इस बात में कोई दो राय नहीं हो सकती कि केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार ने अपने कार्यकाल में ना सिर्फ कई मामलों में विकास का कीर्तिमान स्थापित किया है बल्कि प्रभावशाली व कड़े फैसले भी लिये हैं जिससे ना सिर्फ घरेलू अर्थव्यवस्था की बल्कि विश्व स्तर पर देश की छवि में भी काफी निखार आया है। हालांकि मोदी सरकार के कड़े फैसलों का आम लोगों को कितना लाभ मिला है और इसके एवज में कितना बोझ सहन करते हुए नुकसान उठाना पड़ा है इस पर अलग से बहस हो सकती है। लेकिन इस बात में कोई दो राय नहीं है कि मोदी सरकार ने अपने पूर्ववर्तियों की तुलना में काफी हद तक संतुलित, बहुआयामी, विस्तृत और तेज गति व पारदर्शिता के साथ काम किया है। लेकिन इस बात को भी नकारा नहीं जा सकता है कि सरकार ने जितना काम किया है उससे कहीं अधिक काम को गिनाने में अपनी ऊर्जा खर्च की है। जितने काम की गिनती गिनाई जा रही है उतना जमीन पर बदलाव नहीं दिख रहा है। माना कि सरकार ने योजनाएं आरंभ की और उसे जमीनी स्तर पर पहुंचाने का प्रयास भी हुआ लेकिन इसे ऐसे गिनाना आम लोगों में चिढ़ का सबब बन रहा है मानो सरकार ने देश पर कोई बहुत बड़ा उपकार कर दिया हो और देशवासियों को उसका कृतज्ञ होना चाहिये। वास्तव में सरकार को चुना ही गया था देश हित में काम करने और देश का विकास करने के लिये। लिहाजा सरकार के संचालकों को तो आम लोगों का कृतज्ञ होना चाहिये कि उन्हें जनता ने काम करने का मौका दिया। साथ ही सरकार के संचालकों को इस बात के लिये अपने गिरेबान में भी झांकना चाहिये कि जिन अच्छे दिनों की उम्मीद बंधाई गई थी उसे वे कितना पूरा कर पाए और कितना नहीं कर पाए। सरकार बनाने से पहले सपने तो चांद-तारों के दिखाए गए थे लेकिन हकीकत में उन सपनों को पूरा कर पाना अब तक संभव नहीं हो पाया है। बात चाहे सबको अपना घर दिलाने की हो या सबको स्वास्थ्य बीमा का लाभ दिलाने की। गंगा को पूरी तरह अविरल व निर्मल करने की हो अथवा भ्रष्टाचारियों को सलाखों के पीछे पहुंचाने की। हर देशवासी को चैबीसों घंटे बिजली पाने का अधिकार दिलाने की बात हो, हर हाथ को काम या भूख से पूर्ण मुक्ति की। ये वो वायदे हैं जो मोदी सरकार के मौजूदा संचालकों ने स्पष्ट शब्दों में पिछले चुनाव के दौरान किये थे। लेकिन उपरोक्त में से एक भी वायदा अब तक पूरा नहीं किया जा सका है। आज भी ये बुनियादी जरूरतें आम लोगों के लिये सपना ही बनी हुई हैं। जमीनी धरातल पर सपनों को उतारने की मियाद 2022 की बताई जा रही है जबकि पूरा देश आजादी की 75वीं वर्षगांठ मनाएगा। लेकिन यह मियाद बताते समय सरकार के संचालक यह भूल जाते हैं कि जब उन्होंने इन सपनों को पूरा करने का वायदा करते हुए आम लोगों से वोट मांगे थे तब सरकार केवल 2019 तक के लिये ही चुनी जानी थी, 2022 तक के लिये नहीं। लिहाजा काम तो उन्हें कायदे से 2019 में ही पूरा करना चाहिये था। लेकिन मसला है कि सरकार और विपक्ष के बीच जारी बेमानी मसलों की खींचतान से फुर्सत मिले तो इन बातों पर किसी का ध्यान