शुक्रवार, 29 अप्रैल 2016

बदलाव के उजाले में सियासी अंधेरा

बदलाव के उजाले में सियासी अंधेरा


दमघोंटू प्रदूषण की बढ़ती रफ्तार पर लगाम कसने और वाहनों की बेतहाशा रेलमपेल के कारण हांफती, कराहती व कदम-कदम पर अटकती-चटखती सड़कों को सुगम व सुरक्षित बनाने के मकसद से दिल्ली में शुरू की गयी सम-विषम योजना की गुणवत्ता व लोकप्रियता तो निश्चित ही सवालों से परे है। इस योजना को सही तरीके से लागू करके इसका अधिकतम लाभ हासिल करने में भले ही लाख दुश्वारियां सामने आ रही हों लेकिन इसकी उपयोगिता के बारे में किसी को रत्ती भर भी संदेह नहीं है। तभी तो इस साल के पहले पखवाड़े में पहली दफा लागू की गयी इस योजना को दोबारा शुरू करने से पहले जब लोगों से रायशुमारी की गयी तो 80 फीसदी से भी अधिक लोगों ने इसके प्रति सकारात्मक विचार ही दिये। यहां तक कि दिल्ली सरकार के तमाम राजनीतिक विरोधियों ने भी उसकी इस पहल को सराहनीय व अनुकरणीय बताने से परहेज नहीं बरता। लेकिन इस मामले को लेकर अब जिस तरह की राजनीति शुरू हुई है और इस योजना की आड़ लेकर दिल्ली सरकार ने जिस तरह का राजनीति कारोबार शुरू कर दिया है उसे देखकर स्वाभाविक तौर पर लोगों को दुख भी हो रहा है और इसके भविष्य को लेकर चिंता भी हो रही है। माना कि दिल्ली सरकार ने आम लोगों को राहत देने के लिये ही इस योजना को शुरू किया है और विरोधियों ने भी इसकी जनप्रियता का सम्मान करते हुए इसके औचित्य पर उंगली उठाने की पहल नहीं की है लेकिन इसका कतई यह मतलब नहीं है कि इस मसले को राजनीति का ऐसा मुद्दा बना दिया जाये जो विवादों की नयी गाथा का आधार बन जाये। वास्तव में देखा जाये तो इस योजना को विवादों के दायरे में लाने के लिये दिल्ली सरकार के विरोधी जितने दोषी हैं उससे जरा भी कम आम आदमी पार्टी की नीतियां नहीं हैं। अगर वास्तव में सरकार ने पूरी इमानदारी व सहज भाव से दिल्ली व दिल्लीवालों की समस्या सुलझाने की नीयत से इस योजना को संचालित किया होता तो इस मामले को लेकर कोई विवाद पैदा होने का सवाल ही नहीं था। लेकिन औपचारिक तौर पर भले ही दिल्ली में सत्तारूढ़ आप सरकार के शीर्ष रणनीतिकार इस हकीकत को स्वीकार ना करें लेकिन सच यही है इस योजना को ऐसी दुधारू गाय बनाने की कोशिश की गयी है जो राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी को जनसमर्थन व व्यापक स्वीकार्यता का दूध भी दे और अन्य राजनीतिक दलों को तबियत से लथाड़ मारकर लहुलुहान व परेशान भी करे। वर्ना कोई वजह ही नहीं थी कि कल तक इस मसले पर दिल्ली सरकार को जमकर साधुवाद देनेवाली तमाम राजनीतिक पार्टियां इस मसले पर ही दिल्ली सरकार को जमकर कोसने की पहल करतीं। ऐसा हुआ ही इसलिये है कि क्योंकि समूचे देश में अपनी वाहवाही लूटने व राष्ट्रीय स्तर पर मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का चेहरा चमकाने के लिये दिल्ली के आम लोगों की गाढ़ी कमाई का सैकड़ों करोड़ रूपया विज्ञापन के तौर पर पानी में बहा दिया गया है जिससे दिल्ली या दिल्लीवासियों को कुछ भी लाभ नहीं मिलनेवाला है। अलबत्ता बकौल मधेपुरा सांसद पप्पू यादव, अगर इस रकम का आधा हिस्सा भी दिल्ली में प्रदूषण के नियंत्रण की योजनाओं पर खर्च किया जाता तो लोगों को इसका काफी अधिक लाभ मिल सकता था। यही पैसा अगर सायकिल के प्रयोग को प्रोत्साहित करने, सौर व वैकल्पिक ऊर्जा के क्षेत्र को सुदृढ़ करने, कचरा प्रबंधन की क्षमता में वृद्धि करने या गाद-गंदगी से अटे-पटे नदी, नाले, सीवर व सड़क को साफ-सुथरा करने सरीखे कार्यों में खर्च किया जाता तो निश्चित ही किसी को सम-विषम योजना की खामियां गिनाने का मौका नहीं मिल पाता। लेकिन पैसा खर्च हो रहा है राष्ट्रीय स्तर पर विज्ञापन के माध्यम से चेहरा चमकाने में। इसमें भी अगर दिल्ली सरकार की इस दलील को सही मानें कि लोगों को योजना की जानकारी देने के लिये ऐसा करना आवश्यक है तो कायदे से दिल्ली से प्रकाशित होनेवाले अखबारों व एफएम रेडियो सरीखे जन-जन से जुड़े सूचना व संचार के माध्यमों को ही विज्ञापन दिया जाना चाहिये था। अन्य प्रदेशों में विज्ञापन के माध्यम से इसकी आड़ में अपना चेहरा चमकाने का क्या मतलब है। एक पखवाड़े की इस प्रायोगिक योजना के बहाने समूची दिल्ली को होर्डिंग से पाट देने, समूची दिल्ली को केजरीवालमय कर देने, विज्ञापन के माध्यम से दिल्ली को जागरूक करने के मामले में दिल्ली से प्रकाशित होनेवाले जमीनी अखबारों को इस योजना का सबसे मजबूत हिस्सा बनाने में ज्यादा रूचि नहीं लेने, कम खर्च में बेहतर जनसंपर्क के विभिन्न माध्यमों का इस्तेमाल करने से परहेज बरतने व राष्ट्रीय स्तर पर जमकर शोशेबाजी करने सरीखी पहलकदमियां तो यही इशारा कर रही हैं कि बदलाव व बेहतरी का उजाला लेकर आयी इस नीति को लागू करने में नीयत को साफ-शफ्फाक रखने में कुछ कसर तो रह ही रही है।   

गुरुवार, 21 अप्रैल 2016

'वाह.... क्या बात कही है साहब'

