शुक्रवार, 27 मई 2016

बाजार में बिचौलियों का वर्चस्व

लोग बेहाल बिचौलिये मालामाल


बाजार में बिचौलियों का वर्चस्व तो हमेशा से रहा है। बल्कि यह कहना भी गलत नहीं होगा कि बाजार बनता ही बिचौलियों से है। उत्पादक और उपभोक्ता के बीच की कड़ी कहे जानेवाले बिचौलियों ने अगर बाजार का निर्माण किया है तो जाहिर तौर पर अपने मुनाफे के लिये ही किया है। तभी तो उत्पादन कम हो या ज्यादा, दौर सस्ती का हो या महंगाई का। इनका मुनाफा पक्का रहता है। ये अपने मुनाफे के लिये बाजार को इस तरह संचालित करते हैं कि किसी भी सूरत में ना तो उत्पादक का अधिक भला हो पाता है और ना ही उपभोक्ता को ज्यादा सहूलियत मिल पाती है। मिसाल के तौर पर इन दिनों खुदरा बाजार की बात करें तो हर घर में रोजाना इस्तेमाल होनेवाली प्याज पिछले कई महीनों से लगातार औसतन बीस रूपये प्रति किलोग्राम की दर पर डटी हुई है। यह वो कीमत है जो पिछले मानसून के बाद प्याज की कमी के कारण पनपी आवक में कमी के नतीजे में निर्धारित हुई थी। लेकिन अब जबकि प्याज की बंपर पैदावार हुई है और किसानों के लिये इसे संभाल कर रखना मुश्किल हो रहा है तब भी अगर इसकी खुदरा कीमतों में कोई उतार नहीं दिख रहा है तो इसकी साफ व सीधी वजह बाजार में मुनाफाखोर बिचौलियों का वर्चस्व ही है जिन्होंने मांग व आपूर्ति के बीच मनमाना संतुलन कायम करके कीमत को लगातार स्थिर किया हुआ है। आलम यह है कि किसान को मंडी में महज डेढ़ से दो रूपये प्रति किलो की दर से खरीदनेवाले भी बड़ी मुश्किल से मिल रहे हैं जबकि उपभोक्ताओं को इसकी कीमत औसतन बीस रूपये की दर से चुकानी पड़ रही है। ऐसे में सवाल है कि आखिर बीच का 18 रूपया जा कहां रहा है। जाहिर तौर पर यह उन बिचौलियों की तिजोरी में जमा हो रहा है जो प्याज को खेत से किचेन तक का सफर तय कराते हैं। ऐसे में किसान का यथावत बदहाल रहना स्वाभाविक ही है। वह तब भी बदहाल था जब बाढ़-सुखाड़ के कारण उसकी फसल बर्बाद हो गयी और वह आज भी बदहाल है जब उसने अपना खून-पसीना एक करके बंपर फसल पैदा की है। इसी प्रकार जब उत्पादन कम हुआ तब भी उपभोक्ता को ही अपनी जेब ढ़ीली करनी पड़ी और आज भी बाजार में उपभोक्ता ही लुट रहा है। यानि दोनों तरफ से फायदा इन बिचौलियों का ही है।ऐसा नहीं है कि यह नौबत महाराष्ट्र के प्याज उत्पादकों को ही झेलनी पड़ रही है बल्कि यही हाल समूचे देश के किसानों का है जो मंडी में बिचौलियों के हाथों औने-पौने दामों पर अपनी फसल बेचने के लिये मजबूर हैं। किसान आलू पैदा करे या टमाटर, गन्ना उगाए या फल-फूल उपजाये। सबकी व्यथा एक जैसी ही है। इसमें किसी वस्तु का दाम अधिक तेजी से बढ़ जाने पर सरकार अगर हरकत में भी आती है तो जमाखोरों पर छापेमारी के अलावा आयात में इजाफा करने के परंपरागत तौर-तरीकों पर अमल शुरू कर देती है। लेकिन कभी यह कोशिश नहीं होती कि किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य मिले और उपभोक्ताओं को सही कीमत पर बाजार में सामान उपलब्ध हो सके। लिहाजा बिचौलियों की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता। ऐसे में आवश्यकता है कि बाजार में कीमतों के निर्धारण व नियंत्रण पर भी सरकार व प्रशासन की नजर हो। सिर्फ मांग व आपूर्ति के बीच संतुलन के भरोसे बाजार को छोड़े रखने से ना तो उत्पादकों को न्याय मिल सकता है और ना ही उपभोक्ताओं को। इस दिशा में दिल्ली विधानसभा चुनाव के वक्त आम आदमी पार्टी व भाजपा ने भी काफी वायदे किये थे। एक ओर किसानों को मंडी में ही अपनी उपज बेचने की अनिवार्यता समाप्त करने की बात कही गयी थी वहीं दूसरी ओर बाजारों में स्वयंसेवकों की तैनाती का भरोसा दिलाया गया था ताकि मनमानी कीमत वसूलनेवालों पर लगाम कसी जा सके। लेकिन ये सभी बातें सिर्फ बातें ही साबित हुई हैं। वैसे भी अगर किसान खुद ही उपभोक्ताओं को अपना उत्पाद बेचने चला जाये तो वह खेती पर क्या ध्यान देगा और दूसरी ओर खुदरा बाजार के लिये जब तक सभी जींसों का ठोस तरीके से मूल्य निर्धारण नहीं किया जाता तब तक मनमानी कीमत का कैसे पता चल पाएगा। यानि बाजार की असली बीमारी का इलाज किये बिना इस अव्यस्था से निजात पाने की कल्पना भी बेकार ही है। लिहाजा आवश्यकता है कि उत्पादक और उपभोक्ता के बीच कीमतों का अनुपात निर्धारित किया जाये और बिचौलियों व बाजार की अन्य ताकतों को लागत के मुकाबले एक निश्चित अनुपात में ही मुनाफा कमाने की छूट रहे। वर्ना मांग व आपूर्ति के चक्कर में पूरी बाजार व्यवस्था यथावत घनचक्कर बनी रहेगी।   

