लोग बेहाल बिचौलिये मालामाल
बाजार में बिचौलियों का वर्चस्व तो हमेशा से रहा है। बल्कि यह कहना भी गलत नहीं होगा कि बाजार बनता ही बिचौलियों से है। उत्पादक और उपभोक्ता के बीच की कड़ी कहे जानेवाले बिचौलियों ने अगर बाजार का निर्माण किया है तो जाहिर तौर पर अपने मुनाफे के लिये ही किया है। तभी तो उत्पादन कम हो या ज्यादा, दौर सस्ती का हो या महंगाई का। इनका मुनाफा पक्का रहता है। ये अपने मुनाफे के लिये बाजार को इस तरह संचालित करते हैं कि किसी भी सूरत में ना तो उत्पादक का अधिक भला हो पाता है और ना ही उपभोक्ता को ज्यादा सहूलियत मिल पाती है। मिसाल के तौर पर इन दिनों खुदरा बाजार की बात करें तो हर घर में रोजाना इस्तेमाल होनेवाली प्याज पिछले कई महीनों से लगातार औसतन बीस रूपये प्रति किलोग्राम की दर पर डटी हुई है। यह वो कीमत है जो पिछले मानसून के बाद प्याज की कमी के कारण पनपी आवक में कमी के नतीजे में निर्धारित हुई थी। लेकिन अब जबकि प्याज की बंपर पैदावार हुई है और किसानों के लिये इसे संभाल कर रखना मुश्किल हो रहा है तब भी अगर इसकी खुदरा कीमतों में कोई उतार नहीं दिख रहा है तो इसकी साफ व सीधी वजह बाजार में मुनाफाखोर बिचौलियों का वर्चस्व ही है जिन्होंने मांग व आपूर्ति के बीच मनमाना संतुलन कायम करके कीमत को लगातार स्थिर किया हुआ है। आलम यह है कि किसान को मंडी में महज डेढ़ से दो रूपये प्रति किलो की दर से खरीदनेवाले भी बड़ी मुश्किल से मिल रहे हैं जबकि उपभोक्ताओं को इसकी कीमत औसतन बीस रूपये की दर से चुकानी पड़ रही है। ऐसे में सवाल है कि आखिर बीच का 18 रूपया जा कहां रहा है। जाहिर तौर पर यह उन बिचौलियों की तिजोरी में जमा हो रहा है जो प्याज को खेत से किचेन तक का सफर तय कराते हैं। ऐसे में किसान का यथावत बदहाल रहना स्वाभाविक ही है। वह तब भी बदहाल था जब बाढ़-सुखाड़ के कारण उसकी फसल बर्बाद हो गयी और वह आज भी बदहाल है जब उसने अपना खून-पसीना एक करके बंपर फसल पैदा की है। इसी प्रकार जब उत्पादन कम हुआ तब भी उपभोक्ता को ही अपनी जेब ढ़ीली करनी पड़ी और आज भी बाजार में उपभोक्ता ही लुट रहा है। यानि दोनों तरफ से फायदा इन बिचौलियों का ही है।ऐसा नहीं है कि यह नौबत महाराष्ट्र के प्याज उत्पादकों को ही झेलनी पड़ रही है बल्कि यही हाल समूचे देश के किसानों का है जो मंडी में बिचौलियों के हाथों औने-पौने दामों पर अपनी फसल बेचने के लिये मजबूर हैं। किसान आलू पैदा करे या टमाटर, गन्ना उगाए या फल-फूल उपजाये। सबकी व्यथा एक जैसी ही है। इसमें किसी वस्तु का दाम अधिक तेजी से बढ़ जाने पर सरकार अगर हरकत में भी आती है तो जमाखोरों पर छापेमारी के अलावा आयात में इजाफा करने के परंपरागत तौर-तरीकों पर अमल शुरू कर देती है। लेकिन कभी यह कोशिश नहीं होती कि किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य मिले और उपभोक्ताओं को सही कीमत पर बाजार में सामान उपलब्ध हो सके। लिहाजा बिचौलियों की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता। ऐसे में आवश्यकता है कि बाजार में कीमतों के निर्धारण व नियंत्रण पर भी सरकार व प्रशासन की नजर हो। सिर्फ मांग व आपूर्ति के बीच संतुलन के भरोसे बाजार को छोड़े रखने से ना तो उत्पादकों को न्याय मिल सकता है और ना ही उपभोक्ताओं को। इस दिशा में दिल्ली विधानसभा चुनाव के वक्त आम आदमी पार्टी व भाजपा ने भी काफी वायदे किये थे। एक ओर किसानों को मंडी में ही अपनी उपज बेचने की अनिवार्यता समाप्त करने की बात कही गयी थी वहीं दूसरी ओर बाजारों में स्वयंसेवकों की तैनाती का भरोसा दिलाया गया था ताकि मनमानी कीमत वसूलनेवालों पर लगाम कसी जा सके। लेकिन ये सभी बातें सिर्फ बातें ही साबित हुई हैं। वैसे भी अगर किसान खुद ही उपभोक्ताओं को अपना उत्पाद बेचने चला जाये तो वह खेती पर क्या ध्यान देगा और दूसरी ओर खुदरा बाजार के लिये जब तक सभी जींसों का ठोस तरीके से मूल्य निर्धारण नहीं किया जाता तब तक मनमानी कीमत का कैसे पता चल पाएगा। यानि बाजार की असली बीमारी का इलाज किये बिना इस अव्यस्था से निजात पाने की कल्पना भी बेकार ही है। लिहाजा आवश्यकता है कि उत्पादक और उपभोक्ता के बीच कीमतों का अनुपात निर्धारित किया जाये और बिचौलियों व बाजार की अन्य ताकतों को लागत के मुकाबले एक निश्चित अनुपात में ही मुनाफा कमाने की छूट रहे। वर्ना मांग व आपूर्ति के चक्कर में पूरी बाजार व्यवस्था यथावत घनचक्कर बनी रहेगी।