भ्रष्टाचार की बढ़ती स्वीकार्यता 

उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लागू किये जाने का विरोध करते हुए निवर्तमान मुख्यमंत्री हरीश रावत द्वारा दाखिल की गयी याचिका पर सुनवाई करने के क्रम में नैनीताल उच्च न्यायालय का यह कहना वाकई चैंकानेवाला है कि अगर सिर्फ भ्रष्टाचार के आधार पर चुनी हुई सरकार को बर्खास्त करने की परंपरा शुरू हो गयी तो देश में एक भी सरकार नहीं बचेगी। हालांकि उच्च न्यायालय ने किस सर्वे या जांच रिपोर्ट के आधार पर भ्रष्टाचार के हम्माम में देश के तमाम सूबों की सभी सरकारों के एक बराबर नंगेपन की ओर इशारा किया है यह तो शायद ही किसी को मालूम हो, लेकिन महत्वपूर्ण बात है कि भ्रष्टाचार के मामले में संलिप्तता का सबूत सामने होने के बावजूद अगर अदालत उस पर सख्ती से कार्रवाई किये जाने को बेहतर मानने के बदले उसके नतीजों पर गंभीरता से गौर करने की बात कह रही है तो इसका सीधा मतलब तो यही है कि अब अदालतों के लिये भी इकलौता भ्रष्टाचार कोई बड़ा मुद्दा नहीं रह गया है। अब लाजिमी है कि अदालत की इस बात को भ्रष्टाचार की स्वीकार्यता के बढ़ते दायरे के तौर पर ही देखा जाएगा और भविष्य के लिये यह बात नजीर बन जाएगी। जब भी किसी अदालत में मुख्यमंत्री द्वारा बहुमत जुटाने के लिये विधायकों की खरीद फरोख्त करने से संबंधित कोई मुकदमा पेश होगा तो एक बार के लिये बचाव पक्ष का वकील यह बात अदालत की संज्ञान में अवश्य लाएगा कि नैनीताल हाईकोर्ट ने सिर्फ भ्रष्टाचार के आधार पर किसी सरकार को बर्खास्त किये जाने का क्या नतीजा बताया है। खैर, भ्रष्टाचार के बढ़ते दायरे को एक नये मुकाम पहुंचाने का काम रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ने भी यह कहकर किया है कि बैंकों का पैसा हजम कर जानेवाली कंपनियों से जुड़े मामलों को नैतिकता की कसौटी पर नहीं परखा जाना चाहिये। अब स्वाभाविक है कि रघुराम की इस सलाह को तो मौजूदा माहौल में विजय माल्या सरीखे उन बड़े मगरमच्छों से संबंधित मामलों से ही जोड़कर देखा जाएगा जिन्होंने कागजी तौर पर खुद को भारी घाटे में बताकर बैंकों का काफी मोटा पैसा हजम किया हुआ है। ना सिर्फ माल्या बल्कि उस जैसों की लगातार लंबी होती कतार को मिल रहे बचाव के मौके को लेकर भले ही समाज, सरकार और सर्वोच्च न्यायालय की ओर से भी बदस्तूर गंभीर चिंता जाहिर की जा रही हो लेकिन रघुराम ने इसे नैतिकता का मसला नहीं माने जाने की सलाह देकर तो शायद यही बताने की कोशिश की है कि कर्ज लेकर वापस नहीं लौटाने और मय मुनाफे के पूरी जमा-पूंजी समेटकर चंपत हो जाने के मसले को कालेधन या भ्रष्टाचार से नहीं जोड़ा जाये। अब ऐसे में सवाल तो यही है कि अगर रघुराम की बात मानकर पैसा बनाने की प्रक्रिया को नैतिकता से नहीं जोड़ा जाये और नैनीताल उच्च न्यायालय की दलील को नजीर मानते हुए सिर्फ भ्रष्टाचार के आधार पर किसी सत्ताधारी को उसके पद से नहीं हटाया जाये तो फिर भ्रष्टाचार के मामलों का करें क्या? फिर तो यही मान लिया जाना श्रेयस्कर होगा कि भ्रष्टाचार तो सिर्फ एक भाव है, नजरिया है। ठीक वैसे ही जैसे सुख और दुख। यानि जिसके नजरिये में नैतिकता होगी उसे ही भ्रष्टाचार भी समझ में आएगा और पैसे की कालिख भी दिखेगी। वर्ना पैसा कहां काला या सफेद होता है। इसी प्रकार भले ही पैसा बनाने के गलत तौर तरीकों को कोई भ्रष्टाचार कहे। माल कूटनेवालों की जमात तो इसे सिर्फ मुनाफा कमाने का तरीका ही बताएगी। यानि समाज के संभ्रांत व दिशानिर्देशक वर्ग का काफी बड़ा तबका अब यही बताने की कोशिश में है कि भ्रष्टाचार को सिर्फ एक वैचारिक भाव के तौर पर देखा जाये और व्यावहारिक तौर पर उसे किसी भी कार्रवाई का आधार ना बनाया जाये। जाहिर तौर पर इससे हास्यास्पद और दुखद स्थिति की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती है। माना कि नैनीताल हाईकोर्ट में दाखिल रावत की याचिका पर इंसाफ करने के लिये विधायकों की खरीद-फरोख्त के प्रयासों का संज्ञान लेने की अदालत को आवश्यकता नहीं है लेकिन इसका यह मतलब भी तो नहीं होना चाहिये भ्रष्टाचार के आधार पर किसी चुनी हुई सरकार को बर्खास्त किये जाने की परंपरा की सिर्फ इसलिये शुरू नहीं होने दी जाये क्योंकि ऐसा करने से किसी सूबे में सरकार नहीं बच पाएगी। यानि आवश्यक है सरकार बचाना और इसके लिये भ्रष्टाचार की अनदेखी भी करनी पड़े तो ऐसा करने में कोई हर्ज नहीं है। जाहिर है कि ऐसे में तो अब भ्रष्टाचार के मसले को भूल जाना ही बेहतर होगा, या फिर इसके चाबुक को निचले स्तर तक ही सीमित रखना होगा। वर्ना शीर्ष पर इसका जिक्र होने से खतरा लोकतंत्र की सलामती के लिये भी उत्पन्न हो सकता है और इससे अर्थव्यवस्था की मजबूती भी प्रभावित हो सकती है। वाह.... क्या बात कही है साहब।   

