बुधवार, 20 अप्रैल 2016

पाकिस्तान का खुराफाती कूटनीतिक प्रपंच

चोरी और सीनाजोरी

पाकिस्तान ने भारत के साथ खुराफाती कूटनीतिक प्रपंच का जो खेल शुरू किया है उसकी जाल में अब वह खुद ही उलझता दिख रहा है। हकीकत यही है कि भारत की ओर से तो कभी कहा ही नहीं गया कि बातचीत का दरवाजा बंद करने की कोई जरूरत है। फिर पाकिस्तानी कूटनीतिज्ञों के दिमाग में समग्र वार्ता स्थगित होने की बात कहां से घुसी यह या तो वे जानें या उनका खुदा जाने। हालांकि इसे चोर की दाढ़ी में तिनके के तौर पर अवश्य देखा जा सकता है। दरअसल पठानकोट के मामले में अपनी स्पष्ट भूमिका को नकारते हुए इसे भारत की ही खुराफात बताने की पहल करने, पठानकोट मामले की जांच के लिये एनआईए को अपनी सरहद में दाखिल होने की इजाजत देने से आनाकानी करने, सीमा पर संघर्षविराम का उल्लंघन करते हुए नये सिरे से बेवजह गोलीबारी का सिलसिला शुरू करने और बलूचिस्तान व गुलाम कश्मीर के इलाकों में दावानल की शक्ल अख्तियार करती दिख रही अलगाववाद की आग में भारत को घसीटने के लिये एक कथित सामान्य नौसैनिक को राॅ का एजेंट बताकर दुनियां के समक्ष प्रस्तुत करने के बाद शायद पाकिस्तानी हुक्मरानों को यह लगा होगा कि उनकी इतनी बदमाशियों के बाद तो भारत की ओर से समग्र वार्ता पर अवश्य ही विराम लगा दिया जाएगा। वैसे भी भारत की यह स्पष्ट नीति रही है कि गोली और बोली एक साथ तो जारी नहीं रखी जा सकती। गोली की भाषा में बात करनी हो तो गोली से ही बात कर लो वर्ना बोली में बातचीत तभी संभव है जब गोलियों के शोर पर विराम लगाया जाए। जबकि पाकिस्तान की नीति रही है कि बोली का जवाब गोली से दो और जब गोली का जवाब गोला से मिलने लगे तो वार्ता की दुहाई देना शुरू कर दो। तभी तो इस बार भी जब उसे सरहद पर गोली के जवाब में गोले का सामना करना पड़ा तो उसकी पूरी कूटनीतिक फौज समग्र वार्ता के लिये हाय-तौबा मचाने में जुट गयी। नयी दिल्ली में उसने अपने उच्चायुक्त अब्दुल बासित को आगे कर दिया और उसकी संयुक्त राष्ट्र की स्थायी प्रतिनिधि मलीहा लोधी ने विश्व बिरादरी को बरगलाने के लिये अमेरिका में मोर्चा खोल दिया। दोनों का लोधी ने यह बेसुरा राग आलापा कि भारत के साथ पाकिस्तान के रिश्ते इसलिये नहीं सुधर रहे हैं क्योंकि नई दिल्ली से समग्र बातचीत के लिये पहलकदमी नहीं की जा रही है। दूसरी ओर बासित ने तो बातचीत का सिलसिला स्थगित हो जाने का एलान भी कर दिया। जाहिर है कि पाकिस्तानी रणनीतिकारों को यही लगा होगा कि इन हरकतों से भारतीय खेमा बौखला उठेगा और गुस्से में आकर कुछ अनाप-शनाप बातें या हरकतें अवश्य करेगा। लेकिन उनके अरमान धरे रह गये और इधर से सिर्फ बासित के बयान को ही आपसी संबंधों के लिये झटका बताकर चुप्पी साध ली गयी जबकि लोधी की जहरीली वाणी का प्रतिवाद करने के लिये एक शब्द खर्च करने की भी जहमत नहीं उठायी गयी। यानि नयी दिल्ली का इरादा बिल्कुल स्पष्ट है कि बेवजह की धमाचैकड़ी बहुत हो गयी, अब जो भी होगा वह ठोस होगा। इधर-उधर की बातों में वक्त जाया नहीं करने के नई दिल्ली के ठोस इरादे देखकर अब पाकिस्तान को पसीना आना लाजिमी ही है। तभी तो बड़बोले बासित के बयान को दरकिनार करते हुए उसे औपचारिक तौर पर बताना पड़ा है कि भारत के साथ बातचीत की प्रक्रिया कतई स्थगित नहीं हुई है बल्कि इसके लिये उचित वक्त व स्थान तय करने पर लगातार मंथन चल रहा है। यानि पठानकोट हमले के बाद सामने आये नाजुक हालातों में बातचीत की प्रक्रिया को लगे झटके को प्रचारित करके पाकिस्तान यह साबित करने में जुट गया है कि भारत की ओर बातचीत के लिये पहल ही नहीं हो रही है। जबकि भारत तो पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि बातचीत का तो कोई विकल्प ही नहीं है, यह तो होनी ही है। लेकिन पहले इसके लिये माहौल तो बने। खास तौर से पठानकोट के मामले में जब पाकिस्तान ने स्वीकार कर लिया है कि भारत पर हुए इस हमले में उसकी जमीन का इस्तेमाल हुआ है और उधर के लोगों ने ही इसे अंजाम दिया है तो फिर अब इसके अपराधियों पर ठोस कार्रवाई तो होनी ही चाहिये। वर्ना एक तरफ वह चीन के सहयोग से मसूद अजहर का संयुक्त राष्ट्र में बचाव करे, सरहद पर अशांति का माहौल बनाये और पठानकोट मामले की जांच के लिये एनआईएक को अपने यहां घुसने भी ना दे जबकि दूसरी तरफ बातचीत की प्रक्रिया स्थगित होने का ढि़ढ़ोरा पीटकर भारत को ही इसका जिम्मेवार ठहराये। यह तो वही बात हुई मानो उल्टा चोर कोतवाल को डांटे। 

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