इस बात में कोई दो राय नहीं हो सकती कि केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार ने अपने कार्यकाल में ना सिर्फ कई मामलों में विकास का कीर्तिमान स्थापित किया है बल्कि प्रभावशाली व कड़े फैसले भी लिये हैं जिससे ना सिर्फ घरेलू अर्थव्यवस्था की बल्कि विश्व स्तर पर देश की छवि में भी काफी निखार आया है। हालांकि मोदी सरकार के कड़े फैसलों का आम लोगों को कितना लाभ मिला है और इसके एवज में कितना बोझ सहन करते हुए नुकसान उठाना पड़ा है इस पर अलग से बहस हो सकती है। लेकिन इस बात में कोई दो राय नहीं है कि मोदी सरकार ने अपने पूर्ववर्तियों की तुलना में काफी हद तक संतुलित, बहुआयामी, विस्तृत और तेज गति व पारदर्शिता के साथ काम किया है। लेकिन इस बात को भी नकारा नहीं जा सकता है कि सरकार ने जितना काम किया है उससे कहीं अधिक काम को गिनाने में अपनी ऊर्जा खर्च की है। जितने काम की गिनती गिनाई जा रही है उतना जमीन पर बदलाव नहीं दिख रहा है। माना कि सरकार ने योजनाएं आरंभ की और उसे जमीनी स्तर पर पहुंचाने का प्रयास भी हुआ लेकिन इसे ऐसे गिनाना आम लोगों में चिढ़ का सबब बन रहा है मानो सरकार ने देश पर कोई बहुत बड़ा उपकार कर दिया हो और देशवासियों को उसका कृतज्ञ होना चाहिये। वास्तव में सरकार को चुना ही गया था देश हित में काम करने और देश का विकास करने के लिये। लिहाजा सरकार के संचालकों को तो आम लोगों का कृतज्ञ होना चाहिये कि उन्हें जनता ने काम करने का मौका दिया। साथ ही सरकार के संचालकों को इस बात के लिये अपने गिरेबान में भी झांकना चाहिये कि जिन अच्छे दिनों की उम्मीद बंधाई गई थी उसे वे कितना पूरा कर पाए और कितना नहीं कर पाए। सरकार बनाने से पहले सपने तो चांद-तारों के दिखाए गए थे लेकिन हकीकत में उन सपनों को पूरा कर पाना अब तक संभव नहीं हो पाया है। बात चाहे सबको अपना घर दिलाने की हो या सबको स्वास्थ्य बीमा का लाभ दिलाने की। गंगा को पूरी तरह अविरल व निर्मल करने की हो अथवा भ्रष्टाचारियों को सलाखों के पीछे पहुंचाने की। हर देशवासी को चैबीसों घंटे बिजली पाने का अधिकार दिलाने की बात हो, हर हाथ को काम या भूख से पूर्ण मुक्ति की। ये वो वायदे हैं जो मोदी सरकार के मौजूदा संचालकों ने स्पष्ट शब्दों में पिछले चुनाव के दौरान किये थे। लेकिन उपरोक्त में से एक भी वायदा अब तक पूरा नहीं किया जा सका है। आज भी ये बुनियादी जरूरतें आम लोगों के लिये सपना ही बनी हुई हैं। जमीनी धरातल पर सपनों को उतारने की मियाद 2022 की बताई जा रही है जबकि पूरा देश आजादी की 75वीं वर्षगांठ मनाएगा। लेकिन यह मियाद बताते समय सरकार के संचालक यह भूल जाते हैं कि जब उन्होंने इन सपनों को पूरा करने का वायदा करते हुए आम लोगों से वोट मांगे थे तब सरकार केवल 2019 तक के लिये ही चुनी जानी थी, 2022 तक के लिये नहीं। लिहाजा काम तो उन्हें कायदे से 2019 में ही पूरा करना चाहिये था। लेकिन मसला है कि सरकार और विपक्ष के बीच जारी बेमानी मसलों की खींचतान से फुर्सत मिले तो इन बातों पर किसी का ध्यान जाए। सरकार कतई नहीं चाहेगी कि लोगों को वे पुराने वायदे याद आएं और अगर किसी की जहन में उन सपनों के पूरा होने की उम्मीद बची भी हो तो वह 2022 के भरोसे शांत रहे। दूसरी ओर विपक्ष भी इन मसलों को तूल नहीं पकड़ने देना चाहेगा क्योंकि कल को अगर सत्ता की बागडोर उसके हाथों में आयी तो उसे इन सपनों को 2022 तक पूरा करना ही होगा। लेकिन इस सबके बीच आम लोगों के सपने और उम्मीदें हवा हो रहे हैं। इसी का नतीजा है कि बीते दिनों पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में भाजपा को जनता ने खारिज कर दिया। हालांकि बाकी मसलों पर तो कम से कम 2022 तक की उम्मीद बंधाई जा रही है लेकिन भ्रष्टाचार के जिन मामलों को आगे करके कांग्रेस को बदनाम व अलोकप्रिय किया गया उसके गुनहगारों को सत्ता में रहते हुए भी सजा नहीं दिला पाना निश्चित तौर पर यही बताता है कि इन मामलों को केवल राजनीतिक लाभ लेने के लिये ही तूल दिया गया था और अब एक बार फिर चुनाव करीब आता देख कर ऐसे मामलों को दोबारा उठाया गया था। वर्ना जिस काॅमनवेल्थ घोटाले को लेकर भाजपा ने आसमान सिर पर उठाया हुआ था उसके गुनहगारों की पहचान करना भी अब तक गवारा नहीं किया गया है। जिस राॅबर्ट वाड्रा को सरकार बनते ही सलाखों के पीछे डाले जाने की बात कही जा रही थी वह आज भी छुट्टा घूम रहा है। उसके खिलाफ ठोस कार्रवाई तो अब तक नहीं हुई अलबत्ता उस पर कीचड़ उछालने का सिलसिला बदस्तूर जारी है। यहां तक कि अगस्ता वेस्ट लैंड हेलीकाॅप्टर घोटाले में सीधे तौर पर कांग्रेस के शीर्ष संचालक परिवार को रिश्वतखोर बताया गया उसका सबसे बड़ा मास्टरमाइंड क्रिश्चन मिशेल को भारत लाने के बाद भी सिर्फ उसका नाम लेकर प्रधानमंत्री मोदी कांग्रेस को डराने और बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं। अगर वाकई मिशेल ने कोई सुराग दिया है तो अब तक पूछताछ भी क्यों नहीं हुई है गांधी परिवार के सदस्यों