मंगलवार, 6 सितंबर 2016

अब झुलसेंगे अलगाववादियों के अरमान

 अब झुलसेंगे अलगाववादियों के अरमान


देश विरोधी ताकतों के हाथों में खेल रहे पाकिस्तान के पिट्ठुओं को औकात में लाने की योजना तैयार हो गयी है। अब इन्हें ना सिर्फ सरकारी सहूलियतों से महरूम होना पड़ेगा बल्कि व्यवस्था से कटकर पूरी तरह अलग-थलग रहने के लिये मजबूर होना पड़ेगा। दरअसल कश्मीर में सामान्य स्थिति बहाल करने की कोशिशों के तहत सूबे के दौरे पर गये सर्वदलीय प्रतिमंडल के साथ बदसलूकी करना वहां के स्थानीय अलगाववादी नेताओं को अब काफी महंगा पड़ने जा रहा है और सरकार ने हर कीमत पर उनकी ढ़िठाई, हठधर्मिता व देशविरोधी मानसिकता का माकूल इलाज करने का पक्का इरादा कर लिया है। इस सिलसिले में बनायी गयी योजना के तहत अलगाववादी नेताओं को मुहैया करायी जा रही तमाम सरकारी सहूलियतों से उन्हें महरूम कर दिया जाएगा और सूबे से जुड़े किसी भी मामले को लेकर होनेवाली बातचीत की प्रक्रिया में उन्हें हर्गिज शामिल नहीं किया जाएगा। सूत्रों की मानें तो सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल की वापसी के बाद प्रधानमंत्री के साथ हुई गृहमंत्री राजनाथ सिंह की बैठक के बाद यह तय हुआ है कि अलगाववादियों के प्रति अब कतई नरमी या सहानुभूति का व्यवहार नहीं किया जाएगा बल्कि अगर जल्दी ही वे तहे-दिल से भारत की एकता, अखंडता व संप्रभुता को स्वीकार करने के अलावा समूचे जम्मू-कश्मीर को (गुलाम कश्मीर सहित) भारत के अविभाज्य व अभिन्न हिस्से के तौर पर कबूल नहीं कर लेते तो निकट भविष्य में उन्हें इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है। प्राप्त जानकारी के मुताबिक इसी मसले को लेकर आज शाम भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के साथ भी गृहमंत्री की बैठक हुई जिसमें शाह ने भी सरकार के इस फैसले से पूरी सहमति जताई है। अब माना जा रहा है कि राजनाथ के अलावा वित्तमंत्री अरूण जेटली की मौजूदगी में पार्लियामेंट एनेक्सी में होनेवाली कश्मीर से लौटे सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों की बैठक में सरकार के इस फैसले पर राजनीतिक आम सहमति भी कायम कर ली जाएगी। अलगाववादियों के प्रति सख्त रवैया अपनाये जाने को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक आम सहमति का माहौल बनाने के बाद औपचारिक तौर पर जम्मू कश्मीर सरकार से अनुरोध किया जाएगा कि देशहित को प्राथमिकता देते हुए तमाम अलगाववादी नेताओं का हर स्तर पर पूर्ण बहिष्कार किया जाये और उन्हें किसी भी तरह की सरकारी सहायता या सहूलियत उपलब्ध