शनिवार, 9 अप्रैल 2016

स्थापितों से आगे भी है आसमान

स्थापितों से आगे भी है आसमान 


सांगठनिक तौर पर अहम जिम्मेवारियां सौंपे जाने के मामले में भाजपा द्वारा जिस तरह से एक के बाद चैंकानेवाले चेहरे सामने लाए जा रहे हैं वह वाकई बेहद दिलचस्प है। ना परंपराओं की परवाह की जा रही है और ना ही वर्जनाओं की। ना सिफारिश के आधार पर फैसले हो रहे हैं और ना ही विरोध की परवाह की जा रही है। देखी जा रही है तो सिर्फ योग्यता, क्षमता और काबिलियत। साथ ही जोर इस बात पर कि समाज के सबसे निचले पायदान से आनेवालों को आगे बढ़ने का मौका प्राथमिकता के आधार पर मुहैया कराया जाए। दरअसल जबसे पार्टी के संस्थापकों और उनके द्वारा आगे लाये दूसरी पीढ़ी के नेताओं का संगठन पर वर्चस्व कमजोर पड़ा है और पार्टी का नेतृत्व नरेन्द्र मोदी व अमित शाह के रूप में ऐसी जोड़ी के हाथ में आया है जो ना तो किसी से उपकृत है और ना किसी पूर्वाग्रह या गुटबाजी से प्रेरित, तब से संगठन में बदलाव की जो बयार चल निकली है वह वाकई बेहद दिलचस्प है। तमाम ऐसे स्थापित चेहरे जो जोड़तोड़, गुटबाजी व गणेश परिक्रमा के बूते विभिन्न स्तरों पर पार्टी में लंबे समय से जमे हुए थे उनकी जगह ऐसे चेहरों को तरजीह देने का सिलसिला चल निकला है जो ‘नेकी कर और दरिया में डाल’ की नीति पर अमल करते हुए संगठन की सेवा में दत्तचित्तता से तल्लीन थे। उन्हें ख्वाहिश भले रही हो पार्टी से कुछ पाने की लेकिन उम्मीद तो कतई नहीं थी कि कुछ मिल पाएगा। ऐसे लोगों को जब अचानक मुख्यधारा में शीर्ष पर बिठाने की नीति पर अमल किया जाने लगा है तो स्वाभाविक तौर पर यह आरोप तो लगना ही है कि मोदी-शाह की जोड़ी पार्टी पर अपनी पकड़ मजबूत करने के लिये संगठन में मनमाने परिवर्तन कर रही है। पुराने स्थापितों की अनदेखी की जा रही है और संगठन पर अपना एकाधिकार स्थापित करने की कोशिश हो रही है ताकि किसी भी मामले में किसी भी स्तर से कभी कोई विरोध या असहमति का स्वर सामने आने की गुंजाइश ही ना रहे। जाहिर तौर पर इस तरह के आरोपों को सिरे से तो कतई खारिज नहीं किया जा सकता है लेकिन इन आरोपों से अलग हटकर देखा जाये तो पार्टी के वंचित, पीडि़त व शोषित तबके को नये निजाम के दौर में आगे आने का मौका मिलना तटस्थ नजरिये से तो स्वागतयोग्य ही है। वर्ना जिस रघुवर दास ने टाटा स्टील रोलिंग मिल में दिहाड़ी मजदूरी करते हुए हरिजन विद्यालय से शुरूआती पढ़ाई की हो, बेहद अभाव व फांके में रहकर भी विधि स्नातक की डिग्री ली हो, वर्ष 1977 में ही जनता पार्टी से जुड़ गया हो और भाजपा की स्थापना के बाद से ही पार्टी का सक्रिय कार्यकर्ता रहा हो उसे 1995 तक विधानसभा का टिकट भी नहीं मिला हो और तत्कालीन संगठन महामंत्री गोविंदाचार्य की नजर में आने के कारण टिकट मिलने के बाद से अब तक एक बार भी हार का मुंह नहीं देखा हो, उनकी कहानी ही यह बताने के लिये काफी है कि अगर मोदी-शाह की जोड़ी ने उन्हें मुख्यमंत्री नहीं बनाया होता तो आज भी ये सियासी तौर पर हाशिये पर ही होते। यह इस जोड़ी का ही कारनामा है कि इसने तमाम वर्जनाओं को तोड़कर दास को ठीक उसी प्रकार आदिवासी बहुल झारखंड का गैरआदिवासी मुख्यमंत्री बनवाया जैसे मनोहरलाल खट्टर को जाटबहुल हरियाणा का गैरजाट मुख्यमंत्री। खट्टर की कहानी भी ऐसी ही है जैसी दास की और अब पंजाब में विजय सांपला, उत्तर प्रदेश में केशव प्रसाद मौर्य और तेलंगाना में डाॅ के लक्षमण को पार्टी का अध्यक्ष घोषित करके उसी परंपरा को आगे बढ़ाया गया है। ये सभी पिछड़े समाज व बेहद गरीब परिवार से आए हैं और इन्होंने संघ परिवार व संगठन के लिये अपना सबकुछ अर्पित करने से लेकर पार्टी के लिये खुद को भी समर्पित कर दिया था लेकिन बदले में कुछ पाने के लिये ना तो कभी गुटबाजी की और ना किसी की गणेश परिक्रमा करना गवारा किया। लिहाजा भले ही पिछड़ों-दलितों को साधने के लिये इन्हें आगे आने का मौका दिया गया हो या फिर इन्हें गुटनिरपेक्ष रहने का प्रतिफल मिल रहा हो। सच तो यही है कि मतदाताओं को अंत्योदय के प्रति अपनी प्रतिबद्धता समझाने में पार्टी को इस सांगठनिक अंत्योदय से निश्चित ही काफी लाभ मिलेगा। 

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