बुधवार, 22 जून 2016

कैराना की कराह का कचोट

कैराना की कराह का कचोट


पश्चिमी उत्तर प्रदेश स्थित कैराना की धरती को महाभारत काल में दानवीर कर्ण की जन्मभूमि होने का गौरव हासिल है। यही वही धरती है जहां महान गायक अब्दुल करीम खां ने शाष्त्रीय संगीत के किराना घराना की स्थापना की थी। बताते हैं कि एक बार महान संगीतकार मन्ना डे जब किसी काम से कैराना आये तब उन्होंने गाड़ी से उतर कर यहां की धरती पर पैर रखने से पहले इसकी मिट्टी के प्रति अपना सम्मान प्रदर्शित करते हुए अपने जूते उतारकर हाथ में ले लिये थे। यहां तक कि भारतरत्न पंडित भीमसेन जोशी का संबंध भी कैराना की धरती से रहा है। ऐसे में अंदाजा लगाया जा सकता है कि कैराना की धरती कितनी पूज्य व पवित्र है। बिल्कुल किसी तीर्थ की तरह। लेकिन वही धरती आज कराह रही है, कलप रही है। जहां संगीत के सरगम की तान फिजाओं को गुंजायमान करती थी वहां दहशत का सन्नाटा पसरा है। सामाजिक सद्भाव व समरसता की बात तो दूर रही अब तो वहां का सामाजिक संतुलन ही बिगड़ चुका है और स्थिति की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कुछ दिन पहले तक जहां एक खास समुदाय की आबादी तकरीबन 40 फीसदी थी वह सिमटकर महज 8 फीसदी से भी कम पर आ गयी है। अगर जीवन-यापन की स्थानीय समस्याओं के कारण वहां से परिवारों का पलायन हो रहा होता तो कायदे से सभी समुदायों का पलायन होना चाहिये था। किसी एक संप्रदाय के लोगों का ही पलायन क्यों हुआ दूसरे का क्यों नहीं? इस कसौटी पर परखें तो स्पष्ट है कि पलायन की वजह जीवन-यापन की समस्या नहीं है बल्कि इसके पीछे सांप्रदायिक असहिष्णुता ही है जिसने प्रबल समुदाय के सामने विवश होकर निर्बल समुदाय को पलायन के लिये मजबूर कर दिया है। यानि स्थानीय बहुसंख्यकों को ही सीधे तौर पर इस पलायन के लिये जिम्मेवार कहा जाये तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है। स्थानीय नागरिकांे का कहना है कि यहां पर धर्मविशेष से जुड़े बड़े अपराधियों व गुंडों का जबर्दस्त आतंक है। यह गुंडे आये दिन स्कूल जाती हुयी बच्च्यिों को छेड़ते हंै तथा उनके साथ अश्लील हरकतें करते हैं जिसके कारण इन बच्चियों ने स्कूल जाना बंद कर दिया है। यदि जाती भी हैं तो उनके साथ कोई न कोई उनको छोडने ओर लेने के लिए जाता है। दुराचार की कई घटनाएं घट चुकी हैंै लेकिन पुलिस प्रशासन हाथ पर हाथ धरे बैठा रहा है। आम तौर पर थाने में रिपोर्ट तक दर्ज नहीं की जाती है। यहां तक कि सामाजिक समरसता के लिये कई दफा महापंचायत का भी आयोजन हुआ लेकिन इसका कोई परिणाम नहीे निकला। इसमें महत्वपूर्ण तथ्य है कि समूचा पीड़ित पक्ष एक ही धर्म का है जबकि आरोपियों का मजहब अलग है। यानि पूरा मामला सीधे तौर पर सांप्रदायिक टकराव व वर्चस्व का ही है। लेकिन मसला है कि यह सच कहे कौन? सत्ताधारी सपा भी चुप और मुख्य विपक्षी बसपा भी मौन। स्थानीय तौर पर बहुसंख्यक हो चुके राष्ट्रीय स्तर के अल्पसंख्यकों का वोट तो सबको चाहिये। लिहाजा इस झमेले को कोई क्यों तूल देता। वह भी तब जबकि पिछले प्रधानमंत्री बेलाग लहजे में बता चुके थे कि उनके नजरिये से देश के तमाम संसाधनों पर पहला हक अल्पसंख्यकों का ही है। जाहिर तौर पर यह अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की ही नीति थी जिसके कारण कैराना की समस्या को कभी सतह पर नहीं आने दिया गया और अंदरखाने वहां के बिगड़ते सामाजिक संतुलन की लगातार अनदेखी की गयी। लेकिन केन्द्र में निजाम बदला तो जमीन पर भी असर दिखा और जिनकी अब तक जुबान बंद थी उनके समर्थन में कुछ बातें शुरू हुईं जो बढ़ते-बढ़ते अब यहां तक आ गयी है कि कैराना का नाम अब किसी के लिये अंजाना नहीं रहा है। केन्द्र के नये निजाम के झंडाबरदारों ने जब आवाज उठायी तो सूबे की सरकार भी सक्रिय हुई। फिलहाल दोनों ओर से जांच जारी है। आरोपों के फर्रे तैयार हो रहे हैं। खुद के बचाव का इंतजाम भी किया जा रहा है। लेकिन पीड़ितों की घरवापसी पर किसी का ध्यान नहीं है। सभी इस आग में अपनी सियासी रोटी सेंकने की जुगत में दिख रहे हैं। आखिर चुनावी मौसम जो ठहरा। जाहिर है कि चुनाव के बाद यह मामला भी फाइलों में ही दब कर दम तोड़ देगा और यहां से उजड़े हुए परिवारों का भी वहीं हश्र होगा जो कश्मीरी पंडितों या तमिल ब्राह्मणों का हो चुका है। ऐसे में कैराना की कराह से कचोट होना तो स्वाभाविक ही है। काश कोई वास्तव में पीड़ितों की तत्काल घरवापसी कराने की कोशिश करता लेकिन अफसोस है कि जिनसे उम्मीद की जा सकती है वे भी राजनीतिक कारणों से इसे सांप्रदायिक मामला मानने से इनकार करके सच को झुठलाते हुए ही दिख रहे हैं।  

