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गुरुवार, 5 मई 2016

अराजकता की आजादी

अराजकता की आजादी


लोकतांत्रिक व्यवस्था में हर किसी को आजादी है अपनी बात रखने की। यह आजादी होनी भी चाहिये वर्ना इसके बिना तो लोकतंत्र की कल्पना भी नहीं की जा सकती। लेकिन इसका यह मतलब भी नहीं है कि अपनी बात रखने के लिये ऐसे तौर-तरीकों को अमल में लाया जाये जो व्यवस्था के लिये सिरदर्दी का सबब बन जाये। अलबत्ता स्थापित व्यवस्था पर हमला करने के क्रम में भी अपेक्षित यही है कि इसमें लोकतांत्रिक भावनाओं, मूल्यों व परंपराओं को पूरी अहमियत दी जाये। ऐसा कुछ भी नहीं किया जाये जिससे लोकतांत्रिक मूल्यों को आघात पहुंचे या व्यवस्था के लिये उसे संभावना मुश्किल हो जाये। अगर ऐसी कोई नौबत आती है तो उसे अभिव्यक्ति की आजादी के बजाय अराजकता का नाम ही दिया जाएगा और लोकतंत्र में अराजकता के लिये तो कोई स्थान हो ही नहीं सकता। लिहाजा अभिव्यक्ति की आजादी और अराजकता के बीच की लक्ष्मण रेखा को तो हम सबों को पहचानना ही होगा। गौर से देखें तो इन दिनों यह लक्ष्मण रेखा लगातार कमजोर ही नहीं पड़ रही है बल्कि कई मामलों में तो विलुप्त भी हो जा रही है। उसका इस कदर अतिक्रमण हो जाता है जिसमें यह विभेद करना भी मुश्किल हो जाता है कि इसे अराजकता कहें या अभिव्यक्ति की आजादी। यह स्थिति बहुचर्चित जेएनयू विवाद के मामले में भी दिखी और गुजरात के पाटीदार आंदोलन में भी। यहां तक कि हरियाणा में जाटों के लिये आरक्षण की मांग को लेकर हुए हिंसक आंदोलन के मामले को भी अराजकता की स्थिति उत्पन्न करने के प्रयास का नाम देना ही उचित होगा। कमोबेश यही स्थिति अब दिल्ली में डीजल से चलनेवाली टैक्सियों पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा लगायी गयी रोक के मामले में भी दिख रही है। माना कि अदालत के इस फैसले से सूबे के तकरीबन एक तिहाई टैक्सी चालकों यानि 22 हजार उन परिवारों के सामने रोजी-रोटी का संकट उत्पन्न हो गया है जो डीजल से चलनेवाली टैक्सी पर आधारित व आश्रित हैं। लेकिन इसका यह कतई मतलब नहीं है कि अगर अदालत से उन्हें राहत नहीं मिल पायी है तो वे सड़क पर उतर कर लोगों का जीना दूभर करें। हरियाणा व उत्तर प्रदेश को दिल्ली से जोड़नेवाले राजमार्गों पर चक्का जाम करें। वाहनों की आवाजाही ठप कर