गुरुवार, 26 मई 2016

जीत के जोश में होश की दरकार

जीत के जोश में होश की दरकार


पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के नतीजों की जो समग्र तस्वीर सामने आयी है उसमें दो बातें बिल्कुल साफ हैं। पहली यह की इसने भाजपा को संभावनाओं के असीमित संसार का दरवाजा दिखा दिया है जबकि दूसरी ओर कांग्रेस को उन सूबों में भी मतदाताओं ने सिरे से नकार दिया है जहां कांग्रेस मुक्त भारत के सपने को साकार करने का सपना देखना भी भाजपा के लिये संभव नहीं माना जा सकता है। यानि इस दफा बड़ी जीत भाजपा के हिस्से में आयी है जबकि करारी व अकल्पनीय शिकस्त का सामना कांग्रेस को करना पड़ा है। लिहाजा हार के बाद अब आत्मचिंतन करने की बारी तो कांग्रेस की ही है जिसे इस समय कुछ भी कहना ऐसा ही होगा मानो जले पर नमक छिड़का जा रहा हो। ऐसे में फिलहाल कांग्रेस के नजरिये इन चुनावी नतीजों का विश्लेषण करने से परहेज बरतना ही बेहतर होगा और उचित यही होगा कि उसे इस हार के कारणों पर विचार करने व उसमें सुधार करने का उपाय तलाशने के लिये छोड़ दिया जाये। लेकिन भाजपा के नजरिये से तो इन चुनावी नतीजों का विश्लेषण तत्काल ही किया जा सकता है जिसे इस जीत के बाद ऐसा लग रहा है मानो उसने दुनियां जीत ली हो। तभी तो पार्टी अध्यक्ष से लेकर प्रधानमंत्री तक भी सार्वजनिक तौर पर अपना उद्गार प्रकट करने में कोई कोताही नहीं बरत रहे हैं। बताया जा रहा है कि यह मोदी सरकार की दो साल की उपलब्धियों के प्रति जनता की स्वीकार्यता का नतीजा है। पार्टी इस जीत के नशे में इस कदर मदहोश है कि उसे बाकी सूबों में अपेक्षित सफलता नहीं मिल पाने का कोई मलाल ही नहीं है। असम की जीत से ही पार्टी पूरी तरह आत्ममुग्ध है। उस पर तुर्रा यह कि पार्टी को पहली दफा केरल में भी खाता खोलने का मौका मिल गया। लिहाजा लाजिमी तौर पर उसकी खुशियों का कोई पारावार ही नहीं है। लेकिन पार्टी की ओर जिस जीत को अब तक की तमाम सफलताओं से अधिक बड़ा बताने की कोशिश हो रही है उसकी गहराई से पड़ताल करें तो पूरा मामला उतना खुशनुमां व उत्साहजनक नहीं दिखता है जितना दिखाने की कोशिश हो रही है। अलबत्ता समग्रता में देखें तो लोकसभा चुनाव के पूर्व तक की स्थिति के नजरिये से तो भाजपा ने वास्तव में अपने प्रदर्शन में अकल्पनीय सुधार किया है लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में नरेन्द्र मोदी का पदार्पण होने के बाद जो भाजपा की तस्वीर बनी है उस लिहाज से इस बार का प्रदर्शन कहीं से भी ऐसा नहीं है जिसके दम पर वह उत्साह में आकर अश्वमेध का घोड़ा खोलने की स्थिति में दिखे। माना कि उसे पहली दफा असम में पूर्ण बहुमत के साथ ही देश के पूर्वोत्तरी हिस्से में प्रवेश का अवसर मिल गया है लेकिन बाकी किसी भी सूबे में वह उस लक्ष्य को कतई हासिल नहीं कर पायी है जिसकी उसे अपेक्षा थी। यहां तक कि असम के जिस चुनावी नतीजे को प्रधानमंत्री भी चौंकानेवाला करार दे रहे हैं वहां भी मत फीसदी के मामले में कांग्रेस ही भाजपा पर भारी रही है और भाजपा के मुकाबले कांग्रेस को डेढ़ फीसदी अधिक वोट मिले हैं। केरल की ही बात करें तो सूबे की तीस फीसदी आबादीवाले इझवा समुदाय के सर्वमान्य सामाजिक संगठन एसएनडीपी को राजनीति में प्रवेश दिलाते हुए बड़ी मेहनत व मशक्कत के बाद बीडीजेएस के नाम से एक नयी पार्टी का गठन कराया गया। लक्ष्य था कि अपने परंपरागत ग्यारह फीसदी अय्यर वोटबैंक के साथ तीस फीसदी इझवा वोटों को जोड़कर सूबे के चुनाव को त्रिकोणीय स्वरूप दिया जाये। लेकिन यह पूरी योजना कागजों पर ही सिमट कर रह गयी और जहां एक ओर भाजपा को सिर्फ एक सीट के साथ सूबे में किसी तरह खाता खोलने का मौका मिल सका वहीं बीडीजेएस तो सियासी तौर पर अपना अस्तित्व भी पैदा नहीं कर सका। कहां तो पार्टी को उम्मीद थी कि उसे तीस फीसदी से भी अधिक वोट मिलेंगे और हकीकत में उसे मिला है सिर्फ साढ़े दस फीसदी वोट। दूसरी ओर पश्चिम बंगाल में तो कांग्रेस और वाममोर्चे के गठजोड़ की घोषणा होने के साथ ही सत्ताविरोधी वोटों में अपनी हिस्सेदारी तलाशने की भी भाजपा में हिम्मत नहीं बची और उसने गिने-चुने एक दर्जन सीटों पर ही अपना ध्यान केन्द्रित कर लिया जिसमें उसके हिस्से में सिर्फ तीन सीटें ही आयीं। इसी प्रकार पुदुचेरी और तमिलनाडु में भी भाजपा के हिस्से में सिफर ही आया है। खैर, ये तमाम तथ्य ऐसे हैं जिनकी उपेक्षा या अनदेखी करने का दिखावा किया जाना तो स्वाभाविक ही है लेकिन पार्टी को अंदरूनी तौर पर गहराई से इस बात की पड़ताल करनी ही होगी कि कमी कहां रह गयी। 

