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गुरुवार, 21 अप्रैल 2016

'वाह.... क्या बात कही है साहब'

भ्रष्टाचार की बढ़ती स्वीकार्यता 

उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लागू किये जाने का विरोध करते हुए निवर्तमान मुख्यमंत्री हरीश रावत द्वारा दाखिल की गयी याचिका पर सुनवाई करने के क्रम में नैनीताल उच्च न्यायालय का यह कहना वाकई चैंकानेवाला है कि अगर सिर्फ भ्रष्टाचार के आधार पर चुनी हुई सरकार को बर्खास्त करने की परंपरा शुरू हो गयी तो देश में एक भी सरकार नहीं बचेगी। हालांकि उच्च न्यायालय ने किस सर्वे या जांच रिपोर्ट के आधार पर भ्रष्टाचार के हम्माम में देश के तमाम सूबों की सभी सरकारों के एक बराबर नंगेपन की ओर इशारा किया है यह तो शायद ही किसी को मालूम हो, लेकिन महत्वपूर्ण बात है कि भ्रष्टाचार के मामले में संलिप्तता का सबूत सामने होने के बावजूद अगर अदालत उस पर सख्ती से कार्रवाई किये जाने को बेहतर मानने के बदले उसके नतीजों पर गंभीरता से गौर करने की बात कह रही है तो इसका सीधा मतलब तो यही है कि अब अदालतों के लिये भी इकलौता भ्रष्टाचार कोई बड़ा मुद्दा नहीं रह गया है। अब लाजिमी है कि अदालत की इस बात को भ्रष्टाचार की स्वीकार्यता के बढ़ते दायरे के तौर पर ही देखा जाएगा और भविष्य के लिये यह बात नजीर बन जाएगी। जब भी किसी अदालत में मुख्यमंत्री द्वारा बहुमत जुटाने के लिये विधायकों की खरीद फरोख्त करने से संबंधित कोई मुकदमा पेश होगा तो एक बार के लिये बचाव पक्ष का वकील यह बात अदालत की संज्ञान में अवश्य लाएगा कि नैनीताल हाईकोर्ट ने सिर्फ भ्रष्टाचार के आधार पर किसी सरकार को बर्खास्त किये जाने का क्या नतीजा बताया है। खैर, भ्रष्टाचार के बढ़ते दायरे को एक नये मुकाम पहुंचाने का काम रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ने भी यह कहकर किया है कि बैंकों का पैसा हजम कर जानेवाली कंपनियों से जुड़े मामलों को नैतिकता की कसौटी पर नहीं परखा जाना चाहिये। अब स्वाभाविक है कि रघुराम की इस सलाह को तो मौजूदा माहौल में विजय माल्या सरीखे उन बड़े मगरमच्छों से संबंधित मामलों से ही जोड़कर देखा जाएगा जिन्होंने कागजी तौर पर खुद को भारी घाटे में बताकर बैंकों का काफी मोटा पैसा हजम किया हुआ है। ना सिर्फ माल्या बल्कि उस जैसों की लगातार लंबी होती कतार को मिल रहे बचाव के मौके को लेकर भले ही समाज, सरकार और सर्वोच्च