दें। यह अख्तियार तो उन्हें कतई हासिल नहीं है और इस तरह की हरकतों को तो अराजकता की स्थिति उत्पन्न करने की कोशिश का ही नाम दिया जाएगा। इसे अभिव्यक्ति की आजादी तो कतई नहीं कह सकते। कहें भी कैसे? हालत यह है कि दिल्ली इन दिनों विश्व की सबसे प्रदूषित राजधानी घोषित होने की स्थिति में आती जा रही है। यहां की जहरीली होती आबोहवा को सुधारने के लिये सरकार भी प्रयत्नशील है, एनजीटी प्राधिकरण भी अदालत भी। इसके लिये तमाम उपाय किये जा रहे हैं। चाहे आॅड इवन का फार्मूला लागू करना हो या डीजल से चलनेवाली गाडि़यों का पंजीकरण प्रतिबंधित करना हो। हर मुमकिन कदम उठाये जा रहे हैं ताकि लोगों को खुलकर सांस लेने लायक वातावरण उपलब्ध कराया जा सके। इस दिशा में समाज भी प्रयत्नशील है और स्कूली बच्चे भी जन जागरूकता फैलाने के अभियान में जुटे हुए हैं। लेकिन अफसोस इस बात का है कि वातावरण व माहौल में सुधार के पक्षधर तो सभी हैं लेकिन इसके प्रति अपनी जिम्मेवारी समझना बहुतों को गवारा नहीं है। माननीय सांसदों की मांग है कि उन्हें आॅड इवन से अलग रखा जाये तो वकीलों को भी इस योजना का अनुपालन करना रास नहीं आ रहा। कोई बड़ी बात नहीं कि भविष्य में चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े लोग भी इससे छूट की मांग करेंगे और शिक्षण क्षेत्र से जुड़े लोग भी। फिर विद्यार्थी और पुलिस विभाग के लोग ही क्यों इसका अनुपालन करे। सबकी अपनी दलीलें हैं कि अगर वे नियत समय पर नियत जगह नहीं पहुंचे तो अनर्थ हो सकता है। लेकिन मसला छूट के लिये दी जानेवाली दलीलों का नहीं है। सवाल है समाज की सोच का। वह सोच जो व्यवस्था को सुधारने के लिये कुछ होते हुए तो देखना चाहती है लेकिन खुद कुछ करना नहीं चाहती। खुद पर जरा सा बोझ पड़े, थोड़ी सी परेशानी पेश आए तो ऐसी सोच के लोग बिलबिला उठते हैं। लेकिन कहते हैं कि जो खुद की मदद नहीं करता उसकी मदद भगवान भी नहीं कर सकते, फिर सरकार, प्रशासन या अदालत की तो बिसात ही क्या है। यह तो चलती ही व्यवस्था से है जिस पर अपनी बात मनवाने के लिये प्रहार करते हुए लोग यह भी भूल जा रहे हैं कि कहां उन्होंने अभिव्यक्ति की आजादी का अतिक्रमण करते हुए अराजकता की ओर कदम बढ़ा दिया है। जाहिर है कि इस सोच को तो बदलना ही होगा। व्यवस्था को सुधारने के लिये पहले खुद सुधरना होगा। 