मंगलवार, 17 मई 2016

राष्ट्रपति की विचारणीय चिंता

राष्ट्रपति की विचारणीय चिंता 


देश में ज्ञान, विज्ञान व अनुसंधान के स्तर को लेकर राष्ट्रपति ने अपनी जो चिंता प्रकट की है और जिस तरह के भविष्य का दर्पण दिखाया है वह वाकई विचारणीय भी है और चिंतनीय भी। चिंतनीय इसलिये क्योंकि आखिर कभी तो हमें यह चिंता करनी ही होगी कि हमारी शिक्षा प्रणाली हमें कहां लेकर जा रही है। राष्ट्रपति के ही शब्दों में कहें तो आजादी के बाद से आज तक भारतीय शिक्षण संस्थानों ने एक भी ऐसा देसी छात्र हमें नहीं दिया है जो ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में अपने प्रामाणिक अनुसंधान के दम पर देश को नोबेल पुरस्कार से नवाज सके। एक ओर हमारे शिक्षण संस्थान विश्व की शीर्ष रैंकिंग में दो सौवें स्थान पर आने के लिये भी लगातार जद्दोजहद करते दिखते हैं वहीं सरकार भी इस दिशा में कितनी निश्चिंत है इसका सहज अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि देश की जीडीपी का महज आधा फीसदी ही शिक्षण, प्रशिक्षण व शोध के क्षेत्र में खर्च के लिये आवंटित किये जाने की परंपरा लगातार चली आ रही है। यानि सरकार किसी भी दल की क्यों ना रही हो, शिक्षा को कभी प्राथमिकता नहीं मिल सकी। वह भी तब जबकि हम खम ठोंकते हैं उस चीन को हर मोर्चे पर पीछे छोड़ने का जो अपनी जीडीपी का लगभग सवा दो फीसदी हिस्सा सिर्फ ज्ञान, विज्ञान व अनुसंधान पर ही खर्च करता है। यानि शिक्षा के क्षेत्र में बतकही व बतरस से आगे बढ़कर कुछ ठोस करने की ना तो कभी नीति रही और ना नीयत। इसमें तकरीबन ग्यारह वर्षों तक वित्तमंत्री रहते हुए देश के आय-व्यय में संतुलन बिठा चुके प्रणब दा की यह स्वीकारोक्ति अवश्य ही सराहनीय है कि किसी भी वित्तमंत्री के लिये बाकी खर्चों से बचाकर शिक्षा के मद में आवंटन बढ़ाना बेहद मुश्किल व सिरदर्दी का काम हो सकता है। लेकिन यह करना तो पड़ेगा। वर्ना राष्ट्रपति ने भविष्य की जो तस्वीर दिखायी है उसके मुताबिक 2030 में जब विश्व का हर दूसरा व्यक्ति भारत का नागरिक होगा और उसमें से भी आधे की उम्र 25 वर्ष के भीतर की होगी तब उस विशाल युवा समुद्र को समुचित तौर पर विश्व व्यवस्था में अपना स्थान बनाने में कितनी मुश्किलें पेश आएंगी इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। लिहाजा आज सिर्फ कौशल भारत, कुशल भारत का जो नारा बेहद जादूई प्रतीत हो रहा है वह उन दिनों किसी काम का नहीं बचेगा अगर कुशलता की बुनियाद हमारे अपने अनुसंधान पर आधारित नहीं होगी। यानि आवश्यकता इस बात की है कि हम शोध व अनुसंधान के क्षेत्र में विश्व की मांग व मानवता की जरूरतों के मुताबिक अपना ध्यान केन्द्रित करें और रटंत विद्या की परंपरा से अलग हटकर कुछ नया करने की पहल करें। यह बात तो हमारे प्रधानमंत्री भी कई दफा स्वीकार कर चुके हैं कि मौजूदा युग ज्ञान का युग है। लिहाजा ज्ञान में सिर्फ पारंगत होना ही काफी नहीं हो सकता, इसमें दुनियां से आगे निकलने की आवश्यकता है। जिसके लिये ना सिर्फ हमारे शिक्षण संस्थानों को अपने पाठ्यक्रमों की गुणवत्ता में व्यापक सुधार लाना होगा बल्कि छात्रों को भी भविष्य की चुनौतियों के प्रति जागरूक होना पड़ेगा और सरकार को भी इस दिशा में अभी से समुचित निवेश की व्यवस्था करनी होगी। अगर सभी मोर्चों पर एक साथ पहलकदमी नहीं हुई तो 14 साल बाद 25 साल के आयुवर्ग की विश्व की एक-चौथाई भारतीय आबादी का भविष्य सुधारना नामुमकिन होगा और भारत को विश्वगुरू के पद पर दोबारा प्रतिष्ठित करने का सपना कभी पूरा नहीं हो पाएगा। आज 119 विश्वविद्यालय व 37,000 कॉलेजों का देश होने के बावजूद भारत शिक्षा के क्षेत्र में विश्व मानचित्र पर कहीं नहीं दिख रहा है। हम विश्व में तृतीय व चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों के प्रमुख आपूर्तिकर्ता के तौर पर पहचाने जा रहे हैं। ना हमें कोई नोबेल के लिये नामांकित करवा पा रहा है और ना ही अपने अनुसंधानों के दम पर हम विश्व को चमत्कृत कर पा रहे हैं। हम तो इसी से संतोष कर लेते हैं कि आमर्त्य सेन सरीखे किसी भारतीय मूल वाले को नोबेल मिल गया अथवा गॉड पार्टिकल का नामकरण हमारे सीबी रमण के नाम पर हो गया। लेकिन इससे बात बनती नहीं, बिगड़ती ही जा रही है। जिसे सुधारने के अलावा दूसरा कोई विकल्प ही नहीं है। चाहे इस क्षेत्र को तत्काल प्राथमिकता मिले या भविष्य में, मिलनी तो है ही। बस चिंता इस बात की है कि इसमें जितनी देरी होगी उसकी भरपायी भी उतनी ही मुश्किल होती चली जाएगी।    