से? ये वो तमाम सवाल हैं जो आम लोगों के मन में उठ रहे हैं और उठने भी चाहिये। आखिर जिन उम्मीदों के पूरा होने की कल्पना करके लोगों ने भाजपा को सरकार बनाने का मौका दिया उस मसले पर तो मोदी सरकार के संचालकों से सीधा सवाल पूछा ही जा सकता है। क्योंकि ये सपने इन्हीं लोगों ने दिखाये थे। हालांकि सवाल तो उन सपनों पर भी पूछा जाना चाहिये जिसको पूरा करने का वायदा करते हुए भाजपा का गठन किया गया था लेकिन मौजूदा संचालकों को असहज करने वाले गौ-हत्या बंदी, राम मंदिर निर्माण, धारा-370 और समान नागरिक संहिता सरीखे मसलों को अगर छोड़ भी दें तो जो वायदे इन्हीं लोगों ने किये थे उन्हें भी तो अब तक पूरा नहीं किया गया है। इसके बावजूद अगर काम करने से अधिक गिनाने की रणनीति अपनाई जा रही है तो निश्चत ही यह वैसा ही आत्मघाती रहेगा जैसा वर्ष 2004 में भारत उदय और इंडिया शायनिंग जैसे लोगों को चिढ़ाने वाले नारों ने बैक-फायर किया था।
विचार-प्रवाह
बुधवार, 26 दिसंबर 2018
मंगलवार, 25 दिसंबर 2018
इमरान का बचकानापन
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान बेशक स्थानीय घरेलू राजनीति में अपनी कामयाबी का झंडा गाड़ चुके हों लेकिन वास्तविकता यह है कि वे आज भी सिर्फ एक क्रिकेटर की मानसिकता के बोझ तले ही दबे हुए हैं। क्रिकेट को दरअसल माइंडगेम कहा जाता है। यह जितना जमीन पर खेला जाता है उससे कहीं अधिक दिमाग में होता है। विरोधी पक्ष के दिमाग को पढ़ना और उसके दिमाग को अपने मनमुताबिक नियंत्रित करना क्रिकेट का एक अहम पहलू है। इसकी के तहत विरोधी पक्ष के बारे में ऊटपटांग बातें की जाती हैं और उसे उकसाने का प्रयास किया जाता है। उसकाने की कोशिश के पीछे रणनीति रहती है विरोधी पक्ष की एकाग्रता को भंग करना और उसे गुस्से व आक्रोश से भर देना ताकि उसका असर विरोधी के खेल पर पड़े और वह अपना स्वाभाविक खेल ना दिखा पाए। इसी रणनीति को इमरान ने भारत और पाकिस्तान के रिश्तों के मामले में इस्तेमाल करके यह बेहतर तरीके से जता दिया है कि बेशक वे प्रधानमंत्री के ओहदे पर पहुंच चुके हों लेकिन उनकी मानसिकता क्रिकेटर वाली ही है। वर्ना वे कतई भारतीय मुसलमानों की स्थिति के बारे में टिप्पणी नहीं करते। या फिर ऐसी टिप्पणी करने से पहले वे पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की स्थिति पर विचार कर लेते। सच तो यह है कि इस बचकाने बयान के पीछे इमरान की वही रणनीति काम कर रही है जिसका खुलासा करते हुए उनके विदेशमंत्री ने करतारपुर गलियारे के शिलान्यास के मौके पर कहा था कि पाकिस्तान की ओर से फेंकी गई गुगली में भारत फंस गया है। लेकिन जब पाकिस्तान को लगा कि उसकी गुगली बेकार चली गई तो अब उसने उकसावे की रणनीति पर अमल आरंभ कर दिया है। पहली उकसावे की बात उसने बीते दिनों करतारपुर के मामले को लेकर ही की जिसके तहत करतारपुर का इलाका भारत को देने के एवज में कोई अन्य जमीन का टुकड़ा लेने के कथित भारतीय प्रस्ताव को उसने ढ़ोल पीटकर नकारने की पहल की। जबकि सच तो यह है कि पाकिस्तान से जमीन की अदला बदली का तो कोई सवाल ही नहीं है बल्कि अभी तो भारत को उसके कब्जे से अपनी जमीन का काफी बड़ा हिस्सा छुड़ाना है। उसके कब्जे में मौजूद अपनी जमीन छुड़ाने का प्रयास करने के बजाय भारत की ओर से पाकिस्तान के किसी जमीन की अदला बदली का प्रस्ताव सामने लाया जाएगा इसकी तो कल्पना करना भी मूर्खतापूर्ण ही है। लेकिन पाकिस्तान की ओर से ऐसे प्रचारित किया गया मानो भारत ने उसके पास इस तरह का कोई प्रस्ताव प्रस्तुत किया हो। लेकिन भारत की ओर से इस मामले में सधी प्रतिक्रिया दिया जाना भी जरूरी नहीं समझा गया तो अब भारत में हलचल मचाने की एक नयी तरकीब के तहत भारतीय मुसलमानों की स्थिति को लेकर अनावश्यक व बचकाना बयान इमरान खान की ओर से दिया गया है। हालांकि बेहद खुशी और गर्व की बात है कि इमरान के इस बयान का मुंहतोड़ जवाब देने के लिये सबसे पहले असदुद्दीन ओवैसी और नसीरूद्दीन शाह जैसे ही लोग सामने आए और उन्होंने पाकिस्तान के अल्पसंख्यकों के मसले को उठाकर इमरान को आइना दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इसके अलावा स्वाभाविक तौर पर हमारे गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने भी इमरान को उनकी औकात बताई है और पाकिस्तान की वास्तवकि जमीनी हकीकत को बेपर्दा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। लेकिन इस सबके बीच असली बात पर्दे के पीछे ही रह गयी कि आखिर इमरान ने क्या सोच कर ऐसा बयान दिया। अव्वल तो भारत की अंदरूनी बातों के बारे में बोलने का ना तो उन्हें कोई अख्तियार है और ना ही उनकी हैसियत, स्थिति या औकात है कि वे किसी भी मामले में भारत के सामने खड़े हो सकें। और दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि अगर उनके देश में अल्पसंख्यकों को मानवीय अधिकार भी मिले होते तो संभव था कि उनकी बातों को विश्व बिरादरी द्वारा गंभीरतापूर्वक सुना भी जा सकता था। लेकिन पाकिस्तान