कराने से पूरी तरह परहेज बरता जाये। हालांकि किसी भी वार्ता प्रक्रिया में अलगाववादियों को शामिल नहीं करने का फैसला पहले ही लिया जा चुका है और इसी वजह से ना तो राजनाथ के पिछले जम्मू-कश्मीर दौरे के दौरान अलगाववादी नेताओं को बातचीत का मौका दिया गया और ना ही सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल के दौरे के एजेंडे में उनसे मुलाकात की कोई बात शामिल थी। लेकिन निजी हैसियत से अलगाववादियों से मिलने गये प्रतिनिधिमंडल के कुछ सदस्यों की इस पहलकदमी के साथ सरकार की सहानुभूति अवश्य जुड़ी हुई थी क्योंकि अगर यह बातचीत आगे बढ़ती तो सूबे में अमन बहाली के अलावा अलगाववादियों के देश की मुख्यधारा के साथ जुड़ने की उम्मीद बंध सकती थी। लेकिन मुलाकात के लिये आये नेताओं से अलोकतांत्रिक व काफी हद तक असभ्य व अमर्यादित व्यवहार करके इन अलगाववादियों ने अपने लिये खुद ही ऐसे भविष्य का ब्लू प्रिंट तैयार कर लिया है जिसके तहत देश के किसी भी सियासी या गैर सियासी संगठन की उनके साथ अब रत्ती भर भी सहानुभूति नहीं जुड़ सकती है। वैसे भी इन अलगाववादियों ने लंबे समय से देश की नाक में दम किया हुआ है और भारत के शासन-प्रशासन को चिढ़ाने व खिझाने का कोई भी मौका ये अपने हाथ से जाने नहीं देते। ना तो इन्हें भारत के हितों की कोई परवाह है और ना ही भारतीय संवैधानिक व लोकतांत्रिक व्यवस्था में इनकी आस्था है। ऐसे में इन्हें सिर पर चढ़ाए रखने का कोई मतलब ही नहीं है। बल्कि इन्हें औकात में लाने की कोशिश तो काफी पहले ही आरंभ हो जानी चाहिये थी। लेकिन देर आयद दुरूस्त आयद। इतना तो तय है कि भारत के टुकड़े करने का ख्वाब देखनेवाले अलगाववादियों की सुरक्षा, यात्रा व रहन-सहन पर सरकारी खजाने से होनेवाले औसतन सालाना एक सौ करोड़ रूपये के खर्च में अब भारी कटौती की जाएगी और उन्हें भारतीय संविधान के दायरे में रहकर बातचीत करके पूरे मसले का हल निकालने के लिये विवश होना ही पड़ेगा। लेकिन आवश्यक है कि इन्हें विदेशों से मिलनेवाली खैरात पर रोक लगायी जाये और दीन-दुनियां से इनका संपर्क पूरी तरह काट दिया जाये। साथ ही देश के आम लोगों की गाढ़ी कमाई का पैसा इनकी सुरक्षा, यात्रा व रहन-सहन पर खर्च किये जाने का भी कोई औचित्य नहीं है बल्कि इनसे सुरक्षा का खर्च भी वसूला जाना चाहिये। इसके बाद भी अगर ये सूबे में अमन बहाली की राह के आड़े आएं तो इनके खिलाफ देशद्रोह व देश के खिलाफ जंग छेड़ने की सख्त धाराओं के तहत कठोरतम कानूनी कार्रवाई करने से भी परहेज नहीं बरता जाना चाहिये। उसके बाद ही इन्हें आटे-दाल का भाव पता लगेगा।    

