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गुरुवार, 20 दिसंबर 2018

महबूबा की अटपटी बातें

जम्मू कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री पीडीपी अध्यक्षा महबूबा मुफ्ती ने पाकिस्तान के साथ बातचीत की शुरूआत के लिये लोकसभा चुनावों का नतीजा आने तक इंतजार करने की जो बात कही है वह ना सिर्फ अटपटी और गैर-जरूरी है बल्कि कहीं ना कहीं यह दर्शाता है कि अभी तक वे पाकिस्तान को लेकर भारत सरकार और हर खासो-आम भारतीय की सोच को समझ ही नहीं पाई हैं। हालांकि यह भी संभव है कि वे इस बात को समझना ही नहीं चाह रही हों कि पाकिस्तान के साथ भारत के रिश्तों का हमारे अंदरूनी चुनाव से कोई लेना-देना ही नहीं है। अगर पाकिस्तान कल की तारीख में भी मुंबई हमले के गुनहगारों को उनके किये की माकूल सजा दे तो परसों से ही रिश्तों में जारी संवादहीनता और तल्खी की बर्फ पिघलने लगेगी। लेकिन मसला है कि एक तरफ पाकिस्तान अपनी खुराफातें और बदमाशियां बदस्तूर जारी रखने पर आमादा है और दूसरी ओर यह भी चाह रहा है कि भारत उसके साथ बातचीत की प्रक्रिया भी शुरू कर दे और उसे आगे बढ़कर गले लगा ले। आखिर ऐसा कैसे संभव हो सकता है? देश में चुनाव कब होंगे और उसमें किसकी जीत या हार होगी और किसकी सरकार बनेगी यह तमाम बातें हमारी अंदरूनी राजनीति से जुड़ी है जिनका दोनों मुल्कों के रिश्तों से कोई तालमेल ही नहीं है। हालांकि इस बात से कोई इन्कार नहीं कर सकता कि भारत और पाकिस्तान के बीच शान्तिपूर्ण सम्बन्ध दोनों मुल्कों के लोगों के लिए फायदेमन्द हैं। इस मायने में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान का विचार वाकई काबिले तारीफ है। लेकिन जमीनी हकीकतें इससे बिलकुल विपरीत हैं। यहां तक कि इमरान की कथनी और करनी में कहीं कोई तालमेल दिखाई ही नहीं पड़ रहा है। मिसाल के तौर पर सत्ता संभालने के बाद इमरान सरकार ने मुंबई पर हमले के आतंकी हमले के मास्टरमाइंड हाफिज की अगुवाई वाली तमाम संस्थाओं को आतंकी संगठनों की सूची से बाहर कर दिया। इसमें फलह ए इन्सानियत और जमात उद दावा भी शामिल हैं जिन्हें लश्करे तैयबा के मुखौटे की तरह इस्तेमाल किया जाता है। मुंबई आतंकी हमलों के मास्टरमाइंड हाफिज सईद को संयुक्त राष्ट्र द्वारा वैश्विक आतंकी घोषित किया जा चुका है। उस पर 10 मिलियन डॉलर का इनाम है। लेकिन वह पाकिस्तान में खुला घूम रहा है। यही नहीं, हाफिज की पार्टी ‘मिल्ली मुस्लिम लीग’ को चुनाव लड़ने की अनुमति देकर उसे राजनीति की मुख्यधारा में लाने की कोशिश की जा रही है। इसकी मार्फत हाफिज पाकिस्तान में राजनीतिक ताकत बनने की कोशिश कर रहा है। एक तरफ तो इमरान कहते हैं कि आतंकवाद और कट्टरपन को बढ़ावा देने से पाकिस्तान का ही नुकसान हो रहा है लेकिन दूसरी तरफ सरकार बनने के 100 दिनों के भीतर इमरान ने अनेक संदिग्ध मदरसों को निगरानी सूची से बाहर कर दिया। उनके मुताबिक मदरसों को आतंकवाद से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। हालांकि, वे जानते हैं कि ऐसे अनेक मदरसों को संदिग्ध स्रोतों से पैसा मिलता है और वे अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की नजरों में सन्देहास्पद रहे हैं। पूरी दुनिया को यह पता है कि मदरसे की आड़ में चल रहे इन संस्थाओं