जाए। सरकार कतई नहीं चाहेगी कि लोगों को वे पुराने वायदे याद आएं और अगर किसी की जहन में उन सपनों के पूरा होने की उम्मीद बची भी हो तो वह 2022 के भरोसे शांत रहे। दूसरी ओर विपक्ष भी इन मसलों को तूल नहीं पकड़ने देना चाहेगा क्योंकि कल को अगर सत्ता की बागडोर उसके हाथों में आयी तो उसे इन सपनों को 2022 तक पूरा करना ही होगा। लेकिन इस सबके बीच आम लोगों के सपने और उम्मीदें हवा हो रहे हैं। इसी का नतीजा है कि बीते दिनों पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में भाजपा को जनता ने खारिज कर दिया। हालांकि बाकी मसलों पर तो कम से कम 2022 तक की उम्मीद बंधाई जा रही है लेकिन भ्रष्टाचार के जिन मामलों को आगे करके कांग्रेस को बदनाम व अलोकप्रिय किया गया उसके गुनहगारों को सत्ता में रहते हुए भी सजा नहीं दिला पाना निश्चित तौर पर यही बताता है कि इन मामलों को केवल राजनीतिक लाभ लेने के लिये ही तूल दिया गया था और अब एक बार फिर चुनाव करीब आता देख कर ऐसे मामलों को दोबारा उठाया गया था। वर्ना जिस काॅमनवेल्थ घोटाले को लेकर भाजपा ने आसमान सिर पर उठाया हुआ था उसके गुनहगारों की पहचान करना भी अब तक गवारा नहीं किया गया है। जिस राॅबर्ट वाड्रा को सरकार बनते ही सलाखों के पीछे डाले जाने की बात कही जा रही थी वह आज भी छुट्टा घूम रहा है। उसके खिलाफ ठोस कार्रवाई तो अब तक नहीं हुई अलबत्ता उस पर कीचड़ उछालने का सिलसिला बदस्तूर जारी है। यहां तक कि अगस्ता वेस्ट लैंड हेलीकाॅप्टर घोटाले में सीधे तौर पर कांग्रेस के शीर्ष संचालक परिवार को रिश्वतखोर बताया गया उसका सबसे बड़ा मास्टरमाइंड क्रिश्चन मिशेल को भारत लाने के बाद भी सिर्फ उसका नाम लेकर प्रधानमंत्री मोदी कांग्रेस को डराने और बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं। अगर वाकई मिशेल ने कोई सुराग दिया है तो अब तक पूछताछ भी क्यों नहीं हुई है गांधी परिवार के सदस्यों से? ये वो तमाम सवाल हैं जो आम लोगों के मन में उठ रहे हैं और उठने भी चाहिये। आखिर जिन उम्मीदों के पूरा होने की कल्पना करके लोगों ने भाजपा को सरकार बनाने का मौका दिया उस मसले पर तो मोदी सरकार के संचालकों से सीधा सवाल पूछा ही जा सकता है। क्योंकि ये सपने इन्हीं लोगों ने दिखाये थे। हालांकि सवाल तो उन सपनों पर भी पूछा जाना चाहिये जिसको पूरा करने का वायदा करते हुए भाजपा का गठन किया गया था लेकिन मौजूदा संचालकों को असहज करने वाले गौ-हत्या बंदी, राम मंदिर निर्माण, धारा-370 और समान नागरिक संहिता सरीखे मसलों को अगर छोड़ भी दें तो जो वायदे इन्हीं लोगों ने किये थे उन्हें भी तो अब तक पूरा नहीं किया गया है। इसके बावजूद अगर काम करने से अधिक गिनाने की रणनीति अपनाई जा रही है तो निश्चत ही यह वैसा ही आत्मघाती रहेगा जैसा वर्ष 2004 में भारत उदय और इंडिया शायनिंग जैसे लोगों को चिढ़ाने वाले नारों ने बैक-फायर किया था।
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बुधवार, 26 दिसंबर 2018
मंगलवार, 16 अगस्त 2016
जवाबदेही पर जोर.........