मंगलवार, 16 अगस्त 2016

जवाबदेही पर जोर.........

जवाबदेही पर जोर

लोकतांत्रिक व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही अपेक्षित तो रहती है लेकिन इन अपेक्षाओं के पूरा होने की अभी तक कोई राह नहीं निकली थी। खास तौर से जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही तो चुनावी राजनीति तक ही सीमित रहती आई है। हालांकि इस व्यवस्था को सुधारने के काफी प्रयास हुए और सूचना का अधिकार के तौर पर लोगों के हाथ में एक हथियार भी आया लेकिन इसका भी पूरा लाभ नहीं मिल सका और माननीयों की जवाबदेही पूरी तरह तय नहीं हो सकी। देश को आजाद हुए 70 साल होने को आए लेकिन अब तक का जो अनुभव है उसके मुताबिक सांसद बन जाने के बाद आम तौर पर कोई भी नेता अपने मतदाताओं के सामने अपने कामकाज का हिसाब प्रस्तुत करना गवारा नहीं करता है। जबकि जनप्रतिनिधि के तौर पर उसकी जवाबदेही है कि वह ना सिर्फ जिम्मेवारी के साथ अपने निर्वाचकों के हितों को सुनिश्चित करे और अपने निर्वाचन क्षेत्र के विकास को आगे बढ़ाए बल्कि अपने कामकाज के बारे में मतदाताओं को जानकारी भी दे और इसमें उनका सुझाव भी ले। लेकिन हकीकत तो यह है कि इन सांसदों से अपेक्षाएं भले कुछ भी हों लेकिन वे आम तौर पर सत्ता मिल जाने के बाद जनता से कट ही जाते हैं। कई दफा ऐसे भी मामले सामने आएं हैं जब लोगों को अपने जनप्रतिधियों के गुमशुदा होने का पोस्टर भी गलियों की दीवारों पर चस्पां करने के लिये मजबूर होना पड़ा है। हालांकि यह तो नहीं कहा जा सकता कि सांसद अपनी जिम्मेवारी नहीं निभाते है लेकिन इस बात से कतई इनकार नहीं किया जा सकता कि जो सांसद अपनी जिम्मेवारी निभाते भी हैं वह ज्यादातर मनमाने तरीके से ही निभाते हैं और उसमें भी दिखावा ही अधिक रहता है। मानो जिम्मेवारी निभाकर जनता पर कोई बहुत बड़ा एहसान कर रहे हों। वैसे भी जिस सामाजिक व्यवस्था व पंरपरा में किसी दूसरे व कथित ऐरे-गैरे को अपने कामकाज का हिसाब देना तौहीन माना जाता हो उस तौहीन को कोई क्यों स्वीकार करें? लेकिन अब वक्त बदला है, परिस्थितियां बदली हैं और निजाम बदला है। यह नया निजाम अपनी जवाबदेही को भी समझता है और दूसरों के लिए भी जवाबदेही तय करने से परहेज नहीं बरतता है। यही वजह है कि सत्ता संभालने की सालगिरह के मौके पर प्रधानमंत्री खुद अपनी सरकार के कामकाज का रिपोर्ट कार्ड जनता के सामने हर वर्ष प्रस्तुत कर रहे हैं। साथ ही परंपरा यह भी डाली गई है कि हर साल सरकार का हर विभाग अपने कामकाज का रिपोर्ट कार्ड सार्वजनिक तौर पर पेश करे और अगले साल के लिये निर्धारित अपने लक्ष्य से भी देश को अवगत कराए। यानि प्रधानमंत्री ने खुद को भी जनता के प्रति जवाबदेह बनाया है और अपने माननीय मंत्रियों को भी। ऐसे में अब अगर सांसदों से भी यही अपेक्षा की गई है तो इसे कैसे गलत कहा जा सकता है। बल्कि यह तो होना ही चाहिए था। खैर, देर आयद दुरुस्त आयद। प्रधानमंत्री ने पार्टी के सभी सांसदों को साफ शब्दों में यह बता दिया है कि उन्हें अपने कामकाज का हिसाब देना ही होगा। पिछले दो साल में सांसद के तौर पर उन्होंने क्या काम किया है और बाकी बचे कार्यकाल के लिये उन्होंने अपने लिये क्या लक्ष्य निर्धारित किया है इसका पूरा बही-खाता उन्हें प्रस्तुत करना होगा। चुंकि सांसदों से उनके कामकाज का हिसाब प्रधानमंत्री खुद लेने वाले हैं लिहाजा इसमें गड़बड़ियों व गलतबयानी की गुंजाइश काफी कम होने की संभावना है। वैसे भी प्रधानमंत्री का लगातार यह आग्रह रहा है कि सांसदों को अपने क्षेत्र में अधिक से अधिक वक्त बिताना चाहिए, स्थानीय लोगों के साथ संपर्क में रहना चाहिए और सोशल मीडिया के माध्यम से भी लोगों के लिए उपलब्ध रहना चाहिए। हालांकि उनके इस आग्रह को कितने सांसदों ने स्वीकार किया है यह तो सर्वविदित ही है। वैसे भी स्वेच्छा से जब अपेक्षाएं पूरी नहीं होती हैं तो इसके लिये कड़ाई करनी ही पड़ती है और उसी कड़ाई का मुजाहिरा हुआ है आज प्रधानमंत्री की बातों से। प्रधानमंत्री ने यह भी कहा है की सामाजिक एकता, अखंडता, सौहार्द व समरसता की भावना को जगाते हुए राष्ट्रवाद का प्रवाह जमीनी स्तर तक पहुंचाने के लिए आगामी 15 अगस्त से आरंभ हो रही तिरंगा यात्रा के प्रतिदिन की प्रगति की रिपोर्ट अगर सांसद स्वयं उन्हें सौपेंगे तो बेहतर रहेगा। यानि सांसदों के जमीनी जुड़ाव की मॉनीटरिंग अब प्रधानमंत्री खुद ही करने वाले हैं। जाहिर तौर पर जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही तय करने की दिशा में प्रधानमंत्री की ओर से की गयी यह शुरुआत बेहद ही सराहनीय है। इससे ना सिर्फ सांसदों में जागरुकता आएगी बल्कि आम लोगों का अपने जनप्रतिनिधियों के  प्रति नजरिया भी बदलेगा जिससे निजाम व आवाम के दरमियान परस्पर तारतम्यता कायम होगी जिसका अंतिम परिणाम विकास, सुशासन व पारदर्शिता के तौर पर सामने आएगा। 