शुक्रवार, 29 अप्रैल 2016

बदलाव के उजाले में सियासी अंधेरा

बदलाव के उजाले में सियासी अंधेरा


दमघोंटू प्रदूषण की बढ़ती रफ्तार पर लगाम कसने और वाहनों की बेतहाशा रेलमपेल के कारण हांफती, कराहती व कदम-कदम पर अटकती-चटखती सड़कों को सुगम व सुरक्षित बनाने के मकसद से दिल्ली में शुरू की गयी सम-विषम योजना की गुणवत्ता व लोकप्रियता तो निश्चित ही सवालों से परे है। इस योजना को सही तरीके से लागू करके इसका अधिकतम लाभ हासिल करने में भले ही लाख दुश्वारियां सामने आ रही हों लेकिन इसकी उपयोगिता के बारे में किसी को रत्ती भर भी संदेह नहीं है। तभी तो इस साल के पहले पखवाड़े में पहली दफा लागू की गयी इस योजना को दोबारा शुरू करने से पहले जब लोगों से रायशुमारी की गयी तो 80 फीसदी से भी अधिक लोगों ने इसके प्रति सकारात्मक विचार ही दिये। यहां तक कि दिल्ली सरकार के तमाम राजनीतिक विरोधियों ने भी उसकी इस पहल को सराहनीय व अनुकरणीय बताने से परहेज नहीं बरता। लेकिन इस मामले को लेकर अब जिस तरह की राजनीति शुरू हुई है और इस योजना की आड़ लेकर दिल्ली सरकार ने जिस तरह का राजनीति कारोबार शुरू कर दिया है उसे देखकर स्वाभाविक तौर पर लोगों को दुख भी हो रहा है और इसके भविष्य को लेकर चिंता भी हो रही है। माना कि दिल्ली सरकार ने आम लोगों को राहत देने के लिये ही इस योजना को शुरू किया है और विरोधियों ने भी इसकी जनप्रियता का सम्मान करते हुए इसके औचित्य पर उंगली उठाने की पहल नहीं की है लेकिन इसका कतई यह मतलब नहीं है कि इस मसले को राजनीति का ऐसा मुद्दा बना दिया जाये जो विवादों की नयी गाथा का आधार बन जाये। वास्तव में देखा जाये तो इस योजना को विवादों के दायरे में लाने के लिये दिल्ली सरकार के विरोधी जितने दोषी हैं उससे जरा भी कम आम आदमी पार्टी की नीतियां नहीं हैं। अगर वास्तव में सरकार ने पूरी इमानदारी व सहज भाव से दिल्ली व दिल्लीवालों की समस्या सुलझाने की नीयत से इस योजना को संचालित किया होता तो इस मामले को लेकर कोई विवाद पैदा होने का सवाल ही नहीं था। लेकिन औपचारिक तौर पर भले ही दिल्ली में सत्तारूढ़ आप सरकार के शीर्ष रणनीतिकार इस हकीकत को स्वीकार ना करें लेकिन सच यही है इस योजना को ऐसी दुधारू गाय बनाने की कोशिश की गयी है जो राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी को जनसमर्थन व व्यापक स्वीकार्यता का दूध भी दे और अन्य राजनीतिक दलों को तबियत से लथाड़ मारकर