बुधवार, 20 अप्रैल 2016

पाकिस्तान का खुराफाती कूटनीतिक प्रपंच

चोरी और सीनाजोरी

पाकिस्तान ने भारत के साथ खुराफाती कूटनीतिक प्रपंच का जो खेल शुरू किया है उसकी जाल में अब वह खुद ही उलझता दिख रहा है। हकीकत यही है कि भारत की ओर से तो कभी कहा ही नहीं गया कि बातचीत का दरवाजा बंद करने की कोई जरूरत है। फिर पाकिस्तानी कूटनीतिज्ञों के दिमाग में समग्र वार्ता स्थगित होने की बात कहां से घुसी यह या तो वे जानें या उनका खुदा जाने। हालांकि इसे चोर की दाढ़ी में तिनके के तौर पर अवश्य देखा जा सकता है। दरअसल पठानकोट के मामले में अपनी स्पष्ट भूमिका को नकारते हुए इसे भारत की ही खुराफात बताने की पहल करने, पठानकोट मामले की जांच के लिये एनआईए को अपनी सरहद में दाखिल होने की इजाजत देने से आनाकानी करने, सीमा पर संघर्षविराम का उल्लंघन करते हुए नये सिरे से बेवजह गोलीबारी का सिलसिला शुरू करने और बलूचिस्तान व गुलाम कश्मीर के इलाकों में दावानल की शक्ल अख्तियार करती दिख रही अलगाववाद की आग में भारत को घसीटने के लिये एक कथित सामान्य नौसैनिक को राॅ का एजेंट बताकर दुनियां के समक्ष प्रस्तुत करने के बाद शायद पाकिस्तानी हुक्मरानों को यह लगा होगा कि उनकी इतनी बदमाशियों के बाद तो भारत की ओर से समग्र वार्ता पर अवश्य ही विराम लगा दिया जाएगा। वैसे भी भारत की यह स्पष्ट नीति रही है कि गोली और बोली एक साथ तो जारी नहीं रखी जा सकती। गोली की भाषा में बात करनी हो तो गोली से ही बात कर लो वर्ना बोली में बातचीत तभी संभव है जब गोलियों के शोर पर विराम लगाया जाए। जबकि पाकिस्तान की नीति रही है कि बोली का जवाब गोली से दो और जब गोली का जवाब गोला से मिलने लगे तो वार्ता की दुहाई देना शुरू कर दो। तभी तो इस बार भी जब उसे सरहद पर गोली के जवाब में गोले का सामना करना पड़ा तो उसकी पूरी कूटनीतिक फौज समग्र वार्ता के लिये हाय-तौबा मचाने में जुट गयी। नयी दिल्ली में उसने अपने उच्चायुक्त अब्दुल बासित को आगे कर दिया और उसकी संयुक्त राष्ट्र की स्थायी प्रतिनिधि मलीहा लोधी ने विश्व बिरादरी को बरगलाने के लिये अमेरिका में मोर्चा खोल दिया। दोनों का लोधी ने यह बेसुरा राग आलापा कि भारत के साथ पाकिस्तान के रिश्ते इसलिये नहीं सुधर रहे हैं क्योंकि नई दिल्ली से समग्र बातचीत के लिये पहलकदमी नहीं की जा रही है। दूसरी ओर बासित ने तो बातचीत का सिलसिला स्थगित हो जाने का एलान भी कर दिया। जाहिर है कि पाकिस्तानी रणनीतिकारों को यही लगा होगा कि इन हरकतों से भारतीय खेमा बौखला उठेगा और गुस्से में आकर कुछ अनाप-शनाप बातें या हरकतें अवश्य करेगा। लेकिन उनके अरमान धरे रह गये और इधर से सिर्फ बासित के बयान को ही आपसी संबंधों के लिये झटका बताकर चुप्पी साध ली गयी जबकि लोधी की जहरीली वाणी का प्रतिवाद करने के लिये एक शब्द खर्च करने की भी जहमत नहीं उठायी गयी। यानि नयी दिल्ली का इरादा बिल्कुल स्पष्ट है कि बेवजह की धमाचैकड़ी बहुत हो गयी, अब जो भी होगा वह ठोस होगा। इधर-उधर की बातों में वक्त जाया नहीं करने के नई दिल्ली के ठोस इरादे देखकर अब पाकिस्तान को पसीना आना लाजिमी ही है। तभी तो बड़बोले बासित के बयान को दरकिनार करते हुए उसे औपचारिक तौर पर बताना पड़ा है कि भारत के साथ बातचीत की प्रक्रिया कतई स्थगित नहीं हुई है बल्कि इसके लिये उचित वक्त व स्थान तय करने पर लगातार मंथन चल रहा है। यानि पठानकोट हमले के बाद सामने आये नाजुक हालातों में बातचीत की प्रक्रिया को लगे झटके को प्रचारित करके पाकिस्तान यह साबित करने में जुट गया है कि भारत की ओर बातचीत के लिये पहल ही नहीं हो रही है। जबकि भारत तो पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि बातचीत का तो कोई विकल्प ही नहीं है, यह तो होनी ही है। लेकिन पहले इसके लिये माहौल तो बने। खास तौर से पठानकोट के मामले में जब पाकिस्तान ने स्वीकार कर लिया है कि भारत पर हुए इस हमले में उसकी जमीन का इस्तेमाल हुआ है और उधर के लोगों ने ही इसे अंजाम दिया है तो फिर अब इसके अपराधियों पर ठोस कार्रवाई तो होनी ही चाहिये। वर्ना एक तरफ वह चीन के सहयोग से मसूद अजहर का संयुक्त राष्ट्र में बचाव करे, सरहद पर अशांति का माहौल बनाये और पठानकोट मामले की जांच के लिये एनआईएक को अपने यहां घुसने भी ना दे जबकि दूसरी तरफ बातचीत की प्रक्रिया स्थगित होने का ढि़ढ़ोरा पीटकर भारत को ही इसका जिम्मेवार ठहराये। यह तो वही बात हुई मानो उल्टा चोर कोतवाल को डांटे। 

शनिवार, 16 अप्रैल 2016

आम आदमी पार्टी का मास्टर स्ट्रोक....