बुधवार, 22 जून 2016

कैराना की कराह का कचोट

कैराना की कराह का कचोट


पश्चिमी उत्तर प्रदेश स्थित कैराना की धरती को महाभारत काल में दानवीर कर्ण की जन्मभूमि होने का गौरव हासिल है। यही वही धरती है जहां महान गायक अब्दुल करीम खां ने शाष्त्रीय संगीत के किराना घराना की स्थापना की थी। बताते हैं कि एक बार महान संगीतकार मन्ना डे जब किसी काम से कैराना आये तब उन्होंने गाड़ी से उतर कर यहां की धरती पर पैर रखने से पहले इसकी मिट्टी के प्रति अपना सम्मान प्रदर्शित करते हुए अपने जूते उतारकर हाथ में ले लिये थे। यहां तक कि भारतरत्न पंडित भीमसेन जोशी का संबंध भी कैराना की धरती से रहा है। ऐसे में अंदाजा लगाया जा सकता है कि कैराना की धरती कितनी पूज्य व पवित्र है। बिल्कुल किसी तीर्थ की तरह। लेकिन वही धरती आज कराह रही है, कलप रही है। जहां संगीत के सरगम की तान फिजाओं को गुंजायमान करती थी वहां दहशत का सन्नाटा पसरा है। सामाजिक सद्भाव व समरसता की बात तो दूर रही अब तो वहां का सामाजिक संतुलन ही बिगड़ चुका है और स्थिति की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कुछ दिन पहले तक जहां एक खास समुदाय की आबादी तकरीबन 40 फीसदी थी वह सिमटकर महज 8 फीसदी से भी कम पर आ गयी है। अगर जीवन-यापन की स्थानीय समस्याओं के कारण वहां से परिवारों का पलायन हो रहा होता तो कायदे से सभी समुदायों का पलायन होना चाहिये था। किसी एक संप्रदाय के लोगों का ही पलायन क्यों हुआ दूसरे का क्यों नहीं? इस कसौटी पर परखें तो स्पष्ट है कि पलायन की वजह जीवन-यापन की समस्या नहीं है बल्कि इसके पीछे सांप्रदायिक असहिष्णुता ही है जिसने प्रबल समुदाय के सामने विवश होकर निर्बल समुदाय को पलायन के लिये मजबूर कर दिया है। यानि स्थानीय बहुसंख्यकों को ही सीधे तौर पर इस पलायन के लिये जिम्मेवार कहा जाये तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है। स्थानीय नागरिकांे का कहना है कि यहां पर धर्मविशेष से जुड़े बड़े अपराधियों व गुंडों का जबर्दस्त आतंक है। यह गुंडे आये दिन स्कूल जाती हुयी बच्च्यिों को छेड़ते हंै तथा उनके साथ अश्लील हरकतें करते हैं जिसके कारण इन बच्चियों ने स्कूल जाना बंद कर दिया है। यदि जाती भी हैं तो उनके साथ कोई न कोई उनको छोडने ओर लेने के लिए जाता है। दुराचार की कई घटनाएं घट चुकी हैंै लेकिन पुलिस प्रशासन हाथ पर हाथ धरे बैठा रहा है। आम तौर पर थाने में रिपोर्ट तक दर्ज नहीं की जाती है। यहां तक कि सामाजिक समरसता के लिये कई दफा महापंचायत का भी आयोजन हुआ लेकिन इसका कोई परिणाम नहीे निकला। इसमें महत्वपूर्ण तथ्य है कि समूचा पीड़ित पक्ष एक ही धर्म का है जबकि आरोपियों का मजहब अलग है। यानि पूरा मामला सीधे तौर पर सांप्रदायिक टकराव व वर्चस्व का ही है। लेकिन मसला है कि यह सच कहे कौन? सत्ताधारी सपा भी चुप और मुख्य विपक्षी बसपा भी मौन। स्थानीय तौर पर बहुसंख्यक हो चुके राष्ट्रीय स्तर के अल्पसंख्यकों का वोट तो सबको चाहिये। लिहाजा इस झमेले को कोई क्यों तूल देता। वह भी तब जबकि पिछले प्रधानमंत्री बेलाग लहजे में बता चुके थे कि उनके नजरिये से देश के तमाम संसाधनों पर पहला हक अल्पसंख्यकों का ही है। जाहिर तौर पर यह अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की ही नीति थी जिसके कारण कैराना की समस्या को कभी सतह पर नहीं आने दिया गया और अंदरखाने वहां के बिगड़ते सामाजिक संतुलन की लगातार अनदेखी की गयी। लेकिन केन्द्र में निजाम बदला तो जमीन पर भी असर दिखा और जिनकी अब तक जुबान बंद थी उनके समर्थन में कुछ बातें शुरू हुईं जो बढ़ते-बढ़ते अब यहां तक आ गयी है कि कैराना का नाम अब किसी के लिये अंजाना नहीं रहा है। केन्द्र के नये निजाम के झंडाबरदारों ने जब आवाज उठायी तो सूबे की सरकार भी सक्रिय हुई। फिलहाल दोनों ओर से जांच जारी है। आरोपों के फर्रे तैयार हो रहे हैं। खुद के बचाव का इंतजाम भी किया जा रहा है। लेकिन पीड़ितों की घरवापसी पर किसी का ध्यान नहीं है। सभी इस आग में अपनी सियासी रोटी सेंकने की जुगत में दिख रहे हैं। आखिर चुनावी मौसम जो ठहरा। जाहिर है कि चुनाव के बाद यह मामला भी फाइलों में ही दब कर दम तोड़ देगा और यहां से उजड़े हुए परिवारों का भी वहीं हश्र होगा जो कश्मीरी पंडितों या तमिल ब्राह्मणों का हो चुका है। ऐसे में कैराना की कराह से कचोट होना तो स्वाभाविक ही है। काश कोई वास्तव में पीड़ितों की तत्काल घरवापसी कराने की कोशिश करता लेकिन अफसोस है कि जिनसे उम्मीद की जा सकती है वे भी राजनीतिक कारणों से इसे सांप्रदायिक मामला मानने से इनकार करके सच को झुठलाते हुए ही दिख रहे हैं।  