शुक्रवार, 13 मई 2016

बेमानी गीत का सियासी संगीत

बेमानी गीत का सियासी संगीत


कहते हैं कि जब रोम जल रहा था तब नीरो बांसुरी बजा रहा था। ऐसी ही तस्वीर इन दिनों देश के सियासत की भी दिख रही है। कहां तो देश जल रहा है रक्षा खरीद में भ्रष्टाचार से, सूखे पर हो रहे सियासी कारोबार से, महंगाई के बाजार से और प्रकृति के अत्याचार से। लेकिन जिनके कांधों पर इन मसलों को सुलझाने की जिम्मेवारी है वे अलग ही राग आलाप रहे हैं। उनकी धुन भी अलग है और सरगम भी, जो आम लोगों की अपेक्षाओं व आवश्यकताओं से कहीं मेल ही नहीं खाती। यहां बहस हो रही है प्रधानमंत्री की शैक्षणिक योग्यता पर जिससे आम लोगों का कोई वास्ता ही नहीं है। लेकिन मुद्दा चाहिये ताकि प्रधानमंत्री को लपेटे में लिया जा सके, उनकी खिंचाई की जा सके और उन्हें नीचा दिखाया जा सके। इसके लिये कुछ नहीं तो यही सही। हालांकि यह बात इस विवाद को तूल देनेवाले भी मान रहे हैं कि प्रधानमंत्री बनने के लिये किसी खास शैक्षणिक योग्यता या अहर्ता की कोई बाध्यता नहीं है। ना तो संवैधानिक तौर पर और ना ही सामाजिक, राजनीतिक या पारंपरिक तौर पर। इसके बावजूद कभी कहा जाता है कि जिस नरेन्द्र मोदी ने कला संकाय में दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक की डिग्री ली वह गुजरात के नरेन्द्र दामोदरदास मोदी नहीं बल्कि राजस्थान का नरेन्द्र महावीर मोदी है। फिर जब प्रमाणपत्र के साथ प्रधानमंत्री की अंकतालिका भी भाजपा द्वारा सार्वजनिक कर दी जाती है तो उसे स्वीकार करने के बजाय एक नयी बहस छेड़ी जाती है कि भाजपा ने जो भले ही गुजरात विश्वविद्यालय स्पष्ट शब्दों में यह प्रमाणित कर रहा है कि भाजपा ने प्रधानमंत्री की जो राजनीतिशाष्त्र में मास्टरी का प्रमाणपत्र जारी किया है वह पूरी तरह वैध है। लेकिन गुजरात विश्वविद्यालय की बात पर ध्यान देना किसी को गवारा नहीं है। सब पिले हुए हैं दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रमाणपत्र को गलत बताने में, उसे झूठा व फर्जी साबित करने में। अब इसका इलाज तो यही हो सकता है कि दिल्ली विश्वविद्यालय ही अपने पुराने रिकार्ड खंगालकर यह प्रमाणित करे कि भाजपा ने प्रधानमंत्री का जो प्रमाणपत्र प्रस्तुत किया है वह असली है या नकली। इसके अलावा और कोई