बदहाल व्यवस्था में सुधार की उम्मीद 


आजादी के बाद से अब तक दिल्ली में सरकारी अस्पतालों का जो ढ़ांचा खड़ा हुआ है उसमें सिर्फ दस हजार बेड का ही इंतजाम हो पाया है। ऐसे में दिल्ली व आसपास की तकरीबन दो करोड़ की आबादी पर अस्पतालों में मात्र दस हजार बेड की उपलब्धता के आंकड़े से ही समझा जा सकता है कि स्थिति किस कदर भयावह ही नहीं बल्कि बेकाबू हो चुकी है। हालांकि सरकारी अस्पतालों में सभी के लिये मुफ्त दवाईयों का इंतजाम करके दिल्ली की सरकार ने एक भरोसा तो जगाया है कि जनसरोकार के प्रति उसकी प्रतिबद्धता पर उंगली नहीं उठायी जा सकती। लेकिन मसला है कि स्थिति में सुधार कैसे आये। लोगों को स्वास्थ्य सुविधाओं का अधिकतम लाभ देने के लिये अगले साल के आखिर तक अस्पतालों की क्षमता को दो गुना करते हुए दस हजार बेड और बढ़ाने का लक्ष्य तो निर्धारित कर लिया गया है। लेकिन क्या इतना ही काफी है। कतई नहीं। खास तौर से जिस सूबे की आबादी दो करोड़ के आंकड़े को पार करने जा रही हो वहां के लिये कुछ ऐसे वैकल्पिक इंतजाम तो करने ही होंगे ताकि बड़े अस्पतालों का बोझ कम हो और लोगों को घर के नजदीक ही स्वास्थ्य सुविधा का लाभ उपलब्ध हो सके। इस दिशा में इस साल के अंत तक दिल्ली में एक हजार मोहल्ला क्लीनिक और 150 पाॅलीक्लीनिक खोलने का जो लक्ष्य तय किया है वह वाकई बेहद क्रांतिकारी फैसला है। इस तरह से इस साल के अंत तक दिल्ली के सभी विधानसभा क्षेत्रों में कम से कम 15 ऐसे स्वास्थ्य केन्द्र खुल जाएंगे जहां ना सिर्फ रोजाना डाॅक्टर अपनी सेवाएं देंगे बल्कि वहां मुफ्त दवाओं का भी इंतजाम होगा। इसके अलावा हर विधानसभा क्षेत्र में 2-3 पाॅलीक्लीनिक खोलने की जो योजना बनायी गयी है उसके तहत हर पाॅलीक्लीनिक में 7-8 स्पेस्लिस्ट डाॅक्टर रोज अपनी सेवाएं देंगे और यहां भर्ती करने के लिये बेड को छोड़कर बड़े अस्पतालों सरीखे बाकी तमाम इंतजाम उपलब्ध होंगे। जाहिर है कि इस योजना के साकार हो जाने के बाद दिल्ली की स्वास्थ्य व्यवस्था में वाकई काफी सुधार देखने को मिलेगा। जहां एक ओर लोगों को अपने घर के आसपास ही प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाएं मिल जाएंगी वहीं बड़े अस्पतालों का बोझ भी कम होगा और छोटी-मोटी बीमारियों का इलाज कराने के लिये लोगों को अस्पतालों के चक्कर भी नहीं लगाने पड़ेंगे। पिछले साल से अब तक तकरीबन जिन सौ मोहल्ला क्लिनिकों का परिचालन आरंभ हो चुका है वहां अब तक का अनुभव यही बताता है कि लोगों की 90 फीसदी स्वास्थ्य समस्याएं यहीं ठीक हो जा रही हैं। इन मोहल्ला क्लीनिकों की सफलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है इसका डंका अब अमेरिका में भी बज रहा है और वहां भी लोगों को आसान स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराने के लिए केजरीवाल सरकार की मोहल्ला क्लीनिक योजना से सबक लेने के सुझाव दिए जा रहे हैं। पिछले सप्ताह भी एक बड़े अमेरिकी मीडिया हाउस द वाशिंगटन पोस्ट में इस बाबत एक लेख प्रकाशित हुआ है जिसमें दिल्ली में शुरू की गई मोहल्ला क्लीनिक योजना की जमकर तारीफ की गई है। साथ ही इस लेख में अमेरिकी प्रशासन को सलाह दी गई है कि वह भी अपनी स्वास्थ्य व्यवस्था को सुधारने के लिए मोहल्ला क्लीनिक योजना को लागू करने का इंतजाम करे। जाहिर है कि अगर अमेरिका सरीखे विकसित व साधन संपन्न देश की मीडिया भी वहां के लिये इस योजना को अमल में लाये जाने की वकालत कर रहा है तो निश्चित तौर पर यह एहसास ना सिर्फ दिल्ली सरकार बल्कि आम दिल्लीवासियों के लिये भी बेहद सुखद है। लेकिन इस सब के बीच इस बात को नहीं भुलाया जा सकता है कि मोहल्ला क्लिनिक की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए इनमें जरूरत के अनुरूप स्टाफ और बुनियादी चिकित्सीय सुविधाएं देने में कतई कोताही नहीं बरती जानी चाहिये। खास तौर से बंद पड़े गोदामों में बिना समुचित व्यवस्था व परिचारक के ही आनन फानन में मोहल्ला क्लीनिक शुरू कर देने की जो परिपाटी शुरू की जा रही है वह कतई उचित नहीं है। जब लोगों ने इतने दिनों तक समस्याएं झेली हैं तो वे कुछ दिन और भी सब्र कर सकते हैं। लेकिन इंतजाम ऐसे हों कि जब किसी मोहल्ला क्लीनिक का लोकार्पण किया जाये तो वहां आवश्यक सुविधाएं अवश्य मौजूद हों और वहां काम करनेवालों और इलाज कराने के लिये आनेवालों को किसी समस्या का सामना ना करना पड़े। ऐसा हो जाए तो यह दिल्ली की बीमार जनता के लिए आम आदमी पार्टी का मास्टर स्ट्रोक साबित होगा। 