शुक्रवार, 10 जून 2016

तयशुदा मंजिल की गुमशुदा राहें

तयशुदा मंजिल की गुमशुदा राहें


लोकसभा चुनाव में महज 32 फीसदी वोट पाकर भी भाजपा ने बहुमत के जादूई आंकड़े से ग्यारह सीटें अधिक हासिल कर लीं और चुनावी दौड़ में तमाम सियासी दलों को इस कदर पीछे छोड़ दिया कि किसी दल को इतनी सीटें भी नहीं मिल सकीं कि वह न्यूनतम दस फीसदी सीटों के दम पर लोकसभा में विपक्ष के नेता के पद पर अपनी दावेदारी दर्ज करा सके। इस बात की कसक ने पिछले दो सालों से तमाम राजनीतिक दलों की रातों की नींद और दिन का चैन उड़ाया हुआ है। लिहाजा अगली दफा के लिये सभी ने अभी से यह लक्ष्य तय कर लिया है कि भाजपा की राह रोकने के लिये वे एकजुट होकर ही लड़ेंगे। वोटों का बिखराव नहीं होने देंगे। आपस में एक-दूसरे को चुनौती देने के बजाय एकजुट होकर भाजपा के लिये चुनौती पेश करेंगे। इस लक्ष्य का आधार तो वही है जिसका बेहद सफल प्रयोग बिहार के विधानसभा चुनाव में किया जा चुका है जहां महागठजोड़ बनाकर भाजपा विरोधी वोटों का इस कदर ध्रुवीकरण किया गया कि मोदी की सेना को टिककर लड़ने की मजबूत जमीन भी मयस्सर नहीं हो सकी। लेकिन मसला है कि इस तयशुदा लक्ष्य को हासिल करने के लिये कोई ठोस राह भी तो मिले। इस नजरिये से देखें तो राहें गुमशुदा ही नजर आ रही हैं। जिधर से कोई राह खोलने की कोशिश होती है उधर अगले कदम पर ही किसी ना किसी के मत्वाकांक्षाओं की दीवार आड़े आ जाती है। मसलन कोशिश हुई टूटे-बिखरे व बिछड़े समाजवादी कुनबे को एकजुट करने की तो इसमें बिहार की राजनीति में अपना वर्चस्व कायम रखने की राजद व जदयू की और यूपी में अपना एकाधिकार कायम रखने की सपा की महत्वाकांक्षा आड़े आ गयी। फिर नये सिरे से नितीश ने कोशिश शुरू की जदयू का विस्तार करने के लिये अजित सिंह व बाबूलाल मरांडी को दल-बल सहित संगठन में शामिल कराने की। लेकिन इसमें भी फच्चर यह फंसा कि जब इन दोनों को हाथों-हाथ कोई फायदा मिलना ही नहीं है तो अपनी दुकान समेट कर वे किसी अन्य के साथ विलय ही क्यों करें। लिहाजा यह विचार भी आगे नहीं बढ़ सका। यहां तक कि बिहार विधानसभा चुनाव के बाद राजद व जदयू का विलय हो जाने की जो बात दोनों ही दलों के शीर्ष नेतृत्व ने कही थी उस दिशा में भी कुछ होता हुआ नहीं दिख रहा है। हो भी कैसे? ना तो नितीश कभी लालू के मातहत काम कर सकते हैं और ना ही लालू अपने पूरे जीवन की कमाई नितीश के हवाले कर सकते हैं। लिहाजा वह विचार भी परवान चढ़ पाना नामुमकिन ही दिख रहा है। इन तमाम प्रयोगों का प्रस्ताव विफल हो जाने के बाद अब एक ओर डी राजा ने पांच टुकड़ों में बंटे वाम दलों को एक मंच पर आने का प्रस्ताव दिया है जबकि ममता बनर्जी के नेतृत्व में तीसरा मोर्चा गठित करने की कवायद समाजवादियों ने शुरू की है। लेकिन मसला वही है कि जहां ममता होगी वहां वामदल नहीं हो सकते, जहां सपा होगी वहां बसपा नहीं रह सकती, द्रमुक और अन्ना द्रमुक एक साथ नहीं आ सकते और सबसे बड़ी बात यह कि राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस किसी अन्य का नेतृत्व स्वीकार ही नहीं कर सकती। उस पर तुर्रा यह कि बीजद और टीआरएस सरीखे दल अपना पत्ता खोलने के लिये कतई तैयार नहीं हैं। यानि कुल मिलाकर देखें तो लोकसभा चुनाव में पड़े 68 फीसदी भाजपा विरोधी वोटों को एकजुट करके दिल्ली की कुर्सी पर कब्जा जमाने का लक्ष्य तो कागजी तौर पर सबके समक्ष पूरी तरह स्पष्ट है लेकिन इस लक्ष्य को हासिल करने के लिये आवश्यक विपक्षी एकजुटता की राह पूरी तरह गुमशुदा है। लिहाजा अब तीसरे मोर्चे का विचार भी माखौल का पर्याय बनता जा रहा है। तभी तो भाजपा भी निश्चिंत है और कांग्रेस भी। दोनों को पता है कि उनके मोर्चे से अलग कोई नया मोर्चा गठित हो पाना नामुमकिन की हद तक मुश्किल है। यानि मोर्चे दो ही हो सकते हैं। या तो भाजपा के नेतृत्व में राजग या फिर कांग्रेस के नेतृत्व में संप्रग। इसके अलावा किसी तीसरे के नेतृत्व पर बाकियों के बीच सहमति बन ही नहीं सकती। और अगर बनी भी तो उसका कोई फायदा नहीं मिलना क्योंकि अलग-अलग प्रदेशों की अलग-अलग पार्टियां एकजुट भी हो जाएं तो इसका कोई लाभ-हानि का चुनावी समीकरण नहीं बन सकता। फायदा तो तब हो जब बिहार की तरह हर सूबे की भाजपा विरोधी पार्टियां अपने मतभेद भुलाकर एकजुट हों और राष्ट्रीय स्तर पर उनका एक व्यापक गठजोड़ बने। वर्ना अगर यूपी की तरह चौतरफा लड़ाई हुई और कोई किसी के साथ आने के लिये तैयार नहीं हुआ तो निर्धारित लक्ष्य की राहें यथावत गुमशुदा ही रहेंगी।