शुक्रवार, 10 जून 2016

तयशुदा मंजिल की गुमशुदा राहें

तयशुदा मंजिल की गुमशुदा राहें


लोकसभा चुनाव में महज 32 फीसदी वोट पाकर भी भाजपा ने बहुमत के जादूई आंकड़े से ग्यारह सीटें अधिक हासिल कर लीं और चुनावी दौड़ में तमाम सियासी दलों को इस कदर पीछे छोड़ दिया कि किसी दल को इतनी सीटें भी नहीं मिल सकीं कि वह न्यूनतम दस फीसदी सीटों के दम पर लोकसभा में विपक्ष के नेता के पद पर अपनी दावेदारी दर्ज करा सके। इस बात की कसक ने पिछले दो सालों से तमाम राजनीतिक दलों की रातों की नींद और दिन का चैन उड़ाया हुआ है। लिहाजा अगली दफा के लिये सभी ने अभी से यह लक्ष्य तय कर लिया है कि भाजपा की राह रोकने के लिये वे एकजुट होकर ही लड़ेंगे। वोटों का बिखराव नहीं होने देंगे। आपस में एक-दूसरे को चुनौती देने के बजाय एकजुट होकर भाजपा के लिये चुनौती पेश करेंगे। इस लक्ष्य का आधार तो वही है जिसका बेहद सफल प्रयोग बिहार के विधानसभा चुनाव में किया जा चुका है जहां महागठजोड़ बनाकर भाजपा विरोधी वोटों का इस कदर ध्रुवीकरण किया गया कि मोदी की सेना को टिककर लड़ने की मजबूत जमीन भी मयस्सर नहीं हो सकी। लेकिन मसला है कि इस तयशुदा लक्ष्य को हासिल करने के लिये कोई ठोस राह भी तो मिले। इस नजरिये से देखें तो राहें गुमशुदा ही नजर आ रही हैं। जिधर से कोई राह खोलने की कोशिश होती है उधर अगले कदम पर ही किसी ना किसी के मत्वाकांक्षाओं की दीवार आड़े आ जाती है। मसलन कोशिश हुई टूटे-बिखरे व बिछड़े समाजवादी कुनबे को एकजुट करने की तो इसमें बिहार की राजनीति में अपना वर्चस्व कायम रखने की राजद व जदयू की और यूपी में अपना एकाधिकार कायम रखने की सपा की महत्वाकांक्षा आड़े आ गयी। फिर नये सिरे से नितीश ने कोशिश शुरू की जदयू का विस्तार करने के लिये अजित सिंह व बाबूलाल मरांडी को दल-बल सहित संगठन में शामिल कराने की। लेकिन इसमें भी फच्चर यह फंसा कि जब इन दोनों को हाथों-हाथ कोई फायदा मिलना ही नहीं है तो अपनी दुकान समेट कर वे किसी अन्य के साथ विलय ही क्यों करें। लिहाजा यह विचार भी आगे नहीं बढ़ सका। यहां तक कि बिहार विधानसभा चुनाव के बाद राजद व जदयू का विलय हो जाने की जो बात दोनों ही दलों के शीर्ष नेतृत्व ने कही थी उस दिशा में भी कुछ होता हुआ नहीं दिख रहा है। हो भी कैसे? ना तो नितीश कभी लालू के मातहत काम कर सकते हैं और ना ही लालू अपने पूरे जीवन की कमाई नितीश के हवाले कर सकते हैं। लिहाजा वह विचार भी परवान चढ़ पाना नामुमकिन ही दिख रहा है। इन तमाम प्रयोगों का प्रस्ताव विफल हो जाने के बाद अब एक ओर डी राजा ने पांच टुकड़ों में बंटे वाम दलों को एक मंच पर आने का प्रस्ताव दिया है जबकि ममता बनर्जी के नेतृत्व में तीसरा मोर्चा गठित करने की कवायद समाजवादियों ने शुरू की है। लेकिन मसला वही है कि जहां ममता होगी वहां वामदल नहीं हो सकते, जहां सपा होगी वहां बसपा नहीं रह सकती, द्रमुक और अन्ना द्रमुक एक साथ नहीं आ सकते और सबसे बड़ी बात यह कि राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस किसी अन्य का नेतृत्व स्वीकार ही नहीं कर सकती। उस पर तुर्रा यह कि बीजद और टीआरएस सरीखे दल अपना पत्ता खोलने के लिये कतई तैयार नहीं हैं। यानि कुल मिलाकर देखें तो लोकसभा चुनाव में पड़े 68 फीसदी भाजपा विरोधी वोटों को एकजुट करके दिल्ली की कुर्सी पर कब्जा जमाने का लक्ष्य तो कागजी तौर पर सबके समक्ष पूरी तरह स्पष्ट है लेकिन इस लक्ष्य को हासिल करने के लिये आवश्यक विपक्षी एकजुटता की राह पूरी तरह गुमशुदा है। लिहाजा अब तीसरे मोर्चे का विचार भी माखौल का पर्याय बनता जा रहा है। तभी तो भाजपा भी निश्चिंत है और कांग्रेस भी। दोनों को पता है कि उनके मोर्चे से अलग कोई नया मोर्चा गठित हो पाना नामुमकिन की हद तक मुश्किल है। यानि मोर्चे दो ही हो सकते हैं। या तो भाजपा के नेतृत्व में राजग या फिर कांग्रेस के नेतृत्व में संप्रग। इसके अलावा किसी तीसरे के नेतृत्व पर बाकियों के बीच सहमति बन ही नहीं सकती। और अगर बनी भी तो उसका कोई फायदा नहीं मिलना क्योंकि अलग-अलग प्रदेशों की अलग-अलग पार्टियां एकजुट भी हो जाएं तो इसका कोई लाभ-हानि का चुनावी समीकरण नहीं बन सकता। फायदा तो तब हो जब बिहार की तरह हर सूबे की भाजपा विरोधी पार्टियां अपने मतभेद भुलाकर एकजुट हों और राष्ट्रीय स्तर पर उनका एक व्यापक गठजोड़ बने। वर्ना अगर यूपी की तरह चौतरफा लड़ाई हुई और कोई किसी के साथ आने के लिये तैयार नहीं हुआ तो निर्धारित लक्ष्य की राहें यथावत गुमशुदा ही रहेंगी।