यह प्रमाणित भी नहीं कर सकता। किसी के अख्तियार में ही नहीं है। वर्ना अगर यकीन करें तो उस दौरान अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के दिल्ली प्रांत के अध्यक्ष रहे मौजूदा वित्तमंत्री अरूण जेटली भी यह बताने से नहीं हिचक रहे हैं कि नरेंद्र मोदी अहमदाबाद से दिल्ली आकर बीए की परीक्षा दिया करते थे। साथ ही उनके बयान की पुष्टि वह नरेश गौड़ भी कर रहे हैं जो विद्यार्थी परिषद के पूर्णकालिक सदस्य थे और परिषद के कार्यालय में रहा करते थे। उनकी दलील है कि मोदी जब भी परीक्षा देने दिल्ली आते थे तो उनके साथ विद्यार्थी परिषद के कार्यालय में ही ठहरते थे। यानि गवाह तो सामने हैं जो चीख-चीखकर यह दुहाई दे रहे हैं कि मोदी ने दिल्ली विश्वविद्यालय से ही बीए का इम्तिहान दिया था। लेकिन इन गवाहों पर भला विरोधी व विपक्षी पार्टियां क्यों यकीन करे। उन्हें तो ये सभी गवाह भाजपा के जरखरीद ही नजर आयेंगे क्योंकि जेटली तो आज भी पार्टी के शीर्ष रणनीतिकार बने हुए हैं और नरेश भी भाजपा के टिकट से चार दफा दिल्ली विधानसभा के सदस्य चुने जा चुके हैं। ऐसे में अब पूरी बहस का अंतिम व निर्णायक अंत तो तभी हो सकता है जब दिल्ली विश्वविद्यालय की ओर से इसके बारे में कोई ठोस स्पष्टीकरण आये और वह प्रामाणिक तौर पर मामले की हकीकत का खुलासा करे। लेकिन सवाल है कि 38 साल पुराना रिकार्ड खंगालना भी किसी मुसीबत से कम नहीं है। वह भी तब जबकि इस बीच रिकार्ड रूम में कई दफा अग्निकांड हो चुका हो और दीमकों, तिलचट्टों, चूहों व छिपकलियों की सैकड़ों-हजारों पीढि़यां वहां अपनी रिहाइश बना चुकी हों। ऐसे में उम्मीद तो कम ही है कि उस वक्त का पूरा डाटा यथावत संजोया हुआ मिल जायेगा, वह भी उतनी ही साफ-सुथरी व स्वच्छ हालत में, जैसे उन्हें रखा गया था। खैर, यह जिम्मेवारी तो दिल्ली विश्वविद्यालय की ही है और जिस गति से यह विवाद दिनोंदिन परवान चढ़ रहा है और भाजपा ने भी प्रमाणपत्र की स्वप्रमाणित प्रति सार्वजनिक कर दी है उसके बाद इसे सही या गलत बताने का दबाव तो दिल्ली विश्वविद्यालय पर बढ़ना लाजिमी ही है। लेकिन इस बेमानी व विशुद्ध सियासी मसले को तूल देकर जिस तरह से आम लोगों के दुख-सुख से जुड़े मसलों की अनदेखी की जा रही है उसे कैसे जायज ठहराया जा सकता है।  