शुक्रवार, 27 मई 2016

बाजार में बिचौलियों का वर्चस्व

लोग बेहाल बिचौलिये मालामाल


बाजार में बिचौलियों का वर्चस्व तो हमेशा से रहा है। बल्कि यह कहना भी गलत नहीं होगा कि बाजार बनता ही बिचौलियों से है। उत्पादक और उपभोक्ता के बीच की कड़ी कहे जानेवाले बिचौलियों ने अगर बाजार का निर्माण किया है तो जाहिर तौर पर अपने मुनाफे के लिये ही किया है। तभी तो उत्पादन कम हो या ज्यादा, दौर सस्ती का हो या महंगाई का। इनका मुनाफा पक्का रहता है। ये अपने मुनाफे के लिये बाजार को इस तरह संचालित करते हैं कि किसी भी सूरत में ना तो उत्पादक का अधिक भला हो पाता है और ना ही उपभोक्ता को ज्यादा सहूलियत मिल पाती है। मिसाल के तौर पर इन दिनों खुदरा बाजार की बात करें तो हर घर में रोजाना इस्तेमाल होनेवाली प्याज पिछले कई महीनों से लगातार औसतन बीस रूपये प्रति किलोग्राम की दर पर डटी हुई है। यह वो कीमत है जो पिछले मानसून के बाद प्याज की कमी के कारण पनपी आवक में कमी के नतीजे में निर्धारित हुई थी। लेकिन अब जबकि प्याज की बंपर पैदावार हुई है और किसानों के लिये इसे संभाल कर रखना मुश्किल हो रहा है तब भी अगर इसकी खुदरा कीमतों में कोई उतार नहीं दिख रहा है तो इसकी साफ व सीधी वजह बाजार में मुनाफाखोर बिचौलियों का वर्चस्व ही है जिन्होंने मांग व आपूर्ति के बीच मनमाना संतुलन कायम करके कीमत को लगातार स्थिर किया हुआ है। आलम यह है कि किसान को मंडी में महज डेढ़ से दो रूपये प्रति किलो की दर से खरीदनेवाले भी बड़ी मुश्किल से मिल रहे हैं जबकि उपभोक्ताओं को इसकी कीमत औसतन बीस रूपये की दर से चुकानी पड़ रही है। ऐसे में सवाल है कि आखिर बीच का 18 रूपया जा कहां रहा है। जाहिर तौर पर यह उन बिचौलियों की तिजोरी में जमा हो रहा है जो प्याज को खेत से किचेन तक का सफर तय कराते हैं। ऐसे में किसान का यथावत बदहाल रहना स्वाभाविक ही है। वह तब भी बदहाल था जब बाढ़-सुखाड़ के कारण उसकी फसल बर्बाद हो गयी और वह आज भी बदहाल है जब उसने अपना खून-पसीना एक करके बंपर फसल पैदा की है। इसी प्रकार जब उत्पादन कम हुआ तब भी उपभोक्ता को ही अपनी जेब ढ़ीली करनी पड़ी और आज भी बाजार में उपभोक्ता ही लुट रहा है। यानि दोनों तरफ से फायदा इन बिचौलियों का ही है।ऐसा नहीं है कि यह नौबत महाराष्ट्र के प्याज उत्पादकों को ही झेलनी पड़ रही है बल्कि यही हाल समूचे देश के किसानों का है जो मंडी में बिचौलियों के हाथों औने-पौने दामों पर अपनी फसल बेचने के लिये मजबूर हैं। किसान आलू पैदा करे या टमाटर, गन्ना उगाए या फल-फूल उपजाये। सबकी व्यथा एक जैसी ही है। इसमें किसी वस्तु का दाम अधिक तेजी से बढ़ जाने पर सरकार अगर हरकत में भी आती है तो जमाखोरों पर छापेमारी के अलावा आयात में इजाफा करने के परंपरागत तौर-तरीकों पर अमल शुरू कर देती है। लेकिन कभी यह कोशिश नहीं होती कि किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य मिले और उपभोक्ताओं को सही कीमत पर बाजार में सामान उपलब्ध हो सके। लिहाजा बिचौलियों की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता। ऐसे में आवश्यकता है कि बाजार में कीमतों के निर्धारण व नियंत्रण पर भी सरकार व प्रशासन की नजर हो। सिर्फ मांग व आपूर्ति के बीच संतुलन के भरोसे बाजार को छोड़े रखने से ना तो उत्पादकों को न्याय मिल सकता है और ना ही उपभोक्ताओं को। इस दिशा में दिल्ली विधानसभा चुनाव के वक्त आम आदमी पार्टी व भाजपा ने भी काफी वायदे किये थे। एक ओर किसानों को मंडी में ही अपनी उपज बेचने की अनिवार्यता समाप्त करने की बात कही गयी थी वहीं दूसरी ओर बाजारों में स्वयंसेवकों की तैनाती का भरोसा दिलाया गया था ताकि मनमानी कीमत वसूलनेवालों पर लगाम कसी जा सके। लेकिन ये सभी बातें सिर्फ बातें ही साबित हुई हैं। वैसे भी अगर किसान खुद ही उपभोक्ताओं को अपना उत्पाद बेचने चला जाये तो वह खेती पर क्या ध्यान देगा और दूसरी ओर खुदरा बाजार के लिये जब तक सभी जींसों का ठोस तरीके से मूल्य निर्धारण नहीं किया जाता तब तक मनमानी कीमत का कैसे पता चल पाएगा। यानि बाजार की असली बीमारी का इलाज किये बिना इस अव्यस्था से निजात पाने की कल्पना भी बेकार ही है। लिहाजा आवश्यकता है कि उत्पादक और उपभोक्ता के बीच कीमतों का अनुपात निर्धारित किया जाये और बिचौलियों व बाजार की अन्य ताकतों को लागत के मुकाबले एक निश्चित अनुपात में ही मुनाफा कमाने की छूट रहे। वर्ना मांग व आपूर्ति के चक्कर में पूरी बाजार व्यवस्था यथावत घनचक्कर बनी रहेगी।   