में मासूम बच्चों और नौजवानों का माइंडवॉश  करके उन्हें आतंकी इरादों की पूर्ति का औजार बनाया जाता है। हालांकि, करतारपुर साहिब गलियारे का उद्घाटन विशुद्ध धार्मिक मौका था, लेकिन इमरान ने उस मंच से भी कश्मीर मुद्दे का जिक्र करके इसे राजनीतिक रंग देने की कोशिश की। उनके विदेश मन्त्री शाह महमूद कुरैशी ने इससे भी एक कदम आगे बढ़ते हुए सरकार के इस फैसले को इमरान की गुगली के तौर पर पेश किया। जिस पर भारत ने कड़ी प्रतिक्रिया दी। इस बीच पाकिस्तान प्रशिक्षित आतंकी भारत में खून-खराबे की घटनाओं को अंजाम देने में लगे हुए हैं। पिछले ही दिनों उन्होंने अमृतसर में निरंकारियों के एक धार्मिक जलसे पर हमला किया, जिसमें 03 लोग मारे गए और 20 घायल हुए। इसे पंजाब में साम्प्रदायिक तनाव फैलाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है, ताकि आतंकवाद को भड़काया जा सके। घटनास्थल से बरामद ग्रेनेड पाकिस्तान में बने थे इसलिए इस घटना के स्रोत पर किसी को दुविधा नहीं हो सकती। सबसे चैंकाने वाली बात तो यह है कि करतारपुर साहिब गलियारे के उद्घाटन पर खालिस्तान समर्थक नेता गोपाल सिंह चावला भी मौजूद था और इमरान खान व पाकिस्तानी सेना प्रमुख उससे औपचारिक शिष्टाचार निभा रहे थे। इन सबसे साफ तौर पर यह पता लगता है कि इमरान की बातों और कामों में कोई सम्बन्ध नहीं है। ऐसे माहौल में अगर उन्हें लगता है कि भारत बातचीत के रास्ते पर कदम बढ़ाएगा, तो इसे उनकी खुशफहमी ही कही जा सकती है। भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने साफ कर दिया है कि जब तक पाकिस्तान भारत के खिलाफ आतंकी गतिविधियों पर विराम नहीं लगाता तब तक उससे बातचीत की कोई संभावना नहीं है। उनके मुताबिक आतंकवाद और बातचीत साथ-साथ नहीं चल सकते। पाकिस्तान को समझना होगा कि भारत के लिए आतंकवाद का खात्मा एक अहम मुद्दा है और जब तक पाकिस्तान इसके खिलाफ स्पष्ट, कठोर, और पारदर्शी कदम नहीं उठाता है तब तक उसके किसी अनुरोध या घड़ियाली आंसू का भारत की सोच और नीति पर कोई असर नहीं होगा। पाकिस्तान को भारत ही नहीं तमाम दुनिया को भरोसा दिलाना चाहिए कि वह वास्तव में आतंकवाद के खात्मे के लिए तैयार है और इसके लिए जरूरी कदम उठा रहा है। जिस दिन ऐसा होगा उसी दिन भारत खुद आगे बढ़कर बातचीत की प्रक्रिया को बहाल करने के लिए कदम बढ़ाएगा। लेकिन यह सीधी सी और बिना लाग-लपेट की बात अगर पाकिस्तान में इमरान सरकार के संचालकों को और भारत में महबूबा सरीखी नेताओं समझ में नहीं आ रही है तो इसका सीधा सा मतलब यही है वे इसे समझना ही नहीं चाह रहे हैं। महबूबा को ही नहीं बल्कि पाकिस्तान की सरकार को भी यह समझ लेना चाहिये कि इस मसले को भारत के आम चुनावों से जोड़कर दिखाने के बहाने भारत की मौजूदा सरकार की रीति-नीति के बारे में दुनिया में गलतफहमी फैलाने का जो प्रयास किया जा रहा है उसे कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता है और इस बात में भी किसी को कोई शंका नहीं होनी चाहिये कि बेशक चुनाव के बाद भारत में किसी भी दल की सरकार बने अथवा कोई भी प्रधानमंत्री बने लेकिन पाकिस्तान को लेकर गोली बंद होने के बाद ही बोली शुरू होने की जो नीति अपनाई गई है उसमें रत्ती भर भी रद्दोबदल की जरा भी संभावना नहीं है। 