की अंदरूनी हालत तो यह है कि आजादी के बाद पाकिस्तान की कुल आबादी में अल्पसंख्यकों की हिस्सेदारी जहां 32 फीसदी थी वह घटकर अब सात फीसदी पर आ गई है उसमें भी हिन्दुओं की तादाद महज तीन फीसदी से कुछ ही ज्यादा बची है। जो बचे भी हैं उन्हें जानवरों से भी बदतर स्थित में गुजर बसर करने के मजबूर होना पड़ रहा है और उन्हें वहां की दोयम दर्जे की नागरिक सुविधाएं ही मुहैया कराई जाती हैं। इसी बदतर माहौल का नतीजा है कि जो एक बार पाकिस्तान से बाहर निकलने में कामयाब हो जाता है वह दोबारा कतई वहां वापस लौटने के लिये तैयार नहीं होता है और ऐसे शरणार्थियों को बाहर निकालने की अमानवीयता दिखा पाना किसी भी देश के लिये संभव नहीं हो पाता है। जबकि भारतीय मुसलमानों को यहां अलग करके नहीं देखा जाता बल्कि भारत पर जितना अधिकार किसी अन्य को हासिल है उससे रत्ती भर भी कम मुसलमानों को नहीं है। यही वजह है कि किसी भी देश में भारत का कोई शरीफ मुसलमान शरणार्थी के तौर पर नहीं रह रहा है। खैर, इमरान ने जो बयान दिया है उसके पीछे उनकी कतई यह सोच नहीं है कि वे मुसलमानों को लेकर चिंतित है अथवा उनकी भारतीय मुसलमानों से कोई हमदर्दी है। वर्ना बंटवारे के बाद भारत छोड़ कर जानेवाले मुसलमानों को पाकिस्तान में आज भी मुहाजिर कह कर नहीं पुकारा जाता और उनके साथ बेगाना सलूक नहीं किया जाता। सच तो यह है कि इमरान का यह बयान उस खुराफाती रणनीति का हिस्सा है जिसके तहत वे भारत को उकसा कर उससे पाकिस्तान के बारे में तीखी बातें सुनना चाहते हैं। दरअसल उनकी ख्वाहिश है कि मीठी बातें ना हो सकें तो कम से कम तीखी बातें ही हों ताकि वे अपने देश की जनता को यह तो बता सकें कि वे भारत के मोर्चे पर कुछ कर रहे हैं। दरअसल वे भारत के मोर्चे पर कुछ करते हुए दिखना चाह रहे हैं जबकि भारत की ओर से बारंबार यह स्पष्ट किया जा चुका है कि अगर कुछ कर दिखाना है तो पहले मुंबई हमले के मास्टरमाइंड के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए और उसे उसके करतूतों की कठोरतम सजा दिलाई जाए। इसके अलावा सीमा पार से आतंकवाद को धकेलने का सिलसिला बंद किया जाए और पाकिस्तान की धरती से भारत के खिलाफ हो रहे साजिश के सिलसिले को बंद किया जाए। जब तक ये दोनों बातें अमल में नहीं आएंगी तब तक पाकिस्तान के किसी भी बयान या हरकत का कोई मतलब नहीं निकलने वाला और ऐसा करने के बजाय इमरान जो बचकानी बातें कर रहे हैं उससे उनकी ही गंभीरता औश्र विश्वसनीयता को विश्व मंच पर आघात पहुंच रहा है।
शनिवार, 22 दिसंबर 2018
ग्रह-नक्षत्रों में अटकी सियासत
आगामी लोकसभा चुनाव को लेकर बेशक अंदरूनी तौर पर सियासी गतिविधियां जोर-शोर से जारी हैं और हर खेमे में काफी हलचल का माहौल का दिख रहा है लेकिन औपचारिक तौर पर किसी भी खेमे से कोई बड़ी खबर सामने नहीं आने की बड़ी वजह खरमास को बताया जा रहा है। दरअसल हिन्दू समाज में खरमास के दौरान कोई भी शुभ कार्य करना, नया व्यवसाय या साझेदारी करना या कोई भी नई चीज लेना वर्जित माना जाता है। कई इलाकों में तो इस दौरान नए कपड़े खरीदना या पहनना भी मना होता है। खरमास से जुड़े मिथकों व किस्से-कहानियों का राजनीतिक दलों पर कितना अधिक प्रभाव पड़ रहा है इसका सहज अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इन दिनों किसी भी खेमे से गठबंधन या साझेदारी के बारे में किसी समझौते को निर्णायक रूप नहीं दिया जा रहा है। बात चाहे उत्तर प्रदेश में कांग्रेस से किनारा करके सपा, बसपा व रालोद द्वारा आपस में चुनाव पूर्ण गठबंधन किये जाने के संकेतों की करें अथवा बिहार में भाजपानीत राजग के खिलाफ राजग को धुरी बनाकर समान विचारधारा वाले दलों के एक मंच पर आकर महागठबंधन बनाए जाने की या फिर बिहार में सीट समझौते को लेकर भाजपा, जदयू व लोजपा के बीच जारी तनातनी की। किसी भी मामले में औपचारिक तौर पर अभी कोई अंतिम फैसला नहीं किया जा रहा है और सभी राजनीतिक दल केवल संकेतों की भाषा में ही सियासी समस्याओं को सुलझाने की दिशा में आगे बढ़ते दिखाई पड़ रहे हैं। दरअसल माना जाता है कि सूर्य के धनु राशि में प्रवेश करने के साथ ही खरमास का आरंभ हो जाता है। धनु वास्तव में गुरू की राशि है। जब इसमें सूर्य आते हैं तो गुरू का प्रभाव कुंद पड़ जाता है। जबकि किसी भी शुभ कार्य या बड़ी पहल के लिये ज्योतिषीय नजरिये से गुरू का सहयोग बेहद आवश्यक है। लेकिन जब तक सूर्य धनु राशि में रहेंगे तब तक गुरू काफी हद तक निष्क्रिय रहेंगे। इसी वजह से इसे खरमास का नाम दिया जाता है और इस दौरान कोई बड़ा काम नहीं करने की सलाह दी जाती है। इस बार यह खरमास बीते 16 दिसंबर की सुबह नौ बजकर आठ मिनट से आरंभ हुआ है जो आगामी 14 जनवरी को सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने के बाद ही समाप्त होगा। चुंकि खरमास के दौरान कोई नयी साझेदारी या व्यावसायिक समझौते को अमल में लाना वर्जित बताया गया है लिहाजा कोई भी दल इस दौरान किसी राजनीतिक समझौते को निर्णायक मुकाम