गुरुवार, 26 मई 2016

जीत के जोश में होश की दरकार

जीत के जोश में होश की दरकार


पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के नतीजों की जो समग्र तस्वीर सामने आयी है उसमें दो बातें बिल्कुल साफ हैं। पहली यह की इसने भाजपा को संभावनाओं के असीमित संसार का दरवाजा दिखा दिया है जबकि दूसरी ओर कांग्रेस को उन सूबों में भी मतदाताओं ने सिरे से नकार दिया है जहां कांग्रेस मुक्त भारत के सपने को साकार करने का सपना देखना भी भाजपा के लिये संभव नहीं माना जा सकता है। यानि इस दफा बड़ी जीत भाजपा के हिस्से में आयी है जबकि करारी व अकल्पनीय शिकस्त का सामना कांग्रेस को करना पड़ा है। लिहाजा हार के बाद अब आत्मचिंतन करने की बारी तो कांग्रेस की ही है जिसे इस समय कुछ भी कहना ऐसा ही होगा मानो जले पर नमक छिड़का जा रहा हो। ऐसे में फिलहाल कांग्रेस के नजरिये इन चुनावी नतीजों का विश्लेषण करने से परहेज बरतना ही बेहतर होगा और उचित यही होगा कि उसे इस हार के कारणों पर विचार करने व उसमें सुधार करने का उपाय तलाशने के लिये छोड़ दिया जाये। लेकिन भाजपा के नजरिये से तो इन चुनावी नतीजों का विश्लेषण तत्काल ही किया जा सकता है जिसे इस जीत के बाद ऐसा लग रहा है मानो उसने दुनियां जीत ली हो। तभी तो पार्टी अध्यक्ष से लेकर प्रधानमंत्री तक भी सार्वजनिक तौर पर अपना उद्गार प्रकट करने में कोई कोताही नहीं बरत रहे हैं। बताया जा रहा है कि यह मोदी सरकार की दो साल की उपलब्धियों के प्रति जनता की स्वीकार्यता का नतीजा है। पार्टी इस जीत के नशे में इस कदर मदहोश है कि उसे बाकी सूबों में अपेक्षित सफलता नहीं मिल पाने का कोई मलाल ही नहीं है। असम की जीत से ही पार्टी पूरी तरह आत्ममुग्ध है। उस पर तुर्रा यह कि पार्टी को पहली दफा केरल में भी खाता खोलने का मौका मिल गया। लिहाजा लाजिमी तौर पर उसकी खुशियों का कोई पारावार ही नहीं है। लेकिन पार्टी की ओर जिस जीत को अब तक की तमाम सफलताओं से अधिक बड़ा बताने की कोशिश हो रही है उसकी गहराई से पड़ताल करें तो पूरा मामला उतना खुशनुमां व उत्साहजनक नहीं दिखता है जितना दिखाने की कोशिश हो रही है। अलबत्ता समग्रता में देखें तो लोकसभा चुनाव के पूर्व तक की स्थिति के नजरिये से तो भाजपा ने वास्तव में अपने प्रदर्शन में अकल्पनीय सुधार किया है लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में नरेन्द्र मोदी का पदार्पण होने के बाद जो भाजपा की तस्वीर बनी है उस लिहाज से इस बार का प्रदर्शन कहीं से भी ऐसा नहीं है जिसके दम पर वह उत्साह में आकर अश्वमेध का घोड़ा खोलने की स्थिति में दिखे। माना कि उसे पहली दफा असम में पूर्ण बहुमत के साथ ही देश के पूर्वोत्तरी हिस्से में प्रवेश का अवसर मिल गया है लेकिन बाकी किसी भी सूबे में वह उस लक्ष्य को कतई हासिल नहीं कर पायी है जिसकी उसे अपेक्षा थी। यहां तक कि असम के जिस चुनावी नतीजे को प्रधानमंत्री भी चौंकानेवाला करार दे रहे हैं वहां भी मत फीसदी के मामले में कांग्रेस ही भाजपा पर भारी रही है और भाजपा के मुकाबले कांग्रेस को डेढ़ फीसदी अधिक वोट मिले हैं। केरल की ही बात करें तो सूबे की तीस फीसदी आबादीवाले इझवा समुदाय के सर्वमान्य सामाजिक संगठन एसएनडीपी को राजनीति में प्रवेश दिलाते हुए बड़ी मेहनत व मशक्कत के बाद बीडीजेएस के नाम से एक नयी पार्टी का गठन कराया गया। लक्ष्य था कि अपने परंपरागत ग्यारह फीसदी अय्यर वोटबैंक के साथ तीस फीसदी इझवा वोटों को जोड़कर सूबे के चुनाव को त्रिकोणीय स्वरूप दिया जाये। लेकिन यह पूरी योजना कागजों पर ही सिमट कर रह गयी और जहां एक ओर भाजपा को सिर्फ एक सीट के साथ सूबे में किसी तरह खाता खोलने का मौका मिल सका वहीं बीडीजेएस तो सियासी तौर पर अपना अस्तित्व भी पैदा नहीं कर सका। कहां तो पार्टी को उम्मीद थी कि उसे तीस फीसदी से भी अधिक वोट मिलेंगे और हकीकत में उसे मिला है सिर्फ साढ़े दस फीसदी वोट। दूसरी ओर पश्चिम बंगाल में तो कांग्रेस और वाममोर्चे के गठजोड़ की घोषणा होने के साथ ही सत्ताविरोधी वोटों में अपनी हिस्सेदारी तलाशने की भी भाजपा में हिम्मत नहीं बची और उसने गिने-चुने एक दर्जन सीटों पर ही अपना ध्यान केन्द्रित कर लिया जिसमें उसके हिस्से में सिर्फ तीन सीटें ही आयीं। इसी प्रकार पुदुचेरी और तमिलनाडु में भी भाजपा के हिस्से में सिफर ही आया है। खैर, ये तमाम तथ्य ऐसे हैं जिनकी उपेक्षा या अनदेखी करने का दिखावा किया जाना तो स्वाभाविक ही है लेकिन पार्टी को अंदरूनी तौर पर गहराई से इस बात की पड़ताल करनी ही होगी कि कमी कहां रह गयी। 

