हालांकि यह भी संभव है कि वे इस बात को समझना ही नहीं चाह रही हों कि पाकिस्तान के साथ भारत के रिश्तों का हमारे अंदरूनी चुनाव से कोई लेना-देना ही नहीं है। अगर पाकिस्तान कल की तारीख में भी मुंबई हमले के गुनहगारों को उनके किये की माकूल सजा दे तो परसों से ही रिश्तों में जारी संवादहीनता और तल्खी की बर्फ पिघलने लगेगी। लेकिन मसला है कि एक तरफ पाकिस्तान अपनी खुराफातें और बदमाशियां बदस्तूर जारी रखने पर आमादा है और दूसरी ओर यह भी चाह रहा है कि भारत उसके साथ बातचीत की प्रक्रिया भी शुरू कर दे और उसे आगे बढ़कर गले लगा ले। आखिर ऐसा कैसे संभव हो सकता है? देश में चुनाव कब होंगे और उसमें किसकी जीत या हार होगी और किसकी सरकार बनेगी यह तमाम बातें हमारी अंदरूनी राजनीति से जुड़ी है जिनका दोनों मुल्कों के रिश्तों से कोई तालमेल ही नहीं है। हालांकि इस बात से कोई इन्कार नहीं कर सकता कि भारत और पाकिस्तान के बीच शान्तिपूर्ण सम्बन्ध दोनों मुल्कों के लोगों के लिए फायदेमन्द हैं। इस मायने में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान का विचार वाकई काबिले तारीफ है। लेकिन जमीनी हकीकतें इससे बिलकुल विपरीत हैं। यहां तक कि इमरान की कथनी और करनी में कहीं कोई तालमेल दिखाई ही नहीं पड़ रहा है। मिसाल के तौर पर सत्ता संभालने के बाद इमरान सरकार ने मुंबई पर हमले के आतंकी हमले के मास्टरमाइंड हाफिज की अगुवाई वाली तमाम संस्थाओं को आतंकी संगठनों की सूची से बाहर कर दिया। इसमें फलह ए इन्सानियत और जमात उद दावा भी शामिल हैं जिन्हें लश्करे तैयबा के मुखौटे की तरह इस्तेमाल किया जाता है। मुंबई आतंकी हमलों के मास्टरमाइंड हाफिज सईद को संयुक्त राष्ट्र द्वारा वैश्विक आतंकी घोषित किया जा चुका है। उस पर 10 मिलियन डॉलर का इनाम है। लेकिन वह पाकिस्तान में खुला घूम रहा है। यही नहीं, हाफिज की पार्टी ‘मिल्ली मुस्लिम लीग’ को चुनाव लड़ने की अनुमति देकर उसे राजनीति की मुख्यधारा में लाने की कोशिश की जा रही है। इसकी मार्फत हाफिज पाकिस्तान में राजनीतिक ताकत बनने की कोशिश कर रहा है। एक तरफ तो इमरान कहते हैं कि आतंकवाद और कट्टरपन को बढ़ावा देने से पाकिस्तान का ही नुकसान हो रहा है लेकिन दूसरी तरफ सरकार बनने के 100 दिनों के भीतर इमरान ने अनेक संदिग्ध मदरसों को निगरानी सूची से बाहर कर दिया। उनके मुताबिक मदरसों को आतंकवाद से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। हालांकि, वे जानते हैं कि ऐसे अनेक मदरसों को संदिग्ध स्रोतों से पैसा मिलता है और वे अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की नजरों में सन्देहास्पद रहे हैं। पूरी दुनिया को यह पता है कि मदरसे की आड़ में चल रहे इन संस्थाओं में मासूम बच्चों और नौजवानों का माइंडवॉश करके उन्हें आतंकी इरादों की पूर्ति का औजार बनाया जाता है। हालांकि, करतारपुर साहिब गलियारे का उद्घाटन विशुद्ध धार्मिक मौका था, लेकिन इमरान ने उस मंच