शुक्रवार, 15 अप्रैल 2016

हादसे से बेपर्दा हुई हकीकत

हादसे से बेपर्दा हुई हकीकत


केरल के पुत्तिंगल देवी मंदिर में हुए हादसे के बाद जिस तरह से आतिशबाजी के लिये जमा किये गये बारूदी जखीरे की हकीकत परत दर परत बेपर्दा हो रही है उससे सरकार भी भौंचक है। हालांकि हालत तो सहा भी ना जाये और कहा भी ना जाये की ही है लेकिन मजबूरी है कि कहना तो पड़ेगा ही। यह बताना ही पड़ेगा कि आतिशबाजी में इस्तेमाल किये जानेवाले जिन जानलेवा रसायनों के इस्तेमाल पर समूचे देश में पाबंदी है वे आखिर केरल के मंदिरों में कैसे पहुंच गये। कहां से इतनी बहुतायत मात्रा में ऐसी आतिशबाजी का सामान आया जो ना तो हमारे देश में बनता है और ना ही जिसके इस्तेमाल की इजाजत है। वह भी इतनी अधिक मात्रा में कि भीषण हादसे की वजह बने डेढ़ क्ंिवटल विस्फोटकों के पलक झपकते ही स्वाहा हो जाने के बाद भी जिसका जखीरा समाप्त नहीं हुआ है बल्कि थोक में जमा किये गये ऐसे बारूदी विस्फोटकों की अलग-अलग जगहों से भारी तादाद में बरामदगी का सिलसिला लगातार जारी है। कभी वह कारों से बरामद हो रहा है तो कहीं गोदाम में ठुंसा हुआ पाया जा रहा है। जाहिर है कि प्रशासन की सख्ती को देखते हुए बारूदी जखीरे के सप्लायरों व जमाकर्ताओं ने इसे भारी मात्रा में छिपा लिया होगा। यानि सामान्य शब्दों में कहें तो देश में ऐसे बारूद का ढ़ेर जहां-तहां होने से इनकार नहीं किया जा सकता है जिसे हमारे देश में खपाने के लिये बकायदा एक बहुत बड़ा नेटवर्क काम कर रहा है और इसके तार निश्चित ही विदेशों से जुड़े हुए हैं अथवा यह पूरा नेटवर्क ही विदेशों से संचालित हो रहा है। वर्ना कोई वजह ही नहीं है कि जो विस्फोटक हमारे देश में ना बनता है और ना ही खुले बाजार में बिक सकता है उसकी इतनी बड़ी खेप देश के भीतर मंदिर हादसे की वजह बन जाये और जहां-तहां से थोक के भाव में इसकी बरामदगी हो। जाहिर है कि स्थानीय प्रशासन तो सिर्फ कानून-व्यवस्था की दृष्टि से ही मामले को देखेगा लेकिन असली जिम्मेवारी तो केन्द्र की है क्योंकि केरल के मंदिर हादसे ने जिस हकीकत को बेपर्दा किया है उससे राष्ट्रीय सुरक्षा में सेंध का काफी बड़ा मामला सामने आ गया है। तभी तो केन्द्र सरकार भी औपचारिक तौर पर इस हादसे की जांच का जिम्मा किसी बड़ी एजेंसी को सौंपकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेने के बजाय अंदरूनी तौर पर मामले की पूरी हकीकत को गहराई से समझ लेना चाह रही है। यही वजह है कि इस पूरे मामले की आपराधिक नजरिये से जांच कराने के बजाय विशेषज्ञ संस्थाओं को जांच के काम में लगाया जा रहा है। खास तौर से पेट्रोलियम एक्सप्लोसिव सेफ्टी आॅर्गेनाइजेशन सरीखी ऐसी संस्थाओं को जांच की जिम्मेवारी दी गयी है जिसे यह पता लगाने में महारथ हासिल है कि हादसे की वजह बने पटाखों में कौन सा रसायन इस्तेमाल हुआ और उन रसायनों का उत्पादन व निर्यात किन देशों से होता है। अभी अंदरूनी तौर पर तीन जांच टीमों ने जिम्मा संभाल लिया है और रसायनों व विस्फोटकों की पड़ताल के अलावा यह भी जानकारी जुटायी जा रही है कि ये अवैध व प्रतिबंधित सामान कितनी मात्रा में कैसे व कहां से हमारी सरहद के भीतर दाखिल हो रहे हैं। इस मामले में अब तक जो जानकारी मिली है उसके मुताबिक पूरे मामले में चीन की चालबाजी खुलकर सामने आ रही है। चीन से समुद्री मार्ग द्वारा प्रतिबंधित सामानों की तस्करी होने की सूचना सरकार को मिल गयी है। हालांकि इसमें कमियां व खामियां हमारी ओर से ही रही हैं क्योंकि चीन से आनेवाले माल से लदे कंटेनरों में जिस तरह से छिपाकर प्रतिबंधित सामान भारत में लाया जा रहा है उसे पहचानने और पकड़ने में हमारे तमाम स्कैनर नाकाम साबित हुए हैं। इसमें गलती मशीनों की नहीं बल्कि उसे संचालित करनेवाले उन जांच अधिकारियों की निकल कर सामने आ रही है जो कंटेनरों की गहराई से पड़ताल करने की जहमत नहीं उठाते। अब लाख टके का सवाल है कि जब कंटेनर में छिपाकर प्रतिबंधित पटाखे भारत में दाखिल कराये जाने की हकीकत सामने आ गयी है तो इस संभावना को कैसे नकारा जा सकता है कि उसी कंटेनर में हथियार भी आता होगा और मादक पदार्थ ही नहीं बल्कि नकली नोट भी। साथ ही भारत के खिलाफ पाकिस्तान से हाथ मिलाकर खुल्लमखुल्ला पठानकोट हमले के मास्टर माइंड मसूद अजहर की अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पैरोकारी करनेवाला चीन अपने कंटेनर के द्वारा आईएसआई की साजिशों को भी तो सफल करने में सहयोगी बन सकता है। इस तरह के तमाम पहलू हैं जो कोल्लम हादसे से सतह पर आ गये हैं और जिनकी गहराई से जांच करके सुरक्षा-व्यवस्था को चाक-चैबंद करने की जरूरत है।  

