मंगलवार, 17 मई 2016

राष्ट्रपति की विचारणीय चिंता

राष्ट्रपति की विचारणीय चिंता 


देश में ज्ञान, विज्ञान व अनुसंधान के स्तर को लेकर राष्ट्रपति ने अपनी जो चिंता प्रकट की है और जिस तरह के भविष्य का दर्पण दिखाया है वह वाकई विचारणीय भी है और चिंतनीय भी। चिंतनीय इसलिये क्योंकि आखिर कभी तो हमें यह चिंता करनी ही होगी कि हमारी शिक्षा प्रणाली हमें कहां लेकर जा रही है। राष्ट्रपति के ही शब्दों में कहें तो आजादी के बाद से आज तक भारतीय शिक्षण संस्थानों ने एक भी ऐसा देसी छात्र हमें नहीं दिया है जो ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में अपने प्रामाणिक अनुसंधान के दम पर देश को नोबेल पुरस्कार से नवाज सके। एक ओर हमारे शिक्षण संस्थान विश्व की शीर्ष रैंकिंग में दो सौवें स्थान पर आने के लिये भी लगातार जद्दोजहद करते दिखते हैं वहीं सरकार भी इस दिशा में कितनी निश्चिंत है इसका सहज अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि देश की जीडीपी का महज आधा फीसदी ही शिक्षण, प्रशिक्षण व शोध के क्षेत्र में खर्च के लिये आवंटित किये जाने की परंपरा लगातार चली आ रही है। यानि सरकार किसी भी दल की क्यों ना रही हो, शिक्षा को कभी प्राथमिकता नहीं मिल सकी। वह भी तब जबकि हम खम ठोंकते हैं उस चीन को हर मोर्चे पर पीछे छोड़ने का जो अपनी जीडीपी का लगभग सवा दो फीसदी हिस्सा सिर्फ ज्ञान, विज्ञान व अनुसंधान पर ही खर्च करता है। यानि शिक्षा के क्षेत्र में बतकही व बतरस से आगे बढ़कर कुछ ठोस करने की ना तो कभी नीति रही और ना नीयत। इसमें तकरीबन ग्यारह वर्षों तक वित्तमंत्री रहते हुए देश के आय-व्यय में संतुलन बिठा चुके प्रणब दा की यह स्वीकारोक्ति अवश्य ही सराहनीय है कि किसी भी वित्तमंत्री के लिये बाकी खर्चों से बचाकर शिक्षा के मद में आवंटन बढ़ाना बेहद मुश्किल व सिरदर्दी का काम हो सकता है। लेकिन यह करना तो पड़ेगा। वर्ना राष्ट्रपति ने भविष्य की जो तस्वीर दिखायी है उसके मुताबिक 2030 में जब विश्व का हर दूसरा व्यक्ति भारत का नागरिक होगा और उसमें से भी आधे की उम्र 25 वर्ष के भीतर की होगी तब उस विशाल युवा समुद्र को समुचित तौर पर विश्व व्यवस्था में अपना स्थान बनाने में कितनी मुश्किलें पेश आएंगी इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। लिहाजा आज सिर्फ कौशल भारत, कुशल भारत का जो नारा बेहद जादूई प्रतीत हो रहा है वह उन दिनों किसी काम का नहीं बचेगा अगर कुशलता की बुनियाद हमारे अपने अनुसंधान पर आधारित नहीं होगी। यानि आवश्यकता इस बात की है कि हम शोध व अनुसंधान के क्षेत्र में विश्व की मांग व मानवता की जरूरतों के मुताबिक अपना ध्यान केन्द्रित करें और रटंत विद्या की परंपरा से अलग हटकर कुछ नया करने की पहल करें। यह बात तो हमारे प्रधानमंत्री भी कई दफा स्वीकार कर चुके हैं कि मौजूदा युग ज्ञान का युग है। लिहाजा ज्ञान में सिर्फ पारंगत होना ही काफी नहीं हो सकता, इसमें दुनियां से आगे निकलने की आवश्यकता है। जिसके लिये ना सिर्फ हमारे शिक्षण संस्थानों को अपने पाठ्यक्रमों की गुणवत्ता में व्यापक सुधार लाना होगा बल्कि छात्रों को भी भविष्य की चुनौतियों के प्रति जागरूक होना पड़ेगा और सरकार को भी इस दिशा में अभी से समुचित निवेश की व्यवस्था करनी होगी। अगर सभी मोर्चों पर एक साथ पहलकदमी नहीं हुई तो 14 साल बाद 25 साल के आयुवर्ग की विश्व की एक-चौथाई भारतीय आबादी का भविष्य सुधारना नामुमकिन होगा और भारत को विश्वगुरू के पद पर दोबारा प्रतिष्ठित करने का सपना कभी पूरा नहीं हो पाएगा। आज 119 विश्वविद्यालय व 37,000 कॉलेजों का देश होने के बावजूद भारत शिक्षा के क्षेत्र में विश्व मानचित्र पर कहीं नहीं दिख रहा है। हम विश्व में तृतीय व चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों के प्रमुख आपूर्तिकर्ता के तौर पर पहचाने जा रहे हैं। ना हमें कोई नोबेल के लिये नामांकित करवा पा रहा है और ना ही अपने अनुसंधानों के दम पर हम विश्व को चमत्कृत कर पा रहे हैं। हम तो इसी से संतोष कर लेते हैं कि आमर्त्य सेन सरीखे किसी भारतीय मूल वाले को नोबेल मिल गया अथवा गॉड पार्टिकल का नामकरण हमारे सीबी रमण के नाम पर हो गया। लेकिन इससे बात बनती नहीं, बिगड़ती ही जा रही है। जिसे सुधारने के अलावा दूसरा कोई विकल्प ही नहीं है। चाहे इस क्षेत्र को तत्काल प्राथमिकता मिले या भविष्य में, मिलनी तो है ही। बस चिंता इस बात की है कि इसमें जितनी देरी होगी उसकी भरपायी भी उतनी ही मुश्किल होती चली जाएगी।    

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