से भी कश्मीर मुद्दे का जिक्र करके इसे राजनीतिक रंग देने की कोशिश की। उनके विदेश मन्त्री शाह महमूद कुरैशी ने इससे भी एक कदम आगे बढ़ते हुए सरकार के इस फैसले को इमरान की गुगली के तौर पर पेश किया। जिस पर भारत ने कड़ी प्रतिक्रिया दी। इस बीच पाकिस्तान प्रशिक्षित आतंकी भारत में खून-खराबे की घटनाओं को अंजाम देने में लगे हुए हैं। पिछले ही दिनों उन्होंने अमृतसर में निरंकारियों के एक धार्मिक जलसे पर हमला किया, जिसमें 03 लोग मारे गए और 20 घायल हुए। इसे पंजाब में साम्प्रदायिक तनाव फैलाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है, ताकि आतंकवाद को भड़काया जा सके। घटनास्थल से बरामद ग्रेनेड पाकिस्तान में बने थे इसलिए इस घटना के स्रोत पर किसी को दुविधा नहीं हो सकती। सबसे चैंकाने वाली बात तो यह है कि करतारपुर साहिब गलियारे के उद्घाटन पर खालिस्तान समर्थक नेता गोपाल सिंह चावला भी मौजूद था और इमरान खान व पाकिस्तानी सेना प्रमुख उससे औपचारिक शिष्टाचार निभा रहे थे। इन सबसे साफ तौर पर यह पता लगता है कि इमरान की बातों और कामों में कोई सम्बन्ध नहीं है। ऐसे माहौल में अगर उन्हें लगता है कि भारत बातचीत के रास्ते पर कदम बढ़ाएगा, तो इसे उनकी खुशफहमी ही कही जा सकती है। भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने साफ कर दिया है कि जब तक पाकिस्तान भारत के खिलाफ आतंकी गतिविधियों पर विराम नहीं लगाता तब तक उससे बातचीत की कोई संभावना नहीं है। उनके मुताबिक आतंकवाद और बातचीत साथ-साथ नहीं चल सकते। पाकिस्तान को समझना होगा कि भारत के लिए आतंकवाद का खात्मा एक अहम मुद्दा है और जब तक पाकिस्तान इसके खिलाफ स्पष्ट, कठोर, और पारदर्शी कदम नहीं उठाता है तब तक उसके किसी अनुरोध या घड़ियाली आंसू का भारत की सोच और नीति पर कोई असर नहीं होगा। पाकिस्तान को भारत ही नहीं तमाम दुनिया को भरोसा दिलाना चाहिए कि वह वास्तव में आतंकवाद के खात्मे के लिए तैयार है और इसके लिए जरूरी कदम उठा रहा है। जिस दिन ऐसा होगा उसी दिन भारत खुद आगे बढ़कर बातचीत की प्रक्रिया को बहाल करने के लिए कदम बढ़ाएगा। लेकिन यह सीधी सी और बिना लाग-लपेट की बात अगर पाकिस्तान में इमरान सरकार के संचालकों को और भारत में महबूबा सरीखी नेताओं समझ में नहीं आ रही है तो इसका सीधा सा मतलब यही है वे इसे समझना ही नहीं चाह रहे हैं। महबूबा को ही नहीं बल्कि पाकिस्तान की सरकार को भी यह समझ लेना चाहिये कि इस मसले को भारत के आम चुनावों से जोड़कर दिखाने के बहाने भारत की मौजूदा सरकार की रीति-नीति के बारे में दुनिया में गलतफहमी फैलाने का जो प्रयास किया जा रहा है उसे कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता है और इस बात में भी किसी को कोई शंका नहीं होनी चाहिये कि बेशक चुनाव के बाद भारत में किसी भी दल की सरकार बने अथवा कोई भी प्रधानमंत्री बने लेकिन पाकिस्तान को लेकर गोली बंद होने के बाद ही बोली शुरू होने की जो नीति अपनाई गई है उसमें रत्ती भर भी रद्दोबदल की जरा भी संभावना नहीं है।