न्यायालय की ओर से भी बदस्तूर गंभीर चिंता जाहिर की जा रही हो लेकिन रघुराम ने इसे नैतिकता का मसला नहीं माने जाने की सलाह देकर तो शायद यही बताने की कोशिश की है कि कर्ज लेकर वापस नहीं लौटाने और मय मुनाफे के पूरी जमा-पूंजी समेटकर चंपत हो जाने के मसले को कालेधन या भ्रष्टाचार से नहीं जोड़ा जाये। अब ऐसे में सवाल तो यही है कि अगर रघुराम की बात मानकर पैसा बनाने की प्रक्रिया को नैतिकता से नहीं जोड़ा जाये और नैनीताल उच्च न्यायालय की दलील को नजीर मानते हुए सिर्फ भ्रष्टाचार के आधार पर किसी सत्ताधारी को उसके पद से नहीं हटाया जाये तो फिर भ्रष्टाचार के मामलों का करें क्या? फिर तो यही मान लिया जाना श्रेयस्कर होगा कि भ्रष्टाचार तो सिर्फ एक भाव है, नजरिया है। ठीक वैसे ही जैसे सुख और दुख। यानि जिसके नजरिये में नैतिकता होगी उसे ही भ्रष्टाचार भी समझ में आएगा और पैसे की कालिख भी दिखेगी। वर्ना पैसा कहां काला या सफेद होता है। इसी प्रकार भले ही पैसा बनाने के गलत तौर तरीकों को कोई भ्रष्टाचार कहे। माल कूटनेवालों की जमात तो इसे सिर्फ मुनाफा कमाने का तरीका ही बताएगी। यानि समाज के संभ्रांत व दिशानिर्देशक वर्ग का काफी बड़ा तबका अब यही बताने की कोशिश में है कि भ्रष्टाचार को सिर्फ एक वैचारिक भाव के तौर पर देखा जाये और व्यावहारिक तौर पर उसे किसी भी कार्रवाई का आधार ना बनाया जाये। जाहिर तौर पर इससे हास्यास्पद और दुखद स्थिति की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती है। माना कि नैनीताल हाईकोर्ट में दाखिल रावत की याचिका पर इंसाफ करने के लिये विधायकों की खरीद-फरोख्त के प्रयासों का संज्ञान लेने की अदालत को आवश्यकता नहीं है लेकिन इसका यह मतलब भी तो नहीं होना चाहिये भ्रष्टाचार के आधार पर किसी चुनी हुई सरकार को बर्खास्त किये जाने की परंपरा की सिर्फ इसलिये शुरू नहीं होने दी जाये क्योंकि ऐसा करने से किसी सूबे में सरकार नहीं बच पाएगी। यानि आवश्यक है सरकार बचाना और इसके लिये भ्रष्टाचार की अनदेखी भी करनी पड़े तो ऐसा करने में कोई हर्ज नहीं है। जाहिर है कि ऐसे में तो अब भ्रष्टाचार के मसले को भूल जाना ही बेहतर होगा, या फिर इसके चाबुक को निचले स्तर तक ही सीमित रखना होगा। वर्ना शीर्ष पर इसका जिक्र होने से खतरा लोकतंत्र की सलामती के लिये भी उत्पन्न हो सकता है और इससे अर्थव्यवस्था की मजबूती भी प्रभावित हो सकती है। वाह.... क्या बात कही है साहब।   