गुरुवार, 14 अप्रैल 2016

दिल्ली में दोबारा.... सम-विषम पखवाड़ा

सम-विषम के बढ़ते कदम

दिल्ली सरकार ने प्रदूषण की मार और यातायात व्यवस्था में सुधार के लिये सम-विषम के जिस फार्मूले को आजमाया है वह वाकई हर मामले में सम ही है। हालांकि इस योजना के प्रथम चरण में विषमता के कुछ मामले अवश्य सामने आये। मसलन प्रदूषण के स्तर में अपेक्षित गिरावट नहीं आ पायी, सीएनजी स्टीकर के वितरण में धांधली देखी गयी और पर्यावरण सेवा के तहत निजी व स्कूल की गाडि़यों को सरकारी खर्चे पर सड़क पर उतारना आमदनी के लिहाज से काफी महंगा सौदा साबित हुआ। लेकिन गहराई से गौर करें तो ये तमाम कमियां व खामियां इस योजना को लागू करने में रह गयी कमी का ही नतीजा थीं। वर्ना सफलता के पैमाने पर परखा जाये तो समूची दिल्ली ने इसे तहेदिल से सराहा और जब इसका दूसरा चरण शुरू करने से पहले चार लाख लोगों से वेबसाइट, ई-मेल, फोन और मोहल्ला सभा की बैठकों के माध्यम से रायशुमारी करायी गयी तो 80 फीसदी दिल्लीवासियों ने इसके समर्थन में ही अपनी राय जाहिर की। यानि सियासत के लिये आवश्यक जनसमर्थन की ताकत के नजरिये से तो इसे अभूतपूर्व सफलता मिली ही। साथ ही वाहनों के बोझ से कराह रही सड़कों को भी सांस लेने का मौका मिला और लोगों को जाम के जानलेवा झाम से राहत मिली। इसके अलावा प्रदूषण फैलाने में वाहनों का योगदान भी कम तो हुआ ही। यानि एक योजना का फायदा तिगुना। तभी तो अब दोबारा इसे अगले पंद्रह दिनों के लिये लागू करने का फैसला किया गया है और जनसरोकार के प्रति दिल्ली सरकार की कटिबद्धता को देखते हुए उम्मीद की जा रही है कि जल्दी की इस योजना को स्थायी तौर पर भी लागू कर दिया जाएगा। हालांकि इस बार भी प्रायोगिक तौर पर ही सम-विषम योजना को लागू किया जा रहा है और इसे सफल बनाने के हरसंभव प्रयास किये जा रहे हैं। मसलन दिल्ली-एनसीआर को जोड़नेवाली 17 रूटों पर स्पेशल बसें चलाई जाएंगी। सुचारू यातायात सुनिश्चित करने के लिये 400 पूर्व सैनिकों की तैनाती की जाएगी। साथ ही पिछली बार की तुलना में एक हजार ज्यादा यानी 5 हजार वॉलंटियर लगाए जाएंगे। पर्यावरण बस सेवा इस बार भी जारी रहेगी जिनमें मार्शल तैनात होंगे और आधी सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित रहेंगी। मेट्रो फीडर बस सेवा के रूट में भी जरूरत के मुताबिक बदलाव किया जाएगा और मेट्रो के फेरे भी बढ़ाए जाएंगे। इसके अलावा वायु गुणवत्ता पर बारीक नजर रखने के लिये 119 जगहों पर प्रदूषण के स्तर का लगातार मुआयना किया जाएगा। यानि योजना के पहले चरण से सबक लेते हुए इस दफा भी इसे सफल बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही है। लिहाजा पिछले अनुभव को देखते हुए इस लोकप्रिय योजना की सफलता पर शायद ही किसी को संदेह हो। तभी तो प्रादेशिक स्तर पर विरोधी पार्टियां इसकी कितनी ही खामियां क्यों ना गिना रही हों लेकिन इसकी लोकप्रियता व सफलता ने केन्द्र को भी अचंभित व चमत्कृत कर दिया है। यही वजह है कि अब केन्द्र सरकार देश भर में इस योजना का विस्तार करने पर गंभीरता से विचार कर रही है। जाम व प्रदूषण की दोहरी मार से कराह रहे मुम्बई, पुणे व कोलकाता सरीखे महानगरों को ही नहीं बल्कि उन तमाम शहरों को इस योजना से जोड़ने की योजना बनायी जा रही है जहां वाहनोें की तादाद 20 लाख से अधिक हो और रोजाना औसतन कम से कम 300 गाडि़यां पंजीकृत होती हों। यानि अब देश के तकरीबन सभी सूबों को इसके दायरे में लाया जाएगा और तमाम उन शहरों में इसका विस्तार किया जाएगा जहां जाम की समस्या बेहद आम है। इस योजना को देश भर में लागू करके राष्ट्रीय स्तर पर इसका सियासी श्रेय लूटने के लिये केन्द्र सरकार इस कदर लालायित है कि राज्यसभा में अपने कमजोर संख्याबल की समस्या को देखते हुए वह इससे संबंधित विधेयक को मनीबिल के तौर पर लोकसभा में पेश करने का मन बना रही है ताकि राज्यसभा की मंजूरी हासिल करने का झमेला ही ना रहे। हालांकि अब यह देखना दिलचस्प होगा कि 25 अप्रैल से आरंभ हो रहे संसद सत्र में ही इसे पारित कराने के प्रति कटिबद्ध दिख रही केन्द्र सरकार किस त्वरित गति से इसे देशभर में लागू करने में कामयाब होती है। बहरहाल इतना तो तय है कि देश भर में इसका विस्तार करके सियासी श्रेय लूटने में केन्द्र सरकार भले ही कामयाब हो जाये लेकिन इतिहास के पन्नों में इसका व्यावहारिक श्रेय तो दिल्ली की केजरीवाल सरकार के हिस्से में ही दर्ज होगा।  

मंगलवार, 12 अप्रैल 2016

अब पछताए होत क्या....

अब पछताए होत क्या....

पठानकोट में हुए आतंकी हमले के मामले में पाकिस्तान की ओर से धोखे की सौगात मिलना तो तय ही था। उसका तो इतिहास ही यही रहा है कि दोस्ती की हर कोशिश के बदले में कभी हमें कारगिल की सौगात मिली, कभी संसद और मुंबई पर हमला झेलना पड़ा और कभी हेमराज का कटा हुआ सिर मिला। वह तो हम थे जो भोलेपन में यह मान बैठे थे कि अगर पड़ोसी के साथ नये सिरे से शुरूआत की जाये तो रिश्तों में सुधार संभव है। हालांकि इस भोलेपन को हमारी बेवकूफी का नाम देना भी गलत नहीं होगा लेकिन यह वैसा मामला तो कतई नहीं है जैसा सुब्रमण्यम स्वामी समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि अब तक पाकिस्तान के प्रति दर्शाया गया स्नेह व सहयोगपूर्ण रवैया वैसा ही था जैसा महाभारत से पूर्व कृष्ण ने दुर्योधन से सिर्फ पांच गांव मांगकर प्रदर्शित किया था। स्वामी की मानें तो जिस तरह दुर्योधन द्वारा सुई की नोक के बराबर जमीन देने से भी इनकार कर दिये जाने के बाद महाभारत के युद्ध की नींव पड़ी ठीक उसी प्रकार पाकिस्तान के ताजा धोखे के बाद भारत सरकार भी सख्त फैसले लेने के लिये स्वतंत्र हो गयी है। अब या तो स्वामी वाकई बेहद भोले हैं या इस मामले में भोलेपन का नाटक कर रहे हैं। वर्ना पाकिस्तान की मंशा को ना सिर्फ उन्हें बल्कि उनकी ही पार्टी द्वारा संचालित केन्द्र सरकार को भी तभी भांप लेना चाहिये था जब उसने पहले तो पठानकोट के मामले की जांच के लिये हमारी जांच टीम को अपनी सरहद में दाखिल होने की इजाजत देना ही गवारा नहीं किया और बाद में राजनीतिक दबाव के कारण वह कागजी तौर पर इस शर्त के साथ इसके लिये सहमत हुआ कि पहले उसकी जांच टीम पठानकोट का दौरा करेगी। खैर, मामला चुंकि दस्तावेजी हो रहा था तो इस लिखित समझौते को स्वीकार करने की मजबूरी तो समझी जा सकती है लेकिन वह कौन सी मजबूरी थी जिसके तहत हमारी ओर से यह दबाव बनाने से परहेज बरत लिया गया कि पाकिस्तानी जांच टीम को तभी पठानकोट आने की इजाजत दी जाएगी जब हमारी जांच टीम पाकिस्तान में मौजूद सबूतों व साक्ष्यों को पूरी तरह खंगाल लेगी। वैसे भी पाकिस्तानी जांच टीम को भारत आकर ना तो कुछ करना था और ना उसने कुछ किया। तभी तो इस जांच टीम ने ना तो मुठभेड़वाली जगह का मुआयना किया और ना ही आतंकियों की लाश पर निगाह डालने की जहमत उठायी। अलबत्ता उनका मकसद तो हमारे सैन्य ठिकानों व पठानकोट में मौजूद हमारी प्रतिरोधक क्षमता का जायजा लेना और सैन्य रणनीति को अपनी निगाहों से देखना भर था। तभी तो पाकिस्तानी जांच दल ने जिद पकड़ी थी पठानकोट में तैनात वायुसेना अधिकारियों से पूछताछ करने की और आतंकियों की राहगुजर मंे पेश आयी परेशानियों को बारीकी से समझने की। वर्ना वाकई अगर पठानकोट मामले में पाकिस्तान जरा भी गंभीर होता तो अव्वल तो उसने हमारी ओर उपलब्ध कराए गए सबूतों को कमजोर बताने की पहल ना की होती और दूसरे हमारी जांच दल के वहां जाने में अड़ंगा नहीं लगाता। उस पर इल्जाम ये कि ना सिर्फ पठानकोट मसला भारत की ही खुराफाती साजिश का नतीजा है बल्कि भारत ही बलूचिस्तान में अलगाव की आग को भड़काने व वहां अशांति फैलाने में जुटा हुआ है। अलबत्ता हाफिज सईद और मसूद अजहर तो संत-महात्मा हैं जिन्हें बेवजह आतंकवादी साबित करने की कोशिश हो रही है। अब ऐसी सोच, नीति व नीयत वाले पड़ोसी पर अगर हम हर बार धोखा खाने के बाद भी भरोसा करने की गलती कर रहे हैं तो निश्चित ही असली कमी-खामी तो हममें ही है। वह तो जैसा पहले था, वैसा ही अब भी है और आगे भी ऐसा ही रहनेवाला है। लिहाजा पठानकोट के सबूतों को पुख्ता करने के लिये अमेरिकी संस्थानों की मदद लेने की कूटनीतिक पहल और मसूद अजहर के खिलाफ वारंट जारी करने की स्पष्ट नीति पर आगे बढ़ने में इस बार जो देरी की गयी उस गलती को दुहराने से बचना ही श्रेयस्कर होगा। साथ ही किसी ऐरे-गैरे का वीडियो दिखाकर बलूचिस्तान में ‘राॅ’ की सक्रियता का शगूफा छोड़ने की पाक की नापाक खुराफात का सख्ती से संज्ञान नहीं लेने की जो रणनीति अपनाई जा रही है उस पर भी अगर समय रहते पुनर्विचार नहीं किया गया तो यह मसला भी ‘शर्मअलशेख’ के उस शर्मनाक दस्तावेज की तस्दीक करने के काम में लाया जा सकता है जिसे बड़ी मुश्किल व मशक्कत से अभी हाल ही में हमने खारिज कराया है। 