तक पहुंचाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है। बेशक अंदरूनी तौर पर इस बात का खुला संकेत दिया जा रहा हो कि यूपी में सपा, बसपा और रालोद का जबकि बिहार में राजद, कांग्रेस, रालोसपा, माकपा, भाकपा, हम और शरद यादव का ही नहीं बल्कि भाजपा, जदयू और लोजपा का भी गठबंधन हो गया है और इन तीनों खेमों ने सीटों के बंटवारे के मसले को भी आपस में सुलझा लिया है लेकिन औपचारिक तौर पर कोई भी खेमा सीटों के तालमेल के आंकड़ों को सार्वजनिक करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है। बताया जाता है कि खरमास के कारण ही सपा यह स्वीकार करने से हिचक रही है कि उसने गठबंधन में परिवर्तन करते हुए कांग्रेस से किनारा कर लिया है और महागठबंधन की ओर से भी यह बताने से परहेज बरता जा रहा है कि उसके कौन-कौन से घटक कितनी सीटों पर चुनाव लड़ेंगे। यहां तक कि भाजपा को आंखें दिखा रही लोजपा को कितनी सीटें देने का भरोसा देकर राजग में बरकरार रहने के लिये मनाया गया है इसका खुलासा करने से भी पूरी तरह परहेज बरता जा रहा है। ऐसे में संभव है कि पूरी तस्वीर साफ होने के लिये मकर संक्रांति यानि 14 जनवरी तक का इंतजार करना पड़े जब सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करते ही खरमास का दोष दूर हो जाएगा और शुभ कार्यों पर लगा प्रतिबंध समाप्त हो जाएगा। हालांकि यह कोई पहला मौका नहीं है जब ग्रह-नक्षत्रों के मद्देनजर सियासत ने अपनी चाल बदली हो बल्कि कई बार ऐसा देखा गया है कि ज्योतिषीय सलाहों को मान कर कई ऐसे मामलों में भी ऊटपटांग फैसले ले लिये जाते हैं जो सतही तौर पर मजाक का कारण बनते हैं। मसलन हिन्दू धर्म में 13 के अंक को बेहद अशुभ माना गया है। इसी वजह से लोग अक्सर इस अंक से परहेज बरतते हैं कि कहीं कोई अनहोनी या अपशकुन ना हो जाए। अनहोनी का यही डर था कि जब अत्याधुनिक व विश्वस्तरीय शहर नोएडा को बसाया गया तो उसमें सेक्टर तेरह नाम की जगह ही नहीं रखी गई। नोएडा में सेक्टर बारह भी है और चैहद भी लेकिन तेरह गायब है। इसी प्रकार अंकों का खेल कैसे राजनीति को प्रभावित करता है इसका उदाहरण संसद के भीतर भी देखा गया जहां 420 नंबर की सीट जिसे भी मिलती है वह तुरंत अपनी कुर्सी बदलने के लिये अर्जी दाखिल कर देता है। मजाल है कि कोई भी पार्टी पितृपक्ष यानि श्राद्ध पक्ष के दौरान कोई बड़ी बैठक या बड़ा फैसला कर ले। तमाम नेताओं के अपने ज्योतिषी हैं और अलग-अलग ज्योतिषीय सलाहकार भी हैं। उनसे पूछे बगैर कई बड़े नेता तो घर से कदम बाहर निकालना भी गवारा नहीं करते हैं। भाजपा के एक प्रवक्ता जो इन दिनों केन्द्र सरकार में काफी बड़ा मंत्रालय संभाल रहे हैं उनके बारे में प्रसिद्ध है कि प्रवक्ता रहने के दौरान वे हर दिन के हिसाब से अलग रंग के कपड़ों का चयन करते हैं और निश्चित अंतराल पर अलग-अलग इत्र का इस्तेमाल करते हैं। वास्तव में देखा जाए तो यह सब मन के वहम के अलावा और कुछ भी नहीं है। जो होनी है वह अपने कर्मों पर निर्भर है। कर्म अच्छे होंगे तो भाग्य अच्छा ही रहेगा और कर्म बुरे होंगे तो कितना ही टोना-टोटका क्यों ना कर लिया जाए, किस्मत खराब होकर ही रहेगी और दुर्भाग्य कभी पीछा नहीं छोड़ेगा। लिहाजा बेहतर होगा कि ग्रह-नक्षत्रों से डरने के बजाय राजनीतिक दल अपनी नीति और नीयत में सुधार लाएं ताकि आम लोग उन्हें अपने समर्थन से आगे बढ़ाने के लिये आगे आएं।
गुरुवार, 20 दिसंबर 2018
महबूबा की अटपटी बातें
जम्मू कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री पीडीपी अध्यक्षा महबूबा मुफ्ती ने पाकिस्तान के साथ बातचीत की शुरूआत के लिये लोकसभा चुनावों का नतीजा आने तक इंतजार करने की जो बात कही है वह ना सिर्फ अटपटी और गैर-जरूरी है बल्कि कहीं ना कहीं यह दर्शाता है कि अभी तक वे पाकिस्तान को लेकर भारत सरकार और हर खासो-आम भारतीय की सोच को समझ ही नहीं पाई हैं। हालांकि यह भी संभव है कि वे इस बात को समझना ही नहीं चाह रही हों कि पाकिस्तान के साथ भारत के रिश्तों का हमारे अंदरूनी चुनाव से कोई लेना-देना ही नहीं है। अगर पाकिस्तान कल की तारीख में भी मुंबई हमले के गुनहगारों को उनके किये की माकूल सजा दे तो परसों से ही रिश्तों में जारी संवादहीनता और तल्खी की बर्फ पिघलने लगेगी। लेकिन मसला है कि एक तरफ पाकिस्तान अपनी खुराफातें और बदमाशियां बदस्तूर जारी रखने पर आमादा है और दूसरी ओर यह भी चाह रहा है कि भारत उसके साथ बातचीत की प्रक्रिया भी शुरू कर दे और उसे आगे बढ़कर गले लगा ले। आखिर ऐसा कैसे संभव हो सकता है? देश में चुनाव कब होंगे और उसमें किसकी जीत या हार होगी और किसकी सरकार बनेगी यह तमाम बातें हमारी अंदरूनी राजनीति से जुड़ी है जिनका दोनों मुल्कों के रिश्तों से कोई तालमेल ही नहीं है। हालांकि इस बात से कोई इन्कार नहीं कर सकता कि भारत और पाकिस्तान के बीच शान्तिपूर्ण सम्बन्ध दोनों मुल्कों के लोगों के लिए फायदेमन्द हैं। इस मायने में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान का विचार वाकई काबिले तारीफ है। लेकिन जमीनी हकीकतें इससे बिलकुल विपरीत हैं। यहां तक कि इमरान की कथनी और करनी में कहीं कोई तालमेल दिखाई ही नहीं पड़ रहा है। मिसाल के तौर पर सत्ता संभालने के बाद इमरान सरकार ने मुंबई पर हमले के आतंकी हमले के मास्टरमाइंड हाफिज की अगुवाई वाली तमाम संस्थाओं को आतंकी संगठनों की सूची से बाहर कर दिया। इसमें फलह ए इन्सानियत और जमात उद दावा भी शामिल हैं जिन्हें लश्करे तैयबा के मुखौटे की तरह इस्तेमाल किया जाता है। मुंबई आतंकी हमलों के मास्टरमाइंड हाफिज सईद को संयुक्त राष्ट्र द्वारा वैश्विक आतंकी घोषित किया जा चुका है। उस पर 10 मिलियन डॉलर का इनाम है। लेकिन वह पाकिस्तान में खुला घूम रहा है। यही नहीं, हाफिज की पार्टी ‘मिल्ली मुस्लिम लीग’ को चुनाव लड़ने की अनुमति देकर उसे राजनीति की मुख्यधारा में लाने की कोशिश की जा रही है। इसकी मार्फत हाफिज पाकिस्तान में राजनीतिक ताकत बनने की कोशिश कर रहा है। एक तरफ तो इमरान कहते हैं कि आतंकवाद और कट्टरपन को बढ़ावा देने से पाकिस्तान का ही नुकसान हो रहा है लेकिन दूसरी तरफ सरकार बनने के 100 दिनों के भीतर इमरान ने अनेक संदिग्ध मदरसों को निगरानी सूची से बाहर कर दिया। उनके मुताबिक मदरसों को आतंकवाद से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। हालांकि, वे जानते हैं कि ऐसे अनेक मदरसों को संदिग्ध स्रोतों से पैसा मिलता है और वे अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की नजरों में सन्देहास्पद रहे हैं। पूरी दुनिया को यह पता है कि मदरसे की आड़ में चल रहे इन संस्थाओं में मासूम बच्चों और नौजवानों का माइंडवॉश करके उन्हें आतंकी इरादों की पूर्ति का औजार बनाया जाता है। हालांकि, करतारपुर साहिब गलियारे का उद्घाटन विशुद्ध धार्मिक मौका था, लेकिन इमरान ने उस मंच से भी कश्मीर मुद्दे का जिक्र करके इसे राजनीतिक रंग देने की कोशिश की। उनके विदेश मन्त्री शाह महमूद कुरैशी ने इससे भी एक कदम आगे बढ़ते हुए सरकार के इस फैसले को इमरान की गुगली के तौर पर पेश किया। जिस पर भारत ने कड़ी प्रतिक्रिया दी। इस बीच पाकिस्तान प्रशिक्षित आतंकी भारत में खून-खराबे की घटनाओं को अंजाम देने में लगे हुए हैं। पिछले ही दिनों उन्होंने अमृतसर में निरंकारियों के एक धार्मिक जलसे पर हमला किया, जिसमें 03 लोग मारे गए और 20 घायल हुए। इसे पंजाब में साम्प्रदायिक तनाव फैलाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है, ताकि आतंकवाद को भड़काया जा सके। घटनास्थल से बरामद ग्रेनेड पाकिस्तान में बने थे इसलिए इस घटना के स्रोत पर किसी को दुविधा नहीं हो सकती। सबसे चैंकाने वाली बात तो यह है कि करतारपुर साहिब गलियारे के उद्घाटन पर खालिस्तान समर्थक नेता गोपाल सिंह चावला भी मौजूद था और इमरान खान व पाकिस्तानी सेना प्रमुख उससे औपचारिक शिष्टाचार निभा रहे थे। इन सबसे साफ तौर पर यह पता लगता है कि इमरान की बातों और कामों में कोई सम्बन्ध नहीं है। ऐसे माहौल में अगर उन्हें लगता है कि भारत बातचीत के रास्ते पर कदम बढ़ाएगा, तो इसे उनकी खुशफहमी ही कही जा सकती है। भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने साफ कर दिया है कि जब तक पाकिस्तान भारत के खिलाफ आतंकी गतिविधियों पर विराम नहीं लगाता तब तक उससे बातचीत की कोई संभावना नहीं है। उनके मुताबिक आतंकवाद और बातचीत साथ-साथ नहीं चल सकते। पाकिस्तान को समझना होगा कि भारत के लिए आतंकवाद का खात्मा एक अहम मुद्दा है और जब तक पाकिस्तान इसके खिलाफ स्पष्ट, कठोर, और पारदर्शी कदम नहीं उठाता है तब तक उसके किसी अनुरोध या घड़ियाली आंसू का भारत की सोच और नीति पर कोई असर नहीं होगा। पाकिस्तान को भारत ही नहीं तमाम दुनिया को भरोसा दिलाना चाहिए कि वह वास्तव में आतंकवाद के खात्मे के लिए तैयार है और इसके लिए जरूरी कदम उठा रहा है। जिस दिन ऐसा होगा उसी दिन भारत खुद आगे बढ़कर बातचीत की प्रक्रिया को बहाल करने के लिए कदम बढ़ाएगा। लेकिन यह सीधी सी और बिना लाग-लपेट की बात अगर पाकिस्तान में इमरान सरकार के संचालकों को और भारत में महबूबा सरीखी नेताओं समझ में नहीं आ रही है तो इसका सीधा सा मतलब यही है वे इसे समझना ही नहीं चाह रहे हैं। महबूबा को ही नहीं बल्कि पाकिस्तान की सरकार को भी यह समझ लेना चाहिये कि इस मसले को भारत के आम चुनावों से जोड़कर दिखाने के बहाने भारत की मौजूदा सरकार की रीति-नीति के बारे में दुनिया में गलतफहमी फैलाने का जो प्रयास किया जा रहा है उसे कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता है और इस बात में भी किसी को कोई शंका नहीं होनी चाहिये कि बेशक चुनाव के बाद भारत में किसी भी दल की सरकार बने अथवा कोई भी प्रधानमंत्री बने लेकिन पाकिस्तान को लेकर गोली बंद होने के बाद ही बोली शुरू होने की जो नीति अपनाई गई है उसमें रत्ती भर भी रद्दोबदल की जरा भी संभावना नहीं है।
शनिवार, 19 नवंबर 2016
गुड़-गोबर करती बैंकिंग व्यवस्था
