अब पछताए होत क्या....
पठानकोट में हुए आतंकी हमले के मामले में पाकिस्तान की ओर से धोखे की सौगात मिलना तो तय ही था। उसका तो इतिहास ही यही रहा है कि दोस्ती की हर कोशिश के बदले में कभी हमें कारगिल की सौगात मिली, कभी संसद और मुंबई पर हमला झेलना पड़ा और कभी हेमराज का कटा हुआ सिर मिला। वह तो हम थे जो भोलेपन में यह मान बैठे थे कि अगर पड़ोसी के साथ नये सिरे से शुरूआत की जाये तो रिश्तों में सुधार संभव है। हालांकि इस भोलेपन को हमारी बेवकूफी का नाम देना भी गलत नहीं होगा लेकिन यह वैसा मामला तो कतई नहीं है जैसा सुब्रमण्यम स्वामी समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि अब तक पाकिस्तान के प्रति दर्शाया गया स्नेह व सहयोगपूर्ण रवैया वैसा ही था जैसा महाभारत से पूर्व कृष्ण ने दुर्योधन से सिर्फ पांच गांव मांगकर प्रदर्शित किया था। स्वामी की मानें तो जिस तरह दुर्योधन द्वारा सुई की नोक के बराबर जमीन देने से भी इनकार कर दिये जाने के बाद महाभारत के युद्ध की नींव पड़ी ठीक उसी प्रकार पाकिस्तान के ताजा धोखे के बाद भारत सरकार भी सख्त फैसले लेने के लिये स्वतंत्र हो गयी है। अब या तो स्वामी वाकई बेहद भोले हैं या इस मामले में भोलेपन का नाटक कर रहे हैं। वर्ना पाकिस्तान की मंशा को ना सिर्फ उन्हें बल्कि उनकी ही पार्टी द्वारा संचालित केन्द्र सरकार को भी तभी भांप लेना चाहिये था जब उसने पहले तो पठानकोट के मामले की जांच के लिये हमारी जांच टीम को अपनी सरहद में दाखिल होने की इजाजत देना ही गवारा नहीं किया और बाद में राजनीतिक दबाव के कारण वह कागजी तौर पर इस शर्त के साथ इसके लिये सहमत हुआ कि पहले उसकी जांच टीम पठानकोट का दौरा करेगी। खैर, मामला चुंकि दस्तावेजी हो रहा था तो इस लिखित समझौते को स्वीकार करने की मजबूरी तो समझी जा सकती है लेकिन वह कौन सी मजबूरी थी जिसके तहत हमारी ओर से यह दबाव बनाने से परहेज बरत लिया गया कि पाकिस्तानी जांच टीम को तभी पठानकोट आने की इजाजत दी जाएगी जब हमारी जांच टीम पाकिस्तान में मौजूद सबूतों व साक्ष्यों को पूरी तरह खंगाल लेगी। वैसे भी पाकिस्तानी जांच टीम को भारत आकर ना तो कुछ करना था और ना उसने कुछ किया। तभी तो इस जांच टीम ने ना तो मुठभेड़वाली जगह का मुआयना किया और ना ही आतंकियों की लाश पर निगाह डालने की जहमत उठायी। अलबत्ता उनका मकसद तो हमारे सैन्य ठिकानों व पठानकोट में मौजूद हमारी प्रतिरोधक क्षमता का जायजा लेना और सैन्य रणनीति को अपनी निगाहों से देखना भर था। तभी तो पाकिस्तानी जांच दल ने जिद पकड़ी थी पठानकोट में तैनात वायुसेना अधिकारियों से पूछताछ करने की और आतंकियों की राहगुजर मंे पेश आयी परेशानियों को बारीकी से समझने की। वर्ना वाकई अगर पठानकोट मामले में पाकिस्तान जरा भी गंभीर होता तो अव्वल तो उसने हमारी ओर उपलब्ध कराए गए सबूतों को कमजोर बताने की पहल ना की होती और दूसरे हमारी जांच दल के वहां जाने में अड़ंगा नहीं लगाता। उस पर इल्जाम ये कि ना सिर्फ पठानकोट मसला भारत की ही खुराफाती साजिश का नतीजा है बल्कि भारत ही बलूचिस्तान में अलगाव की आग को भड़काने व वहां अशांति फैलाने में जुटा हुआ है। अलबत्ता हाफिज सईद और मसूद अजहर तो संत-महात्मा हैं जिन्हें बेवजह आतंकवादी साबित करने की कोशिश हो रही है। अब ऐसी सोच, नीति व नीयत वाले पड़ोसी पर अगर हम हर बार धोखा खाने के बाद भी भरोसा करने की गलती कर रहे हैं तो निश्चित ही असली कमी-खामी तो हममें ही है। वह तो जैसा पहले था, वैसा ही अब भी है और आगे भी ऐसा ही रहनेवाला है। लिहाजा पठानकोट के सबूतों को पुख्ता करने के लिये अमेरिकी संस्थानों की मदद लेने की कूटनीतिक पहल और मसूद अजहर के खिलाफ वारंट जारी करने की स्पष्ट नीति पर आगे बढ़ने में इस बार जो देरी की गयी उस गलती को दुहराने से बचना ही श्रेयस्कर होगा। साथ ही किसी ऐरे-गैरे का वीडियो दिखाकर बलूचिस्तान में ‘राॅ’ की सक्रियता का शगूफा छोड़ने की पाक की नापाक खुराफात का सख्ती से संज्ञान नहीं लेने की जो रणनीति अपनाई जा रही है उस पर भी अगर समय रहते पुनर्विचार नहीं किया गया तो यह मसला भी ‘शर्मअलशेख’ के उस शर्मनाक दस्तावेज की तस्दीक करने के काम में लाया जा सकता है जिसे बड़ी मुश्किल व मशक्कत से अभी हाल ही में हमने खारिज कराया है।
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