सम-विषम के बढ़ते कदम
दिल्ली सरकार ने प्रदूषण की मार और यातायात व्यवस्था में सुधार के लिये सम-विषम के जिस फार्मूले को आजमाया है वह वाकई हर मामले में सम ही है। हालांकि इस योजना के प्रथम चरण में विषमता के कुछ मामले अवश्य सामने आये। मसलन प्रदूषण के स्तर में अपेक्षित गिरावट नहीं आ पायी, सीएनजी स्टीकर के वितरण में धांधली देखी गयी और पर्यावरण सेवा के तहत निजी व स्कूल की गाडि़यों को सरकारी खर्चे पर सड़क पर उतारना आमदनी के लिहाज से काफी महंगा सौदा साबित हुआ। लेकिन गहराई से गौर करें तो ये तमाम कमियां व खामियां इस योजना को लागू करने में रह गयी कमी का ही नतीजा थीं। वर्ना सफलता के पैमाने पर परखा जाये तो समूची दिल्ली ने इसे तहेदिल से सराहा और जब इसका दूसरा चरण शुरू करने से पहले चार लाख लोगों से वेबसाइट, ई-मेल, फोन और मोहल्ला सभा की बैठकों के माध्यम से रायशुमारी करायी गयी तो 80 फीसदी दिल्लीवासियों ने इसके समर्थन में ही अपनी राय जाहिर की। यानि सियासत के लिये आवश्यक जनसमर्थन की ताकत के नजरिये से तो इसे अभूतपूर्व सफलता मिली ही। साथ ही वाहनों के बोझ से कराह रही सड़कों को भी सांस लेने का मौका मिला और लोगों को जाम के जानलेवा झाम से राहत मिली। इसके अलावा प्रदूषण फैलाने में वाहनों का योगदान भी कम तो हुआ ही। यानि एक योजना का फायदा तिगुना। तभी तो अब दोबारा इसे अगले पंद्रह दिनों के लिये लागू करने का फैसला किया गया है और जनसरोकार के प्रति दिल्ली सरकार की कटिबद्धता को देखते हुए उम्मीद की जा रही है कि जल्दी की इस योजना को स्थायी तौर पर भी लागू कर दिया जाएगा। हालांकि इस बार भी प्रायोगिक तौर पर ही सम-विषम योजना को लागू किया जा रहा है और इसे सफल बनाने के हरसंभव प्रयास किये जा रहे हैं। मसलन दिल्ली-एनसीआर को जोड़नेवाली 17 रूटों पर स्पेशल बसें चलाई जाएंगी। सुचारू यातायात सुनिश्चित करने के लिये 400 पूर्व सैनिकों की तैनाती की जाएगी। साथ ही पिछली बार की तुलना में एक हजार ज्यादा यानी 5 हजार वॉलंटियर लगाए जाएंगे। पर्यावरण बस सेवा इस बार भी जारी रहेगी जिनमें मार्शल तैनात होंगे और आधी सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित रहेंगी। मेट्रो फीडर बस सेवा के रूट में भी जरूरत के मुताबिक बदलाव किया जाएगा और मेट्रो के फेरे भी बढ़ाए जाएंगे। इसके अलावा वायु गुणवत्ता पर बारीक नजर रखने के लिये 119 जगहों पर प्रदूषण के स्तर का लगातार मुआयना किया जाएगा। यानि योजना के पहले चरण से सबक लेते हुए इस दफा भी इसे सफल बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही है। लिहाजा पिछले अनुभव को देखते हुए इस लोकप्रिय योजना की सफलता पर शायद ही किसी को संदेह हो। तभी तो प्रादेशिक स्तर पर विरोधी पार्टियां इसकी कितनी ही खामियां क्यों ना गिना रही हों लेकिन इसकी लोकप्रियता व सफलता ने केन्द्र को भी अचंभित व चमत्कृत कर दिया है। यही वजह है कि अब केन्द्र सरकार देश भर में इस योजना का विस्तार करने पर गंभीरता से विचार कर रही है। जाम व प्रदूषण की दोहरी मार से कराह रहे मुम्बई, पुणे व कोलकाता सरीखे महानगरों को ही नहीं बल्कि उन तमाम शहरों को इस योजना से जोड़ने की योजना बनायी जा रही है जहां वाहनोें की तादाद 20 लाख से अधिक हो और रोजाना औसतन कम से कम 300 गाडि़यां पंजीकृत होती हों। यानि अब देश के तकरीबन सभी सूबों को इसके दायरे में लाया जाएगा और तमाम उन शहरों में इसका विस्तार किया जाएगा जहां जाम की समस्या बेहद आम है। इस योजना को देश भर में लागू करके राष्ट्रीय स्तर पर इसका सियासी श्रेय लूटने के लिये केन्द्र सरकार इस कदर लालायित है कि राज्यसभा में अपने कमजोर संख्याबल की समस्या को देखते हुए वह इससे संबंधित विधेयक को मनीबिल के तौर पर लोकसभा में पेश करने का मन बना रही है ताकि राज्यसभा की मंजूरी हासिल करने का झमेला ही ना रहे। हालांकि अब यह देखना दिलचस्प होगा कि 25 अप्रैल से आरंभ हो रहे संसद सत्र में ही इसे पारित कराने के प्रति कटिबद्ध दिख रही केन्द्र सरकार किस त्वरित गति से इसे देशभर में लागू करने में कामयाब होती है। बहरहाल इतना तो तय है कि देश भर में इसका विस्तार करके सियासी श्रेय लूटने में केन्द्र सरकार भले ही कामयाब हो जाये लेकिन इतिहास के पन्नों में इसका व्यावहारिक श्रेय तो दिल्ली की केजरीवाल सरकार के हिस्से में ही दर्ज होगा।
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