मंगलवार, 6 सितंबर 2016

अब झुलसेंगे अलगाववादियों के अरमान

 अब झुलसेंगे अलगाववादियों के अरमान


देश विरोधी ताकतों के हाथों में खेल रहे पाकिस्तान के पिट्ठुओं को औकात में लाने की योजना तैयार हो गयी है। अब इन्हें ना सिर्फ सरकारी सहूलियतों से महरूम होना पड़ेगा बल्कि व्यवस्था से कटकर पूरी तरह अलग-थलग रहने के लिये मजबूर होना पड़ेगा। दरअसल कश्मीर में सामान्य स्थिति बहाल करने की कोशिशों के तहत सूबे के दौरे पर गये सर्वदलीय प्रतिमंडल के साथ बदसलूकी करना वहां के स्थानीय अलगाववादी नेताओं को अब काफी महंगा पड़ने जा रहा है और सरकार ने हर कीमत पर उनकी ढ़िठाई, हठधर्मिता व देशविरोधी मानसिकता का माकूल इलाज करने का पक्का इरादा कर लिया है। इस सिलसिले में बनायी गयी योजना के तहत अलगाववादी नेताओं को मुहैया करायी जा रही तमाम सरकारी सहूलियतों से उन्हें महरूम कर दिया जाएगा और सूबे से जुड़े किसी भी मामले को लेकर होनेवाली बातचीत की प्रक्रिया में उन्हें हर्गिज शामिल नहीं किया जाएगा। सूत्रों की मानें तो सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल की वापसी के बाद प्रधानमंत्री के साथ हुई गृहमंत्री राजनाथ सिंह की बैठक के बाद यह तय हुआ है कि अलगाववादियों के प्रति अब कतई नरमी या सहानुभूति का व्यवहार नहीं किया जाएगा बल्कि अगर जल्दी ही वे तहे-दिल से भारत की एकता, अखंडता व संप्रभुता को स्वीकार करने के अलावा समूचे जम्मू-कश्मीर को (गुलाम कश्मीर सहित) भारत के अविभाज्य व अभिन्न हिस्से के तौर पर कबूल नहीं कर लेते तो निकट भविष्य में उन्हें इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है। प्राप्त जानकारी के मुताबिक इसी मसले को लेकर आज शाम भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के साथ भी गृहमंत्री की बैठक हुई जिसमें शाह ने भी सरकार के इस फैसले से पूरी सहमति जताई है। अब माना जा रहा है कि राजनाथ के अलावा वित्तमंत्री अरूण जेटली की मौजूदगी में पार्लियामेंट एनेक्सी में होनेवाली कश्मीर से लौटे सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों की बैठक में सरकार के इस फैसले पर राजनीतिक आम सहमति भी कायम कर ली जाएगी। अलगाववादियों के प्रति सख्त रवैया अपनाये जाने को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक आम सहमति का माहौल बनाने के बाद औपचारिक तौर पर जम्मू कश्मीर सरकार से अनुरोध किया जाएगा कि देशहित को प्राथमिकता देते हुए तमाम अलगाववादी नेताओं का हर स्तर पर पूर्ण बहिष्कार किया जाये और उन्हें किसी भी तरह की सरकारी सहायता या सहूलियत उपलब्ध कराने से पूरी तरह परहेज बरता जाये। हालांकि किसी भी वार्ता प्रक्रिया में अलगाववादियों को शामिल नहीं करने का फैसला पहले ही लिया जा चुका है और इसी वजह से ना तो राजनाथ के पिछले जम्मू-कश्मीर दौरे के दौरान अलगाववादी नेताओं को बातचीत का मौका दिया गया और ना ही सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल के दौरे के एजेंडे में उनसे मुलाकात की कोई बात शामिल थी। लेकिन निजी हैसियत से अलगाववादियों से मिलने गये प्रतिनिधिमंडल के कुछ सदस्यों की इस पहलकदमी के साथ सरकार की सहानुभूति अवश्य जुड़ी हुई थी क्योंकि अगर यह बातचीत आगे बढ़ती तो सूबे में अमन बहाली के अलावा अलगाववादियों के देश की मुख्यधारा के साथ जुड़ने की उम्मीद बंध सकती थी। लेकिन मुलाकात के लिये आये नेताओं से अलोकतांत्रिक व काफी हद तक असभ्य व अमर्यादित व्यवहार करके इन अलगाववादियों ने अपने लिये खुद ही ऐसे भविष्य का ब्लू प्रिंट तैयार कर लिया है जिसके तहत देश के किसी भी सियासी या गैर सियासी संगठन की उनके साथ अब रत्ती भर भी सहानुभूति नहीं जुड़ सकती है। वैसे भी इन अलगाववादियों ने लंबे समय से देश की नाक में दम किया हुआ है और भारत के शासन-प्रशासन को चिढ़ाने व खिझाने का कोई भी मौका ये अपने हाथ से जाने नहीं देते। ना तो इन्हें भारत के हितों की कोई परवाह है और ना ही भारतीय संवैधानिक व लोकतांत्रिक व्यवस्था में इनकी आस्था है। ऐसे में इन्हें सिर पर चढ़ाए रखने का कोई मतलब ही नहीं है। बल्कि इन्हें औकात में लाने की कोशिश तो काफी पहले ही आरंभ हो जानी चाहिये थी। लेकिन देर आयद दुरूस्त आयद। इतना तो तय है कि भारत के टुकड़े करने का ख्वाब देखनेवाले अलगाववादियों की सुरक्षा, यात्रा व रहन-सहन पर सरकारी खजाने से होनेवाले औसतन सालाना एक सौ करोड़ रूपये के खर्च में अब भारी कटौती की जाएगी और उन्हें भारतीय संविधान के दायरे में रहकर बातचीत करके पूरे मसले का हल निकालने के लिये विवश होना ही पड़ेगा। लेकिन आवश्यक है कि इन्हें विदेशों से मिलनेवाली खैरात पर रोक लगायी जाये और दीन-दुनियां से इनका संपर्क पूरी तरह काट दिया जाये। साथ ही देश के आम लोगों की गाढ़ी कमाई का पैसा इनकी सुरक्षा, यात्रा व रहन-सहन पर खर्च किये जाने का भी कोई औचित्य नहीं है बल्कि इनसे सुरक्षा का खर्च भी वसूला जाना चाहिये। इसके बाद भी अगर ये सूबे में अमन बहाली की राह के आड़े आएं तो इनके खिलाफ देशद्रोह व देश के खिलाफ जंग छेड़ने की सख्त धाराओं के तहत कठोरतम कानूनी कार्रवाई करने से भी परहेज नहीं बरता जाना चाहिये। उसके बाद ही इन्हें आटे-दाल का भाव पता लगेगा।