शनिवार, 9 अप्रैल 2016

स्थापितों से आगे भी है आसमान

स्थापितों से आगे भी है आसमान 


सांगठनिक तौर पर अहम जिम्मेवारियां सौंपे जाने के मामले में भाजपा द्वारा जिस तरह से एक के बाद चैंकानेवाले चेहरे सामने लाए जा रहे हैं वह वाकई बेहद दिलचस्प है। ना परंपराओं की परवाह की जा रही है और ना ही वर्जनाओं की। ना सिफारिश के आधार पर फैसले हो रहे हैं और ना ही विरोध की परवाह की जा रही है। देखी जा रही है तो सिर्फ योग्यता, क्षमता और काबिलियत। साथ ही जोर इस बात पर कि समाज के सबसे निचले पायदान से आनेवालों को आगे बढ़ने का मौका प्राथमिकता के आधार पर मुहैया कराया जाए। दरअसल जबसे पार्टी के संस्थापकों और उनके द्वारा आगे लाये दूसरी पीढ़ी के नेताओं का संगठन पर वर्चस्व कमजोर पड़ा है और पार्टी का नेतृत्व नरेन्द्र मोदी व अमित शाह के रूप में ऐसी जोड़ी के हाथ में आया है जो ना तो किसी से उपकृत है और ना किसी पूर्वाग्रह या गुटबाजी से प्रेरित, तब से संगठन में बदलाव की जो बयार चल निकली है वह वाकई बेहद दिलचस्प है। तमाम ऐसे स्थापित चेहरे जो जोड़तोड़, गुटबाजी व गणेश परिक्रमा के बूते विभिन्न स्तरों पर पार्टी में लंबे समय से जमे हुए थे उनकी जगह ऐसे चेहरों को तरजीह देने का सिलसिला चल निकला है जो ‘नेकी कर और दरिया में डाल’ की नीति पर अमल करते हुए संगठन की सेवा में दत्तचित्तता से तल्लीन थे। उन्हें ख्वाहिश भले रही हो पार्टी से कुछ पाने की लेकिन उम्मीद तो कतई नहीं थी कि कुछ मिल पाएगा। ऐसे लोगों को जब अचानक मुख्यधारा में शीर्ष पर बिठाने की नीति पर अमल किया जाने लगा है तो स्वाभाविक तौर पर यह आरोप तो लगना ही है कि मोदी-शाह की जोड़ी पार्टी पर अपनी पकड़ मजबूत करने के लिये संगठन में मनमाने परिवर्तन कर रही है। पुराने स्थापितों की अनदेखी की जा रही है और संगठन पर अपना एकाधिकार स्थापित करने की कोशिश हो रही है ताकि किसी भी मामले में किसी भी स्तर से कभी कोई विरोध या असहमति का स्वर सामने आने की गुंजाइश ही ना रहे। जाहिर तौर पर इस तरह के आरोपों को सिरे से तो कतई खारिज नहीं किया जा सकता है लेकिन इन आरोपों से अलग हटकर देखा जाये तो पार्टी के वंचित, पीडि़त व शोषित तबके को नये निजाम के दौर में आगे आने का मौका मिलना तटस्थ नजरिये से तो स्वागतयोग्य ही है। वर्ना जिस रघुवर दास ने टाटा स्टील रोलिंग मिल में दिहाड़ी मजदूरी करते हुए हरिजन विद्यालय से शुरूआती पढ़ाई की हो, बेहद अभाव व फांके में रहकर भी विधि स्नातक की डिग्री ली हो, वर्ष 1977 में ही जनता पार्टी से जुड़ गया हो और भाजपा की स्थापना के बाद से ही पार्टी का सक्रिय कार्यकर्ता रहा हो उसे 1995 तक विधानसभा का टिकट भी नहीं मिला हो और तत्कालीन संगठन महामंत्री गोविंदाचार्य की नजर में आने के कारण टिकट मिलने के बाद से अब तक एक बार भी हार का मुंह नहीं देखा हो, उनकी कहानी ही यह बताने के लिये काफी है कि अगर मोदी-शाह की जोड़ी ने उन्हें मुख्यमंत्री नहीं बनाया होता तो आज भी ये सियासी तौर पर हाशिये पर ही होते। यह इस जोड़ी का ही कारनामा है कि इसने तमाम वर्जनाओं को तोड़कर दास को ठीक उसी प्रकार आदिवासी बहुल झारखंड का गैरआदिवासी मुख्यमंत्री बनवाया जैसे मनोहरलाल खट्टर को जाटबहुल हरियाणा का गैरजाट मुख्यमंत्री। खट्टर की कहानी भी ऐसी ही है जैसी दास की और अब पंजाब में विजय सांपला, उत्तर प्रदेश में केशव प्रसाद मौर्य और तेलंगाना में डाॅ के लक्षमण को पार्टी का अध्यक्ष घोषित करके उसी परंपरा को आगे बढ़ाया गया है। ये सभी पिछड़े समाज व बेहद गरीब परिवार से आए हैं और इन्होंने संघ परिवार व संगठन के लिये अपना सबकुछ अर्पित करने से लेकर पार्टी के लिये खुद को भी समर्पित कर दिया था लेकिन बदले में कुछ पाने के लिये ना तो कभी गुटबाजी की और ना किसी की गणेश परिक्रमा करना गवारा किया। लिहाजा भले ही पिछड़ों-दलितों को साधने के लिये इन्हें आगे आने का मौका दिया गया हो या फिर इन्हें गुटनिरपेक्ष रहने का प्रतिफल मिल रहा हो। सच तो यही है कि मतदाताओं को अंत्योदय के प्रति अपनी प्रतिबद्धता समझाने में पार्टी को इस सांगठनिक अंत्योदय से निश्चित ही काफी लाभ मिलेगा। 