गुड़-गोबर करती बैंकिंग व्यवस्था
अक्सर यही देखा जाता है कि जिसके हाथ में भी डंडा आ जाये तो वह खुद को हवलदार से कम नहीं समझता। कायदे से तो हाथों में डंडा आने पर सबसे पहले उससे जुड़ी जिम्मेवारियों का एहसास होना चाहिये। लेकिन ऐसा होता हुआ कम ही दिखता है। यही हालत इन दिनों बैंकिंग व्यवस्था की भी है। सरकार ने उसे नोट बदलने का काम क्या सौंपा उसने खुद को आम लोगों का भाग्यविधाता ही समझ लिया। कहीं से भी ऐसा सुनने में नहीं आया है कि किसी बैंक ने लोगों के लिये पेयजल का प्रबंध किया हो या फिर बैठने की व्यवस्था की हो। हर बैंक के बाहर लंबी-लंबी कतार में क्या बूढ़े और क्या महिलाएं, सभी कष्ट से त्राहि-त्राहि करते ही नजर आये। लेकिन बैंक अपने धुन में मगन। घड़ी देखकर उठना और घड़ी देखकर बैठना। उसी सुस्त गति से काम करना और लोगों की परेशानियों का लुत्फ उठाना। वास्तव में देखा जाये तो देश की बैंकिग व्यवस्था की सुस्त व ढ़ीली रफ्तार के कारण ही आम लोगों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। नोटों को बदलने व नये नोटों का वितरण करने की अपेक्षित गति हासिल करने में देश की बैंकिंग व्यवस्था पूरी तरह नाकाम साबित हुई है। इसीका नतीजा है कि नोटबंदी की घोषणा हुए दस दिन का वक्त गुजर जाने के बाद भी हालातों में बहुत अधिक सुधार नहीं देखा जा रहा है। वह भी तब जबकि सरकार बार-बार यह दोहरा रही है कि देश में नये नोटों की कोई कमी नहीं है। बैंकिंग सेवा प्राप्त करने में पेश आ रही दुश्वारी का ही नतीजा है कि अधिकांश मदर डेयरी के बूथों व दवा दुकानदारों ने पुराने नोट स्वीकार करने का अधिकार दिये जाने के बावजूद इसे स्वीकार करने से इनकार करना आरंभ कर दिया है। उनकी दलील है कि उनसे नकदी स्वीकार करने के लिये बैंकों ने कोई विशेष व्यवस्था नहीं की है। बैंकों की सुस्त गति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अधिकांश बैंकों में ना तो कोई विशेष काउंटर बनाया गया और ना ही लोगों को कुछ बताने-समझाने के लिये कोई पहल की गयी। सच पूछा जाये तो देश के नीति निर्धारकों ने कालाधन, भ्रष्टाचार और नकली नोटों के कारोबार से एक झटके में ही निजात हासिल करने के लिये पांच सौ और एक हजार के नोटों को चलन से बाहर करने का जो हौसला दिखाया उसके पीछे कहीं ना कहीं देश की बैंकिंग व्यवस्था के प्रति उनका भरोसा ही छिपा था। लेकिन बड़े अफसोस की बात है कि बैंकिंग व्यवस्था ने उस भरोसे की लाज रखने के लिये अलग से कुछ भी प्रयास नहीं किया है। जो था, जैसा था, उससे ही इतने बड़े और ऐतिहासिक काम को आगे बढ़ाया। वह तो गनीमत है कि सत्ता पक्ष की इमानदारी पर कोई दाग नहीं आया है वर्ना जिस तरीके से नोटबंदी को लागू करने के लिये बैंकों ने आम लोगों की ऐसी-तैसी करके रख दी है उसके नतीजे में सत्ता-व्यवस्था के प्रति भारी आक्रोश के माहौल में कुछ भी हो सकता था। यह स्थिति तब दिख रही है जब सरकार ने बैंकों को ऐसी नीतियां बनाकर दी हैं जिससे उन पर काम का बोझ काफी कम पड़ रहा है। ना तो उन्हें परंपरागत काम को यथापूर्वक निपटाना पड़ रहा है और ना ही पुराने उपभोक्ताओं को यथावत सेवाएं देनी पड़ रही हैं। नकदी की आपूर्ति भी निर्विघ्न तरीके से की जा रही है और रिजर्व बैंक की ओर से मुंहमांगी सहूलियतें भी मुहैया करायी जा रही हैं। इसके बावजूद कहीं दो बजे तो कहीं चार बजे ही शटर बंद कर दिये जाने की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं। रिजर्व बैंक और सरकार के दखल के बाद भी कुछ ही जगह महिलाओं और बुजुर्गों के लिये अलग लाईन लगाने की व्यवस्था की गयी वर्ना कस्टमर को कष्ट में मरने के लिये ही छोड़ रखा है बैंकों ने। अपेक्षित तो यह था कि मौजूदा विशेष परिस्थिति में पूरी मेहनत, लगन और इमानदारी का प्रदर्शन किया जाता। सभी ग्राहकों को एक समान सेवा मुहैया करायी जाती। लेकिन कहीं पीछे की खिड़की से नोट सप्लाई का वीडियो सामने आ रहा है तो कहीं नेताजी और उनके चमचों के लिये देर रात शटर उठाया-गिराया जा रहा है। यह बैंकिग सेवा की अव्यवस्था का ही नतीजा है कि इन दिनों सरकार को कोसने के बजाय लोग सिर्फ बैंकों से ही नाराज दिख रहे हैं। हालांकि ग्रामीण बैंकों ने अपनी पूर्वघोषित हड़ताल को स्थगित करने की सकारात्मक पहल अवश्य की लेकिन इतने भर से ही बैंकिग व्यवस्था की तमाम कमियों, खामियों व गलतियों को कतई नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। सच पूछा जाये तो नोटबंदी के अभियान ने पूरे बैंकिंग तंत्र की सुस्ती, संवेदनहीनता और गैर जिम्मेदाराना रवैये को ही उजागर किया है जिस पर भरोसा करके सरकार ने देश को कैशलेस व्यवस्था की राह पर काफी आगे ले जाने का ख्वाब बुना है। @ Navkant Thakur
मंगलवार, 6 सितंबर 2016
अब झुलसेंगे अलगाववादियों के अरमान
अब झुलसेंगे अलगाववादियों के अरमान