शनिवार, 7 मई 2016

बवालियों की गिरफ्त में कोतवाली

बवालियों की गिरफ्त में कोतवाली  

संसद की मौजूदा तस्वीर के तहत तो बवालियों का ही कोतवाली में बोलबाला दिख रहा है। कहां तो इन बवालियों की आंखों में कोतवाली का खौफ स्पष्ट नजर आना चाहिये था और कहां कोतवाल को ही इन बवालियों ने सवालों के कठघरे में खड़ा करने की कोशिशें शुरू कर दी हैं। खास तौर से अगस्ता वेस्टलैंड हेलीकाॅटर खरीद में हुए घोटाले के मामले को लेकर जिस तरह से अपनी कमियों व खामियों को स्वीकार करने के बजाय पूर्ववर्ती सरकार के रणनीतिकारों ने मौजूदा सरकार की नीति व नीयत पर ही दोषारोपण आरंभ कर दिया है उससे तो यही लग रहा है कि खुद के दामन पर लगे बदनामी का दाग धोने के लिये इन्होंने सरकार का दामन दागदार करने की राह पकड़ ली है। तभी तो अगस्ता के विवाद पर झूठे तथ्यों के सहारे भाजपा को भी गुनाह में बराबर का भागीदार बताने व अपनी गलतियों पर पर्दा डालने की कोशिशें शुरू की गयीं। पहले तर्क गढ़ा गया कि अगस्ता को काली सूची में डालने का काम पूर्ववर्ती संप्रग सरकार ने ही किया था। लेकिन तथ्यों का खुलासा होने के बाद जब इस दलील का दम निकल गया तो कहा गया कि कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व का चरित्र हनन करने के लिये भारतीय प्रधानमंत्री ने इटली के प्रधानमंत्री के साथ एक गुप्त समझौता किया है। जिसके तहत भारतीय मछुआरों की हत्या का मुकदमा झेल रहे इतालवी नौसैनिकों को बचाने के एवज में इटली की अदालत में वहां की जांच एजेसियों ने ऐसी बेबुनियाद कहानी पेश की है जिसके चलते हेलीकाॅप्टर खरीद में दलाली का मामला सामने आया है। लेकिन यह दलील भी सरकार ने औपचारिक तौर पर संसद में खारिज कर दी जिसे कांग्रेस ने स्वीकार भी कर लिया। अगर सरकार की सफाई कांग्रेस ने स्वीकार नहीं की होती तो उसके पास विशेषाधिकार हनन की नोटिस देने का अख्तियार भी था। लेकिन सरकार द्वारा गोपनीय समझौते की बात को ही नहीं बल्कि दोनों देशों के प्रधानमंत्री की मुलाकात होने को भी नकार दिये जाने को कांग्रेस द्वारा चुपचाप स्वीकार कर लिये जाने से साफ है कि उसे अपनी दलील के थोथेपन का पहले से पता था। खैर, जब इस दलील से भी दाल नहीं गल सकी तो एक नया सुर्रा छोड़ा गया कि जब पूर्ववर्ती सरकार को हेलीकाॅप्टर सौदे में गड़बड़ी का पता चला तो ना सिर्फ कंपनी द्वारा जमा करायी गयी धरोहर राशि जब्त कर ली गयी बल्कि उसके द्वारा की गयी तीन हेलीकाॅप्टरों की आपूर्ति का भुगतान भी रोक दिया गया जिससे सरकारी खजाने को तकरीबन तीन हजार करोड़ का फायदा ही हुआ, कोई नुकसान नहीं हुआ। अब ऐसी दलीलों को सामने रखकर अगर यह बताने की कोशिश की जा रही है कि चुंकि इस सौदे में देश को फायदा ही हुआ लिहाजा इसमें दलाली खाए जाने के सवाल को समाप्त कर दिया जाना चाहिये तो जाहिर तौर पर इस दलील को शायद ही कोई स्वीकार करे। क्योंकि इस सौदे में हुए नफा-नुकसान का मामला तो अलग ही है और अगर इसमें देश को घाटा नहीं होने दिया गया तो इसका एहसान नहीं जताया जा सकता। अलबत्ता सरकार का तो कर्तव्य ही है कि वह हर मामले में देश का हित सुनिश्चित करे। लेकिन देश का हित सुनिश्चित करने के एवज में किसी को दलाली खाने की छूट तो नहीं दी जा सकती। यहां सवाल तो उस दलाली की रकम का है जिसे बांटनेवाले ने अपना जुर्म कबूल भी कर लिया है और और अपने इस गुनाह की सजा भी भुगत रहा है। लेकिन दलाली लेनेवाले का कहीं कोई अता-पता ही नहीं है। इस सवाल को तथ्यों के साथ सदन में प्रस्तुत करने के क्रम में जब सुब्रमण्यम स्वामी ने असली दलाल की स्वीकारोक्ती का फर्रा पेश कर दिया तो उसका ठोस जवाब देने के बजाय पूछा जा रहा है कि उनके पास ये कागजात कहां से आये। यानि कागज में दर्ज तथ्यों पर चर्चा करने के बजाय बवाल काटने की कोशिश हो रही है दस्तावेज के स्रोत को लेकर। अब ऐसे सवालों और इन बवालों के सहारे अगर विवाद के दाग को छिपाने की कोशिश होगी तो दाग धुलेंगे या गहरे होंगे इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। लेकिन मसला है कोतवाली में बवालियों के कोहराम का। इसका उपाय तो तभी निकल सकता है जब देश में त्वरित न्याय की व्यवस्था मजबूत हो। वर्ना जिस देश में 1992 में बम फोड़नेवाले आतंकी याकूब मेनन को फांसी के तख्ते तक पहुंचाने में 23 साल का वक्त लग जाता हो वहां की कोतवाली में बवालियों का बोलबाला दिखना स्वाभाविक ही है। 