जवाबदेही पर जोर
लोकतांत्रिक व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही अपेक्षित तो रहती है लेकिन इन अपेक्षाओं के पूरा होने की अभी तक कोई राह नहीं निकली थी। खास तौर से जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही तो चुनावी राजनीति तक ही सीमित रहती आई है। हालांकि इस व्यवस्था को सुधारने के काफी प्रयास हुए और सूचना का अधिकार के तौर पर लोगों के हाथ में एक हथियार भी आया लेकिन इसका भी पूरा लाभ नहीं मिल सका और माननीयों की जवाबदेही पूरी तरह तय नहीं हो सकी। देश को आजाद हुए 70 साल होने को आए लेकिन अब तक का जो अनुभव है उसके मुताबिक सांसद बन जाने के बाद आम तौर पर कोई भी नेता अपने मतदाताओं के सामने अपने कामकाज का हिसाब प्रस्तुत करना गवारा नहीं करता है। जबकि जनप्रतिनिधि के तौर पर उसकी जवाबदेही है कि वह ना सिर्फ जिम्मेवारी के साथ अपने निर्वाचकों के हितों को सुनिश्चित करे और अपने निर्वाचन क्षेत्र के विकास को आगे बढ़ाए बल्कि अपने कामकाज के बारे में मतदाताओं को जानकारी भी दे और इसमें उनका सुझाव भी ले। लेकिन हकीकत तो यह है कि इन सांसदों से अपेक्षाएं भले कुछ भी हों लेकिन वे आम तौर पर सत्ता मिल जाने के बाद जनता से कट ही जाते हैं। कई दफा ऐसे भी मामले सामने आएं हैं जब लोगों को अपने जनप्रतिधियों के गुमशुदा होने का पोस्टर भी गलियों की दीवारों पर चस्पां करने के लिये मजबूर होना पड़ा है। हालांकि यह तो नहीं कहा जा सकता कि सांसद अपनी जिम्मेवारी नहीं निभाते है लेकिन इस बात से कतई इनकार नहीं किया जा सकता कि जो सांसद अपनी जिम्मेवारी निभाते भी हैं वह ज्यादातर मनमाने तरीके से ही निभाते हैं और उसमें भी दिखावा ही अधिक रहता है। मानो जिम्मेवारी निभाकर जनता पर कोई बहुत बड़ा एहसान कर रहे हों। वैसे भी जिस सामाजिक व्यवस्था व पंरपरा में किसी दूसरे व कथित ऐरे-गैरे को अपने कामकाज का हिसाब देना तौहीन माना जाता हो उस तौहीन को कोई क्यों स्वीकार करें? लेकिन अब वक्त बदला है, परिस्थितियां बदली हैं और निजाम बदला है। यह नया निजाम अपनी जवाबदेही को भी समझता है और दूसरों के लिए भी जवाबदेही तय करने से परहेज नहीं बरतता है। यही वजह है कि सत्ता संभालने की सालगिरह के मौके पर प्रधानमंत्री खुद अपनी सरकार के कामकाज का रिपोर्ट कार्ड जनता के सामने हर वर्ष प्रस्तुत कर रहे हैं। साथ ही परंपरा यह भी डाली गई है कि हर साल सरकार का हर विभाग अपने कामकाज का रिपोर्ट कार्ड सार्वजनिक तौर पर पेश करे और अगले साल के लिये निर्धारित अपने लक्ष्य से भी देश को अवगत कराए। यानि प्रधानमंत्री ने खुद को भी जनता के प्रति जवाबदेह बनाया है और अपने माननीय मंत्रियों को भी। ऐसे में अब अगर सांसदों से भी यही अपेक्षा की गई है तो इसे कैसे गलत कहा जा सकता है। बल्कि यह तो होना ही चाहिए था। खैर, देर आयद दुरुस्त आयद। प्रधानमंत्री ने पार्टी के सभी सांसदों को साफ शब्दों में यह बता दिया है कि उन्हें अपने कामकाज का हिसाब देना ही होगा। पिछले दो साल में सांसद के तौर पर उन्होंने क्या काम किया है और बाकी बचे कार्यकाल के लिये उन्होंने अपने लिये क्या लक्ष्य निर्धारित