देश विरोधी ताकतों के हाथों में खेल रहे पाकिस्तान के पिट्ठुओं को औकात में लाने की योजना तैयार हो गयी है। अब इन्हें ना सिर्फ सरकारी सहूलियतों से महरूम होना पड़ेगा बल्कि व्यवस्था से कटकर पूरी तरह अलग-थलग रहने के लिये मजबूर होना पड़ेगा। दरअसल कश्मीर में सामान्य स्थिति बहाल करने की कोशिशों के तहत सूबे के दौरे पर गये सर्वदलीय प्रतिमंडल के साथ बदसलूकी करना वहां के स्थानीय अलगाववादी नेताओं को अब काफी महंगा पड़ने जा रहा है और सरकार ने हर कीमत पर उनकी ढ़िठाई, हठधर्मिता व देशविरोधी मानसिकता का माकूल इलाज करने का पक्का इरादा कर लिया है। इस सिलसिले में बनायी गयी योजना के तहत अलगाववादी नेताओं को मुहैया करायी जा रही तमाम सरकारी सहूलियतों से उन्हें महरूम कर दिया जाएगा और सूबे से जुड़े किसी भी मामले को लेकर होनेवाली बातचीत की प्रक्रिया में उन्हें हर्गिज शामिल नहीं किया जाएगा। सूत्रों की मानें तो सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल की वापसी के बाद प्रधानमंत्री के साथ हुई गृहमंत्री राजनाथ सिंह की बैठक के बाद यह तय हुआ है कि अलगाववादियों के प्रति अब कतई नरमी या सहानुभूति का व्यवहार नहीं किया जाएगा बल्कि अगर जल्दी ही वे तहे-दिल से भारत की एकता, अखंडता व संप्रभुता को स्वीकार करने के अलावा समूचे जम्मू-कश्मीर को (गुलाम कश्मीर सहित) भारत के अविभाज्य व अभिन्न हिस्से के तौर पर कबूल नहीं कर लेते तो निकट भविष्य में उन्हें इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है। प्राप्त जानकारी के मुताबिक इसी मसले को लेकर आज शाम भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के साथ भी गृहमंत्री की बैठक हुई जिसमें शाह ने भी सरकार के इस फैसले से पूरी सहमति जताई है। अब माना जा रहा है कि राजनाथ के अलावा वित्तमंत्री अरूण जेटली की मौजूदगी में पार्लियामेंट एनेक्सी में होनेवाली कश्मीर से लौटे सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों की बैठक में सरकार के इस फैसले पर राजनीतिक आम सहमति भी कायम कर ली जाएगी। अलगाववादियों के प्रति सख्त रवैया अपनाये जाने को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक आम सहमति का माहौल बनाने के बाद औपचारिक तौर पर जम्मू कश्मीर सरकार से अनुरोध किया जाएगा कि देशहित को प्राथमिकता देते हुए तमाम अलगाववादी नेताओं का हर स्तर पर पूर्ण बहिष्कार किया जाये और उन्हें किसी भी तरह की सरकारी सहायता या सहूलियत उपलब्ध कराने से पूरी तरह परहेज बरता जाये। हालांकि किसी भी वार्ता प्रक्रिया में अलगाववादियों को शामिल नहीं करने का फैसला पहले ही लिया जा चुका है और इसी वजह से ना तो राजनाथ के पिछले जम्मू-कश्मीर दौरे के दौरान अलगाववादी नेताओं को बातचीत का मौका दिया गया और ना ही सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल के दौरे के एजेंडे में उनसे मुलाकात की कोई बात शामिल थी। लेकिन निजी हैसियत से अलगाववादियों से मिलने गये प्रतिनिधिमंडल के कुछ सदस्यों की इस पहलकदमी के साथ सरकार की सहानुभूति अवश्य जुड़ी हुई थी क्योंकि अगर यह बातचीत आगे बढ़ती तो सूबे में अमन बहाली के अलावा अलगाववादियों के देश की मुख्यधारा के साथ जुड़ने की उम्मीद बंध सकती थी। लेकिन मुलाकात के लिये आये नेताओं से अलोकतांत्रिक व काफी हद तक असभ्य व अमर्यादित व्यवहार करके इन अलगाववादियों ने अपने लिये खुद ही ऐसे भविष्य का ब्लू प्रिंट तैयार कर लिया है जिसके तहत देश के किसी भी सियासी या गैर सियासी संगठन की उनके साथ अब रत्ती भर भी सहानुभूति नहीं जुड़ सकती है। वैसे भी इन अलगाववादियों ने लंबे समय से देश की नाक में दम किया हुआ है और भारत के शासन-प्रशासन को चिढ़ाने व खिझाने का कोई भी मौका ये अपने हाथ से जाने नहीं देते। ना तो इन्हें भारत के हितों की कोई परवाह है और ना ही भारतीय संवैधानिक व लोकतांत्रिक व्यवस्था में इनकी आस्था है। ऐसे में इन्हें सिर पर चढ़ाए रखने का कोई मतलब ही नहीं है। बल्कि इन्हें औकात में लाने की कोशिश तो काफी पहले ही आरंभ हो जानी चाहिये थी। लेकिन देर आयद दुरूस्त आयद। इतना तो तय है कि भारत के टुकड़े करने का ख्वाब देखनेवाले अलगाववादियों की सुरक्षा, यात्रा व रहन-सहन पर सरकारी खजाने से होनेवाले औसतन सालाना एक सौ करोड़ रूपये के खर्च में अब भारी कटौती की जाएगी और उन्हें भारतीय संविधान के दायरे में रहकर बातचीत करके पूरे मसले का हल निकालने के लिये विवश होना ही पड़ेगा। लेकिन आवश्यक है कि इन्हें विदेशों से मिलनेवाली खैरात पर रोक लगायी जाये और दीन-दुनियां से इनका संपर्क पूरी तरह काट दिया जाये। साथ ही देश के आम लोगों की गाढ़ी कमाई का पैसा इनकी सुरक्षा, यात्रा व रहन-सहन पर खर्च किये जाने का भी कोई औचित्य नहीं है बल्कि इनसे सुरक्षा का खर्च भी वसूला जाना चाहिये। इसके बाद भी अगर ये सूबे में अमन बहाली की राह के आड़े आएं तो इनके खिलाफ देशद्रोह व देश के खिलाफ जंग छेड़ने की सख्त धाराओं के तहत कठोरतम कानूनी कार्रवाई करने से भी परहेज नहीं बरता जाना चाहिये। उसके बाद ही इन्हें आटे-दाल का भाव पता लगेगा।
मंगलवार, 16 अगस्त 2016
जवाबदेही पर जोर.........