बुधवार, 20 अप्रैल 2016
पाकिस्तान का खुराफाती कूटनीतिक प्रपंच
चोरी और सीनाजोरी
पाकिस्तान ने भारत के साथ खुराफाती कूटनीतिक प्रपंच का जो खेल शुरू किया है उसकी जाल में अब वह खुद ही उलझता दिख रहा है। हकीकत यही है कि भारत की ओर से तो कभी कहा ही नहीं गया कि बातचीत का दरवाजा बंद करने की कोई जरूरत है। फिर पाकिस्तानी कूटनीतिज्ञों के दिमाग में समग्र वार्ता स्थगित होने की बात कहां से घुसी यह या तो वे जानें या उनका खुदा जाने। हालांकि इसे चोर की दाढ़ी में तिनके के तौर पर अवश्य देखा जा सकता है। दरअसल पठानकोट के मामले में अपनी स्पष्ट भूमिका को नकारते हुए इसे भारत की ही खुराफात बताने की पहल करने, पठानकोट मामले की जांच के लिये एनआईए को अपनी सरहद में दाखिल होने की इजाजत देने से आनाकानी करने, सीमा पर संघर्षविराम का उल्लंघन करते हुए नये सिरे से बेवजह गोलीबारी का सिलसिला शुरू करने और बलूचिस्तान व गुलाम कश्मीर के इलाकों में दावानल की शक्ल अख्तियार करती दिख रही अलगाववाद की आग में भारत को घसीटने के लिये एक कथित सामान्य नौसैनिक को राॅ का एजेंट बताकर दुनियां के समक्ष प्रस्तुत करने के बाद शायद पाकिस्तानी हुक्मरानों को यह लगा होगा कि उनकी इतनी बदमाशियों के बाद तो भारत की ओर से समग्र वार्ता पर अवश्य ही विराम लगा दिया जाएगा। वैसे भी भारत की यह स्पष्ट नीति रही है कि गोली और बोली एक साथ तो जारी नहीं रखी जा सकती। गोली की भाषा में बात करनी हो तो गोली से ही बात कर लो वर्ना बोली में बातचीत तभी संभव है जब गोलियों के शोर पर विराम लगाया जाए। जबकि पाकिस्तान की नीति रही है कि बोली का जवाब गोली से दो और जब गोली का जवाब गोला से मिलने लगे तो वार्ता की दुहाई देना शुरू कर दो। तभी तो इस बार भी जब उसे सरहद पर गोली के जवाब में गोले का सामना करना पड़ा तो उसकी पूरी कूटनीतिक फौज समग्र वार्ता के लिये हाय-तौबा मचाने में जुट गयी। नयी दिल्ली में उसने अपने उच्चायुक्त अब्दुल बासित को आगे कर दिया और उसकी संयुक्त राष्ट्र की स्थायी प्रतिनिधि मलीहा लोधी ने विश्व बिरादरी को बरगलाने के लिये अमेरिका में मोर्चा खोल दिया। दोनों का लोधी ने यह बेसुरा राग आलापा कि भारत के साथ पाकिस्तान के रिश्ते इसलिये नहीं सुधर रहे हैं क्योंकि नई दिल्ली से समग्र बातचीत के लिये पहलकदमी नहीं की जा रही है। दूसरी ओर बासित ने तो बातचीत का सिलसिला स्थगित हो जाने का एलान भी कर दिया। जाहिर है कि पाकिस्तानी रणनीतिकारों को यही लगा होगा कि इन हरकतों से भारतीय खेमा बौखला उठेगा और गुस्से में आकर कुछ अनाप-शनाप बातें या हरकतें अवश्य करेगा। लेकिन उनके अरमान धरे रह गये और इधर से सिर्फ बासित के बयान को ही आपसी संबंधों के लिये झटका बताकर चुप्पी साध ली गयी जबकि लोधी की जहरीली वाणी का प्रतिवाद करने के लिये एक शब्द खर्च करने की भी जहमत नहीं उठायी गयी। यानि नयी