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2016

स्कूली बस्ते में ठुंसा भ्रष्टाचार

स्कूली बस्ते में ठुंसा भ्रष्टाचार


दिल्ली की मौजूदा सरकार ने जिस मसले पर सबसे ज्यादा तवज्जो दी हुई है वह है स्कूलों की समस्याएं। अपने सालाना बजट का सबसे बड़ा हिस्सा शिक्षा के क्षेत्र में खर्च करने का ऐलान करके सरकार ने अपनी उस घोषणा के प्रति इमानदारी व प्रतिबद्धता का ही मुजाहिरा किया है जिसके तहत सरकारी स्कूलों को हर मामले में निजी स्कूलों के स्तर पर लाने की बात कही गयी थी। साथ ही निजी स्कूलों की मनमानी पर भी उसकी पैनी निगाहें टिकी हुई हैं। तभी तो नर्सरी में दाखिले के नाम पर हर साल मचनेवाली लूट पर अब काफी लगाम लगी है और स्कूलों को पारदर्शी तरीके से प्रशासनिक व्यवस्था संचालित करने के लिये मजबूर होना पड़ रहा है। लेकिन इस सबके बीच निजी स्कूलों में बच्चों के बस्ते के नाम पर हो रही अभिभावकों की सालाना लूट-खसोट की चैतरफा अनदेखी वाकई हैरान करनेवाली है। कायदे से देखा जाये तो दिल्ली की निजी शिक्षण संस्थाओं में हर साल बच्चों के बस्ते में अरबों का भ्रष्टाचार ठूंसा जा रहा है जिसका बोझ वहन करने के अलावा अभिभावकों के पास दूसरा कोई विकल्प ही नहीं है। दरअसल जिनके बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ रहे हैं उनकी मजबूरी बन चुकी है कि हर साल स्कूल में बच्चे का क्लास बदलते ही वे नयी किताबें और काॅपियां खरीद लें। साथ ही स्कूल के नाम की मुहर लगी हुई काॅपियां व किताबें कहां व किस कीमत पर मिलेंगी यह भी स्कूल का प्रशासन ही मनमाने तरीके से तय करता है। अब सवाल यह है कि क्या स्कूल ऐसे बंदोबस्त नहीं कर सकते कि हर साल अनिवार्य रूप से किताबें ना बदली जाएं और एक क्लास की किताबें अगले साल उसी क्लास में आनेवाले बच्चे को दिलवा दी जाएं, ताकि किताबों का दोबारा इस्तेमाल हो सके। बच्चों के माता-पिता पर अतिरिक्त बोझ पड़ने से बच जाए और बच्चों को उसी प्रकाशन और सिलेबस की किताबें आसानी से मिल जाए। लेकिन मसला है कि अगर स्कूल ऐसा करने लगे तो उसकी कमाई का जरिया ही बंद हो जाएगा। उस प्रकाशक का धंधा चैपट हो जाएगा जो मोटे कमीशन के बदले स्कूल से अपनी पसंद की पुस्तकों को स्कूलों में चलवाने का पूरा रैकेट चलवा रहा है। इसमें हैरानी की बात ये है कि स्कूलों की इस मनमानी पर लगाम लगाने का कोई बंदोबस्त नहीं है। बस्ता माफिया खुलकर अभिभावकों की जेब काट रहा है जिस पर न तो सरकार का कोई ध्यान है और न ही अदालत इसका संज्ञान ले रही है। यह बस्ता माफिया लोगों को किस कदर खुलेआम लूट रहा है इसे समझने के लिये अगर हम आंकड़ों का सहारा लें तो दिल्ली व इससे सटे इलाकों में तकरीबन दो हजार से भी ज्यादा छोटे-बड़े निजी स्कूल हैं जिनमें औसतन हर स्कूल में तीन हजार बच्चे पढ़ते हैं। यानी छात्रों की कुल तादाद हुई तकरीबन साठ लाख। अगर इन साठ लाख बच्चों से बस्ते के नाम पर हर साल औसतन पांच हजार रूपया भी वसूला जाता है तो यह आंकड़ा हो जाता है तीस अरब रुपये का। इसमें अगर ‘चोरी में इमानदारी का हिस्सा’ कहा जानेवाला ‘दस फीसदी’ भी स्कूल की तिजोरी में आता हो तो वह रकम होती है तीन अरब की और बाकी 27 अरब में से अगर आधी रकम भी किताब-काॅपी की छपाई, ढ़ुलाई और बंटाई में खर्च हो जाती हो तब भी बस्ता माफिया की जेब में हर साल आम लोगों की खून-पसीने की कमाई का साढ़े तेरह अरब रूपया आना तय ही है। हालांकि अनुमानित कमाई का यह आंकड़ा वास्तव में इससे कहीं ज्यादा बड़ा होगा लेकिन अगर इस अनुमानित आंकड़े को भी हकीकत मान लिया जाये तो जो बस्ता माफिया हर साल 135 करोड़ का मुनाफा बटोर रहा है वह अपने धंधे को बचाने व बढ़ाने के लिये कुछ करोड़ की रकम तो खर्च करता ही होगा। शायद यही वजह है कि हर साल आम लोगों को लग रही इस भारी चपत का किसी भी स्तर पर कोई संज्ञान नहीं लिया जा रहा है और बच्चों को अच्छी तालीम दिलाने की चाहत रखनेवाला आम आदमी बस्ते में ठूंसे गये भ्रष्टाचार का बोझ ढ़ोने के लिये मजबूर हो रहा है।