किया है इसका पूरा बही-खाता उन्हें प्रस्तुत करना होगा। चुंकि सांसदों से उनके कामकाज का हिसाब प्रधानमंत्री खुद लेने वाले हैं लिहाजा इसमें गड़बड़ियों व गलतबयानी की गुंजाइश काफी कम होने की संभावना है। वैसे भी प्रधानमंत्री का लगातार यह आग्रह रहा है कि सांसदों को अपने क्षेत्र में अधिक से अधिक वक्त बिताना चाहिए, स्थानीय लोगों के साथ संपर्क में रहना चाहिए और सोशल मीडिया के माध्यम से भी लोगों के लिए उपलब्ध रहना चाहिए। हालांकि उनके इस आग्रह को कितने सांसदों ने स्वीकार किया है यह तो सर्वविदित ही है। वैसे भी स्वेच्छा से जब अपेक्षाएं पूरी नहीं होती हैं तो इसके लिये कड़ाई करनी ही पड़ती है और उसी कड़ाई का मुजाहिरा हुआ है आज प्रधानमंत्री की बातों से। प्रधानमंत्री ने यह भी कहा है की सामाजिक एकता, अखंडता, सौहार्द व समरसता की भावना को जगाते हुए राष्ट्रवाद का प्रवाह जमीनी स्तर तक पहुंचाने के लिए आगामी 15 अगस्त से आरंभ हो रही तिरंगा यात्रा के प्रतिदिन की प्रगति की रिपोर्ट अगर सांसद स्वयं उन्हें सौपेंगे तो बेहतर रहेगा। यानि सांसदों के जमीनी जुड़ाव की मॉनीटरिंग अब प्रधानमंत्री खुद ही करने वाले हैं। जाहिर तौर पर जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही तय करने की दिशा में प्रधानमंत्री की ओर से की गयी यह शुरुआत बेहद ही सराहनीय है। इससे ना सिर्फ सांसदों में जागरुकता आएगी बल्कि आम लोगों का अपने जनप्रतिनिधियों के प्रति नजरिया भी बदलेगा जिससे निजाम व आवाम के दरमियान परस्पर तारतम्यता कायम होगी जिसका अंतिम परिणाम विकास, सुशासन व पारदर्शिता के तौर पर सामने आएगा।
शुक्रवार, 13 मई 2016
बेमानी गीत का सियासी संगीत
बेमानी गीत का सियासी संगीत
कहते हैं कि जब रोम जल रहा था तब नीरो बांसुरी बजा रहा था। ऐसी ही तस्वीर इन दिनों देश के सियासत की भी दिख रही है। कहां तो देश जल रहा है रक्षा खरीद में भ्रष्टाचार से, सूखे पर हो रहे सियासी कारोबार से, महंगाई के बाजार से और प्रकृति के अत्याचार से। लेकिन जिनके कांधों पर इन मसलों को सुलझाने की जिम्मेवारी है वे अलग ही राग आलाप रहे हैं। उनकी धुन भी अलग है और सरगम भी, जो आम लोगों की अपेक्षाओं व आवश्यकताओं से कहीं मेल ही नहीं खाती। यहां बहस हो रही है प्रधानमंत्री की शैक्षणिक योग्यता पर जिससे आम लोगों का कोई वास्ता ही नहीं है। लेकिन मुद्दा चाहिये ताकि प्रधानमंत्री को लपेटे में लिया जा सके, उनकी खिंचाई की जा सके और उन्हें नीचा दिखाया जा सके। इसके लिये कुछ नहीं तो यही सही। हालांकि यह बात इस विवाद को तूल देनेवाले भी मान रहे हैं कि प्रधानमंत्री बनने के लिये किसी खास शैक्षणिक योग्यता या अहर्ता की कोई बाध्यता नहीं है। ना तो संवैधानिक तौर पर और ना ही सामाजिक, राजनीतिक या पारंपरिक तौर पर। इसके बावजूद कभी कहा जाता है कि जिस नरेन्द्र मोदी ने कला संकाय में दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक की डिग्री ली वह गुजरात के नरेन्द्र दामोदरदास मोदी नहीं बल्कि राजस्थान का नरेन्द्र महावीर मोदी है। फिर जब प्रमाणपत्र के साथ प्रधानमंत्री की अंकतालिका भी भाजपा द्वारा सार्वजनिक