दिल्ली का इरादा बिल्कुल स्पष्ट है कि बेवजह की धमाचैकड़ी बहुत हो गयी, अब जो भी होगा वह ठोस होगा। इधर-उधर की बातों में वक्त जाया नहीं करने के नई दिल्ली के ठोस इरादे देखकर अब पाकिस्तान को पसीना आना लाजिमी ही है। तभी तो बड़बोले बासित के बयान को दरकिनार करते हुए उसे औपचारिक तौर पर बताना पड़ा है कि भारत के साथ बातचीत की प्रक्रिया कतई स्थगित नहीं हुई है बल्कि इसके लिये उचित वक्त व स्थान तय करने पर लगातार मंथन चल रहा है। यानि पठानकोट हमले के बाद सामने आये नाजुक हालातों में बातचीत की प्रक्रिया को लगे झटके को प्रचारित करके पाकिस्तान यह साबित करने में जुट गया है कि भारत की ओर बातचीत के लिये पहल ही नहीं हो रही है। जबकि भारत तो पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि बातचीत का तो कोई विकल्प ही नहीं है, यह तो होनी ही है। लेकिन पहले इसके लिये माहौल तो बने। खास तौर से पठानकोट के मामले में जब पाकिस्तान ने स्वीकार कर लिया है कि भारत पर हुए इस हमले में उसकी जमीन का इस्तेमाल हुआ है और उधर के लोगों ने ही इसे अंजाम दिया है तो फिर अब इसके अपराधियों पर ठोस कार्रवाई तो होनी ही चाहिये। वर्ना एक तरफ वह चीन के सहयोग से मसूद अजहर का संयुक्त राष्ट्र में बचाव करे, सरहद पर अशांति का माहौल बनाये और पठानकोट मामले की जांच के लिये एनआईएक को अपने यहां घुसने भी ना दे जबकि दूसरी तरफ बातचीत की प्रक्रिया स्थगित होने का ढि़ढ़ोरा पीटकर भारत को ही इसका जिम्मेवार ठहराये। यह तो वही बात हुई मानो उल्टा चोर कोतवाल को डांटे।
मंगलवार, 12 अप्रैल 2016
अब पछताए होत क्या....
अब पछताए होत क्या....
पठानकोट में हुए आतंकी हमले के मामले में पाकिस्तान की ओर से धोखे की सौगात मिलना तो तय ही था। उसका तो इतिहास ही यही रहा है कि दोस्ती की हर कोशिश के बदले में कभी हमें कारगिल की सौगात मिली, कभी संसद और मुंबई पर हमला झेलना पड़ा और कभी हेमराज का कटा हुआ सिर मिला। वह तो हम थे जो भोलेपन में यह मान बैठे थे कि अगर पड़ोसी के साथ नये सिरे से शुरूआत की जाये तो रिश्तों में सुधार संभव है। हालांकि इस भोलेपन को हमारी बेवकूफी का नाम देना भी गलत नहीं होगा लेकिन यह वैसा मामला तो कतई नहीं है जैसा सुब्रमण्यम स्वामी समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि अब तक पाकिस्तान के प्रति दर्शाया गया स्नेह व सहयोगपूर्ण रवैया वैसा ही था जैसा महाभारत से पूर्व कृष्ण ने दुर्योधन से सिर्फ पांच गांव मांगकर प्रदर्शित किया था। स्वामी की मानें तो जिस तरह दुर्योधन द्वारा सुई की नोक के बराबर जमीन देने से भी इनकार कर दिये जाने के बाद महाभारत के युद्ध की नींव पड़ी ठीक उसी प्रकार पाकिस्तान के ताजा धोखे के बाद भारत सरकार भी सख्त फैसले लेने के लिये स्वतंत्र हो गयी है। अब या तो स्वामी वाकई बेहद भोले हैं या इस मामले में भोलेपन का नाटक कर रहे हैं। वर्ना पाकिस्तान की मंशा को ना सिर्फ उन्हें बल्कि उनकी ही