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2016

स्कूली बस्ते में ठुंसा भ्रष्टाचार

स्कूली बस्ते में ठुंसा भ्रष्टाचार


दिल्ली की मौजूदा सरकार ने जिस मसले पर सबसे ज्यादा तवज्जो दी हुई है वह है स्कूलों की समस्याएं। अपने सालाना बजट का सबसे बड़ा हिस्सा शिक्षा के क्षेत्र में खर्च करने का ऐलान करके सरकार ने अपनी उस घोषणा के प्रति इमानदारी व प्रतिबद्धता का ही मुजाहिरा किया है जिसके तहत सरकारी स्कूलों को हर मामले में निजी स्कूलों के स्तर पर लाने की बात कही गयी थी। साथ ही निजी स्कूलों की मनमानी पर भी उसकी पैनी निगाहें टिकी हुई हैं। तभी तो नर्सरी में दाखिले के नाम पर हर साल मचनेवाली लूट पर अब काफी लगाम लगी है और स्कूलों को पारदर्शी तरीके से प्रशासनिक व्यवस्था संचालित करने के लिये मजबूर होना पड़ रहा है। लेकिन इस सबके बीच निजी स्कूलों में बच्चों के बस्ते के नाम पर हो रही अभिभावकों की सालाना लूट-खसोट की चैतरफा अनदेखी वाकई हैरान करनेवाली है। कायदे से देखा जाये तो दिल्ली की निजी शिक्षण संस्थाओं में हर साल बच्चों के बस्ते में अरबों का भ्रष्टाचार ठूंसा जा रहा है जिसका बोझ वहन करने के अलावा अभिभावकों के पास दूसरा कोई विकल्प ही नहीं है। दरअसल जिनके बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ रहे हैं उनकी मजबूरी बन चुकी है कि हर साल स्कूल में बच्चे का क्लास बदलते ही वे नयी किताबें और काॅपियां खरीद लें। साथ ही स्कूल के नाम की मुहर लगी हुई काॅपियां व किताबें कहां व किस कीमत पर मिलेंगी यह भी स्कूल का प्रशासन ही मनमाने तरीके से तय करता है। अब सवाल यह है कि क्या स्कूल ऐसे बंदोबस्त नहीं कर सकते कि हर साल अनिवार्य रूप से किताबें ना बदली जाएं और एक क्लास की किताबें अगले साल उसी क्लास में आनेवाले बच्चे को दिलवा दी जाएं, ताकि किताबों का दोबारा इस्तेमाल हो सके। बच्चों के माता-पिता पर अतिरिक्त बोझ पड़ने से बच जाए और बच्चों को उसी प्रकाशन और सिलेबस की किताबें आसानी से मिल जाए। लेकिन मसला है कि अगर स्कूल ऐसा करने लगे तो उसकी कमाई का जरिया ही बंद हो जाएगा। उस प्रकाशक का धंधा चैपट हो जाएगा जो मोटे कमीशन के बदले स्कूल से अपनी पसंद की पुस्तकों को स्कूलों में चलवाने का पूरा रैकेट चलवा रहा है। इसमें हैरानी की बात ये है कि स्कूलों की इस मनमानी पर लगाम लगाने का कोई बंदोबस्त नहीं है। बस्ता माफिया खुलकर अभिभावकों की जेब काट रहा है जिस पर न तो सरकार का कोई ध्यान है और न ही अदालत इसका संज्ञान ले रही है। यह बस्ता माफिया लोगों को किस कदर खुलेआम लूट रहा है इसे समझने के लिये अगर हम आंकड़ों का सहारा लें तो दिल्ली व इससे सटे इलाकों में तकरीबन दो हजार से भी ज्यादा छोटे-बड़े निजी स्कूल हैं जिनमें औसतन हर स्कूल में तीन हजार बच्चे पढ़ते हैं। यानी छात्रों की कुल तादाद हुई तकरीबन साठ लाख। अगर इन साठ लाख बच्चों से बस्ते के नाम पर हर साल औसतन पांच हजार रूपया भी वसूला जाता है तो यह आंकड़ा हो जाता है तीस अरब रुपये का। इसमें अगर ‘चोरी में इमानदारी का हिस्सा’ कहा जानेवाला ‘दस फीसदी’ भी स्कूल की तिजोरी में आता हो तो वह रकम होती है तीन अरब की और बाकी 27 अरब में से अगर आधी रकम भी किताब-काॅपी की छपाई, ढ़ुलाई और बंटाई में खर्च हो जाती हो तब भी बस्ता माफिया की जेब में हर साल आम लोगों की खून-पसीने की कमाई का साढ़े तेरह अरब रूपया आना तय ही है। हालांकि अनुमानित कमाई का यह आंकड़ा वास्तव में इससे कहीं ज्यादा बड़ा होगा लेकिन अगर इस अनुमानित आंकड़े को भी हकीकत मान लिया जाये तो जो बस्ता माफिया हर साल 135 करोड़ का मुनाफा बटोर रहा है वह अपने धंधे को बचाने व बढ़ाने के लिये कुछ करोड़ की रकम तो खर्च करता ही होगा। शायद यही वजह है कि हर साल आम लोगों को लग रही इस भारी चपत का किसी भी स्तर पर कोई संज्ञान नहीं लिया जा रहा है और बच्चों को अच्छी तालीम दिलाने की चाहत रखनेवाला आम आदमी बस्ते में ठूंसे गये भ्रष्टाचार का बोझ ढ़ोने के लिये मजबूर हो रहा है।