लहुलुहान व परेशान भी करे। वर्ना कोई वजह ही नहीं थी कि कल तक इस मसले पर दिल्ली सरकार को जमकर साधुवाद देनेवाली तमाम राजनीतिक पार्टियां इस मसले पर ही दिल्ली सरकार को जमकर कोसने की पहल करतीं। ऐसा हुआ ही इसलिये है कि क्योंकि समूचे देश में अपनी वाहवाही लूटने व राष्ट्रीय स्तर पर मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का चेहरा चमकाने के लिये दिल्ली के आम लोगों की गाढ़ी कमाई का सैकड़ों करोड़ रूपया विज्ञापन के तौर पर पानी में बहा दिया गया है जिससे दिल्ली या दिल्लीवासियों को कुछ भी लाभ नहीं मिलनेवाला है। अलबत्ता बकौल मधेपुरा सांसद पप्पू यादव, अगर इस रकम का आधा हिस्सा भी दिल्ली में प्रदूषण के नियंत्रण की योजनाओं पर खर्च किया जाता तो लोगों को इसका काफी अधिक लाभ मिल सकता था। यही पैसा अगर सायकिल के प्रयोग को प्रोत्साहित करने, सौर व वैकल्पिक ऊर्जा के क्षेत्र को सुदृढ़ करने, कचरा प्रबंधन की क्षमता में वृद्धि करने या गाद-गंदगी से अटे-पटे नदी, नाले, सीवर व सड़क को साफ-सुथरा करने सरीखे कार्यों में खर्च किया जाता तो निश्चित ही किसी को सम-विषम योजना की खामियां गिनाने का मौका नहीं मिल पाता। लेकिन पैसा खर्च हो रहा है राष्ट्रीय स्तर पर विज्ञापन के माध्यम से चेहरा चमकाने में। इसमें भी अगर दिल्ली सरकार की इस दलील को सही मानें कि लोगों को योजना की जानकारी देने के लिये ऐसा करना आवश्यक है तो कायदे से दिल्ली से प्रकाशित होनेवाले अखबारों व एफएम रेडियो सरीखे जन-जन से जुड़े सूचना व संचार के माध्यमों को ही विज्ञापन दिया जाना चाहिये था। अन्य प्रदेशों में विज्ञापन के माध्यम से इसकी आड़ में अपना चेहरा चमकाने का क्या मतलब है। एक पखवाड़े की इस प्रायोगिक योजना के बहाने समूची दिल्ली को होर्डिंग से पाट देने, समूची दिल्ली को केजरीवालमय कर देने, विज्ञापन के माध्यम से दिल्ली को जागरूक करने के मामले में दिल्ली से प्रकाशित होनेवाले जमीनी अखबारों को इस योजना का सबसे मजबूत हिस्सा बनाने में ज्यादा रूचि नहीं लेने, कम खर्च में बेहतर जनसंपर्क के विभिन्न माध्यमों का इस्तेमाल करने से परहेज बरतने व राष्ट्रीय स्तर पर जमकर शोशेबाजी करने सरीखी पहलकदमियां तो यही इशारा कर रही हैं कि बदलाव व बेहतरी का उजाला लेकर आयी इस नीति को लागू करने में नीयत को साफ-शफ्फाक रखने में कुछ कसर तो रह ही रही है।   

शनिवार, 16 अप्रैल 2016

आम आदमी पार्टी का मास्टर स्ट्रोक....