पार्टी द्वारा संचालित केन्द्र सरकार को भी तभी भांप लेना चाहिये था जब उसने पहले तो पठानकोट के मामले की जांच के लिये हमारी जांच टीम को अपनी सरहद में दाखिल होने की इजाजत देना ही गवारा नहीं किया और बाद में राजनीतिक दबाव के कारण वह कागजी तौर पर इस शर्त के साथ इसके लिये सहमत हुआ कि पहले उसकी जांच टीम पठानकोट का दौरा करेगी। खैर, मामला चुंकि दस्तावेजी हो रहा था तो इस लिखित समझौते को स्वीकार करने की मजबूरी तो समझी जा सकती है लेकिन वह कौन सी मजबूरी थी जिसके तहत हमारी ओर से यह दबाव बनाने से परहेज बरत लिया गया कि पाकिस्तानी जांच टीम को तभी पठानकोट आने की इजाजत दी जाएगी जब हमारी जांच टीम पाकिस्तान में मौजूद सबूतों व साक्ष्यों को पूरी तरह खंगाल लेगी। वैसे भी पाकिस्तानी जांच टीम को भारत आकर ना तो कुछ करना था और ना उसने कुछ किया। तभी तो इस जांच टीम ने ना तो मुठभेड़वाली जगह का मुआयना किया और ना ही आतंकियों की लाश पर निगाह डालने की जहमत उठायी। अलबत्ता उनका मकसद तो हमारे सैन्य ठिकानों व पठानकोट में मौजूद हमारी प्रतिरोधक क्षमता का जायजा लेना और सैन्य रणनीति को अपनी निगाहों से देखना भर था। तभी तो पाकिस्तानी जांच दल ने जिद पकड़ी थी पठानकोट में तैनात वायुसेना अधिकारियों से पूछताछ करने की और आतंकियों की राहगुजर मंे पेश आयी परेशानियों को बारीकी से समझने की। वर्ना वाकई अगर पठानकोट मामले में पाकिस्तान जरा भी गंभीर होता तो अव्वल तो उसने हमारी ओर उपलब्ध कराए गए सबूतों को कमजोर बताने की पहल ना की होती और दूसरे हमारी जांच दल के वहां जाने में अड़ंगा नहीं लगाता। उस पर इल्जाम ये कि ना सिर्फ पठानकोट मसला भारत की ही खुराफाती साजिश का नतीजा है बल्कि भारत ही बलूचिस्तान में अलगाव की आग को भड़काने व वहां अशांति फैलाने में जुटा हुआ है। अलबत्ता हाफिज सईद और मसूद अजहर तो संत-महात्मा हैं जिन्हें बेवजह आतंकवादी साबित करने की कोशिश हो रही है। अब ऐसी सोच, नीति व नीयत वाले पड़ोसी पर अगर हम हर बार धोखा खाने के बाद भी भरोसा करने की गलती कर रहे हैं तो निश्चित ही असली कमी-खामी तो हममें ही है। वह तो जैसा पहले था, वैसा ही अब भी है और आगे भी ऐसा ही रहनेवाला है। लिहाजा पठानकोट के सबूतों को पुख्ता करने के लिये अमेरिकी संस्थानों की मदद लेने की कूटनीतिक पहल और मसूद अजहर के खिलाफ वारंट जारी करने की स्पष्ट नीति पर आगे बढ़ने में इस बार जो देरी की गयी उस गलती को दुहराने से बचना ही श्रेयस्कर होगा। साथ ही किसी ऐरे-गैरे का वीडियो दिखाकर बलूचिस्तान में ‘राॅ’ की सक्रियता का शगूफा छोड़ने की पाक की नापाक खुराफात का सख्ती से संज्ञान नहीं लेने की जो रणनीति अपनाई जा रही है उस पर भी अगर समय रहते पुनर्विचार नहीं किया गया तो यह मसला भी ‘शर्मअलशेख’ के उस शर्मनाक दस्तावेज की तस्दीक करने के काम में लाया जा सकता है जिसे बड़ी मुश्किल व मशक्कत से अभी हाल ही में हमने खारिज कराया है।
सदस्यता लें
संदेश (Atom)