गुरुवार, 5 मई 2016

अराजकता की आजादी

अराजकता की आजादी


लोकतांत्रिक व्यवस्था में हर किसी को आजादी है अपनी बात रखने की। यह आजादी होनी भी चाहिये वर्ना इसके बिना तो लोकतंत्र की कल्पना भी नहीं की जा सकती। लेकिन इसका यह मतलब भी नहीं है कि अपनी बात रखने के लिये ऐसे तौर-तरीकों को अमल में लाया जाये जो व्यवस्था के लिये सिरदर्दी का सबब बन जाये। अलबत्ता स्थापित व्यवस्था पर हमला करने के क्रम में भी अपेक्षित यही है कि इसमें लोकतांत्रिक भावनाओं, मूल्यों व परंपराओं को पूरी अहमियत दी जाये। ऐसा कुछ भी नहीं किया जाये जिससे लोकतांत्रिक मूल्यों को आघात पहुंचे या व्यवस्था के लिये उसे संभावना मुश्किल हो जाये। अगर ऐसी कोई नौबत आती है तो उसे अभिव्यक्ति की आजादी के बजाय अराजकता का नाम ही दिया जाएगा और लोकतंत्र में अराजकता के लिये तो कोई स्थान हो ही नहीं सकता। लिहाजा अभिव्यक्ति की आजादी और अराजकता के बीच की लक्ष्मण रेखा को तो हम सबों को पहचानना ही होगा। गौर से देखें तो इन दिनों यह लक्ष्मण रेखा लगातार कमजोर ही नहीं पड़ रही है बल्कि कई मामलों में तो विलुप्त भी हो जा रही है। उसका इस कदर अतिक्रमण हो जाता है जिसमें यह विभेद करना भी मुश्किल हो जाता है कि इसे अराजकता कहें या अभिव्यक्ति की आजादी। यह स्थिति बहुचर्चित जेएनयू विवाद के मामले में भी दिखी और गुजरात के पाटीदार आंदोलन में भी। यहां तक कि हरियाणा में जाटों के लिये आरक्षण की मांग को लेकर हुए हिंसक आंदोलन के मामले को भी अराजकता की स्थिति उत्पन्न करने के प्रयास का नाम देना ही उचित होगा। कमोबेश यही स्थिति अब दिल्ली में डीजल से चलनेवाली टैक्सियों पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा लगायी गयी रोक के मामले में भी दिख रही है। माना कि अदालत के इस फैसले से सूबे के तकरीबन एक तिहाई टैक्सी चालकों यानि 22 हजार उन परिवारों के सामने रोजी-रोटी का संकट उत्पन्न हो गया है जो डीजल से चलनेवाली टैक्सी पर आधारित व आश्रित हैं। लेकिन इसका यह कतई मतलब नहीं है कि अगर अदालत से उन्हें राहत नहीं मिल पायी है तो वे सड़क पर उतर कर लोगों का जीना दूभर करें। हरियाणा व उत्तर प्रदेश को दिल्ली से जोड़नेवाले राजमार्गों पर चक्का जाम करें। वाहनों की आवाजाही ठप कर दें। यह अख्तियार तो उन्हें कतई हासिल नहीं है और इस तरह की हरकतों को तो अराजकता की स्थिति उत्पन्न करने की कोशिश का ही नाम दिया जाएगा। इसे अभिव्यक्ति की आजादी तो कतई नहीं कह सकते। कहें भी कैसे? हालत यह है कि दिल्ली इन दिनों विश्व की सबसे प्रदूषित राजधानी घोषित होने की स्थिति में आती जा रही है। यहां की जहरीली होती आबोहवा को सुधारने के लिये सरकार भी प्रयत्नशील है, एनजीटी प्राधिकरण भी अदालत भी। इसके लिये तमाम उपाय किये जा रहे हैं। चाहे आॅड इवन का फार्मूला लागू करना हो या डीजल से चलनेवाली गाडि़यों का पंजीकरण प्रतिबंधित करना हो। हर मुमकिन कदम उठाये जा रहे हैं ताकि लोगों को खुलकर सांस लेने लायक वातावरण उपलब्ध कराया जा सके। इस दिशा में समाज भी प्रयत्नशील है और स्कूली बच्चे भी जन जागरूकता फैलाने के अभियान में जुटे हुए हैं। लेकिन अफसोस इस बात का है कि वातावरण व माहौल में सुधार के पक्षधर तो सभी हैं लेकिन इसके प्रति अपनी जिम्मेवारी समझना बहुतों को गवारा नहीं है। माननीय सांसदों की मांग है कि उन्हें आॅड इवन से अलग रखा जाये तो वकीलों को भी इस योजना का अनुपालन करना रास नहीं आ रहा। कोई बड़ी बात नहीं कि भविष्य में चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े लोग भी इससे छूट की मांग करेंगे और शिक्षण क्षेत्र से जुड़े लोग भी। फिर विद्यार्थी और पुलिस विभाग के लोग ही क्यों इसका अनुपालन करे। सबकी अपनी दलीलें हैं कि अगर वे नियत समय पर नियत जगह नहीं पहुंचे तो अनर्थ हो सकता है। लेकिन मसला छूट के लिये दी जानेवाली दलीलों का नहीं है। सवाल है समाज की सोच का। वह सोच जो व्यवस्था को सुधारने के लिये कुछ होते हुए तो देखना चाहती है लेकिन खुद कुछ करना नहीं चाहती। खुद पर जरा सा बोझ पड़े, थोड़ी सी परेशानी पेश आए तो ऐसी सोच के लोग बिलबिला उठते हैं। लेकिन कहते हैं कि जो खुद की मदद नहीं करता उसकी मदद भगवान भी नहीं कर सकते, फिर सरकार, प्रशासन या अदालत की तो बिसात ही क्या है। यह तो चलती ही व्यवस्था से है जिस पर अपनी बात मनवाने के लिये प्रहार करते हुए लोग यह भी भूल जा रहे हैं कि कहां उन्होंने अभिव्यक्ति की आजादी का अतिक्रमण करते हुए अराजकता की ओर कदम बढ़ा दिया है। जाहिर है कि इस सोच को तो बदलना ही होगा। व्यवस्था को सुधारने के लिये पहले खुद सुधरना होगा।