बदहाल व्यवस्था में सुधार की उम्मीद 


आजादी के बाद से अब तक दिल्ली में सरकारी अस्पतालों का जो ढ़ांचा खड़ा हुआ है उसमें सिर्फ दस हजार बेड का ही इंतजाम हो पाया है। ऐसे में दिल्ली व आसपास की तकरीबन दो करोड़ की आबादी पर अस्पतालों में मात्र दस हजार बेड की उपलब्धता के आंकड़े से ही समझा जा सकता है कि स्थिति किस कदर भयावह ही नहीं बल्कि बेकाबू हो चुकी है। हालांकि सरकारी अस्पतालों में सभी के लिये मुफ्त दवाईयों का इंतजाम करके दिल्ली की सरकार ने एक भरोसा तो जगाया है कि जनसरोकार के प्रति उसकी प्रतिबद्धता पर उंगली नहीं उठायी जा सकती। लेकिन मसला है कि स्थिति में सुधार कैसे आये। लोगों को स्वास्थ्य सुविधाओं का अधिकतम लाभ देने के लिये अगले साल के आखिर तक अस्पतालों की क्षमता को दो गुना करते हुए दस हजार बेड और बढ़ाने का लक्ष्य तो निर्धारित कर लिया गया है। लेकिन क्या इतना ही काफी है। कतई नहीं। खास तौर से जिस सूबे की आबादी दो करोड़ के आंकड़े को पार करने जा रही हो वहां के लिये कुछ ऐसे वैकल्पिक इंतजाम तो करने ही होंगे ताकि बड़े अस्पतालों का बोझ कम हो और लोगों को घर के नजदीक ही स्वास्थ्य सुविधा का लाभ उपलब्ध हो सके। इस दिशा में इस साल के अंत तक दिल्ली में एक हजार मोहल्ला क्लीनिक और 150 पाॅलीक्लीनिक खोलने का जो लक्ष्य तय किया है वह वाकई बेहद क्रांतिकारी फैसला है। इस तरह से इस साल के अंत तक दिल्ली के सभी विधानसभा क्षेत्रों में कम से कम 15 ऐसे स्वास्थ्य केन्द्र खुल जाएंगे जहां ना सिर्फ रोजाना डाॅक्टर अपनी सेवाएं देंगे बल्कि वहां मुफ्त दवाओं का भी इंतजाम होगा। इसके अलावा हर विधानसभा क्षेत्र में 2-3 पाॅलीक्लीनिक खोलने की जो योजना बनायी गयी है उसके तहत हर पाॅलीक्लीनिक में 7-8 स्पेस्लिस्ट डाॅक्टर रोज अपनी सेवाएं देंगे और यहां भर्ती करने के लिये बेड को छोड़कर बड़े अस्पतालों सरीखे बाकी तमाम इंतजाम उपलब्ध होंगे। जाहिर है कि इस योजना के साकार हो जाने के बाद दिल्ली की स्वास्थ्य व्यवस्था में वाकई काफी सुधार देखने को मिलेगा। जहां एक ओर लोगों को अपने घर के आसपास ही प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाएं मिल जाएंगी वहीं बड़े अस्पतालों का बोझ भी कम होगा और छोटी-मोटी बीमारियों का इलाज कराने के लिये लोगों को अस्पतालों के चक्कर भी नहीं लगाने पड़ेंगे। पिछले साल से अब तक तकरीबन जिन सौ मोहल्ला क्लिनिकों का परिचालन आरंभ हो चुका है वहां अब तक का अनुभव यही बताता है कि लोगों की 90 फीसदी स्वास्थ्य समस्याएं यहीं ठीक हो जा रही हैं। इन मोहल्ला क्लीनिकों की सफलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है इसका डंका अब अमेरिका में भी बज रहा है और वहां भी लोगों को आसान स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराने के लिए केजरीवाल सरकार की मोहल्ला क्लीनिक योजना से सबक लेने के सुझाव दिए जा रहे हैं। पिछले सप्ताह भी एक बड़े अमेरिकी मीडिया हाउस द वाशिंगटन पोस्ट में इस बाबत एक लेख प्रकाशित हुआ है जिसमें दिल्ली में शुरू की गई मोहल्ला क्लीनिक योजना की जमकर तारीफ की गई है। साथ ही इस लेख में अमेरिकी प्रशासन को सलाह दी गई है कि वह भी अपनी स्वास्थ्य व्यवस्था को सुधारने के लिए मोहल्ला क्लीनिक योजना को लागू करने का इंतजाम करे। जाहिर है कि अगर अमेरिका सरीखे विकसित व साधन संपन्न देश की मीडिया भी वहां के लिये इस योजना को अमल में लाये जाने की वकालत कर रहा है तो निश्चित तौर पर यह एहसास ना सिर्फ दिल्ली सरकार बल्कि आम दिल्लीवासियों के लिये भी बेहद सुखद है। लेकिन इस सब के बीच इस बात को नहीं भुलाया जा सकता है कि मोहल्ला क्लिनिक की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए इनमें जरूरत के अनुरूप स्टाफ और बुनियादी चिकित्सीय सुविधाएं देने में कतई कोताही नहीं बरती जानी चाहिये। खास तौर से बंद पड़े गोदामों में बिना समुचित व्यवस्था व परिचारक के ही आनन फानन में मोहल्ला क्लीनिक शुरू कर देने की जो परिपाटी शुरू की जा रही है वह कतई उचित नहीं है। जब लोगों ने इतने दिनों तक समस्याएं झेली हैं तो वे कुछ दिन और भी सब्र कर सकते हैं। लेकिन इंतजाम ऐसे हों कि जब किसी मोहल्ला क्लीनिक का लोकार्पण किया जाये तो वहां आवश्यक सुविधाएं अवश्य मौजूद हों और वहां काम करनेवालों और इलाज कराने के लिये आनेवालों को किसी समस्या का सामना ना करना पड़े। ऐसा हो जाए तो यह दिल्ली की बीमार जनता के लिए आम आदमी पार्टी का मास्टर स्ट्रोक साबित होगा। 