कर दी जाती है तो उसे स्वीकार करने के बजाय एक नयी बहस छेड़ी जाती है कि भाजपा ने जो भले ही गुजरात विश्वविद्यालय स्पष्ट शब्दों में यह प्रमाणित कर रहा है कि भाजपा ने प्रधानमंत्री की जो राजनीतिशाष्त्र में मास्टरी का प्रमाणपत्र जारी किया है वह पूरी तरह वैध है। लेकिन गुजरात विश्वविद्यालय की बात पर ध्यान देना किसी को गवारा नहीं है। सब पिले हुए हैं दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रमाणपत्र को गलत बताने में, उसे झूठा व फर्जी साबित करने में। अब इसका इलाज तो यही हो सकता है कि दिल्ली विश्वविद्यालय ही अपने पुराने रिकार्ड खंगालकर यह प्रमाणित करे कि भाजपा ने प्रधानमंत्री का जो प्रमाणपत्र प्रस्तुत किया है वह असली है या नकली। इसके अलावा और कोई यह प्रमाणित भी नहीं कर सकता। किसी के अख्तियार में ही नहीं है। वर्ना अगर यकीन करें तो उस दौरान अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के दिल्ली प्रांत के अध्यक्ष रहे मौजूदा वित्तमंत्री अरूण जेटली भी यह बताने से नहीं हिचक रहे हैं कि नरेंद्र मोदी अहमदाबाद से दिल्ली आकर बीए की परीक्षा दिया करते थे। साथ ही उनके बयान की पुष्टि वह नरेश गौड़ भी कर रहे हैं जो विद्यार्थी परिषद के पूर्णकालिक सदस्य थे और परिषद के कार्यालय में रहा करते थे। उनकी दलील है कि मोदी जब भी परीक्षा देने दिल्ली आते थे तो उनके साथ विद्यार्थी परिषद के कार्यालय में ही ठहरते थे। यानि गवाह तो सामने हैं जो चीख-चीखकर यह दुहाई दे रहे हैं कि मोदी ने दिल्ली विश्वविद्यालय से ही बीए का इम्तिहान दिया था। लेकिन इन गवाहों पर भला विरोधी व विपक्षी पार्टियां क्यों यकीन करे। उन्हें तो ये सभी गवाह भाजपा के जरखरीद ही नजर आयेंगे क्योंकि जेटली तो आज भी पार्टी के शीर्ष रणनीतिकार बने हुए हैं और नरेश भी भाजपा के टिकट से चार दफा दिल्ली विधानसभा के सदस्य चुने जा चुके हैं। ऐसे में अब पूरी बहस का अंतिम व निर्णायक अंत तो तभी हो सकता है जब दिल्ली विश्वविद्यालय की ओर से इसके बारे में कोई ठोस स्पष्टीकरण आये और वह प्रामाणिक तौर पर मामले की हकीकत का खुलासा करे। लेकिन सवाल है कि 38 साल पुराना रिकार्ड खंगालना भी किसी मुसीबत से कम नहीं है। वह भी तब जबकि इस बीच रिकार्ड रूम में कई दफा अग्निकांड हो चुका हो और दीमकों, तिलचट्टों, चूहों व छिपकलियों की सैकड़ों-हजारों पीढि़यां वहां अपनी रिहाइश बना चुकी हों। ऐसे में उम्मीद तो कम ही है कि उस वक्त का पूरा डाटा यथावत संजोया हुआ मिल जायेगा, वह भी उतनी ही साफ-सुथरी व स्वच्छ हालत में, जैसे उन्हें रखा गया था। खैर, यह जिम्मेवारी तो दिल्ली विश्वविद्यालय की ही है और जिस गति से यह विवाद दिनोंदिन परवान चढ़ रहा है और भाजपा ने भी प्रमाणपत्र की स्वप्रमाणित प्रति सार्वजनिक कर दी है उसके बाद इसे सही या गलत बताने का दबाव तो दिल्ली विश्वविद्यालय पर बढ़ना लाजिमी ही है। लेकिन इस बेमानी व विशुद्ध सियासी मसले को तूल देकर जिस तरह से आम लोगों के दुख-सुख से जुड़े मसलों की अनदेखी की जा रही है उसे कैसे जायज ठहराया जा सकता है।
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