अराजकता की आजादी
लोकतांत्रिक व्यवस्था में हर किसी को आजादी है अपनी बात रखने की। यह आजादी होनी भी चाहिये वर्ना इसके बिना तो लोकतंत्र की कल्पना भी नहीं की जा सकती। लेकिन इसका यह मतलब भी नहीं है कि अपनी बात रखने के लिये ऐसे तौर-तरीकों को अमल में लाया जाये जो व्यवस्था के लिये सिरदर्दी का सबब बन जाये। अलबत्ता स्थापित व्यवस्था पर हमला करने के क्रम में भी अपेक्षित यही है कि इसमें लोकतांत्रिक भावनाओं, मूल्यों व परंपराओं को पूरी अहमियत दी जाये। ऐसा कुछ भी नहीं किया जाये जिससे लोकतांत्रिक मूल्यों को आघात पहुंचे या व्यवस्था के लिये उसे संभावना मुश्किल हो जाये। अगर ऐसी कोई नौबत आती है तो उसे अभिव्यक्ति की आजादी के बजाय अराजकता का नाम ही दिया जाएगा और लोकतंत्र में अराजकता के लिये तो कोई स्थान हो ही नहीं सकता। लिहाजा अभिव्यक्ति की आजादी और अराजकता के बीच की लक्ष्मण रेखा को तो हम सबों को पहचानना ही होगा। गौर से देखें तो इन दिनों यह लक्ष्मण रेखा लगातार कमजोर ही नहीं पड़ रही है बल्कि कई मामलों में तो विलुप्त भी हो जा रही है। उसका इस कदर अतिक्रमण हो जाता है जिसमें यह विभेद करना भी मुश्किल हो जाता है कि इसे अराजकता कहें या अभिव्यक्ति की आजादी। यह स्थिति बहुचर्चित जेएनयू विवाद के मामले में भी दिखी और गुजरात के पाटीदार आंदोलन में भी। यहां तक कि हरियाणा में जाटों के लिये आरक्षण की मांग को लेकर हुए हिंसक आंदोलन के मामले को भी अराजकता की स्थिति उत्पन्न करने के प्रयास का नाम देना ही उचित होगा। कमोबेश यही स्थिति अब दिल्ली में डीजल से चलनेवाली टैक्सियों पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा लगायी गयी रोक के मामले में भी दिख रही है। माना कि अदालत के इस फैसले से सूबे के तकरीबन एक तिहाई टैक्सी चालकों यानि 22 हजार उन परिवारों के सामने रोजी-रोटी का संकट उत्पन्न हो गया है जो डीजल से चलनेवाली टैक्सी पर आधारित व आश्रित हैं। लेकिन इसका यह कतई मतलब नहीं है कि अगर अदालत से उन्हें राहत नहीं मिल पायी है तो वे सड़क पर उतर कर लोगों का जीना दूभर करें। हरियाणा व उत्तर प्रदेश को दिल्ली से जोड़नेवाले राजमार्गों पर चक्का जाम करें। वाहनों की आवाजाही ठप कर दें। यह अख्तियार तो उन्हें कतई हासिल नहीं है और इस तरह की हरकतों को तो अराजकता की स्थिति उत्पन्न करने की कोशिश का ही नाम दिया जाएगा। इसे अभिव्यक्ति की आजादी तो कतई नहीं कह सकते। कहें भी कैसे? हालत यह है कि दिल्ली इन दिनों विश्व की सबसे प्रदूषित राजधानी घोषित होने की स्थिति में आती जा रही है। यहां की जहरीली होती आबोहवा को सुधारने के लिये सरकार भी प्रयत्नशील है, एनजीटी प्राधिकरण भी अदालत भी। इसके लिये तमाम उपाय किये जा रहे हैं। चाहे आॅड इवन का फार्मूला लागू करना हो या डीजल से चलनेवाली गाडि़यों का पंजीकरण प्रतिबंधित करना हो। हर मुमकिन कदम उठाये जा रहे हैं ताकि लोगों को खुलकर सांस लेने लायक वातावरण उपलब्ध कराया जा सके। इस दिशा में समाज भी प्रयत्नशील है और स्कूली बच्चे भी जन जागरूकता फैलाने के अभियान में जुटे हुए हैं। लेकिन अफसोस इस बात का है कि वातावरण व माहौल में सुधार के पक्षधर तो सभी हैं लेकिन इसके प्रति अपनी जिम्मेवारी समझना बहुतों को गवारा नहीं है। माननीय सांसदों की मांग है कि उन्हें आॅड इवन से अलग रखा जाये तो वकीलों को भी इस योजना का अनुपालन करना रास नहीं आ रहा। कोई बड़ी बात नहीं कि भविष्य में चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े लोग भी इससे छूट की मांग करेंगे और शिक्षण क्षेत्र से जुड़े लोग भी। फिर विद्यार्थी और पुलिस विभाग के लोग ही क्यों इसका अनुपालन करे। सबकी अपनी दलीलें हैं कि अगर वे नियत समय पर नियत जगह नहीं पहुंचे तो अनर्थ हो सकता है। लेकिन मसला छूट के लिये दी जानेवाली दलीलों का नहीं है। सवाल है समाज की सोच का। वह सोच जो व्यवस्था को सुधारने के लिये कुछ होते हुए तो देखना चाहती है लेकिन खुद कुछ करना नहीं चाहती। खुद पर जरा सा बोझ पड़े, थोड़ी सी परेशानी पेश आए तो ऐसी सोच के लोग बिलबिला उठते हैं। लेकिन कहते हैं कि जो खुद की मदद नहीं करता उसकी मदद भगवान भी नहीं कर सकते, फिर सरकार, प्रशासन या अदालत की तो बिसात ही क्या है। यह तो चलती ही व्यवस्था से है जिस पर अपनी बात मनवाने के लिये प्रहार करते हुए लोग यह भी भूल जा रहे हैं कि कहां उन्होंने अभिव्यक्ति की आजादी का अतिक्रमण करते हुए अराजकता की ओर कदम बढ़ा दिया है। जाहिर है कि इस सोच को तो बदलना ही होगा। व्यवस्था को सुधारने के लिये पहले खुद सुधरना होगा।
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