गुरुवार, 14 अप्रैल 2016

दिल्ली में दोबारा.... सम-विषम पखवाड़ा

सम-विषम के बढ़ते कदम

दिल्ली सरकार ने प्रदूषण की मार और यातायात व्यवस्था में सुधार के लिये सम-विषम के जिस फार्मूले को आजमाया है वह वाकई हर मामले में सम ही है। हालांकि इस योजना के प्रथम चरण में विषमता के कुछ मामले अवश्य सामने आये। मसलन प्रदूषण के स्तर में अपेक्षित गिरावट नहीं आ पायी, सीएनजी स्टीकर के वितरण में धांधली देखी गयी और पर्यावरण सेवा के तहत निजी व स्कूल की गाडि़यों को सरकारी खर्चे पर सड़क पर उतारना आमदनी के लिहाज से काफी महंगा सौदा साबित हुआ। लेकिन गहराई से गौर करें तो ये तमाम कमियां व खामियां इस योजना को लागू करने में रह गयी कमी का ही नतीजा थीं। वर्ना सफलता के पैमाने पर परखा जाये तो समूची दिल्ली ने इसे तहेदिल से सराहा और जब इसका दूसरा चरण शुरू करने से पहले चार लाख लोगों से वेबसाइट, ई-मेल, फोन और मोहल्ला सभा की बैठकों के माध्यम से रायशुमारी करायी गयी तो 80 फीसदी दिल्लीवासियों ने इसके समर्थन में ही अपनी राय जाहिर की। यानि सियासत के लिये आवश्यक जनसमर्थन की ताकत के नजरिये से तो इसे अभूतपूर्व सफलता मिली ही। साथ ही वाहनों के बोझ से कराह रही सड़कों को भी सांस लेने का मौका मिला और लोगों को जाम के जानलेवा झाम से राहत मिली। इसके अलावा प्रदूषण फैलाने में वाहनों का योगदान भी कम तो हुआ ही। यानि एक योजना का फायदा तिगुना। तभी तो अब दोबारा इसे अगले पंद्रह दिनों के लिये लागू करने का फैसला किया गया है और जनसरोकार के प्रति दिल्ली सरकार की कटिबद्धता को देखते हुए उम्मीद की जा रही है कि जल्दी की इस योजना को स्थायी तौर पर भी लागू कर दिया जाएगा। हालांकि इस बार भी प्रायोगिक तौर पर ही सम-विषम योजना को लागू किया जा रहा है और इसे सफल बनाने के हरसंभव प्रयास किये जा रहे हैं। मसलन दिल्ली-एनसीआर को जोड़नेवाली 17 रूटों पर स्पेशल बसें चलाई जाएंगी। सुचारू यातायात सुनिश्चित करने के लिये 400 पूर्व सैनिकों की तैनाती की जाएगी। साथ ही पिछली बार की तुलना में एक हजार ज्यादा यानी 5 हजार वॉलंटियर लगाए जाएंगे। पर्यावरण बस सेवा इस बार भी जारी रहेगी जिनमें मार्शल तैनात होंगे और आधी सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित रहेंगी। मेट्रो फीडर बस सेवा के रूट में भी जरूरत के मुताबिक बदलाव किया जाएगा और मेट्रो के फेरे भी बढ़ाए जाएंगे। इसके अलावा वायु गुणवत्ता पर बारीक नजर रखने के लिये 119 जगहों पर प्रदूषण के स्तर का लगातार मुआयना किया जाएगा। यानि योजना के पहले चरण से सबक लेते हुए इस दफा भी इसे सफल बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही है। लिहाजा पिछले अनुभव को देखते हुए इस लोकप्रिय योजना की सफलता पर शायद ही किसी को संदेह हो। तभी तो प्रादेशिक स्तर पर विरोधी पार्टियां इसकी कितनी ही खामियां क्यों ना गिना रही हों लेकिन इसकी लोकप्रियता व सफलता ने केन्द्र को भी अचंभित व चमत्कृत कर दिया है। यही वजह है कि अब केन्द्र सरकार देश भर में इस योजना का विस्तार करने पर गंभीरता से विचार कर रही है। जाम व प्रदूषण की दोहरी मार से कराह रहे मुम्बई, पुणे व कोलकाता सरीखे महानगरों को ही नहीं बल्कि उन तमाम शहरों को इस योजना से जोड़ने की योजना बनायी जा रही है जहां वाहनोें की तादाद 20 लाख से अधिक हो और रोजाना औसतन कम से कम 300 गाडि़यां पंजीकृत होती हों। यानि अब देश के तकरीबन सभी सूबों को इसके दायरे में लाया जाएगा और तमाम उन शहरों में इसका विस्तार किया जाएगा जहां जाम की समस्या बेहद आम है। इस योजना को देश भर में लागू करके राष्ट्रीय स्तर पर इसका सियासी श्रेय लूटने के लिये केन्द्र सरकार इस कदर लालायित है कि राज्यसभा में अपने कमजोर संख्याबल की समस्या को देखते हुए वह इससे संबंधित विधेयक को मनीबिल के तौर पर लोकसभा में पेश करने का मन बना रही है ताकि राज्यसभा की मंजूरी हासिल करने का झमेला ही ना रहे। हालांकि अब यह देखना दिलचस्प होगा कि 25 अप्रैल से आरंभ हो रहे संसद सत्र में ही इसे पारित कराने के प्रति कटिबद्ध दिख रही केन्द्र सरकार किस त्वरित गति से इसे देशभर में लागू करने में कामयाब होती है। बहरहाल इतना तो तय है कि देश भर में इसका विस्तार करके सियासी श्रेय लूटने में केन्द्र सरकार भले ही कामयाब हो जाये लेकिन इतिहास के पन्नों में इसका व्यावहारिक श्रेय तो दिल्ली की केजरीवाल सरकार के हिस्से में ही दर्ज होगा।