जवाबदेही पर जोर
लोकतांत्रिक व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही अपेक्षित तो रहती है लेकिन इन अपेक्षाओं के पूरा होने की अभी तक कोई राह नहीं निकली थी। खास तौर से जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही तो चुनावी राजनीति तक ही सीमित रहती आई है। हालांकि इस व्यवस्था को सुधारने के काफी प्रयास हुए और सूचना का अधिकार के तौर पर लोगों के हाथ में एक हथियार भी आया लेकिन इसका भी पूरा लाभ नहीं मिल सका और माननीयों की जवाबदेही पूरी तरह तय नहीं हो सकी। देश को आजाद हुए 70 साल होने को आए लेकिन अब तक का जो अनुभव है उसके मुताबिक सांसद बन जाने के बाद आम तौर पर कोई भी नेता अपने मतदाताओं के सामने अपने कामकाज का हिसाब प्रस्तुत करना गवारा नहीं करता है। जबकि जनप्रतिनिधि के तौर पर उसकी जवाबदेही है कि वह ना सिर्फ जिम्मेवारी के साथ अपने निर्वाचकों के हितों को सुनिश्चित करे और अपने निर्वाचन क्षेत्र के विकास को आगे बढ़ाए बल्कि अपने कामकाज के बारे में मतदाताओं को जानकारी भी दे और इसमें उनका सुझाव भी ले। लेकिन हकीकत तो यह है कि इन सांसदों से अपेक्षाएं भले कुछ भी हों लेकिन वे आम तौर पर सत्ता मिल जाने के बाद जनता से कट ही जाते हैं। कई दफा ऐसे भी मामले सामने आएं हैं जब लोगों को अपने जनप्रतिधियों के गुमशुदा होने का पोस्टर भी गलियों की दीवारों पर चस्पां करने के लिये मजबूर होना पड़ा है। हालांकि यह तो नहीं कहा जा सकता कि सांसद अपनी जिम्मेवारी नहीं निभाते है लेकिन इस बात से कतई इनकार नहीं किया जा सकता कि जो सांसद अपनी जिम्मेवारी निभाते भी हैं वह ज्यादातर मनमाने तरीके से ही निभाते हैं और उसमें भी दिखावा ही अधिक रहता है। मानो जिम्मेवारी निभाकर जनता पर कोई बहुत बड़ा एहसान कर रहे हों। वैसे भी जिस सामाजिक व्यवस्था व पंरपरा में किसी दूसरे व कथित ऐरे-गैरे को अपने कामकाज का हिसाब देना तौहीन माना जाता हो उस तौहीन को कोई क्यों स्वीकार करें? लेकिन अब वक्त बदला है, परिस्थितियां बदली हैं और निजाम बदला है। यह नया निजाम अपनी जवाबदेही को भी समझता है और दूसरों के लिए भी जवाबदेही तय करने से परहेज नहीं बरतता है। यही वजह है कि सत्ता संभालने की सालगिरह के मौके पर प्रधानमंत्री खुद अपनी सरकार के कामकाज का रिपोर्ट कार्ड जनता के सामने हर वर्ष प्रस्तुत कर रहे हैं। साथ ही परंपरा यह भी डाली गई है कि हर साल सरकार का हर विभाग अपने कामकाज का रिपोर्ट कार्ड सार्वजनिक तौर पर पेश करे और अगले साल के लिये निर्धारित अपने लक्ष्य से भी देश को अवगत कराए। यानि प्रधानमंत्री ने खुद को भी जनता के प्रति जवाबदेह बनाया है और अपने माननीय मंत्रियों को भी। ऐसे में अब अगर सांसदों से भी यही अपेक्षा की गई है तो इसे कैसे गलत कहा जा सकता है। बल्कि यह तो होना ही चाहिए था। खैर, देर आयद दुरुस्त आयद। प्रधानमंत्री ने पार्टी के सभी सांसदों को साफ शब्दों में यह बता दिया है कि उन्हें अपने कामकाज का हिसाब देना ही होगा। पिछले दो साल में सांसद के तौर पर उन्होंने क्या काम किया है और बाकी बचे कार्यकाल के लिये उन्होंने अपने लिये क्या लक्ष्य निर्धारित किया है इसका पूरा बही-खाता उन्हें प्रस्तुत करना होगा। चुंकि सांसदों से उनके कामकाज का हिसाब प्रधानमंत्री खुद लेने वाले हैं लिहाजा इसमें गड़बड़ियों व गलतबयानी की गुंजाइश काफी कम होने की संभावना है। वैसे भी प्रधानमंत्री का लगातार यह आग्रह रहा है कि सांसदों को अपने क्षेत्र में अधिक से अधिक वक्त बिताना चाहिए, स्थानीय लोगों के साथ संपर्क में रहना चाहिए और सोशल मीडिया के माध्यम से भी लोगों के लिए उपलब्ध रहना चाहिए। हालांकि उनके इस आग्रह को कितने सांसदों ने स्वीकार किया है यह तो सर्वविदित ही है। वैसे भी स्वेच्छा से जब अपेक्षाएं पूरी नहीं होती हैं तो इसके लिये कड़ाई करनी ही पड़ती है और उसी कड़ाई का मुजाहिरा हुआ है आज प्रधानमंत्री की बातों से। प्रधानमंत्री ने यह भी कहा है की सामाजिक एकता, अखंडता, सौहार्द व समरसता की भावना को जगाते हुए राष्ट्रवाद का प्रवाह जमीनी स्तर तक पहुंचाने के लिए आगामी 15 अगस्त से आरंभ हो रही तिरंगा यात्रा के प्रतिदिन की प्रगति की रिपोर्ट अगर सांसद स्वयं उन्हें सौपेंगे तो बेहतर रहेगा। यानि सांसदों के जमीनी जुड़ाव की मॉनीटरिंग अब प्रधानमंत्री खुद ही करने वाले हैं। जाहिर तौर पर जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही तय करने की दिशा में प्रधानमंत्री की ओर से की गयी यह शुरुआत बेहद ही सराहनीय है। इससे ना सिर्फ सांसदों में जागरुकता आएगी बल्कि आम लोगों का अपने जनप्रतिनिधियों के प्रति नजरिया भी बदलेगा जिससे निजाम व आवाम के दरमियान परस्पर तारतम्यता कायम होगी जिसका अंतिम परिणाम विकास, सुशासन व पारदर्शिता के तौर पर सामने आएगा।
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