मंगलवार, 17 मई 2016

राष्ट्रपति की विचारणीय चिंता

राष्ट्रपति की विचारणीय चिंता 


देश में ज्ञान, विज्ञान व अनुसंधान के स्तर को लेकर राष्ट्रपति ने अपनी जो चिंता प्रकट की है और जिस तरह के भविष्य का दर्पण दिखाया है वह वाकई विचारणीय भी है और चिंतनीय भी। चिंतनीय इसलिये क्योंकि आखिर कभी तो हमें यह चिंता करनी ही होगी कि हमारी शिक्षा प्रणाली हमें कहां लेकर जा रही है। राष्ट्रपति के ही शब्दों में कहें तो आजादी के बाद से आज तक भारतीय शिक्षण संस्थानों ने एक भी ऐसा देसी छात्र हमें नहीं दिया है जो ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में अपने प्रामाणिक अनुसंधान के दम पर देश को नोबेल पुरस्कार से नवाज सके। एक ओर हमारे शिक्षण संस्थान विश्व की शीर्ष रैंकिंग में दो सौवें स्थान पर आने के लिये भी लगातार जद्दोजहद करते दिखते हैं वहीं सरकार भी इस दिशा में कितनी निश्चिंत है इसका सहज अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि देश की जीडीपी का महज आधा फीसदी ही शिक्षण, प्रशिक्षण व शोध के क्षेत्र में खर्च के लिये आवंटित किये जाने की परंपरा लगातार चली आ रही है। यानि सरकार किसी भी दल की क्यों ना रही हो, शिक्षा को कभी प्राथमिकता नहीं मिल सकी। वह भी तब जबकि हम खम ठोंकते हैं उस चीन को हर मोर्चे पर पीछे छोड़ने का जो अपनी जीडीपी का लगभग सवा दो फीसदी हिस्सा सिर्फ ज्ञान, विज्ञान व अनुसंधान पर ही खर्च करता है। यानि शिक्षा के क्षेत्र में बतकही व बतरस से आगे बढ़कर कुछ ठोस करने की ना तो कभी नीति रही और ना नीयत। इसमें तकरीबन ग्यारह वर्षों तक वित्तमंत्री रहते हुए देश के आय-व्यय में संतुलन बिठा चुके प्रणब दा की यह स्वीकारोक्ति अवश्य ही सराहनीय है कि किसी भी वित्तमंत्री के लिये बाकी खर्चों से बचाकर शिक्षा के मद में आवंटन बढ़ाना बेहद मुश्किल व सिरदर्दी का काम हो सकता है। लेकिन यह करना तो पड़ेगा। वर्ना राष्ट्रपति ने भविष्य की जो तस्वीर दिखायी है उसके मुताबिक 2030 में जब विश्व का हर दूसरा व्यक्ति भारत का नागरिक होगा और उसमें से भी आधे की उम्र 25 वर्ष के भीतर की होगी तब उस विशाल युवा समुद्र को समुचित तौर पर विश्व व्यवस्था में अपना स्थान बनाने में कितनी मुश्किलें पेश आएंगी इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। लिहाजा आज सिर्फ कौशल भारत, कुशल भारत का जो नारा बेहद जादूई प्रतीत हो रहा है वह उन दिनों किसी काम का नहीं बचेगा अगर कुशलता की बुनियाद हमारे अपने अनुसंधान पर आधारित नहीं होगी। यानि आवश्यकता इस बात की है कि हम शोध व अनुसंधान के क्षेत्र में विश्व की मांग व मानवता की जरूरतों के मुताबिक अपना ध्यान केन्द्रित करें और रटंत विद्या की परंपरा से अलग हटकर कुछ नया करने की पहल करें। यह बात तो हमारे प्रधानमंत्री भी कई दफा स्वीकार कर चुके हैं कि मौजूदा युग ज्ञान का युग है। लिहाजा ज्ञान में सिर्फ पारंगत होना ही काफी नहीं हो सकता, इसमें दुनियां से आगे निकलने की आवश्यकता है। जिसके लिये ना सिर्फ हमारे शिक्षण संस्थानों को अपने पाठ्यक्रमों की गुणवत्ता में व्यापक सुधार लाना होगा बल्कि छात्रों को भी भविष्य की चुनौतियों के प्रति जागरूक होना पड़ेगा और सरकार को भी इस दिशा में अभी से समुचित निवेश की व्यवस्था करनी होगी। अगर सभी मोर्चों पर एक साथ पहलकदमी नहीं हुई तो 14 साल बाद 25 साल के आयुवर्ग की विश्व की एक-चौथाई भारतीय आबादी का भविष्य सुधारना नामुमकिन होगा और भारत को विश्वगुरू के पद पर दोबारा प्रतिष्ठित करने का सपना कभी पूरा नहीं हो पाएगा। आज 119 विश्वविद्यालय व 37,000 कॉलेजों का देश होने के बावजूद भारत शिक्षा के क्षेत्र में विश्व मानचित्र पर कहीं नहीं दिख रहा है। हम विश्व में तृतीय व चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों के प्रमुख आपूर्तिकर्ता के तौर पर पहचाने जा रहे हैं। ना हमें कोई नोबेल के लिये नामांकित करवा पा रहा है और ना ही अपने अनुसंधानों के दम पर हम विश्व को चमत्कृत कर पा रहे हैं। हम तो इसी से संतोष कर लेते हैं कि आमर्त्य सेन सरीखे किसी भारतीय मूल वाले को नोबेल मिल गया अथवा गॉड पार्टिकल का नामकरण हमारे सीबी रमण के नाम पर हो गया। लेकिन इससे बात बनती नहीं, बिगड़ती ही जा रही है। जिसे सुधारने के अलावा दूसरा कोई विकल्प ही नहीं है। चाहे इस क्षेत्र को तत्काल प्राथमिकता मिले या भविष्य में, मिलनी तो है ही। बस चिंता इस बात की है कि इसमें जितनी देरी होगी उसकी भरपायी भी उतनी ही मुश्किल होती चली जाएगी।